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Friday, 8 November 2019

खुशहाली का प्रतीक : सिरमौर की माता ला -देवी

इस पोस्ट को पढ़ कर मेरे कुछ दोस्त मुझ पर दक़ियानूसी और अंधविश्वासी का ठप्पा लगा सकते हैं | मेरी आज की बातें ही कुछ ऐसी हैं | अपने बचाव में इतना ही कहूँगा कि धर्म, भक्ति और ईश्वर एक आस्था का विषय है | इसमें क्यों, कैसे, तर्क और वाद-विवाद के लिए कोई जगह नहीं है | इन्हें वैज्ञानिक तर्कों की कसौटी पर परखना अपेक्षित नहीं होता | आज भी ऐसे अनगिनत अनसुलझे रहस्य हैं जिनका इतनी उन्नति के बावजूद विज्ञान के पास कोई स्पष्टीकरण नहीं है |ब्रह्मांड और जीवन का रहस्य भी कुछ ऐसा ही है – इंसान कहाँ से आता है, कहाँ जाता है -आज भी विज्ञान इस पर केवल माथा-पच्ची ही कर रहा है | इंसान की फितरत में है – चाहे खुशी में याद आए या न आए, पर जब संकट में गाड़ी रेत में फँस जाती है तब ईश्वर, अल्लाह और जीसस सब एक साथ याद आ जाते हैं | इसी लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघर उसी आदि-शक्ति तक पहुँचने की कोशिश के रास्ते इंसान ने खोज रखे हैं | आज आपको एक ऐसे मंदिर के दर्शन करवाता हूँ जिसके बारे में बहुत ही कम लोगों ने सुना होगा | पर जिन लोगों को इसके बारे में पता है उन सबका इस पर अटूट आस्था, विश्वास और मान्यता है | मैंने इस मंदिर में एक से ऊंचे एक अनेक दिग्गज हस्तियों को श्रद्धा से माथा टेकते और मनौती माँगते देखा है | यह छोटा सा लेकिन सादगी से परिपूर्ण मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर की तहसील पाँवटा साहिब के निकट राजबन के एक सुनसान पहाड़ी जंगल में स्थित है | यह माता ला- देवी का मंदिर है | यह लेख मेरे स्वयं के राजबन निवास के लंबे अनुभव और वहाँ के निकटवर्ती गांवों में बसे मेरे अनेक दोस्तों और स्थानीय निवासियों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है |
इस मंदिर के इतिहास की जड़ें प्राचीन सिरमौर राज्य के राजा तक पहुँचती हैं | ज्यादा जानकारी मेरे ब्लाग की राजबन और सिरमौर पर लिखी पोस्ट (राजबन : राजा का बन और उजाड़ नगरी) में मिल जाएगा जिसका लिंक साथ ही दिया गया है | समय निकाल कर वह भी पढ़ लेंगे तो इस लेख का भी और अधिक आनंद उठा पाएंगे | संक्षेप में कहें तो किसी समय प्राचीन सिरमौर राज्य की राजधानी रहे इस राजबन क्षेत्र में भारी तबाही हुई थी | सब कुछ नष्ट हो गया था – राजा का महल भी | समय बीतता गया .... बरसों बाद उधर के घने जंगल में जिन्हें राजबन के नाम से जाना जाता था, एक सुनसान पहाड़ी पर तेंदु के पेड़ (जिसके चौड़े पत्तों से पत्तल और बीड़ियाँ भी बनती हैं ) के नीचे कुछ प्राचीन पत्थरों की प्रतिमाएँ पायी गईं | ये पत्थर पर खुदी मूर्तियाँ थीं जिन पर किसी अज्ञात प्राचीन लिपि में कुछ लिखा भी हुआ था | आज की बुजुर्ग हो चली पीढ़ी भी अपनी यादों को ताज़ा करते हुए कहती है कि अब से साठ वर्ष पहले राजबन के जंगलों में वे भेड़ चराया करते थे तब भी उस पहाड़ी पर तेंदु के पेड़ के नीचे रखी उन मूर्तियों को देखा करते थे |


