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Thursday, 14 November 2019

बाल सखा : मान सिंह

मेरी यादों का पिटारा दरअसल एक बाबा आदम के जमाने का डिब्बा- कैमरा है | वही डब्बेनुमा तिपाई के ऊपर टिका काले कपड़े से ढ़का कैमरा जिसे पुरानी पीढ़ी के लोगों ने अक्सर सड़क किनारे या नुमाइशों – मेलों में देखा होगा और हो सकता है खुद फोटो खिचवाई भी हो | उसी कैमरे के अंदर झाँकने पर मुझे कभी -कभी यादों के ढ़ेर में बहुत ही पुरानी और धुंधली सी कुछ ऐसी तस्वीरें नज़र आ जाती हैं जो आज भी दिल में एक गहरी सी टीस छोड़ जाती हैं | ऐसी भावुक स्मृतियाँ जिन्होने दिल की गहराइयों में उतर कर गहरी जड़ें जमा लीं हों, वह तो सारी ज़िंदगी आपके कंधों पर सवार रहकर हर क्षण अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाती रहेंगी ही | मान सिंह भी मेरे बचपन से जुड़ी एक ऐसी ही याद है जिसे आज आप सबसे साझा कर रहा हूँ |

मान सिंह से मिलने के लिए आपको मेरे साथ वक्त की पटरी पर बहुत ही पीछे चलना पड़ेगा | मेरठ – रुड़की -सहारनपुर रेल मार्ग पर एक नन्हा सा स्टेशन है – डौसनी | वह आज से साठ साल पहले भी तन्हा और वीरान था और आज भी उसी हालत में है | शायद वह भी आज तक अच्छे दिनों का इंतज़ार ही कर रहा है | सभी मेल और एक्सप्रेस गाडियाँ अभी भी तूफानी गति से उस स्टेशन पर बिना रुके धूल उड़ाते गुज़र जाती हैं | उस स्टेशन की हमदर्द हैं केवल कुछ गिनी -चुनी मरियल पेसेंजर गाडियाँ जो अपनी मर्जी से लखनवी अंदाज़ में शरमाती-सकुचाती आती हैं, आराम से ठहरती हैं और फिर किसी बूढ़े गठिया के मरीज की तरह कलपती -कराहती होले-होले विदा हो जाती हैं | मेरे नाना वहीं पर स्टेशन मास्टर थे यानी एक तरह से सर्वे-सर्वा | मेरे बचपन की प्राचीनतम यादें वहीं से जुड़ी हुई हैं | रेलवे के क्वाटर में रहते थे | उस समय मेरी उम्र होगी यही कोई चार –पाँच साल की | सारे दिन घर के आसपास और उस वीरान से स्टेशन पर ही खेलकूद में व्यस्त रहता | मुझे वह शाम अभी भी अच्छी तरह से याद है – शाम के तीन-चार बजे का सा समय था | मैं अपनी नानी के साथ रेलवे क्वाटर के सामने बैठा धूप सेक रहा था | तभी स्टेशन पर ही काम करने वाला एक कर्मचारी आया | उसके साथ एक बच्चा था जिसकी उम्र लगभग दस साल होगी| बच्चे के हाथ में एक झोला था जिसमें दो-चार कपड़े थे | पूछने पर बच्चे ने अपना नाम मान सिंह बताया |उसके पिता बहुत ही बेरहमी से मारपीट किया करते थे इसलिए तंग आकर पौड़ी गढ़वाल के गाँव के घर से भाग लिया | स्टेशन पर आवारा भटकते उस बच्चे पर जब रेलवे कर्मचारी की नज़र पड़ी वह उसे लेकर हमारे घर आ गया | बहुत समझाने –बुझाने पर भी वह वापिस अपने घर लौटने को तैयार नहीं था | आखिरकार नानी का दिल पसीज ही गया और इस तरह उस बेसहारा बच्चे को मिला बसेरा और मुझ एकल और तन्हा बच्चे को मिला अपने जीवन का पहला दोस्त – बालसखा मान सिंह |

 पिकनिक : बाएँ से - मैं , पिता, बहन, भाई, माँ और अंत में मान सिंह  

अब मेरा समय और ज्यादा मस्ती कटने लगा – मान सिंह का साथ जो मिल गया था | घर के काम -काज में भी मानसिंह नानी का हाथ बटा देता था | घर में जल्द ही एक परिवार के सदस्य की तरह से घुल-मिल गया | मैंने तो यहाँ तक सुना कि एक बार किसी परिचित ने नाना के सामने मान सिंह का ज़िक्र एक नौकर के रूप में कर दिया | इतना सुनना भर था कि नाना  ने गुस्से में  रौद्र रूप दिखलाते हुए दहाड़ मारी कि मेरे  बच्चे को नौकर कहने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई | यह था मेरे नाना -नानी के मान सिंह से आत्मीय लगाव की पराकाष्ठा जिससे उस बच्चे के मन में पारिवारिक सदस्य होने की भावना के शुरुआती बीज पनपे | जहां कहीं भी हम जाते मान सिंह हमारी टीम का स्थायी हिस्सा होता | अगर किसी रिश्तेदारी में भी जब कभी जाते तो वह बच्चा वहाँ भी अपनी मिलनसारिता से सभी में ऐसे घुल-मिल जाता जिसे दूध में बताशा |

कुछ समय बाद डौसनी स्टेशन से बदली होकर पास के स्टेशन पथरी भी रहे | यह वही पथरी है जिसके बारे में पूरी कहानी बचपन की बहार: पथरी की पुकार में पढ़ी होगी | अगर नहीं तो दिये गए लिंक पर क्लिक करके फिर से याद ताज़ा कर सकते हैं |  मानसिंह का साथ बना रहा | खेलकूद में तो वह साथ रहता ही, मुझे अपने रोज़मर्रा के कामों में भी शामिल कर लेता जिसमें मुझे भी बहुत मज़ा आता | लालटेन की चिमनी साफ करना, अँगीठी सुलगाना, कोयले वाली प्रैस से कपड़ों पर इस्तरी होते अचरज से देखना मेरे लिए एक तरह से खेल और मनोरंजन का साधन बन चुके थे | 

पथरी आने के कुछ ही साल बाद वक्त ने बड़ी ज़बरदस्त करवट ली | मुझे अपने माता-पिता के पास उड़ीसा जाना पड़ा | नाना का कैंसर से आकस्मिक निधन हो गया | नानी और मान सिंह को मेरे मामा- जो नेवी में लेफ्टिनेंट थे, अपने पास दिल्ली ही ले आए | कुछ साल बाद मेरे पिता भी उड़ीसा छोड़ कर दिल्ली आ गए थे | यहीं पर मुझे अपना बाल- सखा दोबारा मिला | मान सिंह  के साथ हम सभी भाई -बहन मिल कर जो हल्ला -गुल्ला और शोर शराबा मचाते थे उन सभी शरारतों की मिठास आज भी मेरी ज़िंदगी में मौजूद है | इस धमा-चौकड़ी में शामिल होने में मामा भी तब पीछे नहीं रहते |

बाएँ से : आगे ; मैं , मामा और पीछे भाई, माँ , बहन और मान सिंह  

बाएँ से :  मान सिंह, मैं, भाई -राकेश जी , सबसे आगे बहन पारुल 
उसी दौरान दिल्ली में ही नेवी वाले मामा की शादी हुई- वह भी बहुत ही धूम-धाम से | मान सिंह जो तब किशोरावस्था में प्रवेश कर चुका था, शादी की तैयारियों और प्रबंध करने में घर के किसी बड़े- बुज़ुर्ग की सी ज़िम्मेदारी दौड़-दौड़ कर निभा रहा था | यह घर उसका है – यह ख्याल बहुत अंदर तक उसके मन में घर कर चुका था | घर के सभी सदस्यों को रिश्तों के नाम से ही संबोधित करना उसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार लगता था | शादी के बाद मामा दिल्ली से ट्रान्सफर हो कर अपनी पत्नी , माँ और मानसिंह के साथ बंबई ( आज की मुंबई) चले गए | बाल-सखा फिर बिछड़ गया |

समय अपनी रफ्तार से दौड़ रहा था | मैं स्कूल की पढ़ाई में व्यस्त था | फिर एक दिन खबर आई मान सिंह बंबई में घर छोड़ कर कहीं चला गया | ऐसी क्या बात हुई जिसने उसके दिल को इतना झकझोर दिया यह बात लंबे समय तक रहस्य ही रही | इस मुद्दे पर कहानी से जुड़े सभी पात्र लंबे समय तक खामोश ही रहे कभी कुछ बताया नहीं |

तब तक मैं आठवीं कक्षा में आ गया था | दिल्ली में मानसरोवर पार्क में रहा करते थे | एक दिन मान सिंह घर पर अचानक आ पहुंचा | मेरी खुशी का मानो ठिकाना ही नहीं था | इतनी खुशी कि उस दिन स्कूल का भी चुपचाप बहिष्कार कर दिया | माँ अध्यापिका थी , रोजाना की तरह से  तब तक घर वापिस लौटी नहीं थी | अब घर पर कोई रोकने वाला था नहीं सो उनकी अनुपस्थिति का पूरा फायदा लेते हुए  उठाई साइकिल और पास के ही सिनेमाघर में पहुँच गए पिक्चर देखने मानसिंह के साथ | पिक्चर के बाद इधर-उधर घूमते रहे | शाम को जब वापिस घर पहुंचे तब हमारी खुद की जो पिक्चर बनी वह आज तक मुझे याद है | मानसिंह तो कुटाई से बच गया पर मेरी जो कान खिचाई हुई….. तौबा-तौबा | उसने माँ को बताया कि वह दिल्ली में ही किसी डाक्टर के यहाँ काम कर रहा था |उसके बाद लंबे अरसे तक मान सिंह से कोई संपर्क नहीं रहा | मां को वह जीजी कहा करता था | नानी –मामा के घर को वह मुंबई में बहुत पहले ही छोड़ चुका था इसीलिए शायद उसने सोच समझ कर ही दूरी बना कर रखी थी | वह दोनों परिवार के बीच किसी भी प्रकार की गलतफहमी संभवत: नहीं चाहता होगा |
कई बरस इसी प्रकार बीत गए | मैं भी कॉलेज की पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली से बाहर चला गया | जब वापिस लौटा – शायद वर्ष 1977 चल रहा था | मेरे उम्र भी तब तक बीस साल की रही होगी | घर के आँगन में बैठा कुछ पढ़ रहा था | दरवाजे पर ठक-ठक हुई| जा कर दरवाजा खोला – आँखे आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं | सामने मान सिंह था | लेकिन दूसरे ही पल मुझे लगा मैं चक्कर खा कर नीचे गिर पड़ूँगा | मानसिंह बैसाखियों के सहारे खड़ा था | उसकी बड़ी -बड़ी आँखे मुझे बरबस निहार रहीं थी | उसके होठों पर अपने बचपन के बाल –सखा को देख कर वही पुरानी मुस्कान होठों से निकलने का मानों भरसक असफल प्रयास कर रही थी | मैं उसे सहारा देकर अंदर घर में लाया | उसकी हालत को याद करके आज भी मेरे आँसू निकल आते हैं | जब वह बैठा तब मुझे पता चला उसकी गरदन भी पूरी तरह से जकड़ चुकी थी | टांग में बुरी तरह से जख्म हुआ पड़ा था | उसे हड्डियों की तपेदिक हो चुकी थी | पाँव का आपरेशन हुआ था जिसमें हड्डी को काटना पड़ा जिसके कारण एक पाँव छोटा हो गया और बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा | वह मान सिंह जिसके साथ मैं बचपन में खेला करता था, जो कभी तीन पहिये की साइकिल पर मुझे बैठा कर पीछे से धक्का लगाता था और मेरी खिलखिलाहट आसमान को छूती, उसी बाल- सखा को आज बैसाखियों का सहारा लेने की मजबूर हालत में देख कर दिल पता नहीं कैसा-कैसा हो चला था | मेरे आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे | उसने काँपते हाथों से अपनी जेब से कुछ रुपये निकाल कर मेरी माँ को दिये, बोला जीजी अभी तो रखो , वक्त जरूरत पर मांग लूँगा | माँ ने तभी घर के पास के पोस्ट ऑफिस में उसका खाता खुलवा दिया | बातों ही बातों में उस दिन मान सिंह ने बताया कि तपेदिक होने के बाद, उस डाक्टर के यहाँ से भी काम छूट गया | फिलहाल वह नई दिल्ली में ही विकलांगों के लिए बने सरकारी पुनर्वास केंद्र में सिलाई का काम करता है | वहीं से जो थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती है उसी की पाई-पाई जोड़ कर यहाँ जमा करवाने आया है | मैं चुपचाप बैठा सोच रहा था कि यह वही मान सिंह है जिसके हाथों में किसी समय पूरे घर की चाबियाँ होती थीं | वक्त ने उस अच्छे –भले इंसान की क्या दुर्दशा कर दी | 
मैं उसके बाद फिर अपनी नौकरी के सिलसिले में घर से दूर चला गया | मान सिंह से मेरी फिर कोई मुलाक़ात नहीं हुई , कोई संपर्क नहीं हुआ | माँ ने बताया वह वापिस अपने उसी गाँव चला गया जहां से बचपन में किसी समय अपने निर्दयी पिता की मार से बचने के लिए भाग आया था | शायद जीवन के शेष दिन अपनी उसी मिट्टी में बिताना चाहता हो |
अब अंत में बात उस कड़वे सच की जिससे उस किशोर वय मानसिंह का जीवन ही उलट-पुलट कर रख दिया | पहले दिन से ही नाना –नानी ने उसे हमेशा घर का सदस्य ही माना | यही बात उसके मन में अंदर तक घर कर चुकी थी | नाना के निधन के बाद उसे नानी अपने नेवी वाले अफसर बेटे यानी मेरे मामा के पास चली गईं | मामा की शादी भी अत्यंत प्रभावशाली और ऊंचे खानदान में हुई थी | उस बदले परिवेश में मानसिंह को शीघ्र ही महसूस होने लगा अब वह परिवार का सदस्य नहीं है – बस रह गया है महज़ एक खानदानी नौकर | डाट-डपट के माहोल को वह सह नहीं पा रहा था | जिन नाना –नानी ने घर से भागे उस आठ साल के बेसहारा बच्चे को आसरा दिया, उनके परिवार को छोड़ने का निर्णय कोई आसान काम नहीं था | पर यहाँ प्रश्न आत्म सम्मान का था जिसने उसे हिम्मत दी यह सोच कर कि अगर नौकर बनना ही है तो किसी गैर के यहाँ बनो, कम से कम दिल तो नहीं दुखेगा | और इस तरह मेरा दोस्त चल पड़ा आत्म –सम्मान की डगर पर – निडर और निर्भीक हो कर | इस आत्म-सम्मान की लड़ाई में उसने बहुत कुछ गवायाँ भी लेकिन विपरीत परिस्थितियों के आगे उसने आत्म- समर्पण नहीं किया | 
मुझे नहीं पता मेरा बाल-सखा मान सिंह आज कहाँ है, किस हाल में है , और है भी या नहीं | उसका आधा अधूरा पता आज भी किसी डाक टिकट की तरह मेरे ज़हन के लिफाफे पर  चिपका है: 
मान सिंह बिष्ट, 
गाँव व पोस्ट ऑफिस : दुगड्डा
जिला: पौड़ी गढ़वाल 
उत्तराखंड 
मुझे आज भी यह आस है शायद कोई तो चमत्कार मुझे उससे फिर से मिला दे और मैं उसके गले से चिपट कर एक बार फिर उसी साठ वर्ष पहले की दुनिया में पहुँच जाऊँ जब वह मुझे डौसनी स्टेशन पर पहली बार मिला था |
( इस आपबीती कहानी के लिए सादर आभार आदरणीय विमल कुमार जी  और घर के बड़े-बूढ़ों का जिन्होने मेरी यादों के चश्में से धूल हटा कर इस संस्मरण को प्रामाणिकता दी )     

