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Friday, 8 November 2019

खुशहाली का प्रतीक : सिरमौर की माता ला -देवी

इस पोस्ट को पढ़ कर मेरे कुछ दोस्त मुझ पर दक़ियानूसी और अंधविश्वासी का ठप्पा लगा सकते हैं | मेरी आज की बातें ही कुछ ऐसी हैं | अपने बचाव में इतना ही कहूँगा कि धर्म, भक्ति और ईश्वर एक आस्था का विषय है | इसमें क्यों, कैसे, तर्क और वाद-विवाद के लिए कोई जगह नहीं है | इन्हें वैज्ञानिक तर्कों की कसौटी पर परखना अपेक्षित नहीं होता | आज भी ऐसे अनगिनत अनसुलझे रहस्य हैं जिनका इतनी उन्नति के बावजूद विज्ञान के पास कोई स्पष्टीकरण नहीं है |ब्रह्मांड और जीवन का रहस्य भी कुछ ऐसा ही है – इंसान कहाँ से आता है, कहाँ जाता है -आज भी विज्ञान इस पर केवल माथा-पच्ची ही कर रहा है | इंसान की फितरत में है – चाहे खुशी में याद आए या न आए, पर जब संकट में गाड़ी रेत में फँस जाती है तब ईश्वर, अल्लाह और जीसस सब एक साथ याद आ जाते हैं | इसी लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर उसी आदि-शक्ति तक पहुँचने की कोशिश के रास्ते इंसान ने खोज रखे हैं | आज आपको एक ऐसे मंदिर के दर्शन करवाता हूँ जिसके बारे में बहुत ही कम लोगों ने सुना होगा | पर जिन लोगों को इसके बारे में पता है उन सबका इस पर अटूट आस्था, विश्वास और मान्यता है | मैंने इस मंदिर में एक से ऊंचे एक अनेक दिग्गज हस्तियों को श्रद्धा से माथा टेकते और मनौती माँगते देखा है | यह छोटा सा लेकिन सादगी से परिपूर्ण मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर की तहसील पाँवटा साहिब के निकट राजबन के एक सुनसान पहाड़ी जंगल में स्थित है | यह माता ला- देवी का मंदिर है | यह लेख मेरे स्वयं के राजबन निवास के लंबे अनुभव और वहाँ के निकटवर्ती गांवों में बसे मेरे अनेक दोस्तों और स्थानीय निवासियों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है |
इस मंदिर के इतिहास की जड़ें प्राचीन सिरमौर राज्य के राजा तक पहुँचती हैं | ज्यादा जानकारी मेरे ब्लाग की राजबन और सिरमौर पर लिखी पोस्ट (राजबन : राजा का बन और उजाड़ नगरी) में मिल जाएगा जिसका लिंक साथ ही दिया गया है | समय निकाल कर वह भी पढ़ लेंगे तो इस लेख का भी और अधिक आनंद उठा पाएंगे | संक्षेप में कहें तो किसी समय प्राचीन सिरमौर राज्य की राजधानी रहे इस राजबन क्षेत्र में भारी तबाही हुई थी | सब कुछ नष्ट हो गया था – राजा का महल भी | समय बीतता गया .... बरसों बाद उधर के घने जंगल में जिन्हें राजबन के नाम से जाना जाता था, एक सुनसान पहाड़ी पर तेंदु के पेड़ (जिसके चौड़े पत्तों से पत्तल और बीड़ियाँ भी बनती हैं ) के नीचे कुछ प्राचीन पत्थरों की प्रतिमाएँ पायी गईं | ये पत्थर पर खुदी मूर्तियाँ थीं जिन पर किसी अज्ञात प्राचीन लिपि में कुछ लिखा भी हुआ था | आज की बुजुर्ग हो चली पीढ़ी भी अपनी यादों को ताज़ा करते हुए कहती है कि अब से साठ वर्ष पहले राजबन के जंगलों में वे भेड़ चराया करते थे तब भी उस पहाड़ी पर तेंदु के पेड़ के नीचे रखी उन मूर्तियों को देखा करते थे |


प्राचीन मंदिर 




प्रस्तर प्रतिमाएँ -प्राचीन मंदिर 



प्राचीन मंदिर - पुरातन अवशेष 
( ऊपर के सभी चित्र - सौजन्य : श्री अनिल शर्मा - राजबन ) 