प्राचीन मंदिर 




प्रस्तर प्रतिमाएँ -प्राचीन मंदिर 



प्राचीन मंदिर - पुरातन अवशेष 
( ऊपर के सभी चित्र - सौजन्य : श्री अनिल शर्मा - राजबन ) 

इन मूर्तियों के बारे में उनके गाँव के बड़े-बूढ़े भी बताया करते थे कि ये भी राजा के समय के प्राचीन मंदिर के अवशेष हैं | गाँव के लोगों के जब मवेशी गुम हो जाते थे तब वे यहाँ आकर मनौती मांगते थे जो पूरी भी हो जाती थी | इस मंदिर के इतिहास से आस्था और विश्वास की यहीं से शुरुआत हुई जो समय के साथ -साथ बढ़ती गई| बहुत ही कम लोगों को यह ज्ञात है कि असली प्राचीन ला देवी का मंदिर वास्तव में आज भी वही छोटा मंदिर है जो तेंदु के पेड़ के नीचे बना हुआ है | वहाँ तक जाने के लिए तब कच्ची पहाड़ी पगडंडी होती थी | इसके ठीक सामने कुछ ऊंचाई पर बना बड़ा मंदिर बाद की सरंचना है | पुराने समय में यहाँ आस-पास जंगली जानवर भी घूमते-फिरते आ जाते थे | रात को कई बार शेर भी देखा गया | शायद यही कारण है आज भी शेर की प्रतिमा मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार पर विद्यमान है | 

( नीचे के सभी चित्र श्री श्याम सुंदर माहेश्वरी के सौजन्य से )

मंदिर परिसर मुख्य द्वार 



मंदिर  की 108 सीढ़ियाँ 


अब देखिए चमत्कार - यह पूरा क्षेत्र बहुत ही पिछड़ा हुआ और गरीबी की मार झेल रहा था | उस पहाड़ी गाँव में सिवाय छोटी-मोटी खेती-बाड़ी और मवेशी पालने के और कोई जीवन बसर करने के अलावा कोई अन्य साधन नहीं था | भारत सरकार द्वारा 1970 के आरंभिक दशक में एक निर्णय लिया गया- देहारादून जो कि उस समय उत्तर प्रदेश में आता था , के निकट एक सीमेंट फेक्टरी लगाने का | तब हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री यशवंत सिंह परमार ने अपने प्रभाव से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि वह सीमेंट कारख़ाना देहरादून के बजाय हिमाचल प्रदेश में लगाया जाए | परमार साहब क्योकि खुद सिरमौर जिले से थे अत: उन्होने जोड़-तोड़ करके राजबन में फ़ैक्टरी लगवाने का जुगाड़ पक्का कर दिया | अब यह चमत्कार नहीं तो क्या था – जहां पर रेल लिंक आज तक नहीं पहुँच पाया है – उस जगह पर हिमाचल प्रदेश में सीमेंट उद्योग की पहली फ़ैक्टरी ने अपने पैर जमाये | अब सीमेंट फ़ैक्टरी बननी शुरू हुई , स्थानीय लोगों को रोजगार मिला | गाँवों में खुशहाली आनी शुरू हुई | 

फ़ैक्टरी बनने के दौरान एक दिलचस्प वाकया हुआ | फ़ैक्टरी  से लेकर चूना पत्थर की खानों तक लगभग तेरह किलोमीटर का रोप-वे बनाने का ठेका कलकत्ता की जेसप एंड कंपनी को दिया गया था | दुर्गम पहाड़ी रास्तों और नदी के ऊपर से जाता रोप-वे के निर्माण में बहुत दिक्कते आ रहीं थीं | रोप-वे का रस्सा बार-बार टूट जाता था | हार कर उस कंपनी के अधिकारियों ने उसी माता ला देवी के मंदिर में सफलता के लिए मन्नत माँगी | मुराद पूरी हुई – रोपे- वे बना भी , कामयाब भी हुआ और उसी जेसप एंड कंपनी ने माता ला देवी की श्रद्धा में पक्के मंदिर का निर्माण करवाया | उन दिनों मेरे पोस्टिंग राजबन में ही थी इसलिए घटनाएँ कानों- सुनी नहीं वरन आँखों- देखी हैं | 