Sunday, 10 November 2019

मजबूर हूँ पर निराश नहीं : चंद्रभान

कबीर दास जी के एक दोहे की पंक्ति है : मन के हारे हार है, मन के जीते जीत | अर्थात सब कुछ आपके आत्म विश्वास पर निर्भर करता है | अगर आप हिम्मत हार बैठे तो सफलता नहीं मिल सकती | आज यह बात याद आने के पीछे भी एक विशेष कारण है | मेरी आदत है घर के पास बने पार्क में घूम कर आने की | वहीं पर कसरत करने की तरह -तरह की मशीनें भी लगी हैं जिन पर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बच्चे, बूढ़े और जवान , सभी जोर-आजमाइश करते रहते हैं | मैं भी सामर्थ्य के अनुसार व्यायाम करता हूँ | आज का दिन भी और अन्य दिनों की तरह सामान्य ही था | पार्क में एक कोने में आवारा कुत्तों की टोली आराम फरमा रही थी | पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे थे | ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी | कसरत-मशीनों पर वही नियमित रूप से आने वाले पुराने जाने-पहचाने चेहरे पसीना बहाने में व्यस्त थे | एक नए चेहरे पर नज़र पड़ी | वह बड़ी तन्मन्यता से दीनो-दुनिया से बेखबर एक जिम मशीन पर कसरत कर रहा था |
कड़ी मेहनत - पक्का इरादा : चंद्रभान 
 एक बार सरसरी नज़र से देखने के बाद जब उस शख्स को दोबारा ध्यान से देखा तो अवाक रह गया - वह नेत्रहीन था | सफ़ेद कमीज़ और नीली जींस में उसका दुबला-पतला शरीर मानो कुछ अलग ही कहानी सुना रहा था |अपनी जिज्ञासा को मैं अधिक देर तक नहीं दबा सका और अंत में उस युवक के पास पहुँच ही गया - मन में उठ रहे तरह-तरह के सवालों के साथ | उस युवक ने जो कुछ भी अपने बारे में बताया वह मन को छू लेने वाला तो था ही , साथ ही प्रेरणादायक भी था | उस युवक जिसका नाम था चंद्रभान, की आपबीती कहानी को आप सब तक पहुंचाने के लोभ से मैं अपने आप को नहीं रोक सका हूँ | 
चंद्रभान का बचपन शुरू होता है उत्तरप्रदेश के इलाहबाद जिले के एक छोटे से गाँव – अकोढा से | बचपन के शुरुआती दिनों में वह बिल्कुल ठीक -ठाक था | चार साल की उम्र में उसे गंभीर बीमारी ने घेर लिया | सारे शरीर पर फुंसी -फोड़े निकल आये थे | गाँव के ही एक डाक्टर ने इलाज़ करना शुरू किया पर रोग था कि काबू में नही आ पाया | आँखों पर भी बहुत बुरा असर हुआ और धीरे -धीरे दिखना बंद होता चला गया | बाद में जब तक पता चला कि गाँव में इलाज करने वाला डाक्टर फ़र्जी – झोला छाप है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी | आस-पास के शहरों में भी दूसरे डाक्टरों को दिखाने का कोई लाभ नहीं हुआ और इस तरह से नन्हे चंद्रभान की हंसती -खेलती दुनिया भयावह अंधेरों के आगोश में समा गयी | दुर्भाग्य की इतनी बड़ी मार उस छोटे से बच्चे के लिए कुछ कम नहीं थी | लगभग पूरा बचपन ही माता-पिता और रिश्तेदारों के इस दिलासे पर निकल गया कि इलाज चल रहा है – आँखे ठीक हो जायेंगी | सोचिए उस बच्चे की मनोदशा जिस के लिए सारी दुनिया गहन काली रात में बदल चुकी थी और जिसे हर दिन उस नयी सुबह का इंतज़ार रहता जिसमें वह फिर से देख पायेगा – अपनी मां , पिता , भाई-बहन , संगी -साथी, उगता सूरज, गाँव की पगडंडी और दूर तक फैले खेत | वह खुशनुमा सुबह कभी नहीं आयी और उसे अब इस अन्धेरा दुनिया में ही रहने की आदत डालनी पड़ेगी इसे स्वीकार करने में बहुत वक्त लगा |
इतनी घोर विपत्ति के बावजूद अब एक बात तो उस बच्चे के मनो-मस्तिष्क में धीरे -धीरे घर करने लगी – और वह यह कि इस दुनिया में अगर भविष्य में उसका कोई सहारा होगा तो वह स्वयं | उसके लिए जरुरी होगा पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खुद खड़े होना | गाँव के सामान्य स्कूल में ही शुरुआती पढ़ाई की | बाद में इलाहबाद के एक संस्थान से ब्रेल लिपि का अध्ययन किया | नेत्रहीनों के लिए पुस्तकें ब्रेल लिपि में ही लिखी जाती हैं जिनके उभरे हुए विशेष प्रकार के बिंदुदार अक्षरों को उँगलियों से स्पर्श करके पहचाना और पढ़ा जाता है | इसे सीखने का लाभ यह हुआ कि अब किसी और से पाठ सुनकर याद करने की निर्भरता लगभग समाप्त ही हो गयी | इसके बाद दिल्ली की ओर रुख किया| चन्द्र ने किसी तरह से सी.बी.एस .सी, दिल्ली बोर्ड से इंटर पास किया | गाँव में घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे | जैसे-तैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में बतौर प्राइवेट छात्र के रूप में दाखिला लिया | तमाम समस्याओं के बावजूद कई प्रयासों में आखिरकार बी.ए पास कर ही लिया | 
चन्द्रभान 
अब चंद्रभान अपने लिए काम की तलाश में है | बहुत ही मायूसी में कहता है “ आज के ज़माने में जब अच्छे-भले लाखों लोग बेरोजगार घूम रहे हैं तो मुझे कौन पूछेगा | इसके बावजूद मेरे हौसले बुलंद हैं और मैंने हिम्मत नहीं हारी है |” मुझे सबसे अच्छी बात चंद्रभान की यह लगी कि वह अपने स्वास्थ के प्रति जागरूक है | वह कहता है – भगवान् ने मुझे जो कमी देनी थी वह तो दे ही दी, पर इस दिए हुए शरीर को मजबूत और ताकतवर रखना तो मेरी ही जिम्मेदारी है | यही कारण है कि जब भी मौका मिलता है चंद्रभान आसपास के पार्क में बने खुले जिम में कसरत करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं | जैसे की आपको लेख के शुरू में ही आपको बताया था उससे मेरी पहली मुलाक़ात भी ऐसे ही एक पार्क में हुई | जीवन के प्रति भी वह बहुत ही जिंदादिल और सकारात्मक सोच रखता है | मैं आश्चर्यचकित रह गया जब उसने मुझे बताया कि वह व्हाट्स एप और फेसबुक के माध्यम से सोशल मीडिया पर भी सक्रिय है | इस काम में टेक्स्ट से स्पीच जैसे कई सहायक एप्लीकेशन मदद करते हैं | 
आजकल वह दिल्ली के नंदनगरी में स्थित नेत्रहीनों के लिए बने एक संस्थान में रह रहा है | चंद्रभान के सामने समस्याओं का पहाड़ है लेकिन उसे विश्वास है गिरजा कुमार माथुर के उस गीत पर “मन में है विश्वास , पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन” | नौकरी की तलाश जारी है ..... मुझे भी उम्मीद है उसे मंजिल जरुर मिलेगी | मेरा मानना है कि कठिनाई के दौर से गुजरने वाले के लिए सहायता का हाथ और हिम्मत बंधाने वाले दो मीठे बोल से बढ़ कर और कुछ नहीं | अपने सभी समर्थ और सवेंदनशील पाठको से मेरी अपेक्षा है अगर उनके प्रयास से किसी की मजबूर बीच मझधार में डूबती ज़िंदगी को सहारा मिल जाए तो हम समाज और ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य को कुछ हद तक पूरा कर सकेंगे | अपनी इसी आशा और अपेक्षा के साथ मैं चंद्रभान का फोन नंबर 9599853201 उसकी सहमति से आप सभी से साझा कर रहा हूँ, इस अपील के साथ कि इस संघर्षरत नेत्रहीन लेकिन शिक्षित नौजवान को जीवन में स्थापित करने में मार्गदर्शन करें , सहायता करें अन्यथा कम -से- कम हिम्मत तो जरूर बढ़ाएं |