इन मूर्तियों के बारे में उनके गाँव के बड़े-बूढ़े भी बताया करते थे कि ये भी राजा के समय के प्राचीन मंदिर के अवशेष हैं | गाँव के लोगों के जब मवेशी गुम हो जाते थे तब वे यहाँ आकर मनौती मांगते थे जो पूरी भी हो जाती थी | इस मंदिर के इतिहास से आस्था और विश्वास की यहीं से शुरुआत हुई जो समय के साथ -साथ बढ़ती गई| बहुत ही कम लोगों को यह ज्ञात है कि असली प्राचीन ला देवी का मंदिर वास्तव में आज भी वही छोटा मंदिर है जो तेंदु के पेड़ के नीचे बना हुआ है | वहाँ तक जाने के लिए तब कच्ची पहाड़ी पगडंडी होती थी | इसके ठीक सामने कुछ ऊंचाई पर बना बड़ा मंदिर बाद की सरंचना है | पुराने समय में यहाँ आस-पास जंगली जानवर भी घूमते-फिरते आ जाते थे | रात को कई बार शेर भी देखा गया | शायद यही कारण है आज भी शेर की प्रतिमा मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार पर विद्यमान है | 

( नीचे के सभी चित्र श्री श्याम सुंदर माहेश्वरी के सौजन्य से )

मंदिर परिसर मुख्य द्वार 



मंदिर  की 108 सीढ़ियाँ 


अब देखिए चमत्कार - यह पूरा क्षेत्र बहुत ही पिछड़ा हुआ और गरीबी की मार झेल रहा था | उस पहाड़ी गाँव में सिवाय छोटी-मोटी खेती-बाड़ी और मवेशी पालने के और कोई जीवन बसर करने के अलावा कोई अन्य साधन नहीं था | भारत सरकार द्वारा 1970 के आरंभिक दशक में एक निर्णय लिया गया- देहारादून जो कि उस समय उत्तर प्रदेश में आता था , के निकट एक सीमेंट फेक्टरी लगाने का | तब हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री यशवंत सिंह परमार ने अपने प्रभाव से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि वह सीमेंट कारख़ाना देहरादून के बजाय हिमाचल प्रदेश में लगाया जाए | परमार साहब क्योकि खुद सिरमौर जिले से थे अत: उन्होने जोड़-तोड़ करके राजबन में फ़ैक्टरी लगवाने का जुगाड़ पक्का कर दिया | अब यह चमत्कार नहीं तो क्या था – जहां पर रेल लिंक आज तक नहीं पहुँच पाया है – उस जगह पर हिमाचल प्रदेश में सीमेंट उद्योग की पहली फ़ैक्टरी ने अपने पैर जमाये | अब सीमेंट फ़ैक्टरी बननी शुरू हुई , स्थानीय लोगों को रोजगार मिला | गाँवों में खुशहाली आनी शुरू हुई | 

फ़ैक्टरी बनने के दौरान एक दिलचस्प वाकया हुआ | फ़ैक्टरी  से लेकर चूना पत्थर की खानों तक लगभग तेरह किलोमीटर का रोप-वे बनाने का ठेका कलकत्ता की जेसप एंड कंपनी को दिया गया था | दुर्गम पहाड़ी रास्तों और नदी के ऊपर से जाता रोप-वे के निर्माण में बहुत दिक्कते आ रहीं थीं | रोप-वे का रस्सा बार-बार टूट जाता था | हार कर उस कंपनी के अधिकारियों ने उसी माता ला देवी के मंदिर में सफलता के लिए मन्नत माँगी | मुराद पूरी हुई – रोपे- वे बना भी , कामयाब भी हुआ और उसी जेसप एंड कंपनी ने माता ला देवी की श्रद्धा में पक्के मंदिर का निर्माण करवाया | उन दिनों मेरे पोस्टिंग राजबन में ही थी इसलिए घटनाएँ कानों- सुनी नहीं वरन आँखों- देखी हैं | 



नया मंदिर : माता ला - देवी 




देवी प्रतिमा (नवीन )