नया मंदिर : माता ला - देवी 




देवी प्रतिमा (नवीन )

लोगों का मानना है की इस मंदिर ने इस पिछड़े इलाके को गरीबी से उबारा, संपन्नता दी, हजारों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिया | बात केवल यहीं तक नहीं रुकी – राजबन के निकट ही पांवटा साहिब में सिक्खों का पवित्र गुरुद्वारा है | आज उस स्थान ने भी भरपूर प्रगति की है | पास में ही तारुवाला जो कभी ग्रामीण इलाका होता था आज औद्योगिक क्षेत्र में बदल चुका है | अब इधर यह सब विकास हो रहा था – उधर ला- देवी के भक्तों और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती जा रही थी | सीमेंट फ़ैक्टरी के कर्मठ कर्मचारियों और प्रबंधन ने एक तरह से देखा जाए तो इस मंदिर को अपने सरंक्षण में ले लिया | समय-समय पर भक्तों के सहयोग से इस मंदिर का जीर्णोद्धार और काया-कल्प भी होता जा रहा है । यहाँ समय-समय पर भंडारे होते हैं जिन में हजारों की संख्या में आस-पास के गांवों के निवासी आते हैं | फ़ैक्टरी की सुख-शांति और सफलता के लिए हवन-पूजा भी होती रहती है | एक समय ऐसा भी आया कुछ लोगों की सलाह पर ला-देवी मंदिर के स्थान पर फ़ैक्टरी के टाउनशिप में बने मंदिर में ही भंडारे किए जाने लगे | अब इसे संयोग कहिए या कुछ और – इसके नतीजे बड़े घातक और दुर्भाग्यशाली रहे | अंत में उसी पुरानी परंपरा पर लौटने में ही सबने भलाई समझी | 
अभी कुछ वर्षों पहले ला देवी मंदिर के परिसर में ही भगवान शिव के मंदिर की भी स्थापना हुई है | 
वक्त के साथ सीमेंट फ़ैक्टरी भी उम्र दराज़ हो चली है | अन्य सरकारी उपक्रमों की तरह इसे भी अनेक बीमारियों ने जकड़ लिया है | यह धीरे-धीरे काल के गर्त में समाती जा रही है | सुनने में यह बुरा जरूर लगता है पर वास्तविकता से मुँह भी तो नहीं मोड़ा जा सकता | अब हुआ दूसरा चमत्कार – ठीक सीमेंट फ़ैक्टरी के सामने ही भारत सरकार ने इसी इलाके में रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत बहुत विशाल संस्थान की स्थापना कर दी है | डी०आर०डी०ओ के अधीन उस संस्थान का महत्व केवल इसी बात से समझा जा सकता है कि यहाँ से गुज़रने वाली पतली सी टूटी-फूटी सड़क भी अब फर्राटेदार चोड़े राष्ट्रीय राजमार्ग में बदल चुकी है | कुल मिला कर बदलती परिस्थितियों में भी दैवीय शक्तियों ने इस स्थान पर अपना आशीर्वाद बनाए रखा है | मेरा मानना यह भी है कि देवी की कृपा केवल उन मेहनतकश कर्मयोगी इन्सानों तक ही सीमित रही है | जहाँ मेहनत का स्थान आलस, बेईमानी और भ्रष्टाचार ले लेता है, देवी का आशीर्वाद भी रूठ कर चला जाता है | 

इस लेख के माध्यम से मैं उन सब श्रद्धालुओं की प्रशंसा और आभार प्रकट करना चाहूँगा जो निस्वार्थ भाव से इस मंदिर की देखरेख में अपना हर प्रकार से योगदान कर रहे हैं | 