Friday, 1 November 2019

एक पहेली - अनसुलझी



इस बार की कहानी के ज़्यादातर मुख्य पात्र उस दुनिया के हैं जो इंसानी दुनिया से संबंध नहीं रखते | रिश्तों के उलझे ताने-बाने, मानवीय संवेदना और सबसे ऊपर घूमते कुटिल भाग्य -चक्र के इर्द-गिर्द यह कहानी घूमती है जो अभी कुछ दिन पहले ही घटी| उस घटना ने मुझे अंदर तक कुछ इस कदर झकझोरा कि अभी तक उसके सदमें से उबर नहीं पाया हूँ |
मेरी कॉलोनी के आवारा कुत्तों को मेरे घर के मेन गेट के सामने अड्डा बना कर बैठने में बहुत मज़ा आता है | वे सब वहाँ बैठ कर उतना ही सुरक्षित महसूस करते हैं जितना दाऊद कराची में और जनरल मुशर्रफ दुबई में | उनके झुंड का अपना ही एक अलग किस्म का साम्राज्य है | घर को इतना ज़बरदस्त सुरक्षा कवच प्रदान कराते हैं कि देश के प्रधानमंत्री की ज़ेड प्लस सिक्योरिटी भी उसके सामने पानी भरती प्रतीत होती है | मेरा पालतू कुत्ता चंपू उन सब आतंकवादियों का उसी किस्म का स्व-घोषित लीडर है जैसे अल-बगदादी या बिन लादेन | क्या मजाल है कोई भी ऐरा-गैरा घर की कॉल -बेल भी बजा दे | उन सबका इतने लंबे समय से साथ बना हुआ है कि मैं भी किसी गाँव के बुजुर्ग की तरह उनकी कई पीढ़ियों का गवाह हूँ | कौन कुत्ता किसका नाना है , किसका पोता है , धेवता है- सबका बहीखाता हरिद्वार के किसी पंडे की तरह से मैं बना सकता हूँ | सहूलियत के लिए उस मित्र-मंडली के हर सदस्य का मैंने नाम रख छोड़ा है  | उसी टीम की एक नई मेम्बर थी किशोरी जिसकी उम्र भी रही होगी यही कोई डेढ़ साल के आस-पास | काले-सफ़ेद रंग की , छोटे से कद-काठी की और स्वभाव से बहुत ही चंचल डॉगी | वह उन गिने- चुने वरीयता प्राप्त रेंप बिरादरी की सदस्यों में से एक थी जिन्हें गेट से अंदर आने का भी अधिकार प्राप्त था | जब से यह बात पता चली कि किशोरी गर्भावस्था में है , तब तो उसकी खातिर तवज्जो में और भी इजाफ़ा हो गया | उसके भोजन-पानी का भी ख़ास ही ध्यान रखा जाने लगा | रेंप बिरादरी के दूसरे सदस्यों को बहुत ही ईर्षा होती जब किशोरी कटोरा भर दूध चट कर जाती और बाहर गेट के पार बाकी सब ललचाई नज़रों से जीभ लपलपाते रह जाते | 
मेरे मकान के बगल में ही एक खाली प्लाट है, उसी में किशोरी ने अपना बसेरा कर लिया था | आखिर वह दिन भी आया जब किशोरी ने इकलोते नवजात पिल्ले को जन्म दिया | उस पिल्ले की शरीर पर तेंदुए जैसी चितकबरी पट्टियाँ थीं इसलिए उसका नामकरण भी उसी अनुसार कर दिया - तेंदुल | अब ज़्यादातर समय किशोरी अपने उस नन्हें तेंदुल की देख-रेख में ही व्यस्त रहती| अपने बच्चे की सुरक्षा के प्रति अत्यंत सचेत रहती | पहले की शांत स्वभाव किशोरी, अब आक्रामक हो चली थी | जरा सा भी संदेह होने पर वह रास्ता चलते लोगों को काट खाती | इसी वज़ह से कुछ लोगों के मन में किशोरी के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा भरा पड़ा था | हमारे प्रति उसका स्वभाव अभी भी वही प्रेम भरा था, हम उसके बच्चे को बिना किसी डर के प्यार से सहला भी देते थे और वह बहुत ही भरोसे की नज़रों से हमें टकटकी लगाए निहारती रहती | 
इन्हीं दिनों दिवाली का त्योहार भी आ गया| दिवाली की रात, पटाखों और आतिशबाज़ी के शोर से मेरे इस विशेष रेंप निवासी मित्र मंडली के सदस्यों के साथ, किशोरी भी बहुत परेशान थी | कई बार भाग-भाग कर घर के अंदर सीढ़ियों पर छुपने का प्रयत्न करते | यह सब देख कर बहुत दया भी आती पर मैं भी क्या कर सकता था | दिवाली से अगला दिन था गौवर्धन पूजा का | रोज़ की तरह किशोरी सुबह -सुबह आठ बजे मिलने आ गई | बदकिस्मती से उस समय घर पर दूध नहीं था सो उसके नाश्ते-पानी का प्रबंध नहीं हो सका | बेचारी मन-मार कर वापिस अपने तेंदुल के पास चली गई | अभी एक घंटा ही बीता होगा कि पड़ोस का एक बच्चा भागता हुआ आया और बोला “अंकल मेरे साथ आइये” | वह मुझे घर के बगल के उसी खाली प्लाट में ले गया| वहाँ पर लेटी हुई किशोरी की ओर इशारा करते हुए वह बोला “यह हिल-डुल नहीं रही हैं” | पहली नज़र में देखने में मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा| किशोरी का प्यारा सा पिल्ला तेंदुल बड़ी व्याकुलता से अपनी माँ का दूध पीने का जतन कर रहा था | पास जा कर ध्यान से देखा तो महसूस हुआ किशोरी के शरीर से प्राण पखेरू उड़ चुके थे | उसकी खुली निस्तेज आँखें मानों मुझ से कह रहीं थी – “मेरे दोस्त तुम क्या समझते हो सुबह मैं दूध पीने आई थी | मैं तो लंबे सफर पर जाने से पहले तुम सबसे हमेशा के लिए विदा लेने आई थी |” तेंदुल तब भी अपनी माँ के पेट से चिपटा दूध पीने के प्रयास में व्यस्त था | मैं इससे अधिक झटका झेलने की हालत में नहीं था सो तुरंत लौट कर घर आ गया | 

 घर आकर मन और व्याकुल हो रहा था | दिल में उठ रही उथल-पुथल ने मुझे चैन से नहीं बैठने दिया और कुछ ही देर बाद मैं वापिस फिर उसी जगह पहुँच गया| अब का दृश्य और भी अधिक मार्मिक हो गया था | नन्हें तेंदुल- जिसकी अभी तक आंखे भी नहीं खुल पायी थीं, केवल स्पर्श के सहारे ही अपनी माँ को पहचान पाता था | वह निश्चेष्ट पड़ी अपनी माँ की कोई हरकत नहीं पाकर अब उसके गले और चेहरे से चिपट कर बुरी तरह से रो रहा था | शायद पहली बार उसे अपनी माँ का दुलार नहीं मिल पा रहा था जो उसके लिए बहुत ही अचंभे की बात थी | यह सब देख कर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था | समझ नहीं पा रहा था कि इस दारुण स्थिति मे क्या करूँ | कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था | आखिरकार पता नहीं क्या सोच कर उस छोटे से पिल्ले तेंदुल को सावधानी किशोरी से अलग किया और अपनी गोद में उठा कर घर ले आया | आँगन में ही छोटी सी चादर बिछा कर तेंदुल को लिटा दिया | डाक्टर से फोन पर ही आवश्यक हिदायतें लीं | पास की दुकान से गाय का दूध ला कर सिरिन्ज से तेंदुल को पिलाया | भूखे से बेहाल तेंदुल पेट भर जाने के बाद फिर से गहरी नींद में सो गया | मेरा पालतू कुत्ता चंपू जो बड़ी देर से यह सब अचरज से देख रहा था, तेंदुल के पास आया,प्यार से उसे सूंघा और फिर खामोशी से उसके पास ही बैठ गया | ऐसा अमूमन होता नहीं है क्योंकि चंपू को हर उस चीज़ से एक तरह से नफरत है जो उसकी सल्तनत में किसी भी तरह की दखलंदाजी करती है | मैं भी कुछ देर तेंदुल के पास बैठ कर अपने कमरे में चला गया | कुछ देर बाद कुछ आहट होने पर मैं बाहर निकला – देखा अधखुले फाटक से एक और परिचित कुत्ता ( सही शब्दों में – डॉगी) अंदर आ रहा था | गौर से देखने पर पहचाना, वह तेंदुल की माँ की भी माँ थी – यानि नानी  | वह भी चंपू के ही अंदाज़ में तेंदुल के पास आई , सूँघा फिर शरीर को चाटने लगी | उसके शरीर की भाव-भंगिमा को देख और सोच कर कि आखिर है तो तेंदुल की नानी, अब तक मैं भी थोड़ा निश्चिंत हो चला था | पता नहीं अचानक क्या हुआ .... नानी ने तेंदुल को जबड़े में भर लिया और बाहर जाने लगी | मेरे मुँह से भय-मिश्रित चीख निकली और दौड़ कर नानी की गरदन से तेंदुल को छुड़ाना चाहा | एक झटके से तेंदुल नानी के मुँह की गिरफ्त से बाहर नीचे फर्श पर गिरा | लेकिन तब तक नानी अपने पैने दांत तेंदुल के शरीर में गड़ा चुकी थी | नीचे फर्श पर गिरे नन्हें तेंदुल के तड़पते शरीर से खून की महीन धार फव्वारे की तरह फूट पड़ी | ऊंची आवाज देकर अपने बेटे को पुकारा | खून में सने नन्हें तेंदुल को अपने सीने से चिपका कर, गाड़ी में तुरंत डाक्टर के पास भागे | बदकिस्मती शायद अब भी हम सब का पीछा कर रही थी | डाक्टर का क्लीनिक तब तक बंद हो चुका था | डाक्टर को फोन किया, उसने शाम को दिखाने के लिए कहा और तब तक के लिए बीटाडिन लगाने की सलाह | तड़पते हुए तेंदुल का दर्द मुझसे देखा नहीं जा रहा था | बार-बार अपनी छोटी सी जीभ मुँह से बाहर निकालता और फिर बेहोश हो जाता | हम भी वापिस घर की ओर लौट चले | काँपते हाथों से बीटाडिन रुई पर लगा कर उसके शरीर को देखा, चोट से निकलता खून अब रुक कर जम चुका था | तेंदुल भी अपने प्राण छोड़ चुका था |

किशोरी और तेंदुल की असमायिक मौत ने मुझे बुरी तरह से हिला दिया | इस दुखद कांड से मेरे दिमाग में कई अनसुलझे सवाल एक के बाद एक आकर परेशान कर रहें हैं | क्या यह सब नियति थी – मृत माँ किशोरी की आत्मा ने दूध पीते नन्हें तेंदुल को चार घंटे के भीतर ही अपनी दुनिया में बुला लिया ? क्या नानी को अपनी बेटी किशोरी के जाने का इतना दुख: था कि गुस्से में तेंदुल को ही जिम्मेदार ठहराते हुए चोट पहुंचाई ? क्या नानी अपने तेंदुल को किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर लेजाने के प्रयास में गलती से दाँत चुभ गए ? 

किशोरी की अचानक हुई मौत भी अभी तक अनसुलझा रहस्य है | सुना है किसी ने उस मासूम को शायद ज़हर दे दिया था | अंत में माँ -बेटे की जोड़ी किशोरी और तेंदुल के लिए केवल इतना ही कहूँगा – अगले जन्म में उन्हें किसी धोखे का सामना नहीं करना पड़े | ॐ शांति

Sunday, 13 October 2019

घर में सावन

इस संसार में कोई भी पूरी तरह से स्वाबलंबी नहीं है | हर किसी को किसी न किसी पर कुछ हद तक निर्भर तो रहना ही पड़ता है | एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि बेशक आप कितने ही आला दर्जे के फन्ने खां क्यों न हों, कहीं तो आपको सज़दा करना ही पड़ेगा | अब किसी से अपना काम निकलवाना भी अपने आप में एक हुनर है जो हर किसी के बूते की बात नहीं | कुछ लोग इस कला में माहिर होते हैं तो कुछ फिस्सडी | पुराने से भी बहुत पुराने ज़माने में एक अत्यंत विद्वान व्यक्ति थे जिनका दिमाग चाचा चौधरी से भी तेज़ चलता था | उनके नाम से आप सभी भली- भांति परिचित होंगे – चाणक्य | वह भी लुकमान हकीम की तरह हर मर्ज़ की दवा बता गए थे – अब यह बात अलग है कि उनके बताये इलाज़ शारीरिक कष्टों से सम्बंधित न होकर, दुनियादारी, राजनीति और कूटनीति से ताल्लुक रखते हैं | हज़ारों वर्ष बीत जाने के बाद आज भी चाणक्य नीति के विचार आपको व्हाट्सेप के सुविचारों की दुनिया में उड़ान भरते नजर आ जायेंगे | किसी से भी काम निकलवाने के लिए चाणक्य नीति का एक बहुत ही कारगर और दमदार नुस्खा है – “ साम- दाम- दंड- भेद” | साम : समझा कर , दाम : लालच दे कर , दंड : धमका कर, भेद : कुटिल, तिकड़मबाजी और घाघ तरीके अपना कर ( जैसे ब्लेकमेलिंग ) | अब आप कहेंगे मैं यह सब आपको क्यों बता रहा हूँ | कारण केवल इतना है कि आज तक एक मजेदार घटना और चाणक्य नीति के बीच ताल-मेल नहीं बैठा पा रहा हूँ | 
यह किस्सा भी बहुत पुराना है और उस किस्से को मुझे सुनाने वाले मेरे ख़ास मित्र भी उतने ही पुराने हैं | उनका नाम भी बता ही देता हूँ - श्री रविन्द्र  निगम | देश -विदेश में सीमेंट उद्योग के तकनीकी क्षेत्र में एक तरह से भीष्म पितामह का रुतबा हासिल कर चुके हैं | विदेशों में भी अपने कार्य-कौशल के झंडे गाढ़ चुके हैं | इतिहास के पुराने पन्नों से निकाला यह किस्सा भी आज से तकरीबन तीस साल पुराना तो होगा ही | निगम साहब उन दिनों भारतीय सीमेंट निगम के हरियाणा में स्थित चरखी दादरी प्लांट में तैनात थे | लगे हाथ यह भी बताता चलूँ कि हमारे निगम साहब और सीमेंट निगम में कहीं से भी दूर-दूर तक कोई रिश्तेदारी नहीं है ठीक उसी तरह से जैसे प्राचीन गणितज्ञ -वैज्ञानिक आर्य भट्ट और आज की आलिया भट्ट में | चरखी दादरी जो आज के समय में अपने आप में एक जिला बन चुका है, रोहतक और भिवानी के साथ भौगोलिक रूप से सटा हुआ है | देश के सबसे पुराने सीमेंट कारखानों में से एक वहीं पर था| इसे उद्योगपति डालमिया ने वर्ष 1940 के दौरान बनवाया था | ज़ाहिर सी बात है , समय के साथ-साथ कारखाना पुराना और बीमार पड़ता चला गया और वर्ष 1980 के आते -आते एक तरह से दम ही तोड़ दिया | अब उस फेक्ट्री के बंद होने से सैकड़ों कर्मचारी बेरोजगार हो गए | तत्कालीन सरकार पर जब तरह-तरह के राजनैतिक दबाव पड़ने लगे तब उस बंद पुराने बीमार कारखाने को केंद्र सरकार के आधीन सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (सी.सी.आई ) के सुपर्द कर दिया गया | एक पुरानी कहावत है – मरी गैय्या , बामन के नाम | बस कुछ उसी तर्ज़ पर उस फटे - पुराने ढ़ोल को सी.सी.आई के गले में लटका दिया गया कि बेटा बजाते रहो अगर बजा सकते हो तो | सी.सी.आई ने अपने जिन अनुभवी और प्रतिभाशाली अधिकारियों की टीम को उस मरियल बैल को हांकने की जिम्मेदारी सौपीं थी , हमारे निगम साहब भी उन्हीं में से एक थे | 
उन दिनों के निगम साहब ( बाएं) के साथ मैं  मुकेश कौशिक 
अब जैसा कि आपको बता चुका हूँ वह सीमेंट प्लांट जितनी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था , वहां की रिहायशी कॉलोनी के मकानों की हालत भी उसी तरह की थी | वहां पर सिविल डिपार्टमेंट के प्रमुख थे श्री एच.सी.मित्तल | 
स्व० श्री एच.सी. मित्तल 
आज वह इस दुनिया में नहीं हैं – ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे | निहायत ही शरीफ़ और दीनो-दुनिया से दूर , अपने काम से काम रखने वाले | अब उन पुराने मकानों की मरम्मत करवाने से संबंधित तरह- तरह की शिकायतों का ढेर किसी पहाड़ से कम नहीं था | अब हालत यह कि इधर सीमेंट प्लांट की दिक्कतें और दूसरी ओर टाउनशिप के मकानों की टूट -फूट का रोज का रोना-पीटना और मित्तल साहब का दफ्तर में बैठना मुश्किल, सड़क पर चलना उससे भी ज्यादा मुश्किल | अपनी तरफ से जितना बन पड़ता करते पर कुल मिला कर मामला वही – एक अनार और सौ बीमार | 
ऐसी ही एक समस्या निगम साहब के घर में भी खड़ी हो गयी जब उनके फ्लेट में छत से ऊपर की मंजिल पर बने मकान का पानी टपक-टपक कर गिरना शुरू हो गया | निगम साहब ने भी अपनी फ़रियाद मित्तल साहब के डिपार्टमेंट में करवा दी| कुछ दिनों बाद एक-आध बार मित्तल साहब को याद भी दिलवा दिया | दिन बीतते गए और निगम साहब के फ्लेट में बेमौसम का सदाबहार सावन बदस्तूर जारी रहा | थक हार कर निगम साहब भी अपने दिल को तस्सली देकर चुप बैठ गए कि चेरापूंजी में भी तो लोग रहते ही हैं | समय एक सा नहीं रहता, आखिर एक दिन वक्त ने करवट ली और सड़क पर निगम साहब और सिविल डिपार्टमेंट के प्रमुख मित्तल साहब का आमना -सामना हो गया | मित्तल साहब खुद ही पूछ बैठे – आपके घर की जो प्रोब्लम थी वह ठीक हो गयी क्या ? निगम साहब थोड़ा सा मुस्कराए फिर बोले – “सर अभी तक तो नहीं | हाँ इतना जरूर है कि मैंने उस टपकती आलमारी के ठीक नीचे अपने पूजा घर के सभी देवी-देवता बिठा दिए हैं यह कह कर कि भगवन मैं तो अब मजबूर हूँ | जब तक मित्तल साहब की दया- दृष्टि नहीं होती तब तक इसी प्रकार से स्नान करते रहिए |हम से तो हो नहीं पाया, आप काम करवा सकते हैं तो करवा लीजिए |” सुनकर मित्तल साहब कुछ नहीं बोले , सिर्फ मुस्करा कर चल दिए और निगम साहब भी अपने काम काज में व्यस्त हो गए | 
अगले दिन जब रोज की तरह फेक्ट्री के लंच टाइम में निगम साहब अपने फ्लेट पर पहुंचे तो वहां का नज़ारा देख कर हक्के-बक्के रह गए | सुपरवाइज़र के साथ करीब दस -बारह मजदूर हल्ला बोल चुके थे | सभी उस टपकती छत के इलाज़ में मुस्तैदी से व्यस्त थे | उनके सुपरवाइजर ने बताया कि मित्तल साहब का आदेश है जब तक निगम साहब की ( या यूँ कह लीजिए देवी-देवताओं की ) शिकायत दूर नहीं होती है, वापिस मत लौटना | और इस प्रकार से निगम साहब के यहाँ से सदाबहार सावन की विदाई हुई | 
मैं आज तक यह नहीं समझ पाया हूँ कि इस सारे प्रकरण में “साम-दाम-दंड-भेद “ की चाणक्य नीति, या मित्तल साहब की शराफत या भक्ति-भाव  के कौन से फार्मूले ने काम कर दिया | अगर आप बता सकते हैं तो मुझे ज़रूर बताइयेगा |

