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Tuesday, 22 October 2019

राजबन का हनुमान : अनिल शर्मा

अपनी नौकरी के कार्यकाल के दौरान मैंने महसूस किया कि अन्य स्थानों की तुलना में फेक्ट्रियों के टाउनशिप की अलग ही दुनिया होती है | सब लोग मिल-जुल कर साथ रहते हैं | एक दूसरे के हर सुख- दुःख के साथी | सब त्यौहार मिल जुल कर एक साथ मनाते हैं | हालाकि मुझे रिटायर हुए अरसा बीत चुका है पर आज भी हिमाचल प्रदेश के राजबन से दुर्गापूजा और रामलीला का निमंत्रण हर वर्ष आता है | मौक़ा मिलने पर मैं भी शामिल हो जाता हूँ | इस रामलीला की विशेष बात यह है कि इसके सभी कलाकार फ़ैक्टरी के ही  कर्मचारी होते हैं जो दिन भर की ड्यूटी करने के बाद भी पूरी भक्ति, शक्ति और उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं |अगर मैं ठीक से याद कर पा रहा हूँ तो यह परम्परा विगत चालीस से भी अधिक वर्षों से अनवरत चलती आ रही है | समय के साथ -साथ पुराने कर्मचारी रिटायर होते गए, नए-नए आते गए और इसके साथ ही रामलीला के कलाकारों की भी नई पीढ़ी अवतरित होती गयी | राम, लक्ष्मण , हनुमान , रावण जैसे सभी पात्रों का नया संस्करण | लेकिन इन सब परिवर्तनों के बावजूद भी रामलीला की मूल आस्था और भक्ति भावना वही बरकरार रही| 
राजबन  की रामलीला : नीचे बैठी तत्कालीन जी॰एम  सुश्री सरस्वती देवी 
इस मौके पर पर मुझे आज की रामलीला के आज के हनुमान और उसकी कहानी बरबस याद हो आयी | अनिल शर्मा नाम है उसका | यादों की डोरी पहुँचती है उसके दिवंगत पिता श्री रामानंद शर्मा तक जो फ़ौज से रिटायरमेंट लेने के बाद, किसी ज़माने में उसी राजबन फ़ैक्टरी में नौकरी करते थे | मुझे वह समय भी याद है जब मेरे मकान के लॉन में लगे पेड़ से अमरूद तोड़ने आये बच्चों की टोली में शामिल नन्हा अनिल भी शामिल रहा करता था | इस अनिल की ज़िंदगी भी बहुत ही उथल-पुथल भरी रही है | आइये आप को भी उसकी ज़िंदगी का छोटा सा फ़िल्मी ट्रेलर दिखा देता हूँ | 

बचपन में अनिल पढ़ाई में ठीक- ठाक ही रहा | स्कूल भी अच्छा था लेकिन नौवीं क्लास तक आते-आते जैसे शरारतों के झूले की पींग ऊँची उठती गई, पढ़ाई की बैटरी डाउन होती गई | अंगरेजी स्कूल से हिन्दी मीडियम के सरकारी विद्यालय में पधारना पड़ा पर कुछ समय बाद उसे लगा पढ़ाई बस की बात नहीं | पिता भी तब तक नौकरी से रिटायर हो चुके थे| उन्होंने उम्मीदें तो बहुत पाली हुई थी अनिल से, मगर मन मसोस कर रह जाते | आखिर कर भी क्या सकते थे | इसी बीच दुर्भाग्य ने उस हँसते -खेलते परिवार पर जैसे कोई बम छोड़ दिया | पिता को बीमारी ने जकड़ लिया और बीमारी भी कोई छोटी-मोटी नहीं – वह थी साक्षात मौत का दूसरा नाम – कैंसर | पूरा परिवार मानों एक तरह से हिल गया | इलाज के खर्चों से घर की आर्थिक व्यवस्था चरमराने लगी | दिन में तारे दिखना किसे कहते है ज़िंदगी में पहली बार अनिल ने यह भी जान लिया था |
अधूरी पढ़ाई के साथ नौकरी की तलाश में पता नहीं कहाँ -कहाँ धक्के खाने पड़े | दिल में पहली बार यह ख्याल भी आया कि काश अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाया होता तो शायद आज यह वक्त नहीं देखना पड़ता | उधर पिता की तबीयत दिन पर दिन खराब होती जा रही थी | आखिरकार उसी सीमेंट फ़ैक्टरी में  जहाँ पर उसके फ़ौजी पिता अच्छी-ख़ासी नौकरी करते थे वहीं पर ठेके के मजदूरों में भर्ती होकर काम करना पड़ा | पिता की इच्छा थी जीते जी अपनी आँखों के सामने ही अनिल का घर बसते देखने की सो विवाह भी जल्द ही कर दिया | कुछ समय बाद ही दबे कदमों से आती मौत ने भी पिता को अपने बेरहम शिकंजे में ले ही लिया | इधर पिता की मौत का सदमा और उधर पिता की फौज से मिलने वाली पेंशन भी बंद | सिर पर भरे -पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी आ गई जिसमें थे माँ, बहन , भाई, पत्नी और बेटा | खुद की कमाई इतनी कम जैसे ऊंट के मुंह में जीरा | अनिल आज भी उस वक्त को याद करते हुए कहते हैं वह शायद मेरे ज़िंदगी के सबसे बुरे दिन थे | खाने तक के लाले पड़ गए थे | दस रुपये का मेगी का पेकट लाते थे – मेगी परिवार के अन्य सदस्यों को खिला कर उसके बचे हुए पानी में ही रोटी डूबा कर खा लेते | कई बार तो रोटी भी  खेत से तोड़कर लायी प्याज में नमक -मिर्च डाल कर खाने की नौबत रहती 
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हर बुरे वक्त का कभी तो अंत होता है | अनिल के बुरे वक्त ने भी विदाई लेनी शुरू कर दी – बेशक धीरे-धीरे ही सही | खेत की ज़मीन पर मोबाइल टावर लगा तो किराये की आमदनी से कुछ सहारा लगना शुरू हुआ | दिवंगत पिता की पेंशन का मामला सुलझा और माँ को पेंशन मिलनी शुरू हुई | किसी ने सच ही कहा है – अच्छे वक्त में भाग्य और बुद्धि भी साथ देती है | अनिल ने अपनी अधूरी पढ़ाई की तरफ भी ध्यान देना शुरू किया |पत्राचार के माध्यम से पहले मेट्रिक पास किया और उसके बाद बारहवीं | किस्मत का खेल देखिए – फ़ैक्टरी की सरकारी नौकरी के लिए आवेदन मांगे गए और फार्म भरने की अंतिम तिथि पर ही बारहवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ | भागते-दौड़ते आवेदन पत्र भरा | प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के कड़े मापदण्डों पर खरा उतरने पर आखिरकार सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया  में मिलर की नियमित पक्की नौकरी मिल पायी| सीमेंट उद्योग में मिलर का पद अत्यंत तकनीकी और महत्वपूर्ण होता है | बस वह दिन है और आज का दिन , अनिल ने कभी वापिस पीछे मुड़ कर नहीं देखा | जीवन में जो चाहा मिल गया – अच्छी नौकरी, मोटी तनख़्वाह, भली से पत्नी और दो भोले-भाले प्यारे से बच्चे |
अनिल शर्मा :: मिलर के रूप में 

आज का सुखी परिवार : पत्नी और बच्चों के साथ 
अनिल का मानना है की इस सारी सफलता में उसके परिवार का पूरा सहयोग है विशेषकर पत्नी का | पत्नी स्वयं स्नातक हैं जिसका अनिल की अधूरी पढ़ाई को पूरा करवाने में उल्लेखनीय योगदान है | इन सबसे ऊपर वह विशेष कारण जिसकी वजह से भाग्य भी मेहरबान रहा – वह है ईश्वर पर अटूट आस्था | अनिल हनुमान भक्त है और राजबन सीमेंट फेक्टरी  की रामलीला में विगत बारह वर्षों से हनुमान का पार्ट सफलता पूर्वक अदा कर रहा है | हनुमान की भूमिका निभाने के दौरान अनिल को अपने शरीर में अद्भुत शक्ति का संचार महसूस होता है | एक हाथ से ही रसोई गैस का भरा हुआ सिलेन्डर अपने कंधे पर रखने की ताकत आ जाती है जो सामान्य दिनों में संभव नहीं होती |  वह रामलीला का एक मँजा हुआ कलाकार है और आवश्यकता पड़ने पर जोकर से लेकर मंथरा और राजा जनक से लेकर रावण सेना के गण  तक का रोल बखूबी निभा लेता है | रामलीला के एक से बढ़ कर एक मज़ेदार किस्से-कहानियों का भंडार है अनिल के पास- पर उन सब के लिए एक अलग से ही ब्लाग कभी लिखना पड़ेगा |
अनिल - हनुमान रूप में 
सिगरेट शराब जैसे व्यसनों से दूर अनिल की  भविष्य के प्रति सुनहरी योजनाएँ हैं | सबसे पहले अपने आपको ग्रेजुएट होते हुए देखने का इरादा  | एक बड़ी सी गाड़ी खरीद कर परिवार को सैर -सपाटा करने का सपना | मुझे विश्वास है राम जी इस रामलीला के साक्षात हनुमान की मनोकामना अवश्य पूरा करेंगे |
यह थी रामलीला के हनुमान अनिल  के उथल - पुथल भरे जीवन  की एक छोटी सी बानगी जो हमें याद दिलाती है एक बहुत ही पुराने गीत की :

गर्दिश में हो तारे, ना घबराने प्यारे ,
गर तू हिम्मत ना हारे तो होंगे वारे-न्यारे |