लोगों का मानना है की इस मंदिर ने इस पिछड़े इलाके को गरीबी से उबारा, संपन्नता दी, हजारों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिया | बात केवल यहीं तक नहीं रुकी – राजबन के निकट ही पांवटा साहिब में सिक्खों का पवित्र गुरुद्वारा है | आज उस स्थान ने भी भरपूर प्रगति की है | पास में ही तारुवाला जो कभी ग्रामीण इलाका होता था आज औद्योगिक क्षेत्र में बदल चुका है | अब इधर यह सब विकास हो रहा था – उधर ला- देवी के भक्तों और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती जा रही थी | सीमेंट फ़ैक्टरी के कर्मठ कर्मचारियों और प्रबंधन ने एक तरह से देखा जाए तो इस मंदिर को अपने सरंक्षण में ले लिया | समय-समय पर भक्तों के सहयोग से इस मंदिर का जीर्णोद्धार और काया-कल्प भी होता जा रहा है । यहाँ समय-समय पर भंडारे होते हैं जिन में हजारों की संख्या में आस-पास के गांवों के निवासी आते हैं | फ़ैक्टरी की सुख-शांति और सफलता के लिए हवन-पूजा भी होती रहती है | एक समय ऐसा भी आया कुछ लोगों की सलाह पर ला-देवी मंदिर के स्थान पर फ़ैक्टरी के टाउनशिप में बने मंदिर में ही भंडारे किए जाने लगे | अब इसे संयोग कहिए या कुछ और – इसके नतीजे बड़े घातक और दुर्भाग्यशाली रहे | अंत में उसी पुरानी परंपरा पर लौटने में ही सबने भलाई समझी | 
अभी कुछ वर्षों पहले ला देवी मंदिर के परिसर में ही भगवान शिव के मंदिर की भी स्थापना हुई है | 
वक्त के साथ सीमेंट फ़ैक्टरी भी उम्र दराज़ हो चली है | अन्य सरकारी उपक्रमों की तरह इसे भी अनेक बीमारियों ने जकड़ लिया है | यह धीरे-धीरे काल के गर्त में समाती जा रही है | सुनने में यह बुरा जरूर लगता है पर वास्तविकता से मुँह भी तो नहीं मोड़ा जा सकता | अब हुआ दूसरा चमत्कार – ठीक सीमेंट फ़ैक्टरी के सामने ही भारत सरकार ने इसी इलाके में रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत बहुत विशाल संस्थान की स्थापना कर दी है | डी०आर०डी०ओ के अधीन उस संस्थान का महत्व केवल इसी बात से समझा जा सकता है कि यहाँ से गुज़रने वाली पतली सी टूटी-फूटी सड़क भी अब फर्राटेदार चोड़े राष्ट्रीय राजमार्ग में बदल चुकी है | कुल मिला कर बदलती परिस्थितियों में भी दैवीय शक्तियों ने इस स्थान पर अपना आशीर्वाद बनाए रखा है | मेरा मानना यह भी है कि देवी की कृपा केवल उन मेहनतकश कर्मयोगी इन्सानों तक ही सीमित रही है | जहाँ मेहनत का स्थान आलस, बेईमानी और भ्रष्टाचार ले लेता है, देवी का आशीर्वाद भी रूठ कर चला जाता है | 

इस लेख के माध्यम से मैं उन सब श्रद्धालुओं की प्रशंसा और आभार प्रकट करना चाहूँगा जो निस्वार्थ भाव से इस मंदिर की देखरेख में अपना हर प्रकार से योगदान कर रहे हैं | 

अब आप मुझे अंध-विश्वासी कहें या मोटी बुद्धि वाला बेवकूफ, मेरा मानना है कि इस मंदिर में कुछ तो विशेष जरूर है जिसने इस पिछड़े गाँव और इसके आस-पास के क्षेत्रों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल कर खुशहाली के दिन दिखाये | यह तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आस्था के पीछे वैज्ञानिक तर्क नहीं होते |
(आभार : सर्व श्री श्याम सुंदर माहेश्वरी, जिगरी राम चौधरी, खेम राज शर्मा , अनिल शर्मा, नारायण सिंह पौखरियाल जी का जिनके अमूल्य योगदान के कारण यह लेख आप तक पहुँच पाया है )   

Sunday, 11 August 2019

(#54) बुद्धं शरणं गच्छामि

श्री ब्रजेश राय जिनके सौजन्य से इस लेख के लिए सभी जानकारी और  फोटो प्राप्त हुए 
मैं अक्सर कहा करता हूँ, हमारी आसपास की दुनिया में ही बिखरे होते हैं अनगिनत रोचक इंसान, विचित्र पशु-पक्षी, अदभुत पेड़-पौधे और अपने आप में एक भरा-पूरा इतिहास समेटे ऐसे स्थान जिनसे हम अनजान हैं | इंसान की अक्सर फितरत होती है कि दूर-दूर की दुनिया देखने में इतना खो जाता है कि अपने आसपास की दुनिया से बेखबर रह जाता है | मेरी ज़िंदगी का काफी हिस्सा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की मनोहर  वादियों में गुजरा | नौकरी ही कुछ ऐसी थी कि काम के सिलसिले में एक तरह से चप्पे-चप्पे की ख़ाक छाननी पड़ती थी | पुरानी यादें अक्सर दिमाग के दरवाजे पर दस्तक दे जाती हैं और आज भी कुछ ऐसी ही धुंधली सी याद आ गयी | उस धुंधली याद पर पड़ी धूल को साफ़ करने का काम किया मेरे मित्र और तत्कालीन सहकर्मी श्री ब्रजेश राय ने | इस लेख के लिए सभी फोटो श्री ब्रजेश राय के माध्यम से ही प्राप्त हुए हैं|