Sunday, 11 August 2019

ऐसा भी होता है


यह ज़िंदगी भी बड़ी अजीब चीज़ है , पूछिए मत क्या रंग दिखलाती है | कुछ रंग ऐसे पक्के होते हैं जो अपने पीछे यादों के परदे पर ऐसे निशान छोड़ जाते हैं जो उम्र भर मिटाए नहीं मिटते | आज ऐसा ही अजीबोगरीब किस्सा सुनाने जा रहा हूँ जिसे सुनने के बाद आप भी बरबस कह उठेंगे क्या ऐसा भी होता है?
 
इस किस्से को सुनने के लिए आप को मेरे साथ आज से पचास साल पीछे जाना पड़ेगा | राशन, कंट्रोल और परमिट का ज़माना था | उस ज़माने में आज की तरह से दोपहिया वाहनों की सडकों पर ऐसी भरमार नहीं होती थी | स्कूटर खरीदने के लिए भी बाकायदा बुकिंग करानी पड़ती थी जिसमें बारी आने में सालों भी लग जाते थे | पिता जी सरकारी नौकरी में थे अत: सरकारी कोटे के हकदार थे जिसमें नंबर प्राथमिकता के आधार पर जल्दी आ जाता था | अपनी बरसों की पाई-पाई करके जोड़ी थोड़ी सी बचत के पैसों से , उन्होंने सरकारी कोटे में ही स्कूटर खरीदा | मुझे आज भी याद है , वह पीले रंग का वेस्पा स्कूटर था | बड़ी ही हिफाजत से रखा जाता , यहाँ तक कि शुरूआत में तो उसे घर के अन्दर उसी कमरे में रात को रखते जहां हम सोते थे | आखिर बड़े मेहनत के पसीने की कमाई का था सो डर स्वाभाविक था कि कहीं चोरी न हो जाए | उस समय हमारी उम्र भी होगी यही कोई दस-बारह बरस की | सुबह-सुबह हम दोनों भाइयों की ड्यूटी उसे साफ़ करने की लगती | रविवार के दिन उस स्कूटर को बाकायदा विशेष स्नान करवाया जाता जिसके बाद पालिश लगा कर खूब चमकाया जाता | हमारी सुबह की ड्यूटी में उस स्कूटर को घर के रेम्प से सड़क पर उतरवाने और शाम को पिता जी के दफ्तर लौटने पर धक्का देकर वापिस ऊपर चढ़वाने में मदद करना भी होता था | शाम को उस स्कूटर की पतली सी पी-पी की आवाज के हॉर्न का इंतज़ार रहता जो एक तरह से हमारे शाम की स्कूटर धक्का-पेल ड्यूटी पर तुरंत हाजिर होने सायरन होता था | 
सो दिन उसी तरह से गुज़रते जा रहे थे | एक दिन जब रोज़ शाम की तरह से स्कूटर के हार्न का इंतज़ार कर रहे थे तब  हार्न तो नहीं बजा, हाँ गेट पर दस्तक की आवाज जरूर हुई | देखा तो पिता जी तो खड़े हैं पर स्कूटर नदारत | पिता जी का चेहरा मुरझाया, पीला पड़ा हुआ | ठीक ऐसे जैसे कोई घुड़सवार युद्ध के बाद लौटता है किसी पैदल सैनिक के रूप में | माँ ने स्कूटर के बारे में पूछा तो कोई उत्तर नहीं | चुपचाप आकर कमरे में बैठ गए, रोज की तरह एक गिलास पानी पिया| माँ ने स्कूटर के बारे में दोबारा वही प्रश्न दोहराया तो इस बार छत पर लगे पंखे को देखते हुए धीमें स्वर में जवाब दिया – “चोरी हो गया |” पहले लगा कि शायद पिता जी मज़ाक कर रहें हैं, पर उनके चेहरे पर छाये गहरे परेशानी के बादलों को देखकर वह ख्याल दिमाग से तुरंत निकालना पड़ा | वह रात पिता जी ने करवट लेते ही काटी | सुबह के समय हाथ में ब्रीफकेस लेकर घर से धीर-धीरे पैदल निकलते समय उनके चेहरे पर छाई मायूसी की तस्वीर आज तक मेरी आँखों के सामने ताज़ा है | काफी दिनों तक घर में उदासी का माहौल रहा | अक्सर कहा करते मेरी मेहनत की कमाई का स्कूटर ऐसे कैसे चोरी हो सकता है | चोरी की रिपोर्ट भी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी थी पर कुछ नतीजा नहीं | हाँ, अखबारों में जरुर यह खबर छपी थी कि कविवर श्री रमेश कौशिक का स्कूटर चोरी हो गया है |
घर में भी कुछ दिनों के राजकीय शोक के बाद धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो चला | समय के साथ-साथ स्कूटर वियोग का दुःख भी काफी हद तक दिलो-दिमाग से दूर हो चुका था | हमारी दिनचर्या में से भी स्कूटर की दैनिक सफाई, रेम्प पर धक्का-चढ़ाई और साप्ताहिक नह्लाईं से पिंड छूट चुका था | एक दिन शाम के समय हम सब आँगन में बैठे हुए गपशपकर रहे थे | गेट पर किसी ने दस्तक दी | सामने एक यही कोई तीस-पैंतीस साल का दुबला –पतला आदमी खड़ा था | पिता जी का नाम ले कर पूछा कि क्या उन्हीं का घर है | जब मेरे पिता जी ने उसके बारे में जानना चाहा तो उसने धीमी आवाज में कहा कि मैं वह आदमी हूँ जिसने आपका स्कूटर चुराया था | अब हैरान होने की बारी हमारी थी | बड़े अचम्भे से उस इंसान को देख रहे थे और सोच रहे थे कि क्या जो हम देख और सुन रहे हैं वह सच है या सपना | खैर उस आदमी को बाहर आँगन में खाट पर बिठाया, पहले पानी और फिर चाय पिलाई और उसके बाद उससे पूछा कि यह सारा गौरखधंधा आखिर है क्या | उस आदमी ने जो भी बताया वह हमारे दिमाग को चकराने के लिए काफी था | उसने बताया कि स्कूटर चोरी करने के कुछ दिनों बाद ही उस स्कूटर की कहीं छोटी-मोटी टक्कर हो गयी जिस पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया था | यह पता लगाने पर कि स्कूटर चोरी का है, पुलिस ने उस स्कूटर को जब्त कर लिया और उस चोर को मार –पीट और डरा-धमका कर भगा दिया | अब पुलिस की नीयत साफ़ तो थी नहीं सो उस जब्त स्कूटर की कहीं भी रिकार्ड में बरामदगी नहीं दर्ज की | साफ़ तौर पर थानेदार साहब उस स्कूटर को गटक जाना चाहते थे | अब इधर चोर भी अपनी हुई पिटाई से आहत था और वह भी घायल मजनू की तरह सोच रहा था कि अगर लैला मेरी नहीं हुई तो कम से कम पुलिस की भी नहीं हो सकती | स्कूटर में मौजूद रजिस्ट्रेशन के कागजों से उसे हमारे घर का पता चल ही चुका था सो हमारे घर आ कर उस चोर ने बाकायदा उस थाने का पूरा अता-पता बता दिया जहां वह स्कूटर थानेदार साहब ने चुपचाप गायब करने की नीयत से छिपा कर रखा था | 
अगले दिन पिता जी पहले तो उसी सम्बंधित थाने में गए पर थानेदार साहब सीधे-सीधे मुकर गए | कोई और रास्ता न होने पर अंत में मजबूरीवश अपने जानकार पुलिस के आला अधिकारी के पास गए जो कि उन्हें एक कवि के रूप में सम्मान करते थे | सारा किस्सा सुनकर जब उस अधिकारी ने ताना बाना खींचा तो थानेदार साहब के तुरंत होश ठिकाने आ गए और उन्होंने उस स्कूटर , जो कि उनके मुंह में पड़ा गर्म आलू बन चुका था, को उगलने में ही अपनी भलाई समझी | इस प्रकार से वह दिल्ली जैसी जगह में खोया हुआ स्कूटर बहुत ही अविश्वसनीय तरीके से कविवर के पास ऐसे लौट आया “जैसे उड़ी जहाज़ का पंछी फिर जहाज़ पर आये”| और उस स्कूटर के साथ ही वापिस लौट आयीं हमारी वे ढेर सारी खुशियाँ जो कभी गुम हो गयीं थी उसी स्कूटर के चोरी होने पर |
बाद में कई बार इस घटना का जिक्र होने पर पिता जी अक्सर कहा करते थे कि यहाँ देखा जाए तो एक तरह से चोरी का काम पुलिस ने किया और पुलिस वाला काम किया चोर ने जिसकी बदौलत स्कूटर बरामद हो सका | इसके साथ ही उनका यह भी पक्का विश्वास था कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई पर ही ऐसे चमत्कार होते हैं | पिता जी की सारी बातें अपनी जगह सोलह आने सही हैं पर मेरा मानना है कि इस सारे किस्से को सुखद अंत तक लाने में उनका कवि के रूप में प्रसिद्धी का भी कोई कम योगदान नहीं रहा |

