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Sunday, 13 October 2019

घर में सावन

इस संसार में कोई भी पूरी तरह से स्वाबलंबी नहीं है | हर किसी को किसी न किसी पर कुछ हद तक निर्भर तो रहना ही पड़ता है | एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि बेशक आप कितने ही आला दर्जे के फन्ने खां क्यों न हों, कहीं तो आपको सज़दा करना ही पड़ेगा | अब किसी से अपना काम निकलवाना भी अपने आप में एक हुनर है जो हर किसी के बूते की बात नहीं | कुछ लोग इस कला में माहिर होते हैं तो कुछ फिस्सडी | पुराने से भी बहुत पुराने ज़माने में एक अत्यंत विद्वान व्यक्ति थे जिनका दिमाग चाचा चौधरी से भी तेज़ चलता था | उनके नाम से आप सभी भली- भांति परिचित होंगे – चाणक्य | वह भी लुकमान हकीम की तरह हर मर्ज़ की दवा बता गए थे – अब यह बात अलग है कि उनके बताये इलाज़ शारीरिक कष्टों से सम्बंधित न होकर, दुनियादारी, राजनीति और कूटनीति से ताल्लुक रखते हैं | हज़ारों वर्ष बीत जाने के बाद आज भी चाणक्य नीति के विचार आपको व्हाट्सेप के सुविचारों की दुनिया में उड़ान भरते नजर आ जायेंगे | किसी से भी काम निकलवाने के लिए चाणक्य नीति का एक बहुत ही कारगर और दमदार नुस्खा है – “ साम- दाम- दंड- भेद” | साम : समझा कर , दाम : लालच दे कर , दंड : धमका कर, भेद : कुटिल, तिकड़मबाजी और घाघ तरीके अपना कर ( जैसे ब्लेकमेलिंग ) | अब आप कहेंगे मैं यह सब आपको क्यों बता रहा हूँ | कारण केवल इतना है कि आज तक एक मजेदार घटना और चाणक्य नीति के बीच ताल-मेल नहीं बैठा पा रहा हूँ | 
यह किस्सा भी बहुत पुराना है और उस किस्से को मुझे सुनाने वाले मेरे ख़ास मित्र भी उतने ही पुराने हैं | उनका नाम भी बता ही देता हूँ - श्री रविन्द्र  निगम | देश -विदेश में सीमेंट उद्योग के तकनीकी क्षेत्र में एक तरह से भीष्म पितामह का रुतबा हासिल कर चुके हैं | विदेशों में भी अपने कार्य-कौशल के झंडे गाढ़ चुके हैं | इतिहास के पुराने पन्नों से निकाला यह किस्सा भी आज से तकरीबन तीस साल पुराना तो होगा ही | निगम साहब उन दिनों भारतीय सीमेंट निगम के हरियाणा में स्थित चरखी दादरी प्लांट में तैनात थे | लगे हाथ यह भी बताता चलूँ कि हमारे निगम साहब और सीमेंट निगम में कहीं से भी दूर-दूर तक कोई रिश्तेदारी नहीं है ठीक उसी तरह से जैसे प्राचीन गणितज्ञ -वैज्ञानिक आर्य भट्ट और आज की आलिया भट्ट में | चरखी दादरी जो आज के समय में अपने आप में एक जिला बन चुका है, रोहतक और भिवानी के साथ भौगोलिक रूप से सटा हुआ है | देश के सबसे पुराने सीमेंट कारखानों में से एक वहीं पर था| इसे उद्योगपति डालमिया ने वर्ष 1940 के दौरान बनवाया था | ज़ाहिर सी बात है , समय के साथ-साथ कारखाना पुराना और बीमार पड़ता चला गया और वर्ष 1980 के आते -आते एक तरह से दम ही तोड़ दिया | अब उस फेक्ट्री के बंद होने से सैकड़ों कर्मचारी बेरोजगार हो गए | तत्कालीन सरकार पर जब तरह-तरह के राजनैतिक दबाव पड़ने लगे तब उस बंद पुराने बीमार कारखाने को केंद्र सरकार के आधीन सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (सी.सी.आई ) के सुपर्द कर दिया गया | एक पुरानी कहावत है – मरी गैय्या , बामन के नाम | बस कुछ उसी तर्ज़ पर उस फटे - पुराने ढ़ोल को सी.सी.आई के गले में लटका दिया गया कि बेटा बजाते रहो अगर बजा सकते हो तो | सी.सी.आई ने अपने जिन अनुभवी और प्रतिभाशाली अधिकारियों की टीम को उस मरियल बैल को हांकने की जिम्मेदारी सौपीं थी , हमारे निगम साहब भी उन्हीं में से एक थे | 