चकरोता उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध हिल स्टेशन है | लेकिन आज मैं आपको उस हिल स्टेशन पर नहीं ले कर जा रहा | देहरादून से चकरोता जाने के रास्ते में ही एक छोटा सा पहाड़ी कस्बा पड़ता है नाम है कालसी, इतना छोटा कि अगर आप इस रास्ते से गुज़र रहे हैं तो पहली नज़र में ही इसे पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर बैठेंगे |

कालसी की प्राकृतिक सुन्दरता 
ज से लगभग दस वर्ष पहले की बात है जब दफ्तर के काम से ही कालसी जाना पडा था | ब्रजेश जी भी साथ ही थे | काम निपटा कर वापिस लौट ही रहे थे कि सड़क के किनारे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का बोर्ड नज़र आया | सच बताऊँ मुझे एक तरह का नशा है पुरानी चीज़ों का, पुराने रिश्तों का, दोस्तों का और पुरानी जगहों का | इतिहास से जुडी इमारतों को देखने मात्र से एक अलग ही किस्म की अनुभूति होती है | उन को देखते हुए मानों आप किसी और ही दुनिया में खो जाते हैं इस अहसास के साथ कि जब वह इमारत अपना वर्तमान जी रही थी तब की दुनिया कैसे रही होगी | पूछताछ करने पर पता चला कि पास में ही एक स्मारक है जिसमें मौर्यकालीन सम्राट अशोक के समय का प्राचीन शिलालेख है | मन में छुपी उत्सुकता को रोक ना सका और पहुँच गया उस ऐतिहासिक जगह को देखने | बाद में उस शिलालेख और कालसी के इतिहास के बारे में जगह-जगह से अन्य जानकारी भी जुटाई जिसे आपके साथ साझा कर रहा हूँ |

कालसी स्मारक का प्रवेश द्वार 

 इस सारी कहानी की शुरुआत होती है ईसापूर्व 269- 231 के समय में सम्राट अशोक से | वही चक्रवर्ती सम्राट अशोक जिसका शासन अफ़गानिस्तान से लेकर पूर्वी भारत में असम व बर्मा तक व दक्षिण भारत में सिर्फ़ तमिलनाडु व केरल को छोड कर पूरे भारत पर था। ज़रा सोचिए, कितना विशाल साम्राज्य रहा होगा सम्राट अशोक का | कितने ही युद्ध जीते पर अंत में जो युद्ध कलिंग ( आज का ओडीशा ) में जीता उसने उसकी मानों ज़िंदगी और सोच ही बदल दी | उस युद्ध में लगभग डेढ़ लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे | इस लड़ाई में हुई भयानक तबाही को देख कर क्रूर सम्राट अशोक का पूरी तरह से ह्रदय परिवर्तन हो गया | उसे लगा युद्ध से कुछ हासिल नहीं होता, राज्य जीतने की बजाय जनता का दिल जीतो | मानवता और शान्ति के मार्ग पर चल कर जनता का उद्धार करो | इस नई सोच के साथ ही सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया | शान्ति और मानवता के मार्ग पर चलते हुए बौद्ध धर्म के उपदेशों को दूर-दूर के देशों तक फैलाया | यहाँ तक कि अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को भी बोद्ध धर्म के प्रचार के लिए सिंहल द्वीप ( आज का श्रीलंका) भेजा | अभी तक सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए कुल 33 अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिन्हें स्तंभों, चट्टानों और गुफाओं की दीवारों में अपने 269 ईसापूर्व से 231 ईसापूर्व तक चलने वाले शासनकाल में स्थापित किया गया । ये आधुनिक बंगलादेश, भारत, अफ़्ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल में जगह-जगह पर मिलते हैं और बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं। कालसी में भी ऐसा ही शिला लेख है |

अशोक का शिलालेख 

एक तरह से देखा जाए तो कालसी का महत्त्व भारत के महान सम्राट अशोक के पत्थर पर बने हुए शिलालेख के कारण ही है। ब्रिटिश शासनकाल में जॉन फारेस्ट नाम के एक अंग्रेज ने सबसे पहले घने पहाड़ी जंगलों में छिपे-पड़े इस ऐतिहासिक प्राचीन चट्टान को वर्ष 1860 में दुनिया की नज़रों में लाने का काम किया था | पुराने समय में पत्थरों जैसी कठोर सतह पर कुछ लिखने की परम्परा थी। प्राचीन काल से ही राजा महाराजा अपने आदेश इसी प्रकार लिखवाते थे। जिससे लोग इन्हे पढ़ें, सीख लें औरअपने जीवन में इन का पालन करें |कालसी का शिलालेख वह चट्टान है, जिस पर मौर्य सम्राट अशोक के 14 आदेशों को 253 ई. पू. में चट्टान पर कुरेद-कुरेद कर लिखा गया था | इन आदेशों की जड़ में बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत ही हैं जिसमे अहिंसा पर सबसे अधिक बल दिया गया है। इन आदेशों में नैतिक तथा मानवीय सिद्धान्तों का वर्णन किया है जैसे जीव- हत्या की मनाही, आम जनता के लिए चिकित्सा व्यवस्था, पानी के लिए कुँए खुदवाने, वृक्ष लगवाने, धर्म प्रचार करने, माता-पिता तथा गुरू का सम्मान करने, सहनशीलता तथा दयाभाव आदि श्रेष्ठ मूल्यों का प्रचार करने का निर्देश दिया है। यह आदेश राजा के बताये गए सुधारों और सलाह का संकलन है, जिसको प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। इस चट्टान की ऊंचाई 10 फुट और चौड़ाई 8 फुट है।