Wednesday, 7 August 2019

बगल में छोरा, नगर में ढिंढोरा


मेहनतकश रंजन 

आपने वह कहावत सुनी ही होगी  कि बगल में छोरा, नगर में ढिंढोरा | यह कहावत कुछ ऐसे अवसरों के लिए कही जाती है जब किसी चीज़ के खो जाने पर हम दुनिया भर में खोज रहें होते है जबकि वह सामान हमारे ही आस-पास कहीं होता है | 
कुछ दिनों पहले एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे पछतावे की आग में कुछ इस तरह से झुलसा दिया जिसका मलाल आज तक दिल के कोने में मौजूद है | मेरे लिए शायद यही सज़ा उचित है कि पश्चाताप के रूप में आप से उस आपबीती और उससे मिली सीख को साझा करूँ | 
शहरों में आजकल एक प्रथा बहुत ही आम हो चली है – आलस और साहबी के रौब में अपनी कार की सफ़ाई ख़ुद तो करते नहीं , किसी नौकर-चाकर से करवाते हैं | वो बेचारा, हर मौसम में चाहे सर्दी, गर्मी या बरसात हो , बिना नागा ,सुबह-सुबह हाथ में बाल्टी और कंधे पर पुराने कपड़े के झाड़न लिए , पूरी मेहनत से कॉलोनी में घरों के आगे कतार में लगी कारों को रगड़-रगड़ कर साफ़ करने में लगा रहता है | एक भी दिन अगर किसी हारी-बीमारी की वजह से नहीं आ पाए या देरी हो जाए तो समझ लीजिए कि बस उस पर डाट-डपट, तानों-उलाहनों का मानों पहाड़ टूट पड़ता है | एक लम्बे समय तक मैं अपनी गाड़ी खुद ही साफ़ करता रहा था | फिर धीरे-धीरे कुछ बढ़ती उम्र और ढलती शारीरिक शक्ति का तकाज़ा समझ लीजिए कि मुझे भी उसी रास्ते को मजबूरन अपनाना पड़ा जिसे मैं नापसंद करता था | अब हर सुबह मेरी गाड़ी भी मौहल्ले की दूसरी गाड़ियों की तरह से एक बंगाली मजदूर – रंजन द्वारा की जाने लगी | रंजन, बहुत ही ईमानदार शख्स, दिन भर रिक्शा चलाता है पर सुबह के खाली समय में कॉलोनी की गाड़ियों की धुलाई-पुछाई करके कुछ अतिरिक्त आमदनी कर लेता है | साल में एक बार रंजन एक महीने के लिए बंगाल में अपने गाँव जरूर जाया करता है | ऐसे समय में वह अपनी जगह किसी दूसरे आदमी का इंतजाम जरूर कर जाता है जिससे उसके साहब ग्राहकों को को किसी प्रकार की समस्या न हो | उस बार भी ऐसा ही हुआ जब दो किशोर उम्र के बच्चों की हमसे पहचान कराते हुए रंजन ने अपने गाँव जाने के बारे में बताया | अगले दिन से ही वे दोनों बच्चे आकर बड़ी मुस्तैदी से गाड़ी की सफ़ाई करने लगे | कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा | हाँ, एक बात बताना मैं भूल गया, अब गाड़ी मैं तो कभी-कभार ही चलाता हूँ , ज्यादातर काम के सिलसिले में मेरे बेटे प्रियंक को ही जरूरत पड़ती है | एक दिन अचानक प्रियंक आया और बोला कि गाड़ी की डिक्की बंद नहीं है और अन्दर रखा टायर में हवा भरने का पम्प भी नहीं मिल रहा है | मैं तो बस यही कह पाया कि याद करो कहीं और रख कर तो नहीं भूल गए | रहा सवाल डिक्की के खुला रहने की तो वह भी गलती से खुली रह सकती है | अगर किसी ने चोरी करनी ही होती तो वह डिक्की में रखे दूसरे सामान पर भी हाथ साफ़ कर चुका होता | प्रियंक मेरी बात से सहमत नहीं था | इस पूरे विवाद में अब श्रीमती जी भी शामिल हो चुकी थीं | पहले तो वह मेरे साथ थीं पर बाद में उन्हें भी प्रियंक की बात में दम नज़र आया और उन्हें भी लगा कि पम्प तो किसी ने चुराया ही है | अब सवाल उठा कि अगर चोरी हुई तो चोर कौन हो सकता है | पहली नज़र में ही शक की सुईं सीधे-सीधे उन दो लड़कों पर घूमी जो सुबह –सुबह गाड़ी साफ़ करने आया करते थे | इसकी एक वजह यह भी थी कि हर दिन की तरह, अगले रोज़ दो में से केवल एक ही लड़का गाड़ी साफ़ करने आया | इस मामले में उस लड़के को काफी डाट –डपट पिलाई गयी कि तुमने गाड़ी साफ़ करने के बाद डिक्की खुली छोड़ दी और इस लापरवाही की वज़ह से हमारा नुकसान हो गया | अपनी छुटियाँ बिताने के बाद जब रंजन काम पर दोबारा आया तो उसे भी इस घटना के बारे में बताया | खैर , समय के साथ बात आयी-गयी हो गयी और ज़िंदगी अपने पुराने ढ़र्रे पर पहले की तरह से ही चलती रही | हां , इस बीच प्रियंक ने अमेज़न की ऑनलाइन शॉपिंग से दूसरा हवा भरने का पम्प भी खरीद कर मंगवा लिया| एक दिन घूमने-फिरने के लिए प्रियंक और कुछ दोस्त हिमाचल प्रदेश की यात्रा पर निकल पड़े | गाड़ी उसके दोस्त की ही थी | हमेशा की तरह हर दिन अपनी कुशलता देने के लिए प्रियंक फोन करता रहता | उसी दौरान एक दिन फोन पर उसने बताया कि वह पुराना वाला पम्प भी मिल गया है | दोस्त को कभी देकर वापिस लेना भूल गया था और आज टायर पंक्चर होने पर जब उसकी गाड़ी की डिक्की खोली तो उसी में मिल गया | उसने तो इतना कह कर अपनी बात ख़त्म कर दी पर इस छोटी सी खबर ने मेरे दिमाग में एक ज़बरदस्त हलचल खड़ी कर दी | मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर हमारी सोच इस हद तक क्यों पहुँच गयी है |सबसे बड़ा दुःख यह कि इस सारे प्रकरण के ‘हम’ में मैं भी शामिल रहा | अपने विवेक का इस्तेमाल किए बिना , बहुमत के पक्ष में जाकर मैंने भी अपना पाला बदल लिया था और सीधे-सीधे गुम हुए सामान के लिए एक निर्दोष को जिम्मेदार ठहरा दिया था |
अब उस बात को जाने दीजिए कि बाद में घर आने पर अपने बेटे प्रियंक और उसके दोस्त की अच्छी तरह से खबर ली | इस पूरी घटना ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमारी मानसिकता कितने छोटे और निचले स्तर पर पहुँच चुकी है | हमारी मानसिकता में यह बात क्यों समा गयी है कि अगर कोई घर में कोई सामान गुम हो गया है तो पहला शक घर के नौकर-चाकरों पर ही जाता है | क्या इसका कारण यह है कि हमें अपने नौकर से ज्यादा भरोसा अपनी उस याददास्त और स्मरण शक्ति पर होता है जो बढ़ती उम्र के साथ धीरे-धीरे कमजोर और धुंधली पड़ती जा रही है | अब मामला चाहे अक्ल का हो या शक्ल का, इंसान का जन्मजात स्वभाव ही कुछ ऐसा होता है कि अपने आगे उसे सारी दुनिया कमतर ही नज़र आती है | उस पर भी अगर सामने वाला गरीब है तब तो समझ लीजिए कि उसमें सारी बुराइयां केवल आपको ही नहीं बल्कि सारी दुनिया को रातो-रात नज़र आने लगती हैं | कहने वाले एक तरह से ठीक ही कह गए हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा अपराध गरीब होना है | तभी तो कहावत बनी है कि गरीब की जोरू , सबकी भौजाई | लोग यह भी कहते है कि जब कुम्हार का अपनी बीवी पर जोर नहीं चलता है तब वह अपने गधे के कान उमेंठता है | बस यह समझ लीजिए कि जिस की लाठी उसी की भैंस | अगर आप ताकतवर हैं तो आपके सारे दोष माफ़ हैं और आपकी सारी बुराइयां भी ढँक जाती हैं | अब चाहे वह ताकत पैसे के बल पर हो, नेतागिरी के दम पर या कुर्सी की वजह से हो – बन्दे को एक तरह से लाइसेंस मिल जाता है हर तरह से मनमानी करने का | संत कबीर दास का ऐसे ही लोगों के लिए सीख देते हुए कह गए थे :
निर्बल को न सताइये, वा की मोटी हाय |
बिना सांस की चाम से, लोह भसम हो जाय || 
उनके कहने का अर्थ यही है कि हालात के कारण कोई भी व्यक्ति कमजोर हो सकता है | ऐसे व्यक्ति को कभी भी सता कर, परेशान करके उसकी बद्दुआ नहीं लेनी चाहिए | ऐसी बद्दुआ में बहुत ताकत होती है जैसे कि लुहार की धौकनीं का बेजान चमड़ा निर्जीव होते हुए भी लोहे को भस्म कर देता है |
इन सब बातों का यही सार निकलता है कि अपने आसपास के उन सभी समाज के निम्न और गरीब वर्ग के लोगों के प्रति हम सवेंदनशील रहें | यह उनकी मजबूरी ही है जिस के कारण कोई रिक्शा चला रहा है, किसी का घर आपके घर में झाडू- पौचा और बर्तन मांजने से चल रहा है, किसी को पढ़ –लिख कर भी घर-घर जाकर कूरियर- बाय या पिज्जा-बर्गर देने का काम करना पड़ रहा है | भरी गर्मीं में आपकी सेवा में हाज़िर होते हैं तो हम और कुछ नहीं तो कम से कम पानी के लिए तो उनसे पूछ ही सकते हैं | और सबसे बड़ी बात : उन्हें बिना किसी सबूत के चोर या उठाईगीर का तमगा तो हरगिज मत दीजिए | उन्हें चोरी- चकारी से ही पैसा कमाना होता तो दिन रात की बदन तोड़ और मेहनत-मशक्कत का काम क्यों करते | मुझे पता है इस प्रकार की उदार मानसिकता एक दिन में ही रातों-रात नहीं आती | ऐसी सोच धीरे -धीरे ही आपके स्वभाव का अंग बनती है | ऐसी अच्छी सोच के लिए कोशिश करने में क्या हर्ज़ है | मैं भी कर रहा हूँ – आप भी करके देखिए |

Sunday, 28 July 2019

अजब गज़ब : मोहित तिवारी

मोहित तिवारी : सच में गज़ब  
अगर शादी करने जा रहा आपका कोई परिचित बाकायदा यह घोषणा कर दे कि वह शादी में घोड़ी पर नहीं बैठेगा| उसकी घुड़चढ़ी नहीं बल्कि ‘मोटर-साइकिल-चढ़ी’ होगी | बाराती भी बाकायदा बुलेट मोटर साइकिलों के काफिले में पहुंचेंगे | दिल पर हाथ रख कर एक बात सच-सच बताना- यह सब सुनकर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी | आप एक ही झटके में मेरे इस सवाल को यह कहते हुए पूरी तरह से नकार देंगे कि “कौशिक जी ! आप का सवाल बे-सिर पैर का है | यह विदेश नहीं है, भारत है | अभी हमने इतनी तरक्की नहीं की है जहां शादी जैसी परम्पराओं में कोई इतना बड़ा काण्ड कर दें |” अब क्या बताऊँ आपको, पहले मैं भी कुछ-कुछ ऐसा ही सोचा करता था जब तक मैं मोहित तिवारी से नहीं मिला था | जब इसी तरह की बात मैंने उसके मुंह से सुनी, सच मेरा तो दिमाग एक बार पूरी तरह से घूम ही गया था | फिर यह भी सोचा कि जाने भी दो , कई बार बच्चों की बातों में कथनी और करनी में फर्क भी होता है| पर यहाँ मैं पूरी तरह से गलत साबित हुआ | जब मोहित तिवारी की शादी हुई तो कुछ इस निराले अंदाज़ में जिसकी यादें आज भी मेरे ज़हन में ताज़ा हैं | उत्तराखंड के सुदूर जिम कार्बेट नेशनल पार्क के जंगलों में बरात का स्वागत, मोटर साइकिल पर दूल्हा और उसके पीछे दोस्तों का कारवां | भीड़ –भड़क्के से दूर प्रकृति की गोद में, नदी किनारे जयमाला, शादी के फेरे और रस्में|
गज़ब बन्दे की अजब बरात 
इन सब को देख कर मुझे लगा कि और कुछ हो न हो , पर इस बन्दे में कुछ तो है ख़ास | बस तभी से दिमाग में यही ख्याल रह रह कर उमड़ता रहा कि इस पर एक लेख लिखा जाए | समय निकलता गया और एक दिन टी.वी. पर कुछ ऐसा देखा कि लगा कि अब वक्त आ गया है, अब तो उस बन्दे यानी मोहित तिवारी के बारे में कुछ लिखना ही चाहिए | टी.वी. पर क्या देखा, यह भी बताता हूँ , बस ज़रा धीरज रखिए |
दरअसल मोहित मेरे बेटे प्रियंक का हमउम्र और पुराना दोस्त है | घर में आना जाना लगा ही रहता है| घर में घुसते ही गेट से ही उसकी ऊँची खनकदार आवाज जैसे मुनियादी कर देती है कि शहंशाहे आलम तशरीफ ला रहे हैं | दोस्त से मिलने बाद में जाएगा, पहले मेरी मां के हाल-चाल लेने सीधे –धड़धड़ाते उनके कमरे में और उसके बाद सीधे ही जैसे जानदार आवाज का बारूदी पटाखा छूटता है “ अम्मा नमस्ते” | इससे पहले कि मां इस नमस्ते का जवाब आशीर्वाद के रूप में दे सके, उस जानदार, शानदार और गरजदार आवाज की गूंज पड़ोसियों के घर की दीवार से टकरा कर कई बार घर में पहुँच जाती है “ अम्मा नमस्ते ..... अम्मा नमस्ते ... अम्मा नमस्ते !!!!” कभी-कभार मेरे कमरे में भी भूले-भटके गपशप करने आ बैठता | उसी बातचीत के दौरान धीरे-धीरे उसकी जानी-अनजानी जन्मकुंडली परत-दर-परत खुलने लगी जोकि हर तरह से काफी दिलचस्प थी | मोहित के पिता भारत सरकार के गृह मंत्रालय  में एक अच्छे ओहदे पर थे | बदकिस्मती से बीमारी से उनका तभी निधन हो गया जब मोहित ने पढाई पूरी करके नौकरी की दुनिया में कदम रखा ही था | पिता की असामयिक मृत्यु ने शुरू में तो मोहित को एक तरह से कहीं अन्दर तक तोड़ डाला | पर ऐसा कब तक चलता, आखिर मां को भी तो हिम्मत बंधानी थी | सो खामोशी की चादर ओढ़े , शर्मीले से मोहित का धीरे-धीरे रूपांतरण शुरू हो गया एक बिलकुल अलग नए अवतार में जो था मिलनसार, हंसमुख, मस्त मौला, खतरों का खिलाड़ी| बचपन से ही मोहित को मोटर-साइकिल या जिसे आज की शब्दावली के हिसाब से बाइक कहा जाता है, से जबरदस्त जुनून की हद तक लगाव रहा | उम्र के साथ-साथ यह लगाव दीवानगी की हद तक पहुँचने लगा | इस शौक के चक्कर में अपने बाइक से ऐसे फिसले भी कि हाथ-पाँव तक तुड़वा लिए | ऊपर से तुर्रा यह कि दोस्त लोग भी ऐसे जो  टांग के प्लास्टर पर भी कार्टून और सन्देश लिख कर चले जाते |  पर वह शौक ही क्या जो फ्रेक्चर, प्लास्टर और अस्पताल के खतरों से डर जाए | 
गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में 