अब आप मुझे अंध-विश्वासी कहें या मोटी बुद्धि वाला बेवकूफ, मेरा मानना है कि इस मंदिर में कुछ तो विशेष जरूर है जिसने इस पिछड़े गाँव और इसके आस-पास के क्षेत्रों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल कर खुशहाली के दिन दिखाये | यह तो मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आस्था के पीछे वैज्ञानिक तर्क नहीं होते |
(आभार : सर्व श्री श्याम सुंदर माहेश्वरी, जिगरी राम चौधरी, खेम राज शर्मा , अनिल शर्मा, नारायण सिंह पौखरियाल जी का जिनके अमूल्य योगदान के कारण यह लेख आप तक पहुँच पाया है )   

Tuesday, 22 October 2019

राजबन का हनुमान : अनिल शर्मा

अपनी नौकरी के कार्यकाल के दौरान मैंने महसूस किया कि अन्य स्थानों की तुलना में फेक्ट्रियों के टाउनशिप की अलग ही दुनिया होती है | सब लोग मिल-जुल कर साथ रहते हैं | एक दूसरे के हर सुख- दुःख के साथी | सब त्यौहार मिल जुल कर एक साथ मनाते हैं | हालाकि मुझे रिटायर हुए अरसा बीत चुका है पर आज भी हिमाचल प्रदेश के राजबन से दुर्गापूजा और रामलीला का निमंत्रण हर वर्ष आता है | मौक़ा मिलने पर मैं भी शामिल हो जाता हूँ | इस रामलीला की विशेष बात यह है कि इसके सभी कलाकार फ़ैक्टरी के ही  कर्मचारी होते हैं जो दिन भर की ड्यूटी करने के बाद भी पूरी भक्ति, शक्ति और उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं |अगर मैं ठीक से याद कर पा रहा हूँ तो यह परम्परा विगत चालीस से भी अधिक वर्षों से अनवरत चलती आ रही है | समय के साथ -साथ पुराने कर्मचारी रिटायर होते गए, नए-नए आते गए और इसके साथ ही रामलीला के कलाकारों की भी नई पीढ़ी अवतरित होती गयी | राम, लक्ष्मण , हनुमान , रावण जैसे सभी पात्रों का नया संस्करण | लेकिन इन सब परिवर्तनों के बावजूद भी रामलीला की मूल आस्था और भक्ति भावना वही बरकरार रही| 
राजबन  की रामलीला : नीचे बैठी तत्कालीन जी॰एम  सुश्री सरस्वती देवी 
इस मौके पर पर मुझे आज की रामलीला के आज के हनुमान और उसकी कहानी बरबस याद हो आयी | अनिल शर्मा नाम है उसका | यादों की डोरी पहुँचती है उसके दिवंगत पिता श्री रामानंद शर्मा तक जो फ़ौज से रिटायरमेंट लेने के बाद, किसी ज़माने में उसी राजबन फ़ैक्टरी में नौकरी करते थे | मुझे वह समय भी याद है जब मेरे मकान के लॉन में लगे पेड़ से अमरूद तोड़ने आये बच्चों की टोली में शामिल नन्हा अनिल भी शामिल रहा करता था | इस अनिल की ज़िंदगी भी बहुत ही उथल-पुथल भरी रही है | आइये आप को भी उसकी ज़िंदगी का छोटा सा फ़िल्मी ट्रेलर दिखा देता हूँ | 