Friday, 19 July 2019

हलधर नाग : एक फक्कड़ लोक कवि



सादगी की प्रतिमूर्ति : हलधर नाग 

हलधर नाग - अगर मैं गलत नहीं हूँ तो शायद आप सभी के लिए यह नाम कतई अनजाना लग रहा होगा | इसमें आपका भी कोई दोष नहीं - ऐसा ही होता है जब कोई व्यक्ति टी.वी., अखबारों और सोशल मीडिया के शोर शराबे से दूर , अपनी ही एक अलग सीधी-सादी सी ज़िंदगी में चुपचाप एक उद्देश्य को लेकर कार्यरत है तो भला आप उसे कैसे जान पायेंगे | वह क्रिकेट जगत के विराट कोहली या सिनेमा के रुपहले परदे के शाहरुख़ खां तो हैं नहीं जो एक स्कूली छात्र भी उन पर दीवाना हो | लेकिन वह इन दोनों से इस बात में कम भी नहीं कि उन्हें भी भारत सरकार से प्रतिष्ठित पदमश्री पुरस्कार मिल चुका है | 
राष्ट्रपति से प्राप्त करते हुए : हलधर नाग  
हलधर नाग ओड़ीसा के कोसली भाषा के कवि एवम लेखक हैं। वे 'लोककवि रत्न' के नाम से प्रसिद्ध हैं। हमेशा एक सफेद धोती और नंगे पैर चलने वाले नाग को, उड़िया साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है| नाग का जन्म 1950 में संभलपुर से लगभग 76 किलोमीटर दूर, बरगढ़ जिले में एक गरीब परिवार में हुआ था। जब वह 10 साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई, और वह तीसरी कक्षा के बाद पढ़ नहीं सके। इसके बाद वे एक मिठाई की दुकान पर बर्तन धोने का काम करने लग गए। दो साल बाद, उन्हें एक स्कूल में खाना बनाने का काम मिल गया, जहाँ उन्होंने 16 साल तक नौकरी की। स्कूल में काम करते हुए, उन्होंने महसूस किया कि उनके गाँव में बहुत सारे स्कूल खुल रहे हैं। उन्होंने एक बैंक से संपर्क किया और स्कूली छात्रों के लिए स्टेशनरी और खाने-पीने की एक छोटी सी दुकान शुरू करने के लिए 1000 रुपये का ऋण लिया। 

अब तक कोसली में लोक कथाएँ लिखने वाले नाग ने 1990 में अपनी पहली कविता लिखी। जब उनकी कविता ‘ढोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद का पेड़) एक स्थानीय पत्रिका में प्रकाशित हुई, तो उन्होंने चार और कवितायेँ भेज दी और वो सभी प्रकाशित हो गए। इसके बाद उन्होंने दुबारा पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी कविता को आलोचकों और प्रशंसकों से सराहना मिलने लगी | उन्हें सम्मानित किया गया जिससे उन्हें लिखने के लिए और प्रोत्साहन मिला | उन्होंने अपनी कविताओं को सुनाने के लिए आस-पास के गांवों का दौरा करना शुरू कर दिया जिसकी सभी लोगों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली। यहीं से उन्हें ‘लोक कवि रत्न’ नाम से जाना जाने लगा।
आपको जानकार आश्चर्य होगा की स्वयं तीसरी कक्षा तक पढ़े 69 वर्षीय हलधर नाग की कोसली भाषा की कविता पाँच विद्वानों के पीएचडी अनुसंधान का विषय भी है। इसके अलावा, संभलपुर विश्वविद्यालय इनके सभी लेखन कार्य को हलधर ग्रंथाबली -2 नामक एक पुस्तक के रूप में अपने पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर चुकी है। संभलपुर विश्वविद्यालय में अब उनके लेखन के कलेक्शन 'हलधर ग्रंथावली-2' को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है। 

उन्हें अपनी सारी कविताएं और अबतक लिखे गए 20 महाकाव्य कंठस्थ हैं। उन्हें वह सबकुछ याद रहता है, जो लिखते हैं। आप केवल नाम या विषय का उल्लेख भर कर दीजिए और वह बिना कुछ भूले सब कविताएं सुना देंगे। वह रोजाना कम से कम तीन से चार कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, जहां वह कविता पाठ करते हैं। उनकी कवितायें सामाजिक मुद्दों के बारे में बात करती है, उत्पीड़न, प्रकृति, धर्म, पौराणिक कथाओं से लड़ती है, जो उनके आस-पास के रोजमर्रा के जीवन से ली गई हैं। उनके विचार में, कविताओं में वास्तविक जीवन से मेल और लोगों के लिए एक संदेश होना चाहिए| वे कहते हैं “कोसली में कविताओं में युवाओं की भारी दिलचस्पी देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है। वैसे तो हर कोई एक कवि है, पर कुछ ही लोगों के पास उन्हें आकार देने की कला होती है।“ 

हलधर नाग पैरों में कभी कुछ नहीं पहनते। सादगी पसंद इस कवि का ड्रेस कोड धोती और बनियान है। जब वह पद्मश्री का सम्मान राष्ट्रपति के हाथों प्राप्त कर रहे थे तब भी वह नंगे पाँव और धोती बनियान में ही थे | इसी को तो कहते हैं सादगी और ज्ञान का अद्भुत संगम जो विगत काल में महाकवि निराला की जीवन शैली में देखने में नज़र आता था | हलधर नाग की कहानी व्यक्त करती है उस घोर गरीबी में घिरे संघर्ष को जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी | यह सीधा सादा इंसान अपने ज्ञान की ज्योति की मशाल से समाज को प्रकाशित करता, एक सन्देश देता हुआ चलता रहा अकेला और आज भी चला जा रहा है ........ नंगे पाँव, धोती बनियान में | 



Thursday, 21 March 2019

हैदर का हौसला

ज्यादा पुरानी बात नहीं है | बहुत दिनों से घर पर बैठा बोर हो रहा था | घर से बाहर निकलना ही था सो घूमते- फिरते जा पहुंचा हुमांयू के मकबरे पर जो कि मेरे घर से कोई ख़ास दूर भी नहीं है | यह मकबरा दिल्ली के ख़ास दर्शनीय स्थानों में से एक है जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जा चुका है इस जगह पर मुग़ल सल्तनत के बादशाह हुमांयू और उसके वशंजों और ख़ास दरबारियों को यहीं दफनाया गया था | हरे-भरे बाग़ में बसी यह यह सुन्दर सी इमारत मुग़ल वास्तु-कला का जीता-जागता नायाब नमूना है | | ऐतिहासिक महत्त्व का होने के कारण इस जगह पर देशी –विदेशी सैलानियों की भरमार लगी रहती है | किसी समय हरी-भरी दिल्ली आज इस मुकाम पर पहुँच चुकी है कि ताज़ी हवा में सांस लेने के लिए भी मकबरे और कब्रिस्तानों का आसरा लेने की नौबत आ चुकी है | 

हरियाली में घिरा हुमांयू का मकबरा 
तो उस दिन हुआ कुछ ऐसा कि मकबरे में घूमते-घामते, वहां के बाग़ तक भी टहलते हुए पहुँच गया | भीड़-भाड़ से दूर उस हरे-भरे पार्क में एक अनोखी शान्ति विराजमान थी | ताज़ी आबो-हवा और हरियाली उस पूरे माहौल को एक अलग ही ऐसी रंगत दे रही थी जिसे शब्दों में बताना भी मुश्किल है | एक पेड़ की छाँव में बैठा हुआ इस पूरे आलौकिक वातावरण के आनंद में पूरी तरह से खोया हुआ था कि अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज में आलाप लेता हुआ एक बीस-बाईस साल का लड़का नज़र आया | वह उस पार्क के चक्कर काट रहा था पर लगता था जैसे किसी और ही दुनिया में खोया हुआ है | पहली नज़र से देखने में ही वह एक अलग ही दुनिया का बाशिंदा महसूस हो रहा था क्योंकि उसके गले से संगीत की मीठी स्वर-लहरियां किसी पहाड़ी झरने की तरह से फूट रहीं थी | मेरे पास से जैसे ही वह गुज़रा, मैं स्वयं को उससे बात करने से रोक नहीं पाया | उसने अपने बारे में जो भी बताया वह मेरे दिमाग़ को झकझोरने के लिए काफी था | आइये आज आपसे भी उस बातचीत को साझा करता हूँ -
हैदर का बचपन  

उस लड़के का नाम है - हैदर अंसारी | बचपन से निहायत ही गरीबी के माहौल से टक्कर लेते हुए किसी तरह से गुज़र-बसर हो रही है | पिता की मौत तभी हो गयी जब हैदर महज सात साल का था | 
दिवंगत अब्बू के साथ हैदर 
हालात इतने खराब हो चले कि जिस माँ ने कभी घर से बाहर कदम नहीं रखा, परिवार पालने के लिए बेचारी को पान के खोखे पर बैठना पड़ा | बचपन से ही हैदर और उसके भाइयों को भी इस काम में हाथ बटाने के लिए दुकान पर भी बैठते |
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं
इस तंगहाल ज़िंदगी से परेशान हूँ मैं 