अब तक मोहित ने कई नामी गिरामी बाइक प्रतियोगिताओं में भाग लिया, पुरस्कार भी जीते और सारे भारत की लम्बी-लम्बी  जोखिम भरी  यात्राएं भी की |
यादगार मिशन: दस हजार किलोमीटर बाइक पर 


बैजू बावरा नहीं - बाइक बावरा 
एक तरह से देखा जाए तो आप कह सकते हैं कि काश्मीर से कन्याकुमारी और सुदूर नार्थ-ईस्ट के राज्यों से लेकर राजस्थान तक शायद ही कोई 70,000 किलोमीटर की सड़कें उनकी बाइक के टायरों के निशान से अछूती रही होगी | कार से भी लगभग इतनी ही भारत की खोजी यात्रा कर चुके हैं | एक बार तो हद ही हो गयी जब मोहित को जरूरत पड़ गयी एक महीने की छुट्टी की, क्योंकि उन्हें बाइक से भारत भ्रमण प्रतियोगिता में हिस्सा लेना था | कंपनी ने छुट्टी देने में ना-नुकुर की तो श्रीमान जी ने सीधे नौकरी से ही हाथ जोड़ कर विदा ले ली | 
यही वजह थी मोहित की पहाड़ी जंगलों में हुए  बाइक-विवाह समारोह की जहां मैं खुद भी मौजूद था | मज़े की बात यह कि उसकी जीवन साथी विशुमा गौतम भी उसी तरह बाइक की पूरी दीवानी| मोहित की तरह उसने भी दूर –दूर की कठिन यात्राएं बाइक से से की हैं| हिमालय के ऐसे-ऐसे खतरनाक रास्ते जहां से गुजरने मात्र के ख्याल से अच्छे भले इंसान को डर से कंपकपी छूट जाए, वहां से यह बहादुर लड़की अपनी मोटर साइकिल से कई बार फर्राटे से गुजर चुकी है | 
हम किसी से कम नहीं : विशुमा गौतम 

सफ़र लेह का : विशुमा गौतम 

टक्कर  की जोड़ी : मोहित - विशुमा 

प्यारी जोड़ी : मोहित - विशुमा 
अपनी ज़िंदगी में मियाँ-बीवी की ऐसी जोडियाँ बहुत देखी जहां दोनों ही - डाक्टर, वकील, अफसर या फ़ौजी हों पर भैय्या फटफटी के दीवानों की जोड़ी सच में पहली बार देखी | अभी भी दोनों बाइक के साहसिक अभियानों में लगातार जाते रहते हैं | भगवान इस प्यारी सी जोड़ी पर सदा अपना आशीर्वाद बनाए रखे |
अब आता हूँ टी.वी. के उस किस्से पर जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया था | अभी कुछ दिन पहले ऐ.बी.पी. न्यूज़ के चेनल पर देखा मोहित एक बहुत ही मनोरंजक और दिलचस्प कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा है | प्रोग्राम का नाम है “अजब देश की गज़ब कहानी" | इस प्रोग्राम के लिए मोहित ने देश के कोने-कोने की ख़ाक छानने में खूब पसीना बहाया और अब  ऐसी विलक्षण प्रतिभाओं को सबके सामने ला रहा है जिन्हें देख कर आप सच में अचम्भे से दांतों तले अपनी उंगली दबा लेंगें | यह प्रोग्राम हर शनिवार को रात आठ बजे प्रसारित हो रहा है |
अच्छा लगता है जब आप देखते हैं कि मोहित तिवारी  जैसा एक नन्हा सा पौधा, ज़िंदगी के हर थपेड़े और मुश्किलों का हंसते-गाते सामना करते हुए, सफलता की सीढ़ियों पर चढते हुए, धीरे-धीरे अब एक हरे-भरे वृक्ष का रूप ले रहा है | आइये हम और आप उसकी सफलता के लिए कामना करें | और हाँ यह तो मुझे विश्वास है कि आप मोहित तिवारी के प्रोग्राम को जरूर देखेंगे |

Sunday, 30 June 2019

मुखौटा

चेहरे पर चेहरा 
मशहूर शायर मुनीर नियाजी की ग़ज़ल का एक बड़ा प्यारा सा शेर है :
ये जो ज़िंदगी की किताब है ,
ये किताब भी क्या किताब है ,
कहीं रहमतों की हैं बारिशें ,
कहीं जान लेवा *अज़ाब है | ( * अज़ाब = पीड़ा / दर्द )

बस एक तरह से यह जान लीजिए कि इस ज़िंदगी की किताब से हमें बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है | हाँ, इतना जरूर है कि हमारे आँख, नाक , कान और इन सबसे ऊपर दिमाग खुला होना चाहिए | इसी ज़िंदगी में हमें तरह-तरह के इंसान मिलते हैं , अच्छे भी और बुरे भी | सीख हमें दोनों से ही मिलती है | कहीं न कहीं मुझे लगता है भले लोगों की बजाय बुरे लोगों से ज्यादा सीखने को मिल जाता है | यही कि कुछ भी कर लो पर इस गलत इंसान की तरह तो बर्ताव कतई मत करो | आज बरबस एक ऐसे ही शख्स की याद आ गयी | 

यह श्रीमान मेरे संस्थान में ही एक तरह से सर्वे-सर्वा थे | सबके सामने तो बहुत ही ठन्डे, विनम्र स्वभाव के | छोटी-छोटी बातों में ईमानदारी की जीती जागती मिसाल | एक बार मेरे दफ्तर के निरीक्षण दौरे पर आये | शाम को जब उन्हें होटल तक पहुंचाने जा रहा था तो रास्ते में उन्होंने गाड़ी रुकवा ली और पानी की बोतल और बिस्किट के पेकेट के लिए अनुरोध किया  | साथ चल रहे अपने सहायक को मैंने इशारा किया जो पास की दुकान से सामन ले आया | साहब ने जेब में हाथ डाला और उस सामन की कीमत जो लगभग 28 रुपये थी, मेरे मना करने के बावजूद भी जबरदस्ती थमा दी | अब भाई हम तो सच में मुरीद हो गए साहब की साफगोई और ईमानदारी के | सब जगह जिक्र करते कि साहब हो तो उन जैसा | भगवान को शुक्रिया भी अदा करते कि तूने हमें ज़िंदगी में ऐसे भले इंसान के नीचे काम करने का मौक़ा दिया | 

समय बीतता गया | पता चला हमारे  संस्थान से भी ज्यादा बड़े एक महा नवरत्न सरकारी कंपनी के सर्वोच्च पद पर नियुक्त हो कर चले गए | मेरे सच्चे मन से आवाज निकली वाह भले और ईमानदार लोगों का भला ऊपर वाला भी देखता है | बीच-बीच में उन साहब के बारे में खोज-खबर भी मिलती रहती की सफलता की सीढ़ियों पर ऊँचे चढ़ते जा रहे हैं | 
मुझे आज भी वह सुबह अच्छी तरह से याद है | सुबह - सुबह की चाय पी रहा था कि फोन की घंटी बजी | लाइन पर दूसरी ओर मेरे एक बहुत ही ख़ास दोस्त थे | छूटते ही बोले : आज टी.वी की न्यूज देखी क्या ? अगर नहीं तो देखो | इतना कह कर उन्होंने फोन झटके से रख दिया | अब मैं बहुत ही अचम्भे और आश्चर्य की पराकाष्ठा पर पहुँच गया | आखिर ऐसा क्या हो गया .... कौन सा पहाड़ टूट गया | टी.वी के न्यूज चेनल को खोला | सामने जो समाचार चल रहे थे उन्हें देख और सुन कर लगा जैसे बिजली का चार सौ चालीस वोल्ट का झटका लगा | आँख और कानों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था | समाचार आ रहे थे कि हमारे उन्हीं आराध्य और पूज्यनीय ईमानदारी के जीते –जागते अवतार को सी.बी.आई ने मोटी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया है | उस से भी दुःखदायी बात यह कि इस सारे रिश्वत - काण्ड में उनकी पत्नी की भी अहम् भूमिका रही सो उन्हें भी साथ ही गिरफ्तार किया गया | दोनों ही पति-पत्नी की जोड़ी से पहले सी.बी.आई ने कड़ी पूछताछ की और बाद में कोर्ट में पेशी हुई | अदालत से जमानत नहीं मिली और दोनों को ही तिहाड़ जेल भेज दिया गया जहां लम्बे समय तक रहना पड़ा | 

यह बात जब भी याद आती है, मैं सोच में पड़ जाता हूँ | आखिर क्या कमी थी उन्हें अपनी शानदार वैभवशाली ज़िंदगी में | जीवन के उस अंतिम पड़ाव पर जब वह प्रसिद्धि और कामयाबी की ऊँचाइयों के आसमान को छू रहे थे तो लालच के चंगुल में ऐसे फँसे कि बदनामी की कालिख ने सब करे धरे पर पानी फेर दिया | नौकरी तो गयी ही , सब अखबारों में कारनामों के ऐसे चर्चे हुए कि अडोस –पड़ोस और रिश्तेदारी में भी कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे | आज भी मुंह छिपा कर चोरों की ज़िंदगी जी रहे हैं |कभी-कभी सड़क से गुजरते हुए देखता हूँ कि जिस घर के आगे हमेशा चहल-पहल रहा करती थी आज भूत बंगले की सी वीरानी छाई रहती है |

यदि उनकी जगह कोई और शख्स होता तो मुझे इतना कष्ट नहीं होता | दुःख तब होता है जब आपका भ्रम टूटता है | यहाँ भी ऐसा ही हुआ - उनके चेहरे पर ता- उम्र इतना खूबसरत मुखोटा रहा कि बस कुछ पूछिए मत | पर चेहरे से ईमानदारी का नकाब उतारा तो असल सूरत नज़र आयी | ऐसी शक्ल जिसे दुनिया ने देखा, और सिर्फ देखा ही नहीं बल्कि मारे अचरज के दांतों तले उंगली दबा ली | इस पूरे किस्से से मैं तो यही सीखा हूँ कि ज़िंदगी सीधे-सादे तरीके से अपने असल चेहरे के साथ बिना किसी बनावट के गुज़ारिये | बनावट का कोई भी मुखौटा हमेशा के लिए आप की असलियत को नहीं छुपा सकता | 

Monday, 24 June 2019

साहब का पाजामा बनाम हाथी के दांत ( सत्य घटना से प्रेरित लघु कथा )