जब कालसी के अशोक शिला लेख स्मारक में घूम रहा था तो उस स्मारक की हवा में एक मन्त्र मुग्ध करने वाली वह सुगंध थी जिसे केवल महसूस ही किया जा सकता है | वह सुगंध अहसास दिला रही थी कि आज से भी लगभग 2300 साल पहले, जब सारी दुनिया में अज्ञान और हिंसा अपने चरम पर थी, तब भी हमारे देश में एक ऐसा महान शासक था जिसने सर्व शक्तिशाली होते हुए भी धर्म के मार्ग को अपनाया | केवल अपनाया ही नहीं, इतनी दूर-दूर तक प्रचार किया जिसकी बदौलत आज बौद्ध धर्म के अनुयायी भारत के अलावा चीन, बर्मा, जापान, श्रीलंका, भूटान, कोरिया, विएतनाम , मलेशिया , कम्बोडिया, थाईलेंड तक में बहुतायत से हैं | कहना चाहता हूँ कि कालसी का यह अनजान स्मारक देखने में छोटा जरूर है पर उस नन्हे से स्मारक में समाहित सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण और लोक-हित का सन्देश इस पूरे ब्रह्माण्ड से भी विशाल है | इसी भावना को ध्यान में रखते हुए, जब भी मौक़ा मिले, उस नन्हे, अनजान स्मारक को देखने जरूर जाइयेगा |

Friday, 12 July 2019

भारत माता की जय


भारत माता मंदिर
सच कहूँ तो मैं कोई पोंगा पंडित नहीं हूँ | कर्मकांडी भी नहीं हूँ | हाँ उस ऊपर वाले ईश्वर में अलबत्ता जरुर आस्था रखता हूँ | कभी-कभार मंदिर में भी अगर जाना पड़े तो मत्था टेक लेता हूँ उसी श्रद्धा से जिससे गुरुद्वारे में अपना शीश नवाता हूँ | सबकी अपनी - अपनी सोच है , अपने विचार हैं | मेरा मानना है कि धर्म के मामले में किसी पर भी अपनी राय, अपने विचार दूसरे पर नहीं थोपने चाहिए | अब अगर हम मंदिर की बात करते हैं तो मन में एक ख़ास तरह की परिकल्पना उभरती है - देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजा धजा पूजा-अर्चना का पवित्र स्थान | पर कभी-कभी कुछ ऐसा होता है जिससे आपको अपनी परम्परागत सोच से हट कर अपने विचार बदलने को मजबूर होना पड़ता है | ऐसा ही कुछ –कुछ मेरे साथ हुआ जब मैं फिलहाल में हरिद्वार की यात्रा से लौटा |


हरिद्वार का नाम आते ही मन में याद आ जाती है गंगा मैय्या , हर की पौड़ी और हरिद्वार- ऋषिकेश स्थित अनगिनत छोटे –बड़े मंदिर और आश्रम | परिस्थितियां कुछ ऐसी बन पड़ी कि अपने एक बड़े भाई तुल्य अभिन्न मित्र श्री विजय कुमार उपाध्याय जी के साथ हरिद्वार जाना पड़ा | उनके सुझाव पर ही दर्शन करने पहुंचे भारत माता मंदिर | हो सकता है आप में  से बहुत से पाठक मित्र  इस मंदिर के बारे में पहले से ही जानते हों, पर जो इससे अपरिचित हैं उन्हें यह जानकारी रोचक लगेगी | वास्तव में अपने नाम के अनुरूप ही भारत माता मंदिर अपने आप में एक व्यापकता समेटे हुए है | यह हरिद्वार में गंगा किनारे, सप्तऋषि आश्रम मार्ग पर बना हुआ है | यह लगभग 180 फीट ऊँचा है जिसमें आठ मंजिलें हैं | हर मंजिल पर आपको एक अलग ही थीम और विचारधारा का अनुभव होता है | 

मात्र दो रुपये का टिकट लेकर मंदिर की सबसे ऊपर की आठवीं मंजिल तक आप सीधे लिफ्ट से पहुँच सकते हैं | यहाँ भगवान शिव का मंदिर है | यहाँ से आपको आध्यात्मिक शान्ति के अलावा हरिद्वार की प्राकृतिक सुन्दरता के भी दर्शन होते हैं | 