(फोटो सौजन्य : मौहम्मद समीर)
हुमांयू के मकबरे के इलाके में ही बसी हुई झौंपड-पट्टी में रहा | कुछ साल पहले मकबरे की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का काम जब आगा खां ट्रस्ट और भारत सरकार द्वारा हाथ में लिया गया तब उस बस्ती को ही गिरा दिया गया | सर पर जो आसरा था वह भी छिन गया | वह तो गनीमत थी कि सरकार ने इस बात का ख्याल रखा कि बस्ती से उजड़ कर जाने वालों को तीस किलोमीटर दूर रहने की जगह दिलवा दी | पर हालत तो अब इस मायने में और बुरी हो गयी कि रिहाइश दिल्ली के एक कोने में और काम-धंधा वहां से इतनी दूर | हैदर को इस बात का बहुत मलाल है कि माँ को रोज काम के सिलसिले में ३० किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है | पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर हैदर ने बताया कि वह बारहवीं कक्षा तक दिल्ली पब्लिक स्कूल , मथुरा रोड से पढ़ा है | यह दिल्ली का नामी-गिरामी स्कूल है जहां पर अच्छे-अच्छे अमीर और खासे रसूख वाले लोग भी अपने बच्चों का दाखिला करवाने के लिए तरसते हैं | हैदर वहां कैसे पहुँच गया ? खुद हैदर ने यह राज़ खोला कि इस इतने नामचीन स्कूल में दाखिला मिलने में भी आखिर उसकी गरीबी ही काम आयी | सरकारी दिशानिर्देशों के कारण उन पब्लिक स्कूलों के लिए आस-पास के इलाकों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए भी दाखिला देने की बाध्यता होती है | सुनकर एक बारगी तो मैं भी सोच में पड़ गया- पैसा जहां काम न आया, ग़ुरबत ने अपना काम कर दिया | हाँ इतना जरूर था कि सुबह के समय साहबी बच्चों के बाद ही उन गरीब बच्चों के लिए स्कूल में शाम के समय अलग शिफ्ट में पढ़ाई करवाई जाती जिससे राजा और रंक में हमेशा से चला आ रहा फर्क आगे आने वाली नस्लों में भी बाकायदा बरकरार रहे |
अब बात आयी संगीत के शौक की तो हैदर ने बताया कि यह जुनून तो उसमें बचपन से ही है | हाँ इतना जरूर है कि पैसे की किल्लत के कारण इसकी विधिवत शिक्षा उस प्रकार से नहीं ले पाया जैसी होनी चाहिए थी | इस बात का मलाल आज भी उसे है कि संगीत के गुरू का हाथ अगर सर पर होता तो शायद आज वह भी उस मुकाम से बहुत बेहतर होता जहां आज है | वह महसूस करता है कि उसकी हालत बहुत कुछ उस नौसीखिए तैराक की तरह है जिसे समुद्र में सीधे धकेल दिया गया हो| अपने हाथ-पाँव मार कर , संगीत के प्रति जन्मजात रुझान और शौक की वजह से और दूसरे अच्छे गायकों को सुन-सुन कर ही खुद रियाज़ कर लेता है | जहां कहीं भी कोई संगीत का कार्यक्रम होता है कोशिश होती है अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिल जाए , चाहे पैसा न भी मिले | 
गाने का दीवाना : हैदर अंसारी 
हैदर बताते हैं कि इनके कई गाने यू ट्यूब पर भी हैं | पैसे की तंगी के बावजूद , इन गानों की वीडिओ रिकार्डिंग भी किसी न किसी तरह से करवा ही लेते हैं| कभी दोस्तों से उधार ले कर तो कभी मदद लेकर | यही कारण है कि ज्यादातर म्यूजिक वीडिओ में हैदर किसी और के साथ नज़र आते हैं | ये दूसरे कलाकार अक्सर वही होते हैं जो उस वीडिओ के लिए आर्थिक योगदान देने में सक्षम होते हैं | यह बात नहीं है कि इन साथी कलाकारों के हुनर में किसी प्रकार की कमीं है , उनकी गायकी अपनी जगह और आर्थिक सहायता अपनी जगह | स्वभाव से ही संवेदनशील हैदर बहुत कम बोलने वाला और अपनी ही दुनिया में खोया रहता है | दिमाग में उधेड़-बुन चलती रहती है जब कोई नया गीत जन्म ले रहा होता है | अपनी माँ के प्रति आदर और सम्मान देने के लिए अन्य साथी कलाकार- अल्ताफ शाह  के साथ एक म्यूजिक वीडिओ बनाया है जिसे आप भी पसंद करेंगे | हैदर की यही दिली इच्छा है कि संगीत की दुनिया में इतना नाम कमाए कि माँ को मेहनतकश ज़िंदगी से निजात मिल सके | नीचे के लिंक पर आपके लिए उसी गीत को दे रहा हूँ , जरूर सुनिएगा :

और हाँ , चलते-चलते मेरे दिमाग में एक फितूरी ख्याल भी मंडरा रहा है | पुराने ज़माने में बादशाहों के दरबारियों में संगीतज्ञों और गायकों की ख़ास इज्ज़त होती थी जैसे तानसेन, बैजूबावरा | मुझे लगता है उन जैसे ही किसी की आत्मा हैदर के रूप में आज भी उस मकबरे में सोये पड़े शाही खानदान का सुरीला मनोरंजन कर रही है |



Tuesday, 5 February 2019

अनिल भैया : छुक –छुक- छैयां




आज के इस शीर्षक को पढ़ कर शायद एक बारगी तो आपका अच्छा-भला दिमाग भी चकरा गया होगा | इस छुक –छुक-छैयां में समाई हुई हैं रेलगाड़ी की ढेरों रूमानियत से भरपूर बचपन की यादें, वे यादें जो जुड़ी हुई हैं दूर-दराज के छोटे-मोटे रेलवे स्टेशनों पर बिताए बचपन की जहाँ मेरे नाना स्टेशन मास्टर हुआ करते थे | मेरे उस बचपन की बानगी से अगर आप अब तक अनजान हैं तो संस्मरण कण-कण में भगवान (भाग- 1 ):  बचपन की बहार - पथरी की पुकार को भी अवश्य पढ़ लीजिएगा, जिसका लिंक शीर्षक के साथ ही दिया हुआ है |
रेलगाड़ी से जुड़ी कभी एक जीवन-सीख देने वाली कविता भी पढी थी :
**********
अगर तुम्हारा पथ
निश्चित है
तब तो घने अँधेरे में भी
पहुँच जाओगे अपनी मंजिल
जैसे ट्रेने दौड़ लगातीं
रातों में भी
पहुँचा करती हैं स्टेशन |


अगर नहीं
तो भरी दोपहरी में भी
अपना पथ भूलोगे
जैसे नावें भटका करती हैं
सागर में |

********
( साभार : स्व० श्री रमेश कौशिक, कविता संग्रह: मैं यहाँ हूँ ) 
******** सो ज़ाहिर सी बात है रेल तो आज तक मेरे दिलो-दिमाग में छुक-छुक-छैय्याँ कर ही रही है | 

उन्हीं यादों को फिर से ताज़ा करने के लिए बैठे-बिठाए दिमाग में फितूर उठा कि चलो रेल म्यूजियम चलते हैं | नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित रेल म्यूजियम, भारतीय रेल के इतिहास और विकास दोनों को ही बहुत आकर्षक और मनोरंजक रूप में प्रस्तुत करता है | यहीं का एक प्रमुख आकर्षण है छोटी से रेलगाड़ी जिसमें बैठ कर बच्चे और बड़े सभी एक सामान आनंदित होते हैं | उस छोटी सी रेलगाड़ी के छोटे से स्टेशन के छोटे से प्लेटफार्म पर बच्चे और बड़ों की भीड़ में चहलकदमी करते हुए दिल के किसी कोने से आवाज उठी कहाँ है वह शख्स जो इस छोटी सी खिलौना ट्रेन को चलाता है और सभी को बहुत बड़ी खुशी दे रहा है | मन में एक धूमिल सी तस्वीर थी कि कैसा होगा वह इंसान – शायद ढीले-ढाले बेतरतीब से कपड़ों में अधेड़ उम्र का, कच्चे-पक्के बालों वाला जिसकी आँखों पर नज़र का मोटा सा चश्मा लगा होगा | इसी दिमागी-तस्वीर से मेल खाता इंसान खोजने की कोशिश कर रहा था पर नाकामयाब रहा | हाँ , अलबत्ता इंजिन के पास ही सूट-बूट पहने एक बहुत ही स्मार्ट, गोरा –चिट्टा नवयुवक दिखाई पड़ा| कुल मिलाकर व्यक्तित्व ऐसा कि एक बार देखकर भी दोबारा नज़र चुम्बक की तरह मजबूरन वापिस खिंची चली जाए | सच में, मुझे संकोचवश शब्द भी नहीं मिल रहे थे कि पूंछ लूँ- “क्या यह रेलगाड़ी आप ही चलाते है ?” समय कम था और मन में उमड़ रहे सवाल कहीं ज्यादा अत: हिम्मत करके सवाल का जवाब मिल ही गया – “आपने सही पहचाना | मैं अनिल सेंगर हूँ जो इस छुक-छुक गाड़ी को चलाता हूँ |” बस फिर क्या था मन में बसे ढेरों सवाल और उन सवालों के बहुत ही विनम्रता से दिए गए शालीन जवाब जो अपनी कहानी खुद ही बयाँ कर रहे हैं, और इसी पर आधारित है आज की कहानी – अनिल भैय्या – छुक-छुक छैयां 
छोटा इंजिन पर जिम्मेदारी बड़ी 