नहा कर निकला ही था पर पहनने के लिए पाजामे का अता-पता ही नहीं | तौलिया बांधे पागलों की तरह से अलमारी खंगाल रहा था कि  पीछे से  श्रीमती जी ने आकर खोज निकाला और मुस्कराते हुए कहा – क्यों आसमान सर पर उठा रखा है | तुम्हारा पाजामा न हो गया मानों कोहनूर हीरा हो गया | बिना बहस किये चुपचाप  खिसिया कर  पाजामा ले लिया और वहां से  खिसक लिया  | अब उन्हें कौन समझाए कि किसी भी चीज़ की अहमियत को कम कर के नहीं आंकना चाहिए | इस बात को मुझसे ज्यादा कोई नहीं समझ सकता , आखिर भुक्तभोगी जो ठहरा | वह घटना आज तक मुझे अच्छी तरह से याद है |
यह बात उन दिनों की है जब मैं देहरादून में कार्यरत था | एक दिन सूचना मिली कि बड़े साहब का निरीक्षण दौरा होने जा रहा है | आनन-फानन में सारी तैयारियां मुक्कमल करीं गयी |  आखिर वह नियत दिन आ पहुँचा | शहर के एक बड़े होटल में मीटिंग का प्रबंध किया गया | दफ्तर के सभी महत्वपूर्ण अधिकारी अपनी पूरी तैयारी के साथ धड़कते दिल से और राम-नाम जपते हुए हाज़िर हो गए | मीटिंग शुरू हुई और हर अधिकारी के काम-काज की समीक्षा और चीर-फाड़ शुरू हुई | अब साहब का हाल यह कि वह किसी से भी खुश नहीं | हर किसी को  धमकाते  और लताड़ते | सभी के लिए एक ही उपदेश – सुधर जाओ | मार्केटिंग के आदमी हो, कभी दफ्तर से भी बाहर निकला करो | अपने दफ्तर के खर्चे कम करो | फालतू के टी.ए बिल पसंद नहीं , वगैरह ...वगैरह | सभी बंद दिमाग से कान दबा कर महापुरुष के सत्य वचन  सुन रहे थे और  दम साधे  इस प्रवचन सभा की सकुशल समाप्ति का इंतज़ार  कर रहे थे |  खैर हर बुरे वक्त की तरह उस सर्कस मजमें का भी अंत हुआ | देर रात हो चुकी थी |खाना-पीना हुआ और इसके बाद साहब का फरमान जारी हुआ..... “बाहर से आये सभी अफसर अपनी –अपनी नियत जगहों के लिए अभी  रवाना हो जाएँ | रात को कोई होटल में नहीं ठहरेगा | सरकारी खर्चे कम करिए |”  अब यह बात अलग है कि खुद  साहब तो  खा-पी कर सारी मीटिंग  बिरादरी को धकिया कर, लतिया कर  , रोता कलपता छोड़, खुद उस आलीशान होटल के शानदार कमरे में खर्राटेदार नींद का लुत्फ़ लेने के लिए सिधार गए |
अगले दिन सुबह का नाश्ता-पानी करने  के बाद साहब बहादुर  फ्लाईट से वापिस दिल्ली उड़ चले | आयी बला के टलने  पर इधर मैंने भी चैन की सांस ली |  शाम के समय साहब के पी.ए का फोन आया – साहब बात करेगें | साहब लाइन पर आये | दो-चार मिनिट इधर-उधर की बातें करने के बाद बोले – “मेरा पाजामा होटल में रह गया है | जरा देख लेना |” अब इस देख लेना के क्या मायने होते हैं यह मुझे देखना था | अब यह कोई ब्लाक-बस्टर पिक्चर बाहुबली  का पाजामा तो था नहीं जो थियेटर में जा कर देख आता | अपने स्वर्गीय पूज्य पिताश्री की अक्सर दोहराए जाने वाली कहावत याद आ गयी  : गूंगे की बात गूंगा जाने, या जाने उसकी मैय्या | साहब की बात का मतलब समझ में आ गया कि जनाब जान की सलामती चाहते हो तो पजामा तुरंत खोजो और हाज़िर करो | दफ्तर बंद होने का समय हो चला था पर तुरंत आपातकालीन मीटिंग बुलाई गयी | एक शख्स को फटाफट मौका-ए-वारदात यानि उस होटल को रवाना किया गया इस हिदायत के साथ कि ग्राउंड जीरो से पूरी तफ्शीश करके रिपोर्ट भेजी जाए | कुछ देर बाद रिपोर्ट भी मिल गयी – साहब का पजामा मिल गया | सुनकर सचमुच इतनी खुशी हुई जितनी शायद नासा को मंगल गृह पर पानी मिलने पर भी नहीं हुई होगी | पसीने में लथपथ, हांफता-कांपते वापिस लौटे हनुमान जी ने संजीवनी बूटी की तरह से पजामा हाज़िर कर दिया | समय कम था, तुरंत सुन्दर सी पेकिंग में उस पजामे को विराजमान करने के बाद एक अन्य कर्मचारी की तैनाती हुई इस हिदायत के साथ कि भाई रात्री बस सेवा से दिल्ली के लिए रवाना हो जाओ और मुर्गे की पहली बांग से पहले, ब्रह्ममुहूर्त में   साहब  के दौलतखाने में इस आफत की बला से छुटकारा पा आओ | एक्शन प्लान पर सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर निहायत ही बारीकी से अमल किया गया और बिना किसी जान-माल के नुक्सान के, हमारा बहादुर सेनानी, साहब ( जान के दुश्मन) के खेमे से सुरक्षित वापिस लौट आया | 
हर युद्ध के लिए कुछ कीमत भी चुकानी पड़ती है | यह पजामा अन्वेषण अभियान भी कोई अपवाद नहीं था | जब उन बिलों पर साइन करने बैठा तो जो इस अभियान से जुड़े थे, तो पता चला खर्चा आया लगभग साढ़े तीन हज़ार रुपयों का | उस समय दिमाग में एक और कहावत याद आ रही थी : हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और |

(*इस सत्य कथा के सभी पात्र काल्पनिक हैं ....... किसी भी प्रकार की समानता संयोगवश हो सकती है , पर संयोग भी इसी दुनिया का सच है | अब आप सच-झूठ का फैसला करते रहिए , मैं तो चला |)


Thursday, 13 June 2019

चम्पू का बन्दरकाण्ड

चम्पू
आज के इस किस्से का हीरो कोई दो पैरों वाला इंसान नहीं वरन चार पैरों वाला एक प्राणी है | उस चुलबुले प्राणी का नाम है चम्पू | जितना प्यारा उसका नाम है उतनी ही रंग-बिरंगी और चंचल उसकी शक्सियत है | अरे पर अभी तक आपको यह तो बताया ही नहीं कि यह चम्पू महाशय हैं कौन | यह दरअसल मेरा पालतू कुत्ता है जिसके लिए कुत्ता शब्द कहने में भी मेरी जुबान सही मायने में लड़खड़ा जाती है | बहुत छोटा था, यह तभी से पिछले पांच वर्षों से मेरे पास है इसलिए एक तरह से यह मेरे परिवार का सबसे छोटा सदस्य है | आज के प्रचलित फैशन के अनुसार इसे खरीदा नहीं था, बल्कि कई परिवारों से तिरस्कृत कर ठुकराए जाने के बाद इसे बड़े प्यार से एक तरह से गोद ही लिया था | तभी से यह हम सब का आँखों का तारा है | इसका संक्षिप्त सा परिचय और कारगुजारियों की जानकारी आपको एक छोटी सी कविता में भी मिल जाएगी जिसका लिंक साथ में ही दिया गया है “चम्पू” | चम्पू की सबसे बड़ी खासियतों में शामिल है इसका तेज दिमाग और निडर स्वभाव | शराफत का आलम यह है कि हर सुबह, मेनगेट से अखबार उठा कर मुझे बिस्तर पर ही लाकर हाज़िर कर देता है | 
मजेदार जिन्दगी 


जनाब इंसान नहीं, उसकी कुर्सी बोलती है  
अब रही बात बदमाशी की तो जनाब बस कुछ यूँ समझ लीजिए के चम्पू कुछ हद उस गली-मौहल्ले में पले- बढे उस इंसान की तरह है जो पढ़-लिख कर किसी मल्टी-नेशनल कंपनी का सफ़ेदपोश बड़ा अफसर तो बन गया पर जिसके खून में से गुंडागर्दी के बदमाशी कीटाणू अभी तक जोर मार रहे हैं | नतीजा यह होता है कि छोटी कद –काठी का होने के बावजूद मोहल्ले की गली के सारे आवारा कुत्तों का निर्विवाद स्वघोषित दादा है | हाँ यह बात अलग है कि कभी कभी अमरीका जैसे देश की भी हर जगह पंगे लेने की आदत की वजह से कई बार बुरी तरह से फजीहत हो जाती है | ऐसा ही कई बार चम्पू के साथ भी हो जाता है जब मोहल्ले के सारे विद्रोही कुत्ते महागठबंधन बना कर हमला बोल देते हैं और राणा सांगा की तरह पूरे शरीर पर नोच-खसोट के निशान लिए चम्पू घर पर लुटे-पिटे दाखिल होते हैं | वह सब देख कर हम भी समझ जाते हैं कि बस अब इलाज के मेडीकल बजट में बढ़ोत्तरी करने के लिए तैयार हो जाइए | पर एक बात काबिले तारीफ़ है , इतने सब के बावजूद चम्पू के हौसले में कोई कमीं नहीं आती और ठीक होने के बाद नई जंग के लिए फिर से चाक-चौकस और तैयार | लगता है उसने मशहूर शायर अज़ीम बेग “अज़ीम” का यह शेर अपने दिलो-दिमाग में पूरी तरह से बसा लिया है :
गिरते हैं शह-सवार ही मैदाने जंग में,
वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले |
(* तिफ्ल = छोटा बच्चा )| 
यकीन मानिए मुझे कई बार लगता है कि अमरीका और चम्पू की जन्मकुंडली में बहुत समानता होगी | लड़ाई- झगड़े और हर मामले में टांग अड़ाने की अपनी आदत बदलने को दोनों में से कोई भी तैयार नहीं | 

इसी सिलसिले में मुझे एक वाकया याद आ रहा है – ऐसा वाकया जिसे आप हल्के – फुल्के अंदाज़ में बन्दरकाण्ड कह सकते हैं या फिर बचाव अभियान भी | पूरा किस्सा पढ़ने के बाद आप क्या सोचते हैं यह आप पर निर्भर है |
तो भाई लोगों हुआ कुछ यूँ कि अपने कमरे में बैठा टी.वी देख रहा था | एक कोने में चम्पू भी अलसाई मुद्रा में अपनी दोपहर की नींद का मज़ा लूट रहां था | अचानक घर के बाहर से कुछ चीख-पुकार और शोर-शराबा सुनाई पड़ा | बाहर झाँक कर देखा तो बड़ा ही खौफ़नाक नज़ारा था | सड़क के एक ओर एक छोटा सा बच्चा गिरा पड़ा था और जोर-जोर से डर के मारे रोये जा रहा था | डर का कारण था मोटे-ताज़े, हट्टे- कट्टे बंदरों का झुण्ड जिन्होंने उस बच्चे को घेर रखा था | अपने बड़े-बड़े दांत निकाल कर बहुत ही भयानक तरीके से तरह की आवाजें निकाल कर उस सड़क पर गिरे बच्चे को डरा रहे थे | अब वह बेचारा बच्चा तो बच्चा ठहरा, उस नज़ारे को देख कर किसी भी मजबूत से मजबूत कलेजे वाले का भी खून जम जाए | उस बच्चे की माँ दूर एक तरफ खड़ी चिल्ला-चिल्ला कर मदद की गुहार लगा रही थी | इस शोरोगुल के आलम में सड़क पर ही लोगों का जमावड़ा इकठ्ठा हो गया था | महानगरों में प्रचलित परिपाटी के अनुसार उस भीड़ में मददगार कोई नहीं, सब के सब तमाशबीन | यहाँ तो वह हाल होता है कि बन्दा सड़क पर पड़ा मदद की आस में दम तोड़ देता है पर मदद नहीं मिलती | मदद तो तब मिले जब लोगों को सेल्फी खींचने से फुर्सत मिले | तो यहाँ भी कमोबेश कुछ वैसा ही नज़ारा था | दूर खड़े लोग बस जोर –जोर से शोर कर रहे थे जिससे बन्दर डरना तो दूर, गुस्से में आकर और अधिक आक्रामक हो रहे थे | यह सब देख कर एक बारगी तो मेरा कलेजा भी मुंह को आ गया | दिमाग मानों सुन्न पड़ गया | कुछ समझ नहीं आ रहा था कि करूँ तो करूँ क्या | बड़े ही तनाव से भरे और उधेड़बुन के क्षण थे और समय था कि निकलता जा रहा था | किसी भी समय उस बच्चे के साथ कुछ भी अनहोनी घट सकती थी | संकट के समय कई बार आपको मदद ऐसी जगह से मिलती है जिसे आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है | मेरे दिमाग में भी अचानक जैसे कोई बिजली सी कौंध गई और बेसाख्ता ही मेरे मुंह से जोरदार चीख निकली ..... चम्पू ....... चम्पू !!! इधर मेरे मुंह से पुकार निकली और उधर आवाज सुनते ही बिजली की रफ़्तार से घर के अन्दर से दौड़ लगाता चम्पू मेरे सामने हाज़िर | आँखों में सवाल लिए मेरे चेहरे को देखते हुए मानो पूछ रहा था कि क्या हुआ ? घबराई आवाज में सड़क की तरफ इशारा करते हुए मेरे मुंह से केवल यही शब्द निकले : बन्दर..... बन्दर ! ! इतना सुनना था कि बिना कोई आगा-पीछा सोचे उस छोटे से चम्पू ने सरपट दौड़ लगा दी उन बंदरों के झुण्ड की तरफ | उस बच्चे को बीच में घिरा देख कर चम्पू भी उस हालात की गंभीरता को समझ चुका था | अब चम्पू को मैं दौड़ा तो चुका था पर अब मेरी भी हालत खराब हो चली थी | दरअसल बन्दर इतने मोटे-ताजे और मुशटंडे किस्म के थे कि चम्पू के चीथड़े-चीथड़े कर सकते थे | पर इंसान और जानवर में शायद यही बुनियादी फर्क है – इंसान सोचता ज्यादा है, पर जानवर अपनी जान पर खेल कर भी वह कर गुजरता है जो हर इंसान के बूते की बात नहीं होती | अब तक चम्पू उन बंदरों के झुण्ड में लगभग घुस ही चुका था | बन्दर भी इस अचानक आयी आफत के लिए तैयार नहीं थे | उन्होंने पहले तो बुरी तरह से डराने की कोशिश की पर चम्पू पर उस सब का कोई फर्क नहीं पड़ा | जोरदार आवाज में भौंक-भौंक कर चम्पू ने उन बंदरों के झुण्ड को पूरी तरह से तितर-बितर कर दिया | आज मुझे लगता है बंदरों से नहीं डरने के पीछे , चम्पू का हिमाचल प्रदेश के जंगलों में मेरे साथ बीता वह बचपन रहा , जब वह आये दिन पहाड़ी बन्दर और लंगूरों को मेरे घर के बगीचे से धड़ल्ले से भगा दिया करता था | बंदरों में भगदड़ मचते ही सबसे पहले उस रोते हुए बच्चे की माँ ने दौड़ कर अपने उस बच्चे को अपनी बाहों में जकड़ कर उठा लिया | माँ उस बच्चे का मुंह बेतहाशा चूमे जा रही थी | बड़ी-बड़ी आँखों से चम्पू कुछ देर तक उन्हें टकटकी बांधे देखता रहा | कुछ देर बाद तमाशबीनों की भीड़ भी छंटने लगी | दस तरह के लोग, दस तरह की बातें | कोई बंदरों के बढ़ते उत्पात का जिक्र कर रहा था तो कोई नगर प्रशासन की लापरवाही की | सब की नज़रों पर अगर चश्मा चढ़ा था तो उस बेजुबान पर बहादुर चम्पू के लिए जिसने अपनी जान पर खेल कर उस बंदरों के झुण्ड से बच्चे को बचाया था | चम्पू को भी शायद किसी तारीफ़ की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि उसे पता था कि जैसे ही वह मेरे पास आयेगा मैं  भी आँखों में खुशी के आसूँ  लिए उसे बच्चे की तरह ही  अपनी बांहों में वैसे ही भर लूंगा जैसे उस बच्चे को उसकी माँ ने | चम्पू ने ठीक ही  सोचा था |