वापिस नीचे सीढ़ियों से उतरने पर सातवीं मंजिल पर भगवान विष्णु के दस अवतारों को देखा जा सकता हैं । भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उनके मत्स्य , कुर्म , वाराह , नर्सिहा , वामन , परशुराम , राम , कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतारों की सुन्दर झाकियां दर्शायी गयी है | 

छठवीं मंजिल पर बने “शक्ति मंदिर” में आदि शक्ति की प्रतीक विभिन्न देवियों - माँ दुर्गा , पार्वती , राधा , काली , सरस्वती आदि की मूर्तियाँ प्रदर्शित की गयी हैं|
अभी तक जो भी हमने देखा वह सब अन्य दूसरे मंदिरों जैसा ही था | पर अब जैसे ही आप पांचवी मंजिल पर उतरते हैं, आपको अब एहसास होने लगता है कि यह मंदिर दूसरे अन्य सामान्य मंदिरों से अलग क्यों है | इस खंड में भारत के विभिन्न प्रदेशों और राज्यों की संस्कृति को चित्रों के माध्यम से बहुत ही रोचक तरीके से दिखाया गया है | यहाँ की दीर्घा का एक चक्कर मात्र लगाने से आपको कर्नाटक, गोवा, गुजरात, राजस्थान, जम्मू –काश्मीर, कश्मीर पंजाब, हिमाचल प्रदेश का मानो सजीव दर्शन करा देता है | यह खंड विभिन्न धर्मों की झांकियां ,इतिहास ,एवं भारत के विभिन्न भागों की लोक कला को सुंदरता से प्रदर्शित करता  है । 

चौथी मंजिल पर है संत मंदिर | यहाँ उन सब संत पुरुषों और समाज सुधारकों की प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं जिन्होनें धर्म और समाज के क्षेत्र में एक नयी चेतना लाकर अभूतपूर्व योगदान दिया | यहाँ आपको बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मगुरुओं के भी दर्शन होंगें जैसे - गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, महर्षि बाल्मिकी , संत ज्ञानेश्वर, गुरुनानक जी, गुरु गोविंद सिंह जी, स्वामी विवेकानंद , स्वामी दयानंद सरस्वती , महर्षि अरविन्द , परमहंस रामकृष्ण जी | 

तीसरी मंजिल बना खंड समर्पित है स्त्री शक्ति के नाम | इस मंदिर का नाम है “ मातृ मंदिर” | प्रेम, वात्सल्य और भक्ति और समाज सेवा के प्रतीक रानी पद्मिनी , सती सावित्री , सती चमखर देवी,  मीरा बाई , हेलन केलर , एनी बेसेंट की मूर्तियां यहाँ स्थापित हैं | अब आपको भी लग रहा है ना आश्चर्य | अभी देखते जाइये आगे भी | 

दूसरी मंजिल पर है शूर मंदिर | अपने नाम के अनूरूप यह मंदिर देश के वीर सपूतों को समर्पित है जिनके योगदान और बलिदान को आज का भारत कभी नहीं भूल सकता |इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर लिखी राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की देश के बलिदानियों को वन्दना करती कविता की  यह पंक्तियाँ पढ़कर चलते कदम मानों बरबस ठिठक गए :
तुमने दिया देश को जीवन,
देश तुम्हें क्या देगा,
अपनी आग, तेज रखने को,
नाम तुम्हारा लेगा |

मंदिर के इस खंड  में सरदार पटेल, महात्मा गाँधी , सुभाष चन्द्र बोस , लाल बहादुर शास्त्री , गुरु गोविन्द सिंह , महाराणा प्रताप , शिवाजी महाराज , झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई , भगत सिंह , सुखदेव , चन्द्र शेखर आज़ाद, राजगुरु आदि भारत माता के वीर सपूतों की मूर्तियाँ लगी है | यह सब देखकर मन सोचने पर विवश हो जाता है कि समय काल के साथ-साथ यही महापुरुष हजारों वर्ष के अंतराल पर देवताओं के रूप में शायद याद किये और पूजे जायेंगे | 