मेरा नाम अनिल सेंगर है | भारतीय रेलवे में काम करता हूँ , लोको पायलेट के पद पर | वैसे मेरी कहानी में कहने को कुछ भी ख़ास नहीं है, पर दूसरी तरह से सोचा जाए तो बहुत कुछ है | मेरा बचपन एक तरह से गाँव, कस्बे और शहर का मिला-जुला खिचडी रूप रहा है | आठवीं तक की पढाई दिल्ली में ही हुई जहां मेरे पिता जी की पोस्टिंग थी जो रेलवे में ही काम करते थे | लिहाजा उसके बाद हाथरस से विज्ञान विषयों से इंटरमीडिएट किया | सच कहूँ तो मुझे एक तरह से नौकरी करने की जल्दी थी | वजह मुझे आजतक खुद भी नहीं पता | अब नतीज़ा यह कि इंटर के बाद जहां मेरे दूसरे साथी बी.ए या बी.एस.सी में दाखिला लेने की जुगाड़ में थे, मैं पहुँच गया आई.टी.आई के तकनीकी कोर्स में दाखिला लेने | जो मेरे पिता ने समझाया मैंने उसी पर आँखें मूंद कर विश्वास ही नहीं, वरन अमल भी किया | आज के जमाने में जब बी.ए , एम्.ए और अब तो एम्.बी.ए की डिग्री लेने की भेड़ –चाल है, ऐसे बेरोज़गारी के समय में भी तकनीकी शिक्षा लेने वाला कभी और कुछ हो- या- न- हो , पर कम-से-कम भूखा तो नहीं मरेगा, ऐसा उनका विश्वास था | उनका विश्वास और भरोसा समय की कसौटी पर खरा उतरा | आई.टी.आई. का कोर्स करने के बाद ही मैं भारतीय रेलवे की नौकरी में वर्ष 2003 में आ गया | शुरुआत में यहाँ के मेंटेनेंस डिपार्टमेंट की वर्कशाप में काम सीखा, काम किया, मेहनत से किया | हाथ और कपड़े तेल और ग्रीस में भरपूर काले - काले पर माथे पर कोई शिकन नहीं | बस मन के कोने में यही एक विश्वास था कि मेहनत रंग जरूर लाएगी – बेशक देर-सवेर ही सही | और कहा जाए तो मेरे मामले में, यह देर भी कुछ ख़ास नहीं रही | साल 2013 मेरे लिए एक खुशी लाया | मैं लोको रनिंग स्टाफ के केडर के लिए चुन लिया गया | आप इसे कुछ यूं समझ सकते हैं – अब निर्धारित ट्रेनिंग पूरी करने के बाद मैं रेलगाड़ी को चला सकता था | 
रेलगाड़ी भी बड़ी और जिम्मेदारी भी बड़ी 
प्रमोशन पर बढ़ा हुआ वेतन अपने साथ ज्यादा खुशियाँ तो लाता ही है पर साथ ही लाता है ज्यादा जिम्मेदारियां और अगर नौकरी रेलवे की है तो उन जिम्मेदारियों में निहित पेशेवर जोखिम | बस यह समझ लीजिए मामला कुछ ऐसा ही है जो आप रेलवे स्टेशन के हर सिग्नल केबिन की दीवार पर लिखा पाते हैं – सावधानी हटी, दुर्घटना हुई | एक छोटी सी भूल, लापरवाही, या किसी भी प्रकार की अपराधिक तोड़फोड़ की गतिविधि, हमारे साथ-साथ हज़ारों यात्रियों की जान-माल का खतरा बन जाता है | घर से ड्यूटी पर जाने के समय से ले-कर जब तक वापिस नहीं आ जाते, घर वालों की सांस आफ़त मे अटकी रहती है | जान से बढ़ कर कुछ प्यारा नहीं होता, इसी लिए मोटी तनख्वाह और एलाउंस जिन्दगी का मोल नहीं हो सकती, ऐसा उन लोगों को जरूर समझना चाहिए जिनकी नज़र लोको पायलेट्स की पगार पर रहती है | अगर मुझसे पूछा जाए तो  शायद इन्हीं सब वजहों से मैं  खुद अपने बच्चों को लोको पायलट के रूप में नहीं देखना चाहता |
निकल पड़े अपने सफ़र पर 
कई बार ऐसी दुखद घटनाएं भी हो जाती हैं जिन पर हम चाह कर भी बचाव नहीं कर पाते | 100 कि.मी. प्रति घंटे की तेज गति से चल रही गाड़ी के आगे अचानक कोई भी आ-जाए, गाडी को तुरंत नहीं रोका जा सकता | हम भी आखिर हैं तो इंसान ही, ऐसी कोई भी दुर्घटना होने पर अन्दर तक बुरी तरह से हिल जाते हैं | अब तक लगभग बीस जीवन मेरी ट्रेन के नीचे आकर समाप्त हुए होंगें | अपने सरपट तेज रफ़्तार दौड़ते इंजिन में घटी सबसे पहली बार की भयानक याद मुझे आज तक ताज़ा है| मैं दिल्ली से ट्रेन लेकर अजमेर तक जा रहा था | रोहतक से कुछ पहले एक पुल के पास , बहुत ही बूढी औरत जल्दबाजी में ट्रेन की पटरी पार करने की कोशिश में नाकामयाब रही और इस बुरी तरह से घबरा गयी कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि करे तो क्या करे | मैं बुरी तरह से लगभग पागल-सा होकर लगातार चेतावनी की सीटी बजाये जा रहा था पर कुछ नहीं कर पाया | उस दैत्याकार चिंघाड़ मारते इंजिन ने सरपट दौड़ते हुए उस कमजोर, दुबली-पतली बूढी काया को टक्कर मार कर दूर हवा में मानों उछल कर फेंक दिया | उसकी चीख भी उस इंजिन की गर्जना और पहियों की खटर-पटर के शोरगुल में शायद कहीं गुम हो गयी होगी | ड्यूटी समाप्त होने पर गंतव्य स्टेशन के रिटायरिंग रूम में गया |परेशानी का आलम इस कदर कि न-तो खाना खा पाया और ना- ही एक पल को सो पाया | आँख बंद करते ही उस वृद्धा के क्षत-विक्षत शरीर के चिथड़े हवा में उड़ते नज़र आते |घबराहट के मारे मेरा पूरा शरीर मानों पसीने में भीग रहा था | दिल का कोई कोना कचोट-कचोट कर कह रहा था – जो कुछ भी हो, आखिर उस बूढी की जान गयी तो तुम्हारे इंजिन के पहियों के तले आकर ही-ना | रात की तरह से ही सुबह भी मेरे वरिष्ठ साथी समझाने पर लगे थे कि इस प्रकार की दुर्घटनाएं अक्सर होती ही रहती हैं और अगर पटरी पर दौड़ते इंजिन की नौकरी अगर करनी है तो मन तो मजबूत रखना ही पड़ेगा | मुझे लगता है शायद उस वृद्धा में मुझे अपनी नानी का अक्स नज़र आया था तभी तो वापिस जब अपने घर पहुंचा तो अपनी नानी को एक ही बात तोते की तरह बोले जा रहा था कि पटरी जब भी पार करो, ट्रेन के गुजर जाने के बाद बाद | यही सीख आज भी मैं अपने हर चिर-परिचित को देता हूँ कि जीवन अनमोल है, उसे अपनी लापरवाही से व्यर्थ न गवाओं | 

रही बात रेल म्यूजियम की बच्चा ट्रेन चलाने की, तो जब कभी भी नियमित स्टाफ छुट्टी पर चला जाता है तो ऐसी स्थिति में मेरी ड्यूटी भी लग जाती है | अपने रोजमर्रा के एक ही ढंग के काम से हटकर यहाँ आकर हंसते-खिलखिलाते बच्चों को देखकर मैं पूरी तरह से तरोताज़ा हो जाता हूँ | मुझे अपना खुद का बचपन याद आ जाता है जब मेरे पिता जी ने मुझे इसी बच्चा ट्रेन में सैर करवाई थी | सच मानिए बड़ी ट्रेन की तो बात ही छोडिये , उस वक्त मैंने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि एक दिन इस खेल-गाड़ी को भी मैं स्वयं चलाऊंगा|  मेरी जिन्दगी इस खेल-गाडी और रेल- गाड़ी  के बीच आप सबकी शुभकामनाओं से बहुत ही आनंद से गुज़र रही है |
कड़ी मेहनत के बाद मौज - मस्ती भी जरुरी 
और हाँ..... चलते-चलते एक बात और | मेरा मानना है कि जीवन के प्रति एक सकारात्मक सोच रखिए | अपने और अपने परिवार के बारे में तो सभी सोचते हैं , कुछ देश के बारे में भी सोचिए | मैं स्वयं भारतीय प्रादेशिक सेना में भी अपनी सेवाएं दे रहा हूँ जिसके लिए प्रति वर्ष एक माह की ट्रेनिंग पर भी जाता हूँ | भारतीय फौज के साथ बिताया यह एक माह मुझे पूरे वर्ष के लिए इतने उत्साह और ऊर्जा से भर देता है जिसे मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता | 

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तो दोस्तों , यह थी कहानी हमारे अनिल भैया उर्फ़ छुक-छुक-छैय्याँ की | कैसी लगी ?  आप सबसे मेरा अनुरोध है कि इस जोशीले नौजवान के सुरक्षित और सफल भविष्य के लिए कामना करें | यदि हमारा- आपका  अनिल सुरक्षित रहेगा तभी तो अपनी-अपनी मंजिलों तक पहुँचने का हमारा-आपका सफ़र सुरक्षित होगा | 

Wednesday, 30 January 2019

ऊँची उड़ान (भाग 6 ) : मेरे प्रेरणा-स्रोत की

पिछले काफी समय से मैं इस ब्लॉग की दुनिया से दूर रहा | कारण आज की  इस कहानी में ही छिपा है | 

ले० कर्नल एच .सी. शर्मा (रि 0)
हापुड़ जिले का एक छोटा सा गाँव है नान, जी हाँ वही जिसकी नाम-राशि की चपाती को आप होटल में बड़े स्वाद से खाते हैं | उसी गाँव में एक अच्छा –खासा, खाता-पीता किसान परिवार था श्री होशियार सिंह जी का | गाँव के गिने-चुने सम्मानित और प्रभावशाली परिवारों में से एक| उन्हीं के तीन बेटों में से एक थे श्री हुकुम चंद –यानी आज की कहानी का नायक | अपने सीधे-सरल स्वभाव के कारण यह बच्चा गाँव में सभी की आँख का तारा | सीमित साधनों के बावजूद पढ़ाई -लिखाई में तेज़ | अभी बारह  साल का था कि माँ का निधन हो गया | उस बच्चे के लिए इतना बड़ा सदमा सहना आसान नहीं था | बाल-मन पर पड़ा यह घाव जीवन भर रहा और कभी भी माँ की कमीं से उबर नहीं पाया | अब उस बिन माँ के बच्चे का दिल न तो घर पर लगता था और ना ही बाहर संगी-साथियों के बीच | अच्छा-ख़ासा हंसता-खेलता बच्चा यकायक मानों रातों-रात खामोशी की चादर ओढ़े एक गंभीर इन्सान में परिवर्तित हो गया | माँ की याद वैसे तो किसी भी तरह से भुलाई नहीं जा सकती, पर उस बालक ने आखिर एक तरीका ढूँढ ही लिया उस याद को कम करने का | और वह उपाय था खुद को पूरी तरह से पढ़ाई में समर्पित करना | दिमाग तो पहले से ही तेज था, ऊपर से यह मेहनत , नतीजा सभी परीक्षाओं में अव्वल नंबरों से पास होते चले गए | आठवीं तक की पढ़ाई गाँव के ही स्कूल में और उसके बाद पास के शहर हापुड़ में | गाँव से स्कूल जाने के लिए कभी-कभी हालत ऐसे भी बन जाते कि कपड़ों की पोटली को सर पर बाँध कर रास्ते में पड़ने वाली नदी को तैर कर पार करना पड़ता | इन कठिन परिस्थितियों में मेट्रिक और उसके बाद विज्ञान विषयों के साथ इंटर प्रथम श्रेणी के नंबरों के साथ पास किया | 

उन दिनों शादी कम उम्र में ही कर दी जाती थी | उस बालक,जो कि अब किशोरावस्था में था, के साथ भी ऐसा ही हुआ | अब शादी तो हो चुकी थी पर गौना नहीं हुआ था | यानी पत्नी अपने गाँव में पिता के घर ही रह रहीं थी और हमारी कहानी का हीरो अपने पिता के पास अपने गाँव में | अब यहाँ आता है कहानी में एक जबरदस्त मोड़ |अचानक एक दिन सुबह-सुबह पड़ोसी होशियार सिंह जी के पास पहुंचता है और अनुरोध करता है "मेरा बेटा हापुड़ जा रहा है जहां फ़ौज के लिए भर्ती चल रही है| रास्ते में साथ के लिए अपने बेटे हुकुम को भी भेज दीजिए तो मेरी चिंता दूर हो जायेगी |" अब वहां पहुँच कर पता नहीं क्या सूझी कि हीरो भी लाइन में लग गए और तकदीर का खेल , जिसे भर्ती करवाने आये थे वह तो रह गया टांय-टांय फिस्स और चुन लिया गया हमारा हीरो| अब गाँव में जाकर जब सबको बताया तो मच गया कोहराम और रोआ-पीटन | परिवार का कोई भी बड़ा-बूढ़ा इस पक्ष में नहीं था कि हुकुम जाकर फ़ौज की नौकरी करे | उनका सोचना भी एक हद तक जायज़ था | पहले और दूसरे विश्व-युद्ध की बर्बादी झेल चुके बुजुर्गों के लिए फ़ौज की नौकरी में खतरा ही खतरा था | पर जो होना था सो तो हो चुका था सो बुझे मन से दिल पर पत्थर रख कर घर-परिवार ने हालात को स्वीकार करने में ही भलाई समझी और इस के बाद मन में जोशीले अरमान लिए घर-बार छोड़, निकल पड़ा हमारा बहादुर सिपाही एक नई मंजिल की ओर | वह साल था वर्ष 1954 का | 