Sunday, 19 May 2019

चुनाव ड्यूटी का मारा : इक टीचर दुखियारा

दिमाग में बहुत दिनों से एक अजीब सी उलझन चल रही थी | यही सोच रहा था कि अपनी बात आप से साझा करूं या चुप रहना बेहतर रहेगा | दरअसल किसी भी भले इंसान या आसपास की दीनो-दुनिया की अच्छाई के बारे में बात करो तो खुद को भी खुशी होती है और सुनने वाले को भी सुकून मिलता है | पर दुनिया में सब कुछ तो भला-चंगा नहीं है और कहीं तो मजबूरन ऐसे हालात बन जाते हैं कि आपको लगता है कि अब तो हद हो चुकी है| ऐसे मौकों पर खामोशी कमजोरी की निशानी मान ली जाती है जिससे समाज में गलत लोगों और खराब व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है | एक जिम्मेदार नागरिक होने का फ़र्ज़ निभाते हुए आपको इन हालातों में अक्सर सामने वाले को आईना दिखाते हुए कहना ही पड़ता है कि हुजूर बस करिए , बहुत हुआ अब सुधर जाइए | मेरे घर के आस-पास कभी सड़क की लाईट हफ़्तों खराब पडी रहती है तो कभी सामने के पार्क में गंदगी बिखरी रहती है | जनता-जनार्दन ऐसी कि जान कर भी अनजान बने रहते हैं | मैं ऐसे मौकों पर संबंधित महकमों पर शिकायत दर्ज करवा ही देता हूँ जिस पर मेरी श्रीमती जी भी ताने मार देती हैं कि जब सब चुप बैठे हैं तो तुम्हें ही क्या पड़ी है | कभी मैं खामोश रह जाता हूँ तो कभी जवाब देता हूँ कि सभी अगर चुप रहें तो आखिर काम कैसे चलेगा | 

तो चलिए अब आते हैं सीधे मुद्दे की बात पर | पिछले काफी दिनों से देश में हर जगह चुनाव का माहौल अपनी पूरी सरगर्मी पर है | अखबार , टी.वी. , सोशल मीडिया , जहां देखिए सब चुनाव के रंग में रंगे पड़े हैं | जिसे देखो सब अपना राग अलाप रहे हैं | इस सारे शोर-शराबे में अगर कोई खामोश है , जिनकी आप आवाज नहीं सुन पा रहें हैं तो ये वे भुक्तभोगी कर्मयोगी हैं जिनके कन्धों पर सवार होकर चुनाव का महात्यौहार सफलता पूर्वक पूरा हुआ | अगर आप चुनाव आयोग के बारे में सोच रहें हैं तो लगे हाथों आपकी गलतफहमी भी दूर कर देता हूँ | इस मामले में चुनाव आयोग की भूमिका तो खच्चर पर बैठे मदमस्त, अड़ियल और हठीले हाथ में चाबुक लहराते सवार जैसी है | वजन से लदे-फदें उस मरियल खच्चर पर कोई रहम नहीं खाता जो कोड़ों की बेदर्द मार से पूरी तरह से पस्त होने के बावजूद उस मुटल्ले सवार को मुश्किल से मुश्किल रास्तों से गुजरते हुए मंजिल तक समय पर पहुँचाने में कामयाब ही रहता है | जी हाँ , चुनाव को संपन्न करवाने के लिए जिन सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं ली जाती हैं , उनमें सबसे अधिक पढ़े-लिखे पर मजबूर शोषित कर्मचारियों का समूह होता वे हैं अध्यापक का | कहने को दुनिया जितनी चाहे बातें बना ले , पर सच्चाई यही है कि इतना सम्माजनक प्रोफेशन होने के बावजूद भी इन्हें बदकिस्मती से समाज वह इज्ज़त नहीं देता जिसके ये असली हकदार हैं | अब यहाँ सवाल उस व्यवहार का नहीं है जो चुनाव आयोग के बददिमाग निरंकुश अधिकारी उन लोगों से करते हैं जिनकी सेवाएं वे उधार के सिंदूर की तरह प्राप्त करते हैं, यहाँ हम बात कर रहें हैं उस बद-इंतजामियत की जिसकी मार चुनाव ड्यूटी पर लगे कर्मचारियों पर पड़ती है | और यह मार भी ऐसी कि चोट खाया मुलाजिम डर के मारे उफ्फ तक नहीं कर सकता कि आवाज उठाई तो कहीं सस्पेंड ना कर दिया जाऊं | यह वह डर ही है जिसकी वजह से जिनकी चुनाव ड्यूटी की आपबीती राम कहानी का मैं ज़िक्र करने जा रहा हूँ उन्होंने गुमनाम रहने में ही अपनी भलाई समझी | अब आप ही सोचिए उन सबके बारे में जो अपने रिटायरमेंट की दहलीज़ पर हैं , जिनकी शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है पर मजबूर हैं फ़ौजी स्टाइल में चौबीस घंटे की लगातार ड्यूटी देने के लिए | खाना तो दूर पानी भी मिल जाए तो गनीमत है | यह बात मैं बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कह रहा | किसी की सच्ची आपबीती है | बीच में उठ कर बाथरूम तक जाने का समय नहीं | चुनाव के बाद ईवीएम मशीन को देर रात तक जमा करवाने के लिए भेड़-बकरियों की तरह सर-फोडू मेहनत-मशक्कत | 
सुखद व्यवस्था का मनमोहक नज़ारा 

ईवीएम मशीन जमा करने की धक्का-मुक्की  

अब चुनाव आयोग बेशक अपनी पीठ खुद कितनी ही थपथपा ले, पर असलीयत में ज़मीनी हालात का जाएजा आपको इस कविता के माध्यम से बखूबी मिल जाएगा | यह कविता मुझे व्हाट्सएप पर किसी ने भेजी, जिसे प्राप्त सन्देश के अनुसार सुश्री मीनाक्षी खंतवाल ‘मीना’ ने लिखी है | मुझे कोई शक नहीं यह किसी की आपबीती ही है जिसमें वह शायद स्वयं भी हो सकती हैं | कविता लम्बी अवश्य है पर जब कष्ट अपरम्पार हैं तो उन कष्टों का बखान करती कविता भी कुछ लम्बी ही होगी जिसे पढ़ने के लिए  आपमें धीरज तो होना ही चाहिए |

शिक्षक बनाम चुनाव 

जो धीमे धीमे हाथ में सफ़ेद थैला लिए जा रहा है,
लोकतंत्र की रक्षा का भार कंधे पर धरे जा रहा है....
उसी पर तो इन दिनों सरकार का पूर्ण भरोसा है,
वो कभी कोई ग़लती नहीं करेगा,उसीसे ये आशा है...
सरकारी महकमों में यही कौम गाय सरीख़ी होती है,
किसी और महकमे की क़ौम मिर्च सी तीखी होती है,
उन पर तो सरकार मजबूरी में ही हाथ डालती है,
क्योंकि वो तो फ़ाइलों को भी कल पर टालती है,
शिक्षक की कॉपी डायरी सब अप टू डेट रहती है,
तब भी ये क़ौम अधिकारियों के ताने ही सहती है..
उसी सहनशक्ति की परीक्षा चुनावी ड्यूटी होती है,
शिक्षक के कंधे पर बोझ रख राजनीति चैन से सोती है..
चुनावी घोषणा होते ही हमारा दिल ज़ोर से धड़कने लगा,
बायीं या दायीं आँख का पता नहीं,अंग अंग फड़कने लगा,
सुबह और शाम की पूजा में ये प्रार्थना भी शामिल हो गयी,
स्कूल पहुँच के ड्यूटी पायी तो ये आस भी धूमिल हो गयी,
कोई हमारी नहीं सुनता ,ये तो जग ज़ाहिर है,
पर ये भगवान भी हमे धोखा देने में माहिर है!
ड्यूटी न आने की प्रार्थना पर कैसे मुस्काता था,
भगवान तब तेरा वो रूप हमें कितना भाता था,
जो प्रिंसिपल दारुण दुःख में भी छुट्टी नहीं देता है,
चुनाव आयोग के सामने कितना बेबस होता है,
अब तो शिक्षक सिर्फ़ फ़ोन पर सन्देश दिखाते हैं,
उसी प्रिंसिपल से 'अभी जाओ' का आदेश पाते हैं,
दुःख तो होता है ड्यूटी का , फिर भी धीरज धरते हैं,
' चलो सबकी ड्यूटी आई है' सोच गहरी साँस भरते हैं,
पहुँचे जब पंडाल में तो एक बिछड़ा साथी मिल गया,
चुनाव आयोग से मेरा बैर कुछ क्षण को टल गया,
एक दूसरे के सुख दुःख पूछते ट्रेनिंग भी हो गयी,
मित्र की छोटी बच्ची उसकी गोद में ही सो गयी,
'अक्कड़ बक्कड़'खेल कर पोलिंग पार्टी बनायीं गयी,
किसी तरह'भानुमति' के कुनबे की ईंटें जुटाई गयी,
यूँ हर कोई एक दूजे के लिए अजनबी था,अनजान था,
पर अब तो एक टीम थे ,और सामने बिखरा सामान था,
ज़मीन पर बैठ कर सामान की गिनती कर रहे थे,
कुछ रह ना जाये, प्रिसाइडिंग इसी फ़िक्र में मर रहे थे,
पोलिंग अफ़सर दो और तीन तो निरे बेफ़िक्रे थे,
ये सब तो पोलिंग एक और पीठासीन के ठीकरे थे,
सबसे ज़्यादा एक दूजे के लिए वही फिक्रमंद थे,
वे दोनों मानो एक ही गीत के तुकांत छंद थे,
दोनों मनाते थे कि सामने वाला समझदार हो,
चुनाव के दिन का उसी पर दारोमदार हो...
सुबह चार बजे जब घर से शिक्षक बाहर निकलता है,
उसकी बेबसी पर गली का कुत्ता भी नहीं भौंकता है,
अँधेरी सड़कों पर पोस्टमॉर्टम से सफ़ेद थैले चमक रहे हैं,
लोकतंत्र बचाने के स्तंभ, शिक्षकों के चेहरे दमक रहे हैं,
राह चलते वो गाड़ी रोक औरों को लिफ़्ट देता है,
इस तरह मानव दूजे को मानवीयता का गिफ़्ट देता है,
पोलिंग बूथ को बच्चे के घरौंदे-सा मनोयोग से सजाता है,
कर्तव्यनिष्ठा में वो गुरु,शिष्य को भी लजाता है...
चौदह घंटे एक सीट पर भूखा प्यासा बैठा रहता है,
तब भी मुस्कुराता है जब कोई मतदाता ऐंठा रहता है,
मशीन जमा करवाने के लिए,बसों में ठूंसा जाता है,
रहा सहा ख़ून भी जमा करवाते वक़्त चूसा जाता है,
इस तरह शिक्षकों का चुनावी मेला हो ख़त्म होता है,
उधर छह बजे के बाद नेताओं के घरों में जश्न होता है....
नेताओं के भक्त उनकी ज़ोरशोर से जयकार कर रहे हैं,
उन्हें कोई नहीं जानता,जो इनके लिए24 घंटे से मर रहे हैं,
अपना काम निकालने के बाद,सब वादे तोड़ देते हैं,
चुनाव करानेवालों को आधी रात सड़क पर छोड़ देते हैं,
इनके लिए रात्रि में कोई बस या मैट्रो सेवा नहीं चलती है,
इस क़ौम को सरकार काम निकालने हेतु यूँ ही छलती है,
रात के डेढ़ बजे हैं और मैं मदर्स डे के सन्देश पढ़ रही हूँ,
कई मदर्स अभी भी सड़कों पर हैं,ये सोच शर्म से गढ़ रही हूँ|
(मीनाक्षी खंतवाल'मीना')
13 मई 2019 

वैसे तो इस मामले से जुड़ी मन को झकझोर देने वाली घटनाओं का अंत नहीं है पर फिलहाल तो मैं केवल इतनी ही कामना कर सकता हूँ कि ईश्वर चुनाव आयोग और सरकार को इतनी सद्बुद्धि , क्षमता और संवेदना दे कि भविष्य में चुनाव कार्यों में लगे सभी छोटे-बड़े कर्मचारियों से इंसानों की तरह से सलूक हो | चुनाव में सभी को एक त्यौहार का एहसास हो, किसी के मरने पर ग़मगीन तेहरवीं का नहीं |

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...