भारत माता की प्रतिमा 
सबसे नीचे मंदिर की पहली मंजिल पर तिरंगा  झंडा हाथ में लिए भारत माता की भव्य मूर्ति है | साथ में ही धरती पर रेत , मिट्टी और सीमेंट के मिश्रण से बना विशाल भारत के नक़्शे का माडल है जिसे देखने मात्र से ही बहुत ही आलौकिक अनुभव होता है | रात के समय रंग –बिरंगी रोशनी में इसकी छटा देखते ही बनती है | 
इस मंदिर के दर्शन करने के बाद आपको एक विचित्र अनुभव होता है जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है | एक ओर आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है लेकिन साथ ही साथ हमें गर्व की अनुभूति होती है भारत भूमि की ऐतिहासिक विरासत के बारे में जान कर| यह इतिहास हमें  बताता है कि हजारों वर्ष पूर्व जब आज के तथाकथित उन्नत पश्चिमी देश के लोग भेड़-बकरियां चरा रहे थे तब यहाँ भारत देश में वेद और पुराणों की रचना की जा रही थी | यह मंदिर हमें याद दिलाता है उन समाज सुधारकों के योगदान को जिन्होंने समाज में फ़ैली कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई और समाज को नयी चेतना और दिशा दी  | इस मंदिर में आकर हमारा सर श्रद्धा से झुक जाता है उन शूर-वीर स्वतन्त्रता सैनानियों के लिए जो इस देश को आज़ाद कराने के लिए हंसते हुए अपनी जान पर खेल गए | यहाँ आकर मुझे लगा मानों भगवान् , देवताओं और महापुरुषों में बस केवल एक महीन सी विभाजन रेखा है | इन सबके सद्कर्मों का आशीर्वाद ही तो है जो आज हम सब आज़ादी की हवा में सांस ले रहे हैं | शत शत नमन उन सब को | 
ब्रह्मलीन गुरु महामंडलेश्वर सत्यमित्रानंद गिरि जी 
साथ ही नमन उस सोच को जिन्होनें इस मंदिर की स्थापना की | इस मंदिर का निर्माण प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु महामंडलेश्वर सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज ने करवाया था | मई 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका उदघाटन किया था | अभी पिछले माह ही 25 जून 2019 को 87 वर्ष की आयु में स्वामी जी का निधन हो गया |  समाज के प्रति विभिन्न अभूतपूर्व योगदान और परमार्थ सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित भी किया जा चुका है | ऐसे गौरवशाली महापुरुष की श्रद्धांजली में केवल यही सबसे सार्थक शब्द हो सकते हैं : 
                 |भारत माता की जय |

Monday, 8 July 2019

तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय

(इस जानकारी पूर्ण लेख के सभी तथ्य और फोटो देहरादून निवासी  श्री राय धर्मेश प्रसाद के सौजन्य से प्राप्त हुए जिसके लिए उनका हार्दिक धन्यवाद ) 


राय धर्मेश प्रसाद 
अक्सर लोग कहा करते हैं – दोस्ती करो या दुश्मनी, जो भी करो जम कर करो | सीधी सपाट बात है, आसानी से समझ भी आ जाती है और ठीक भी लगती है | दोस्ती के किस्से तो आप लोगों ने खूब सुने होंगे और दुश्मनी के भी | इतिहास तो ख़ास तौर से दुश्मनी के किस्से-कहानियों से भरा पड़ा है | राजे – महाराजाओं और नवाबों को तो मानों सिवाय जंग लड़ने और खून बहाने से फुर्सत ही नहीं होती थी | पर शत्रु को इज्ज़त और सम्मान देने वाली बात हो तो ऐसे लोग तो बिरले ही होते हैं | रामायण का किस्सा आप को याद होगा जब तीर लगाने पर रावण प्राण त्यागने वाला था तब श्री राम ने लक्ष्मण को कहा कि रावण बहुत विद्वान और प्रकांड पंडित है उनसे अंतिम समय में कुछ ज्ञान की सीख प्राप्त कर लो | लक्ष्मण ने रावण के सर की ओर खड़े होकर कुछ ज्ञान की बातें बताने को कहा जिस पर रावण चुप रहा | इस पर श्री राम ने ही लक्षमण को समझाया था कि आदर पूर्वक चरणों में बैठ कर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है | इसी प्रकार सिकंदर –पोरस का किस्सा भी याद आ जाता है | युद्ध में हारने पर राजा पोरस को बंदी बना कर सिकंदर के सामने पेश किया जाता है| सिकंदर राजा पोरस से पूछते हैं कि तुम्हारे साथ कैसा सलूक किया जाए | जवाब मिलता है – जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है | कहते हैं इस ज़वाब ने सम्राट सिकंदर को इतना प्रभावित किया कि उसने राजा पोरस को न केवल आज़ाद कर दिया बल्कि जीता हुआ राज्य भी वापिस कर दिया | यह थे इतिहास के पन्नों से सुने-सुनाये कुछ किस्से जो कितने सच्चे या झूठे हैं कोई दावे के साथ नहीं कह सकता | पर बहादुर दुश्मन को भी इज्ज़त और सम्मान देने का एक सचमुच की ऐतिहासिक घटना को प्रमाण के साथ मेरी जानकारी में लाने का श्रेय देहरादून निवासी मेरे एक अत्यंत घनिष्ठ सहकर्मी मित्र श्री धर्मेश राय प्रसाद को जाता है | उनके द्वारा बताई गयी जानकारी को मैंने आप तक पहुंचाने से पहले सत्यता की कसौटी पर अनेक माध्यमों से परखा और ठीक पाया | 