अब अगर थोड़े में कहूँ तो फ़ौज की नौकरी इस बहादुर हीरो ने कुछ इस अंदाज़ में की जैसे जंगल में शेर की चहल कदमी | इस बात का अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि सिपाही के रूप में भर्ती हुए इस लाजवाब इंसान ने तरक्की की हर हद को एक के बाद एक आश्चर्यजनक ढंग से पार करते हुए अपने 34 वर्ष के सेवा-काल में लेफ्टिनेंट कर्नल के ओहदे तक पहुँच कर ही दम लिया | इसके लिए काम के प्रति पूरा समर्पण और स्वयं के विकास के लिए लगातार अध्ययन जारी रख कर शैक्षिक योग्यता बढाते रहे | सेना में रहते हुए ही विभिन्न तकनीकी कोर्स के अलावा उन्होंने बी.एस.सी , बी .एड, मेनेजमेंट और विधि क्षेत्रों की  शैक्षिक  योग्यताएं अर्जित की | ईमानदारी से अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए, बिना किसी सिफारिश की बैसाखी का सहारा लिए, जो कुछ पाया बस अपने बल-बूते पर | यही ईमानदारी और सिद्धांत कहीं उनकी नौकरी-नैय्या की पतवार बने तो कहीं इन्हीं जीवन-मूल्यों ने आगे बढ़ने के रास्ते में अड़चने भी खडी कर दीं वरना शायद एक - दो अतिरिक्त प्रमोशन भी मिल गए होते | पर इस बात का उन्हें कभी कोई दुःख नहीं रहा जैसा कि वह स्वयं कई बार कहते भी थे कि जीवन मूल्यों के साथ समझौता करके कोई भी लाभ उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं | अपने सेवा-काल में तीनों मुख्य –युद्ध – 1962 चीन के साथ , 1965 और 1971 पाकिस्तान के साथ , में सीमा पर बहुत बहादुरी से दुश्मन का मुकाबला किया | भूटान में हुए सत्ता-संघर्ष के समय विद्रोहियों से निपटने के लिए भेजी गयी भारतीय सेना की पहली टुकड़ी के सदस्य थे जहां बहुत ही खतरनाक हालातों का सामना करना पड़ा | एक से एक कठिन सीमावर्ती स्थानों पर तैनाती रही जिसे बखूबी निभाया | 1962 के भारत-चीन के युद्ध के समय जब इनकी पोस्टिंग बार्डर पर थी, तब अपने पिता श्री होशियार सिंह जी को भी खो बैठे | दरअसल  रेडियो पर आरही लड़ाई और शहीद सैनिकों के समाचारों को सुनते-सुनते ही वृद्ध पिता अपने बेटे की चिंता में हार्ट-अटेक का झटका नहीं झेल पाए थे  |
इनकी उच्च-श्रेणी की ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा को देखते हुए भारतीय सेना के सिग्नल्स कोर की बहुत ही गोपनीय और संवेदनशील साइफर ब्रांच में कार्यरत रहे| इनके कार्य-कलापों की संवेदनशीलता और गोपीनयता का सम्मान करते हुए मैं इस विषय में अधिक विस्तार से नहीं जा रहा हूँ | केवल इतना कह सकता हूँ कि यह मेरे रोल माडल रहे, जिनसे मैंने सीखा ( या सच कहूँ तो सीखने का प्रयत्न किया पर पूरी तरह से आज तक सफल नहीं हो पाया ) कि कभी भी किसी की बुराई मत करो | उतना बोलो जितना आवश्यक है | जहां तक हो सके लोगों की मदद करो | एक बात और - मेहनत और ईमानदारी अगर आप के पास है तो ज़िन्दगी में सब कुछ हासिल किया जा सकता है |शायद इस ब्लॉग के माध्यम से आप सब तक यही नसीहतें पहुंचाना ही मेरा उद्देश्य है |   


मेरे यह रोल माडल, प्रेरणास्रोत हैं लेफ्टिनेंट कर्नल एच. सी. शर्मा ( सेवा निवृत ) जो अभी कुछ दिन पूर्व ही अचानक 19 जनवरी 2019 को सदगति को प्राप्त हो गए |अपने पीछे भरा-पूरा, सुखी-संपन्न परिवार छोड़ कर जाने वाले कर्नल शर्मा सबकी नज़रों में यूँ तो मेरे स्वसुर थे पर मेरे लिए सही मायने में एक ऐसे पथ-प्रदर्शक रहे जिनकी कमी जीवन- पर्यंत मुझे खलती रहेगी | अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने उनसे कहा था कि आपके इतने प्रेरणादायी और साहसिक व्यक्तित्व के बारे में एक लेख लिखूँगा | मुझे यह नहीं आभास था कि थोड़ी से देर के कारण यह लेख श्रद्धांजली-सुमन के रूप में अर्पित  करना पड़ेगा |   




                   सादर नमन – श्रद्धांजली

Thursday, 3 January 2019

ऊँची उड़ान ( भाग पांच ) : चाहत की चाहत

सब से पहले सुनिए सुनिए चाहत -सौरव के संगीत निर्देशन में फिल्म नारायण के कुछ गीत 

शायद आपको याद हो कुछ माह पहले उड़ान श्रंखला (भाग तीन) के अंतर्गत संगीत के एक दीवाने की कहानी लिखी थी – सौरव मिश्रा : संघर्ष का सुरीला सफ़र | सौरव मिश्रा की बेहतरीन गायकी और उस मुकाम तक पहुँचने में संघर्ष से भरे रास्ते से आपको परिचित करवाया था | अगर आप भूल चुके हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके अपनी याद ताज़ा कर लीजिए|  दरअसल सौरव अकेले तो काम करते नहीं हैं, उनके जोड़ीदार हैं चाहत कक्कड़, तो मेरा पहले लिखा ब्लॉग तब तक अधूरा है जब तक उसमें चाहत की कहानी भी नहीं जुड़ जाती है | इसके अलावा भी सौरव मिश्रा की कहानी पढ़ कर बहुत सारे पाठकों ने मुझ से गब्बर सिंह के अंदाज में पूछा भी था – कहाँ हे रे फ़ौजी नंबर दो ? तो चलिए आज इसी फौजी नंबर दो यानी चाहत कक्कड़  से आपकी मुलाक़ात करवाता हूँ | वैसे आपको यह भी बता दूँ कि इस फ़ौजी नंबर दो में कहीं से भी पहलवान के लक्षण नहीं हैं | पहली नज़र में ही हर तरह से कलाकार नज़र आता है, गोरा चिट्टा रंग, दर्मियाना कद , चेहरा निहायत ही मासूम पर उस मासूमियत को नज़रंदाज़ करती  शरारती आंखें | चेहरे पर एक ऐसी नटखट और निर्मल मुस्कान जिसे देखकर नई पीढी को शाहिद कपूर और मुझ जैसे को अमोल पालेकर याद आ जाए | 
चाहत कक्कड़ 

कहते हैं कि जो नज़र आता है वह दरअसल होता नहीं है और जो असल वास्तविकता होती है वह नज़रों से कोसों दूर होती है| कुछ ऐसी ही कहानी है चाहत की | जब मैं इनके जोड़ीदार सौरव मिश्रा यानी फ़ौजी नंबर एक की कहानी पर काम कर रहा था तब अपनी सीमित जानकारी की वजह से दिमाग में चाहत के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां पाल बैठा था | दोष मेरा भी नहीं था | सौरव की संघर्ष-गाथा पर ही पूरी तरह से केन्द्रित रहा | मुझे प्रारंभ से ही कुछ ऐसा लगा कि चाहत उन गिने-चुने खुशनसीबों में से है जिन्हें पारिवारिक रसूख की वजह से जिन्दगी में सब कुछ चांदी की थाली में परोसा हुआ हर सुख, वैभव और उपलब्धि सरलता से प्राप्त हो जाती है | बाद में मुझे पता चला कि मैं थोड़ा-बहुत नहीं, इस मामले में पूरी तरह से गलत था | अगर सच कहूँ तो जिन्दगी की हर परेशानियों की सौगात उन्हें कुछ ज्यादा ही मिली जिसने उन्हें इतने पापड़ बेलने को मजबूर किया कि अगर आज संगीत की दुनिया से नहीं जुड़े होते तो कसम से लिज्ज़त पापड से ज्यादा “कक्कड़ पापड” की दूकान चल रही होती | पर चाहत की किस्मत और शौक ने-तो कोई और ही मंजिल चुन कर रख ली थी – संगीत की मंजिल | आज के दिन चाहत एक उभरते हुए संगीतकार,स्टेज शो के जबरदस्त अदाकार होने के साथ-साथ ही साउंड रिकार्डिंग इंजीनियर भी हैं | संगीत के कई वाद्य यंत्र जैसे गिटार, पिआनो, ड्रम, तबला , कांगो, माउथ-आर्गन, की-बोर्ड बजाने में उनका कोई सानी नहीं है | अपने संगीत कार्यक्रमों में एक साथ कई वाद्य यंत्र बजा कर श्रोताओं को चकित और मंत्रमुग्ध कर देते हैं |

चलिए आज की राम कहानी चाहत कक्कड़  के नाम, सुनते हैं क्या कहते हैं अपने बारे में वो : 