उन दिनों के निगम साहब ( बाएं) के साथ मैं  मुकेश कौशिक 
अब जैसा कि आपको बता चुका हूँ वह सीमेंट प्लांट जितनी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था , वहां की रिहायशी कॉलोनी के मकानों की हालत भी उसी तरह की थी | वहां पर सिविल डिपार्टमेंट के प्रमुख थे श्री एच.सी.मित्तल | 
स्व० श्री एच.सी. मित्तल 
आज वह इस दुनिया में नहीं हैं – ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे | निहायत ही शरीफ़ और दीनो-दुनिया से दूर , अपने काम से काम रखने वाले | अब उन पुराने मकानों की मरम्मत करवाने से संबंधित तरह- तरह की शिकायतों का ढेर किसी पहाड़ से कम नहीं था | अब हालत यह कि इधर सीमेंट प्लांट की दिक्कतें और दूसरी ओर टाउनशिप के मकानों की टूट -फूट का रोज का रोना-पीटना और मित्तल साहब का दफ्तर में बैठना मुश्किल, सड़क पर चलना उससे भी ज्यादा मुश्किल | अपनी तरफ से जितना बन पड़ता करते पर कुल मिला कर मामला वही – एक अनार और सौ बीमार | 
ऐसी ही एक समस्या निगम साहब के घर में भी खड़ी हो गयी जब उनके फ्लेट में छत से ऊपर की मंजिल पर बने मकान का पानी टपक-टपक कर गिरना शुरू हो गया | निगम साहब ने भी अपनी फ़रियाद मित्तल साहब के डिपार्टमेंट में करवा दी| कुछ दिनों बाद एक-आध बार मित्तल साहब को याद भी दिलवा दिया | दिन बीतते गए और निगम साहब के फ्लेट में बेमौसम का सदाबहार सावन बदस्तूर जारी रहा | थक हार कर निगम साहब भी अपने दिल को तस्सली देकर चुप बैठ गए कि चेरापूंजी में भी तो लोग रहते ही हैं | समय एक सा नहीं रहता, आखिर एक दिन वक्त ने करवट ली और सड़क पर निगम साहब और सिविल डिपार्टमेंट के प्रमुख मित्तल साहब का आमना -सामना हो गया | मित्तल साहब खुद ही पूछ बैठे – आपके घर की जो प्रोब्लम थी वह ठीक हो गयी क्या ? निगम साहब थोड़ा सा मुस्कराए फिर बोले – “सर अभी तक तो नहीं | हाँ इतना जरूर है कि मैंने उस टपकती आलमारी के ठीक नीचे अपने पूजा घर के सभी देवी-देवता बिठा दिए हैं यह कह कर कि भगवन मैं तो अब मजबूर हूँ | जब तक मित्तल साहब की दया- दृष्टि नहीं होती तब तक इसी प्रकार से स्नान करते रहिए |हम से तो हो नहीं पाया, आप काम करवा सकते हैं तो करवा लीजिए |” सुनकर मित्तल साहब कुछ नहीं बोले , सिर्फ मुस्करा कर चल दिए और निगम साहब भी अपने काम काज में व्यस्त हो गए | 
अगले दिन जब रोज की तरह फेक्ट्री के लंच टाइम में निगम साहब अपने फ्लेट पर पहुंचे तो वहां का नज़ारा देख कर हक्के-बक्के रह गए | सुपरवाइज़र के साथ करीब दस -बारह मजदूर हल्ला बोल चुके थे | सभी उस टपकती छत के इलाज़ में मुस्तैदी से व्यस्त थे | उनके सुपरवाइजर ने बताया कि मित्तल साहब का आदेश है जब तक निगम साहब की ( या यूँ कह लीजिए देवी-देवताओं की ) शिकायत दूर नहीं होती है, वापिस मत लौटना | और इस प्रकार से निगम साहब के यहाँ से सदाबहार सावन की विदाई हुई | 
मैं आज तक यह नहीं समझ पाया हूँ कि इस सारे प्रकरण में “साम-दाम-दंड-भेद “ की चाणक्य नीति, या मित्तल साहब की शराफत या भक्ति-भाव  के कौन से फार्मूले ने काम कर दिया | अगर आप बता सकते हैं तो मुझे ज़रूर बताइयेगा |