तो चलिए बात शुरू करते हैं और पहुँच जाते हैं आज से 200 लगभग साल पीछे | यह कहानी शुरू होती है वर्ष 1814 में जब देहरादून घाटी का क्षेत्र नेपाली गुरखाओं के शासन के आधीन था | नालापानी की पहाड़ियों पर खालंगा नाम के स्थान पर एक किला था जिसकी सुरक्षा का जिम्मा नेपाली सेनापति वीर बलभद्र थापा के अधीन था | इस किले मे लगभग 600 सैनिक अपने परिवारों के साथ रहते थे | अपने साम्राज्य को ज्यादा से ज्यादा विस्तार देने की नीति के अनुसार अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज ने सहारनपुर की ओर से देहरादून पर हमला बोल दिया | यहाँ पर गोरखाओं के सेनापति बलभद्र थापा ने ब्रिटिश सेना के कमाण्डर जनरल जिलेस्पी के साथ बड़ी बीरता से युद्ध किया था। ब्रिटिश सेनाओं के पास उस समय के आधुनिक हथियार बंदूके, तोपे 3000 से अधिक सैनिक थे। ब्रिटिश कमाण्डर जिलेस्पी को लगता था कि वह आसानी से कुछ ही समय में युद्ध को जीत लेंगे पर यह इतना आसान नहीं था। दूसरी तरफ गोरखाओं के सेनापति बलभद्र के पास लगभग 600 सैनिक थे जिनमे औरतें और बच्चे भी शामिल थे और हथियारो के नाम पर तलवारें, भाले और तीर कमान ही थे लेकिन फिर भी उन्होंने अपने युद्ध कौशल से अंग्रेजों का पूरे एक महीने तक पूरी दृढता से सामना किया। इस लड़ाई में जनरल जिलेस्पी शहीद हो जाते है। अंत में और कोई रास्ता न देख कर, जब अंग्रेजो को लगा की ये युद्ध जीतना असंम्भव है, तो उन्होंने इस किले तक जो पीने का पानी आता था उसकी सप्लाई बंद करवा दी | इसके बाद गुरखा सैनिक 3 से 4 दिनों तक प्यासे ही लड़ते रहे | लेकिन जब वीर बलभद्र थापा को लगा कि बिना पानी पिए यह युद्ध लड़ना सम्भव नहीं है तो वो अपने बचे-खुचे 70 सैनिको के साथ किले का द्वार खोल देते है और अंग्रेजो के सामने उनकी पूरी सेना आत्मसमर्पण कर देती है लेकिन वह खुद वहाँ से अंग्रेजो को चकमा देकर भाग जाते है। कई लोग यह भी मानते है की वह भी इस युद्ध में शहीद हो गए थे। कुछ इतिहासकारों का मत है कि है कि गोरखा सेनापति अफगानी फौज के साथ युद्ध करते समय शहीद हुऐ जिसमे यह राजा रणजीत सिंह का साथ दे रहे थे। सच्चाई जो भी रही हो , पर इतना जरूर है कि अंग्रेज गोरखा सेनापति और उसकी सेना की बहादुरी के कायल हो गए | इसके बाद इस बहादुरी को सम्मान देते हुए ही अंग्रेजों ने इस युद्ध में जो सैनिक शहीद हुऐ थे अपने उन अंग्रेज साथियों के साथ –साथ उन सभी गोरखा सैनिकों के शौर्य और की याद में भी इस स्मारक का निर्माण करवाया |
अपनी कहानी खुद बोलते शिला लेख 

इतिहास की गवाही 

आपस में लड़े, पर मर कर भी साथ-साथ   
यह शायद दुनिया का अकेला ऐसा युद्ध स्मारक है जिसमें विजयी सेना के साथ-साथ पराजित सेना के सेनापति की भी बहादुरी की प्रशंसा में सयुंक्त श्रद्धांजली के रूप में स्थापित किया  गया हो | इस स्मारक के शिलालेख में गोरखा सेनापति को “बहादुर दुश्मन ” के रूप में सम्मान दिया गया है | अगल-बगल में खड़े दो विजय स्तम्भ जो एक दूसरे के दुश्मन सेनापति की याद में हैं मानों आज स्वर्गीय शैलेन्द्र के पुराने गीत की याद दिला रहे हैं : –
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय,
ना तुम हारे , ना हम हारे | 
सफ़र साथ जितना था हो ही गया तय , 
ना तुम हारे, ना हम हारे |


भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...