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समझ में नहीं आ रहा कहाँ से शुरू करूँ अपनी कहानी | आज के बारे में बताऊँ जब संगीत के सागर में बहुत ही ठाठ से  तैर रहा हूँ या उस बीते समय की जब बचपन के ऊबड़-खाबड़ घोर परेशानियों से भरे दिनों की जिन्हें याद करके आज भी मैं भय से सहम जाता हूँ | मेरा बचपन पूरी तरह से दिल्ली में ही बीता, पढ़ाई-लिखाई भी ज़ाहिर सी बात है यहीं हुई | मेरे माता – पिता दोनों ही संगीत के इवेंट मेनेजमेंट के क्षेत्र से जुड़े थे | जगह-जगह संगीत कार्यक्रमों के स्टेज-शो में भाग लेते |घर पर भी गाने-बजाने का वातावरण रहता, जिसे सुन-सुन कर मेरी भी रूचि संगीत की और मुड़ती गयी | शुरुआती दौर में सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था | मुझे दिल्ली में जनकपुरी के एक अच्छे पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया | उन दिनों ही  अचानक घर की वित्तीय स्थिति में जैसे भूचाल सा आ गया | पिता जी ने जो अपने गाढ़े खून-पसीने की बचत पूंजी छोटे मोटे व्यवसाय में लगा रखी थी वह साझीदारों की बेईमानी की वजह से ड़ूब गयी | घर खर्चों में कटोती साफ़ नज़र आने लगी | पर हालात थे कि बद से बदतर होते जा रहे थे | समय पर स्कूल फीस नहीं दे पाने के कारण मेरे पिता जी को भी स्कूल बुलवा लिया जाता | जो चीजें आप फिल्मों में देखते हैं, वे सब मेरे साथ सचमुच हुई हैं जैसे फीस के कारण ही मुझे सब बच्चों के सामने अपमानित करके, क्लास से बाहर कर दिया जाता | आप समझ सकते हैं इन सब कड़वी यादों का मेरे बाल-मन पर कितना गहरा आघात पहुंचता होगा | क़र्ज़ का दीमक घर में घुस चुका था और धीरे-धीरे नींव खोखली करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था | मेरे बड़े भाई गौरव  को इस दौरान अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी | मैं हिम्मत और धैर्य की सराहना करता हूँ अपने माता-पिता और बड़े भाई का जिन्होंने इन विकट परिस्थितियों से जूझते हुए भी मेरी शिक्षा पर कोई आंच नहीं आने दी | 

माँ -पापा - श्रीमती सुमन व श्री गुलशन कक्कड़

बारहवी क्लास की बोर्ड की परीक्षा पास करने के बाद यही सोच थी कि अब आगे क्या | घर के संगीतमय वातावरण के कारण मेरा झुकाव आवाज़ की दुनिया के आस-पास ही मंडरा रहा था सो एशियन एकेडेमी ऑफ़ फिल्म एंड टेलीविजन, नोएडा से साउंड रिकॉर्डिंग के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया| मेरे पास सीनियर सेकेंडरी में विज्ञान विषय नहीं थे जबकि साउंड इंजीनियरिंग के लिए फिजिक्स की अच्छी जानकारी होनी चाहिए | इस विषय को मैंने अलग से काफी मेहनत से पढ़ा और उस बेच में मैं सबसे ज्यादा नंबर लेकर पहला स्थान प्राप्त किया | इसके बाद पत्रकारिता और मॉस कम्युनिकेशन में स्नातक कोर्स भी कर लिया | प्रयाग संगीत समिति. इलाहाबाद से शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा भी प्राप्त की | 

अब नौकरी के लिए भी जोर-शोर से हाथ पैर मारने शुरू कर दिए थे | एक जगह नौकरी शुरू भी कर दी पर यह जो ऊपर वाला है, वह भी कुछ कम नहीं है | हमारी हिम्मत और सब्र के इम्तिहान में उसे शायद अब भी कुछ कमी नज़र आ रही थी सो हमारे सर पर एक बम और फूटा – माँ को केंसर हो गया | घर की पहले से ही जर्जर नैया जो अब तक मझदार में गोते लगा रही थी, इस केंसर के तूफ़ान से मानों पूरी तरह से बीच समुद्र में पलट चुकी थी | हालात इतने बुरे हो चुके थे कि एक तरह से दो वक्त खाने के भी लाले पड़ने लगे | अब दुनिया की सारी परेशानियां एक तरफ और माँ की जानलेवा बीमारी दूसरी तरफ| सर पर पहले से ही भारी क़र्ज़ का बोझ, ऊपर से बीमारी के इलाज़ के महंगे और कमरतोड़ खर्चे | पिछली बार जब घर पर आर्थिक संकट आया था तब बड़े भाई गौरव को अपनी पढाई छोड़ कर नौकरी पर लगना पड़ा , पर इस बार माँ की बीमारी के कारण उनकी देखभाल के लिए मुझे अपनी नौकरी ही छोड़नी पड़ी | पूरे परिवार की ज़िंदगी का एक ही मकसद रह गया था – किसी भी कीमत पर माँ की जान बचाना | पर सवाल था कीमत का, उस कीमत के लिए पैसे कहाँ से लायें | ले-देकर आसरे के नाम पर एक छोटा सा मकान था, मजबूरी में वह २५ लाख का मकान आधी कीमत में ही मन मार कर बेचना पड़ा | इस तरह ,सर पर जो छत थी, हमारा आसरा था वह भी छिन गया | किराए के छोटे से मकान में जाना पड़ा | माँ का इलाज लगातार चला | अगर मैं गलत नहीं हूँ तो लगभग 96 बार कीमियोथेरापी हुई | इस सबके बाद हमारे लिए खुशी की बात यह कि सभी शुभचिंतकों की दुआ और ईश्वर के आशीष से माँ स्वस्थ हो गयी | शायद अब तक भगवान को भी हम पर तरस आ गया था | 

संगीत का शौक मुझे बचपन से ही रहा | अपने स्कूल में कांगों बजाना अपने-आप ही सीखा | शायद नवीं क्लास में पढ़ता था तब स्कूल के ही कुछ और बच्चों के साथ मिलकर एक म्यूजिक-बैंड बनाकर पहला गाना बाकायदा रिकार्ड करवाया | स्कूल के संगीत के कार्यक्रमों में ड्रम भी बजाया करता | बाद में गिटार सीखने के लिए श्री ललित हिमांग जी की शरण में गया | गिटार जल्दी- से- जल्दी सीखने की इतनी ललक रही कि रोज आठ से दस घंटे अभ्यास करता | उँगलियों के पोर बुरी तरह से छिल जाते पर गुरु के आशीर्वाद से मैं दो माह में ही काफी हद तक गिटार पर अच्छी पकड़ बना चुका था | गिटार ने मुझे सुर-ताल का अच्छा ज्ञान दिया | रही सही कसर एशियन एकेडेमी ऑफ़ फिल्म एंड टेलीविजन में साउंड रिकार्डिंग की तकनीकी शिक्षा ने पूरी कर दी | इस पढ़ाई के दौरान मैं वहां के प्रोफेसर श्री राजेन्द्र गांधी जी से बहुत प्रभावित रहा | 
गिटार के तार - मेरा पहला प्यार 

अब मेरी नौकरी की शुरूआत हो चुकी थी | जगह –जगह हाथ पैर मारे, नामी –गिरामी रिकार्डिंग स्टूडियो में संगीतकार और साउंड इंजीनियर के रूप में काम किया, खूब अनुभव बटोरा और ख़ासा पैसा भी | पर इस बीच जैसा मैंने पहले भी आपको बताया, माँ की बीमारी की वजह से अच्छी-भली नौकरी छोड़ी क्योंकि माँ है तो सब कुछ है वरना कुछ नहीं | कुछ समय बाद दोबारा से नई शुरुआत करी लेकिन इस बार मेरे साथ एक ऐसा दोस्त मेरे साथ जुड़ गया था जो भाई से भी बढ़ कर था | जी हाँ – ये थे सौरव मिश्रा जो आज तक मेरे जोड़ीदार हैं | सुरीली आवाज के बेताज बादशाह, इनके गले में मानों साक्षात सरस्वती का वास तो था ही, साथ ही साथ गीत लिखने और धुन बनाने में भी अच्छी पकड़   | बस अब क्या था,  हम दोनों की आवाज और साज़ ही बहुत थे दुनिया में धूम मचाने के लिए | अब हम ऐसी अटूट जोड़ी बन चुके थे जिसकी सोच एक थी, राह एक थी और मंजिल एक थी | हमनें नौकरी के बंधन से दूर स्वतन्त्र रूप से काम करने की ठान ली | अब जो भी करते मिल कर करते – स्टेज शो किये, म्यूजिक वीडिओ बनाए, गानों की धुनें बनाईं, नारायण और तीन ताल जैसी फिल्मों के लिए पार्श्व संगीत दिया, मोबाइल फोन के लिए रिंग टोन्स बनाई, वीडियो गेम्स के लिए भी संगीत बनाया, रेडियो और टी.वी के लिए जिंगल्स तैयार किए   | एक तरह से देखा जाए तो यह जोड़ी ऐसे हरफनमौला दो कलाकारों की है जिसमने दोनों ही गायन, वादन और  संगीत रचना और स्टेज-शो के सही मायने में खिलाड़ी हैं |  
सौरव और मेरी जोड़ी 

मेरा बहुत ही विनम्र भाव से यह सोचना है कि अब जो भी हम काम कर रहें है, उसके बारे में अब हम नहीं बोलेंगें वरन काम बोलेगा | हमारे बनाए गाने संगीत-प्रेमियों को पसंद आ रहे हैं यही हमारे लिए संतोष की बात है | मेरे लिए सबसे बड़े आत्म-संतोष की बात यह है कि मेरे संगीत के शौक ने आज मुझे उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां मैं आज की तारीख में परिवार के सर पर सवार भारी-भरकम कर्जे के अधिकाँश भाग से मुक्ति पा-चुका हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आप सब के आशीर्वाद और शुभकामनाओं से इस सबसे अगले एक वर्ष में पूरी तरह से छुटकारा मिल जाएगा |अपने परिवार के सर पर किराये की छत नहीं, बल्कि अपनी छत दे पाऊं यही मेरी  सबसे बड़ी अभिलाषा है|

इस आप-बीती कहानी में अगर अपने जीवन साथी पूजा का जिक्र न करूँ तो सब कुछ अधूरा है | मेरे सबसे मुश्किल दिनों में पूजा ने सहारा दिया - न केवल मुझे वरन मेरी बीमार माँ को, मेरे पूरे परिवार को | अगर उसने इतनी जिम्मेदारी से यह घर नहीं सम्भाला होता तो शायद मैं अपने काम पर इतना ध्यान नहीं दे-पाता और इस मुकाम पर नहीं पहुँच पाता जहां आज मैं हूँ | समझ नहीं आता इस सबके लिए उसे क्या कहूँ – धन्यवाद, आभार, शाबाश या और कोई शब्द जिसका निर्णय मैं आप पर ही छोड़ता हूँ |

बस इक 'पूजा' और न कोई दूजा 

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तो दोस्तों , कैसी लगी चाहत की कहानी जो ऊबड़ -खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अब कामयाबी के हाई-वे पर दौड़ रही है | मेरी शुभकामनाएँ  - ईश्वर चाहत की हर चाहत पूरी करे |