Saturday, 1 September 2018

दास्ताने कोल पत्तर


यूँ के है तो यह महज़ एक क़िस्सा पर है सच्चा । बात है तक़रीबन 37 साल पुरानी , याने सन 1980 के आसपास की । चरखी दादरी यूनिट का सी सी आई द्वारा अधिग्रहण ताज़ा ताज़ा हुआ ही था । पुरानी काफ़ी समय से बन्द पड़ी फ़ेक्ट्री का काया कल्प करने का काम ज़ोर शोर से चल रहा था । सी सी आई के जगह जगह से टूर पर बुलाए गए अपने अपने तकनीकी क्षेत्रों के एक्सपर्ट पूरी तरह से दिन रात काम पर जुटे रहते थे । इन लोगों का जमावड़ा फ़ेक्ट्री के पुराने हवेलीनुमा गेस्ट हाउस में ही रहता था ।  इस गेस्ट हाउस के कर्ता धरता या यूँ कहिए हनुमान हुआ करते थे जनाब कोल पत्तर । छोटे से क़द के , भारी बदन के स्वामी । हाँ अलबत्ता बेचारे एक आँख से लाचार थे । स्वभाव से बड़े हँसमुख और  मेहमान नवाजी में पक्के माहिर । उम्र होगी यही कोई पचास के आसपास , यानी खासे तजुरबेकार । डालमिया के समय से ही गेस्ट हाउस की रसोई और अन्य व्यवस्था संभालते थे । हमारे जैसे कई अन्य बेचलर्स जिनके खाने पीने का मजबूरी वश इंतज़ाम गेस्ट हाउस में ही था, कोल पत्तर को प्यार से मूँछों वाली मम्मी कह कर बुलाते थे और वह ज़िंदादिल शक्स भी पूरी मस्ती में इस उपनाम के मज़े लेता था ।
सो हुआ यूँ कि एक दिन गेस्ट हाउस में किसी बड़े अधिकारी का आना हुआ । सफ़र की थकान थी या स्वभाव की जन्मजात आदत , उन्होंने किसी बात पर कोल पत्तर को ज़ोरदार डाँट पिला दी । अब श्रीमान कोल पत्तर उर्फ़ हमारी मूँछों वाली मम्मी, कुछ समय तक तो हनुमान रूप में चुपचाप भक्ति भाव से डाँट बर्दाश्त करते रहे, पर ज़्यादा बमबारी होने पर सीधे हनुमान से परश राम के रूप में अवतरित हो गए और बोले : "साहिब , आप हम को जानित नाहीं , हम हैं कोल पत्थर जो आप जैसे कितनन को हम सामान समेत गड्डी चड़ाए दिए है । " अब सच मानिए , साहब बहादुर तो एकदम धड़ाम से जैसे ज़मीन पर आ गए , मानों सर पर किसी ने घड़ों पानी उड़ेल दिया हो । ग़ुस्से और शर्म से चुपचाप वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी ।
पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई । साहब बहादुर ठहरे आला अफ़सर , सवाल मूँछों का था जिसे सरे आम भरी महफ़िल में हमारी तथा कथित मूँछों वाली मम्मी ने बड़ी बेदर्दी से कुतर डाला था l जिसका डर था आख़िर वही हुआ - कोल पत्तर को शाही बुलावा अगले ही दिन आ गया । हम समझ गए कि आज तो हनुमान का कोर्टमार्शल तय है । श्री गुप्ता (पूरा नाम याद नहीं ) तब फ़ेक्ट्री के जी एम हुआ करते थे और बहुत ही सरल और सौम्य व्यक्ति थे । उनके दरबार में पेशी हुई हमारे गोलू मोलू की । जी एम साहब ने जो कि ऑर्डिनेन्स फ़ेक्ट्री , से डेपुटेशन पर आए हुए थे ,  पहला गोला दागा " तुमने साहब की बेज्जती करी ? क्या बोला था ज़रा फिर से बोलो ।" कोल पत्तर जी कानों पर हाथ रख कर तुरंत बोले " साहिब हम तो ऐसा सपने में भी नाहीं सोच सक़त । हम ठहरे सेवक माई बाप, हम तो साहिब को बताई रहिल की बड़े बड़े साहिब लोगन को सटेशन तक सामान लेकर हम ही जाता हूँ ।  हमारा क्या ग़लती साहिब । "  चरखी दादरी स्टेशन और फ़ेक्ट्री बिलकुल साथ साथ थीं । कोल पत्तर की बात लगभग उसी तर्ज़ पर थी जैसा महाभारत के युद्ध में बोला गया युधिष्ठिर का अर्ध सत्य - अश्वत्थामा हत: नरो व कुंजर ।  राम जाने उस दिन था क्या  - कोल पत्तर की क़िस्मत थी या जी एम रूपी राम को अपने हनुमान की भक्ति और सेवाएँ याद आ गई । असल माजरा तो जी एम साहब समझ चुके थे , पर शायद हनुमान की हाज़िर जवाबी उन्हें अंदर तक गुदगुदा ग़ई थी । होंठों पर आई हल्की सी मुस्कान को बलात दबाते हुए उन्होंने , नीचे फ़ाइलों में नज़र गढ़ाए हुए ही हाथ के इशारे से मूँछों वाली मम्मी को जाने का इशारा कर दिया ।  और इस  तरह से लंका कांड का हैपी वाला दी एंड हुआ ।
चलिए अब लगे हाथों आपको इस फ़िल्म के नायक के दर्शन भी करवा देता हूँ । साथ में लगे फ़ोटो में बीचों बीच ( बाएँ से तीसरे ) सफ़ेद बुर्राक वर्दी में मुस्कान बिखेरते जो ठिगने से महानुभाव मौजूद हैं वही हैं हमारी  तत्कालीन   ' मूँछों वाली मम्मी ' ।

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...