Wednesday, 26 December 2018

ऊँची उड़ान ( भाग चार ) : परिश्रम और भाग्य की श्रंखला

जिन्दगी में किस चीज़ का ज्यादा महत्त्व है – मेहनत का या भाग्य का, यह सवाल अरसे से मेरे दिमाग में घूमा करता था और हो सकता है मेरी तरह से आप भी बहुत से लोगों को यह सवाल परेशान करता हो | इस सीधे से पर टेढ़े सवाल का जवाब खोजने में लोगों को बरसों लग गए पर आज भी सवाल वहीं का वहीं है, बिना किसी भी जवाब के, ठीक उसी तरह जैसे कोई पूछे कि मुर्गी पहले आयी या अंडा ? कुछ-कुछ इसी तरह के जलेबी की तरह गोल सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है आज की कहानी – एक जीते –जागते इंसान की सच्ची आपबीती | 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले बुलंदशहर के लगभग नामालूम से कस्बे खुर्जा से शुरू होती है यह कहानी | यह कहानी घूमती है एक ऐसी मेधावी छात्रा के इर्द –‍‍‍‍‍ गिर्द     जिसकी अब तक की उथल-पुथल से भरी ज़िंदगी में लगातार जंग होती रही, समय – समय पर टकराने वाली मुसीबतों से, जिनकों को पार करने के लिए कभी सामना किया मेहनत से और कभी सहारा मिला किस्मत का | बस यही तो है आज की दिलचस्प कहानी का छोटा सा परिचय | संघर्षों से लड़ने वाले जिन किरदारों से आपको ‘उड़ान’ श्रंखला के अंतर्गत अब तक आपसे मिलवाया है, आज का किरदार उम्र में उन सबसे छोटा है | मज़े की बात यह कि इस किरदार का नाम भी श्रंखला ही है – जी हाँ, श्रंखला पालीवाल, एक कुशाग्र छात्रा, जो एम.बी.बी.एस की पढाई कर रही हैं –जवाहर लाल नेहरु राजकीय मेडीकल कालेज, अजमेर से | अगर अपनी कहानी खुद श्रंखला ही सुनाए तो शायद ज्यादा अच्छा रहे | तो शुरू होती है श्रंखला की कहानी खुद उसी की ज़ुबानी : 
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      मैं : श्रंखला पालीवाल 

नाम तो अब तक आप मेरा जान ही चुके हैं, दोबारा दोहराने से कोई लाभ नहीं | मुझे खुद यह कभी नहीं लगा कि अब तक जिन्दगी में कुछ ऐसा ख़ास घटा है जिससे मैं स्वयं को विशेष समझ पाऊं | वजह केवल यही रही कि होने वाली हर घटना को बहुत ही सामान्य तरीके से लिया | मेरी बाल-बुद्धि बस यही कहती है कि अपने आप को जितना आम ( खाने वाला नहीं ) समझेंगे, यह जीवन उतना ही सरल रहेगा | मेरा बचपन एक बहुत ही छोटे से शहर खुर्जा में बीता | बहुत ही साधारण पर अनोखी पारिवारिक पृष्ठभूमि, जिसमें शिक्षा और खेती-बाड़ी, कस्बे और ग्रामीण संस्कृति का अद्भुत संगम था | 



बचपन की मेरी पहली यादें जाकर पहुँचती हैं मेरे दादा जी- श्री शिव चरण पालीवाल जी पर जो आज इस दुनिया में नहीं हैं, पर जिनका प्रभावशाली व्यक्तित्व आज भी मेरी स्मृति में पूरी तरह से स्पष्ट है | उनकी दी हुई नसीहतें और समझदार सोच आज तक मुझे समय-समय पर रास्ता दिखाती हैं | मेरे दादा अपने ज़माने के लखनऊ विश्वविद्यालय से इंग्लिश और मनोविज्ञान में डबल एम.ए थे | आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र के वह जाने-माने रेडिओ-एनाउंसर थे | मेरी दादी भी इस मामले में कम नहीं रहीं, वह भी मेरी मां की तरह, आगरा यूनिवर्सिटी से एम.ए हैं | अब खुर्जा एक छोटा सा कस्बे-नुमा दकियानूसी शहर जहाँ लड़के और लड़कियों की पढ़ाई में अभी भी भेद-भाव किया जाता है | वह तो भला हो मेरे दादा-दादी के प्रगतिशील विचारों का जो अड़ गए कि पोती भी वहीं दाखिला लेगी जहाँ पोता | इस तरह भारी-भरकम कमर तोड़ फीस के बावजूद मेरे भाई के साथ मुझे भी शहर के जाने-माने महंगे पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया| यह किस्मत की परी की मेरे लिए पहली सौगात थी जो इतने समझदार दादा-दादी और माँ - पापा के रूप में मेरी जिन्दगी में आए |




                               दादा -दादी

अब मैनें भी उसी स्कूल में जाना शुरू कर दिया जहाँ मेरा बड़ा भाई रजत जाता था | मैं तब सबसे छोटी क्लास के.जी. में थी| सुबह-सुबह रोज की तरह स्कूल बस में बैठ कर स्कूल के लिए जा रही थी | तबियत कुछ खराब सी थी और रास्ते में ही बस में ही मुझे उल्टी आ गयी | स्कूल पहुँच कर जब सब बच्चे बस से उतर रहे थे, मैं अपनी पानी की बोतल से बस के फर्श पर उस फ़ैली हुई गन्दगी को साफ़ करने में लगी हुई थी | तब तक सब बच्चे बस से उतर चुके थे और मेरी मौजूदगी से अनजान ड्राइवर ने बस आगे बढ़ाना शुरू कर दिया| बस चलती देख कर मैं बुरी तरह से घबरा गयी और अपने नन्हे-नन्हे कदमों से लगभग दौड़ते हुए ही बस के दरवाजे तक पहुँची और नीचे उतरने का प्रयत्न किया | इस सब हड़बड़ाहट में, बस के पायदान पर मेरा संतुलन लड़खड़ा गया और मैं धड़ाम से नीचे गिर गयी जहाँ एक नुकीली ईंट सीधे मेरी आँख से कुछ ऊपर माथे में बुरी तरह से घुस गयी | खून का एक जोरदार फव्वारा मेरे माथे से फूट निकला और जैसे बेहोशी के अंधे कुँए में अपने आप को मैंने गिरते हुए महसूस किया | इतनी छोटी सी बच्ची होने के बावजूद भी मुझे इतना होश था कि बस आगे बढ़ रही है और मैंने अपने बचाव में तुरंत एक करवट ली वरना पिछला टायर मेरे ऊपर से निकल जाता | इसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा | जब होश आया तो मैंने अपने आप को एक अस्पताल में पाया | बाद में पता चला कि उस भयानक हादसे के बाद मुझे मुझे स्कूल वाले ही शहर के ही अस्पताल ले गए जहाँ उन्होंने प्राथमिक उपचार के बाद हाथ खड़े कर दिए और सलाह दी कि जान बचाने के लिए तुरंत दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर दिया जाए | दिल्ली में सर गंगा राम अस्पताल में मेरे चेहरे के एक के बाद कई आपरेशन किए गए | जख्म इतने गंभीर थे कि आंख और दिमाग तक पर असर पड़ने के आसार थे | डाक्टरों ने साफ़ कह दिया कि अव्वल तो जान ही खतरे में है, अगर जान बच भी गयी तो आँखों की रोशनी जा सकती है, साथ ही याददाश्त भी जा सकती है | मैं उस समय एक छोटी सी नन्ही सी जान, आपरेशन के बाद पट्टियों में लिपटा चेहरा, हड्डियों तक को दर्द से पिघला देने वाला दर्द और उन सबसे ऊपर मेरे दुःख से ज्यादा दुखी मेरे मम्मी-पापा | खैर ..... थोड़े में अगर कहूँ तो, डाक्टरों की लगातार बारह साल की मेहनत और भगवान की कृपा से मुझ पर किये गए सभी आपरेशन और प्लास्टिक सर्जरी सफल रहे, मेरी जान , मेरी आँख और मेरी याददाश्त सभी बच गयी | यह किस्मत की परी की मेरे लिए दूसरी सौगात थी जिसने मुझे एक नई जिन्दगी दी |

मेरी जिन्दगी स्कूल की पढाई और अस्पतालों के बीच घड़ी के पेंडुलम की तरह घूम रही थी | शायद उस समय ही सफ़ेद कोट पहने डाक्टरों को देख कर दिमाग के किसी कोने में में खुद एक डाक्टर बनने का सपना पाला| बस पढाई में और ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया | इसी बीच मेरे दादा बहुत ही गंभीर रूप से बीमार हो गए |तमाम प्रयत्नों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका| कहीं कुछ लगा कि इलाज मे शायद लापरवाही हुई है | डाक्टर बनने की इच्छा ने और मजबूती से संकल्प का रूप ले लिया| मेरी माँ ने हर वक्त मेरी हिम्मत बंधाई| 



अपनी दादी और माँ -पापा के साथ

इसी बीच हालात कुछ ऐसे बने कि खुर्जा छोड़ कर जयपुर बसना पड़ा | अगर ऐसे समय में हमें अपनी पुरवा बुआ जी का सहारा न मिला होता तो आज शायद कहानी ही कुछ और ही होती | जयपुर आ कर  स्कूल की पढाई के साथ मेडीकल कॉलेज के दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की भी शुरुआत कर दी | ऐसे समय में मेरे अपने फूफा जी, जिनका खुद का अपना कोचिंग सेंटर था, मेरे लिए मानों साक्षात भगवान के रूप में अवतरित हो गए | उनकी निगरानी में मेरी तैयारी और अधिक व्यवस्थित हो गयी | यह किस्मत की परी की मेरे लिए तीसरी सौगात थी जिसने मुझे छोटे से शहर खुर्जा से जयपुर पहुंचाया और अपने कोचिंग सेंटर वाले फूफा जी से मिलवाया जिन्होंने मेरी पढाई को एक निश्चित दिशा दी| अक्सर यह सोचती हूँ कि यहाँ साक्षात किस्मत की परी मेरी बुआ जी  श्रीमती पुरवा और देवदूत के रूप में विशाल  फूफा जी ही थे | 
किस्मत की परी और देवदूत - मेरी पुरवा बुआ और विशाल फूफा जी 
पढाई मेरी लगातार पूरी मेहनत से हो रही थी | सभी परीक्षाओं में नंबर भी अच्छे आ रहे थे पर मेरा लक्ष्य तो था मेडीकल में दाखिले का | वह मेडीकल जिसमें केवल एक प्रतिशत प्रतियोगी ही दाखिले के लिए सफल हो पाते हैं | वर्ष 2015 में केवल एक फ़ार्म भरा राजस्थान के कालेजों के लिए | परीक्षा हुई पर जब रिजल्ट आया तो मेरा नाम सफल छात्रों की लिस्ट में नहीं था जो कि एक बहुत गहरा आघात था मेरे लिए | सारी आशा, सारे सपने, सारा आत्म-विश्वास  मानों पल भर में चकनाचूर हो गए | कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ | अचानक एक दिन पता चला कि उस दाखिले की परीक्षा में पेपर लीक होने की शिकायत के कारण, पूरा रिजल्ट ही कैंसिल  कर दिया गया है और दाखिले की परीक्षा दोबारा से होगी | मेरे लिए यह खबर किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं थी | पिछली बार के अनुभव से सबक लेते हुए इस बार और अधिक पढाई, और अधिक मेहनत और जब रिजल्ट आया तो .... हुर्रा .... इस बार मैं सफल थी | मैंने अपने सपने के महल में पहला कदम रख दिया था | मेरी मेहनत तो थी ही पर किस्मत की परी ने इस बार मुझे चौथी बार ऐसा अनौखा उपहार दिया था जो हर किसी को नसीब नहीं होता | असफल होने पर पूरी परीक्षा का ही केंसिल होकर दोबारा सफल होने का मौक़ा भला कितनों को नसीब हो पाता है |

खैर मेडीकल कालेज में दाखिला हो गया | हर साल प्रतिभागी छात्रों के समग्र व्यक्तित्व और बुद्धि-कौशल के मानक माप-दंडों पर कालेज में नई छात्राओं में से मिस फ्रेशर का चुनाव किया जाता है| वर्ष 2015  की मिस फ्रेशर मैं चुनी गयी| कौन यकीन करेगा कि एक छोटे से कस्बे की साधारण सी वह लड़की जिसका कभी दुर्घटना में चेहरा  बुरी तरह से बिगड़ चुका था, याददाश्त बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, वह लड़की अपनी अब तक पाली गयी सभी हीन-भावनाओं को पूरी तरह से नकार कर, गौरव से अपना सर ऊँचा कर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पुरस्कार ले रही थी | उस दिन पहली बार मुझे महसूस हुआ कि मेहनत और किस्मत की परी के साथ-साथ , मुझे यहाँ तक पहुंचाने का श्रेय जाता है मेरे दादा-दादी, मम्मी-पापा, फूफा जी और सभी गुरुजनों को | इन सभी को मेरा सादर नमन |                  
फिलहाल मैं मेडीकल के तीसरे वर्ष में हूँ | इंतज़ार है पढाई पूरी करने के बाद, सफ़ेद कोट को पहन कर लोगों की जान बचाऊं, ठीक उसी तरह जैसे किसी ने मेरी जान बचाई थी |

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श्रंखला की इस आपबीती कहानी सुनकर क्या आपको भी मेरी तरह  ऐसा नहीं लगता कि किस्मत की परी भी उसी के पास आती है जो संघर्षों के रास्ते पर चल कर मेहनत के पसीने की कीमत जानता है |




Wednesday, 12 December 2018

पंजाब दा पुत्तर - पम्मा

अभी पिछले दिनों ही एक बहुत ही करीबी सिख परिवार की शादी में सम्मिलित होने के लिए लुधियाना ( पंजाब) जाना हुआ | शादी दिन की थी | धार्मिक परम्परा के अनुसार दुल्हा- दुल्हन के फेरे गुरूद्वारे में हुए और उसके बाद एक तो पंजाब और ऊपर से शादी भी सरदारों के यहाँ जो वैसे ही अपनी जिंदादिली और तड़क-भड़क के लिए मशहूर हैं, तो धूम-धड़ाका, हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा होना तो स्वाभाविक ही था | एक कोने में चुपचाप बैठा इसी मौज- मस्ती का आनंद उठा रहा था कि अचानक सामने कुछ हलचल सी नज़र आयी | एक नवयुवक बार- काउंटर पर सर्व कर रही लड़की के पास आ कर सेल्फी लेने का प्रयत्न कर रहा था | जाहिर तौर पर वह लड़की इस मनचले की हरकत के लिए तैयार नहीं थी | पर वही बात , दारू के नशे में हर शख्स किसी शहंशाह से कम नहीं होता और उस शहंशाह को जमीन पर उतारने के लिए बात या फिर लात का ही सहारा लेना पड़ता है | तभी क्या देखता हूँ कि वहां पर न जाने कहाँ से अचानक काले सफारी सूट में एक भीमकाय, बलिष्ठ नौजवान अलादीन के जिन्न की तरह से प्रकट हो जाता है | पहली नज़र में देखते ही दिमाग चकरा जाता है कि उसे नौजवान कहूँ या पहलवान | हमारी- आपकी गर्दन से मोटी तो उस शख्स की बाहों के डोले थे |
बाउंसर पम्मा 
उस पहलवानी शांतिदूत ने बड़े ही प्यार से उस मनचले शहंशाह को अमन का सन्देश मुस्कराते हुए बातों के द्वारा ही इस प्रकार से दे दिया कि नवाब साहब ने वहां से इज्ज़त बचाकर भागने में ही भलाई समझी | आसान शब्दों में बस यह समझ लीजिए कि बातों से ही काम बन गया और लात रूपी ब्रह्मास्त्र की आवश्यकता ही नहीं पड़ी | 

बैठे –बिठाए दिमाग में ख्याल आया कि भाई यह भीम तो बड़े काम की चीज है ठीक उसी तरह जैसे क्लास में मानीटर होता था | शरारती बच्चों को काबू में लाने का जिम्मा उसी का होता था | मिलने पर बहुत ही अदब से उसने मुझे बताया कि सर मेरा नाम है पम्मा और मेरा काम है बाउंसर का | काम का नज़ारा आप देख ही चुके हैं | 
मैं और पम्मा (बाएं से)  
मैंने उसे सुझाव दिया कि चलो पम्मा भाई, कहीं बैठ कर शांति से बात कर लेते हैं | पम्मा ने फिर वही अपनी चिर-परिचित मुस्कराहट के साथ जवाब दिया कि सर मैं ड्यूटी पर हूँ और बैठ नहीं सकता | बस इसके बाद डी.जे के कानफाडू संगीत के शोर-शराबे के बीच ही शुरू हो गया पम्मे से बातचीत का एक ऐसा सिलसिला जिससे उसकी ज़िंदगी और प्रोफेशन के बहुत सारे रोचक और भावुक कर देने वाली छुए –अनछुए पहलू निकल कर सामने आये | 
एक तस्वीर बचपन की 
मैं यहीं लुधियाना से तकरीबन 40 कि.मी दूर एक कस्बा है – जगरांव , वहीं का रहने वाला हूँ | वहीं पैदा हुआ , पला – बढ़ा पर बदकिस्मती से कुछ ख़ास पढ़-लिख नहीं पाया जिसका मुझे आज तक मलाल है | अपने गाँव में एक हज़ार रुपये महीने पर भी एक दुकान में काम किया | अगर मैनें पढ़ाई की होती तो आज मैं कुछ और बेहतर हालात में होता | हमारे गाँव में भी वही समस्या है जिससे सारा पंजाब आज भी जूझ रहा है – नशे की लत | घर-घर में नशे का जहर आज की नयी पीढी को बरबाद कर रहा है | हालत यहाँ तक पहुँच चुकी है कि हर कमजोर शरीर के बच्चे और जवान पर नशेड़ी होने का शक किया जाता है| आज जो आप मेरा पहलवानी शरीर देख रहे हैं उसे बनाने के पीछे भी यही वजह है कि लोग मुझे भी नशेड़ियों की जमात में शामिल न समझें | नशे से मुझे सख्त नफरत है| 
मजबूत कंधो  पर जिम्मेदारी भी भारी 
मेरे घर के हालात अच्छे नहीं रहे | पुरखों ने अपनी जमीन – जायदात काफी हद तक दान- पुण्य में गवां दिया | अब मुझे जिन्दगी के बहुत ही मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है | मेरा यह फौलादी जिस्म ही मेरा खेत, खलिहान , पूंजी सब कुछ है | रोज एक से डेढ़ घंटे की कसरत नियमित रूप से करता हूँ | पर इसे बरकरार रखने के लिए जरूरत के हिसाब से सही ढंग का खान-पान बनाए रखना भी मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती है| बाउंसर का काम मैं करता जरूर हूँ पर मजबूरी में | इस काम में इज्ज़त नहीं है | जब लोग समारोहों में सबके सामने हमसे बहुत ही बे-अदबी से पेश आते हैं, अबे-तबे कह कर बात करते हैं, सच कहता हूँ दिल पर सीधे चोट लगती है | उन बदतमीजियों का माकूल जवाब तो मैं भी दे सकता हूँ पर घूम फिर कर बात वहीं रोजी-रोटी पर आ कर ठहर जाती है इस लिए हाथ बंधे ही रखने पड़ते हैं | एक बात और – मुझे भले लोग भी मिले हैं | वर्जिश करने के लिए मैं जिस जिम में जाता हूँ उसके मालिक सतनाम जी ने मेरे हालात देख कर मुझ से आज तक कोई फीस नहीं ली | अपने दोस्तों का भी मुझे भरपूर प्यार मिला है जो मेरे हर सुख दुःख में मेरा साथ देते हैं | 
मेरे दोस्त 
मेरा सपना है किसी तरह से विदेश चला जाऊं | पाई-पाई करके पैसे भी जोड़ रहा हूँ | वहां जा कर अपने लायक काम तो मैं खोज ही निकालूँगा, इतना तो खुद पर भरोसा है | आखिर 23 साल की उम्र में 105 किलो का यह 6 फीट का शरीर कब काम आयेगा | 
खुदा खैर करे - बुरी नज़र से 
अपने तजुर्बे से आप सब दोस्तों के लिए मेरा बस यही सन्देश है : पढ़ाई –लिखाई जरूर करिए और नशे से दूर रहें, कामयाबी आप के कदम जरूर चूमेगी |
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हमेशा की तरह से इस बार भी मैं आप से अनुरोध करूंगा कि पंजाब के इस भीम-पुत्र पम्मा के चमकदार भविष्य के लिए आप सच्चे मन से दुआ करेंगे जो इतना दिल का सच्चा इंसान है जिसने मुझे यह भी बता दिया कि आप जो लिखेंगे उसे मैं अपने दोस्तों से ही पढ़वा कर सुनूंगा क्योंकि मैं पढ़ाई –लिखाई में कच्चा हूँ |

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...