बचपन में अनिल पढ़ाई में ठीक- ठाक ही रहा | स्कूल भी अच्छा था लेकिन नौवीं क्लास तक आते-आते जैसे शरारतों के झूले की पींग ऊँची उठती गई, पढ़ाई की बैटरी डाउन होती गई | अंगरेजी स्कूल से हिन्दी मीडियम के सरकारी विद्यालय में पधारना पड़ा पर कुछ समय बाद उसे लगा पढ़ाई बस की बात नहीं | पिता भी तब तक नौकरी से रिटायर हो चुके थे| उन्होंने उम्मीदें तो बहुत पाली हुई थी अनिल से, मगर मन मसोस कर रह जाते | आखिर कर भी क्या सकते थे | इसी बीच दुर्भाग्य ने उस हँसते -खेलते परिवार पर जैसे कोई बम छोड़ दिया | पिता को बीमारी ने जकड़ लिया और बीमारी भी कोई छोटी-मोटी नहीं – वह थी साक्षात मौत का दूसरा नाम – कैंसर | पूरा परिवार मानों एक तरह से हिल गया | इलाज के खर्चों से घर की आर्थिक व्यवस्था चरमराने लगी | दिन में तारे दिखना किसे कहते है ज़िंदगी में पहली बार अनिल ने यह भी जान लिया था |
अधूरी पढ़ाई के साथ नौकरी की तलाश में पता नहीं कहाँ -कहाँ धक्के खाने पड़े | दिल में पहली बार यह ख्याल भी आया कि काश अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाया होता तो शायद आज यह वक्त नहीं देखना पड़ता | उधर पिता की तबीयत दिन पर दिन खराब होती जा रही थी | आखिरकार उसी सीमेंट फ़ैक्टरी में  जहाँ पर उसके फ़ौजी पिता अच्छी-ख़ासी नौकरी करते थे वहीं पर ठेके के मजदूरों में भर्ती होकर काम करना पड़ा | पिता की इच्छा थी जीते जी अपनी आँखों के सामने ही अनिल का घर बसते देखने की सो विवाह भी जल्द ही कर दिया | कुछ समय बाद ही दबे कदमों से आती मौत ने भी पिता को अपने बेरहम शिकंजे में ले ही लिया | इधर पिता की मौत का सदमा और उधर पिता की फौज से मिलने वाली पेंशन भी बंद | सिर पर भरे -पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी आ गई जिसमें थे माँ, बहन , भाई, पत्नी और बेटा | खुद की कमाई इतनी कम जैसे ऊंट के मुंह में जीरा | अनिल आज भी उस वक्त को याद करते हुए कहते हैं वह शायद मेरे ज़िंदगी के सबसे बुरे दिन थे | खाने तक के लाले पड़ गए थे | दस रुपये का मेगी का पेकट लाते थे – मेगी परिवार के अन्य सदस्यों को खिला कर उसके बचे हुए पानी में ही रोटी डूबा कर खा लेते | कई बार तो रोटी भी  खेत से तोड़कर लायी प्याज में नमक -मिर्च डाल कर खाने की नौबत रहती 
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हर बुरे वक्त का कभी तो अंत होता है | अनिल के बुरे वक्त ने भी विदाई लेनी शुरू कर दी – बेशक धीरे-धीरे ही सही | खेत की ज़मीन पर मोबाइल टावर लगा तो किराये की आमदनी से कुछ सहारा लगना शुरू हुआ | दिवंगत पिता की पेंशन का मामला सुलझा और माँ को पेंशन मिलनी शुरू हुई | किसी ने सच ही कहा है – अच्छे वक्त में भाग्य और बुद्धि भी साथ देती है | अनिल ने अपनी अधूरी पढ़ाई की तरफ भी ध्यान देना शुरू किया |पत्राचार के माध्यम से पहले मेट्रिक पास किया और उसके बाद बारहवीं | किस्मत का खेल देखिए – फ़ैक्टरी की सरकारी नौकरी के लिए आवेदन मांगे गए और फार्म भरने की अंतिम तिथि पर ही बारहवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित हुआ | भागते-दौड़ते आवेदन पत्र भरा | प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार के कड़े मापदण्डों पर खरा उतरने पर आखिरकार सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया  में मिलर की नियमित पक्की नौकरी मिल पायी| सीमेंट उद्योग में मिलर का पद अत्यंत तकनीकी और महत्वपूर्ण होता है | बस वह दिन है और आज का दिन , अनिल ने कभी वापिस पीछे मुड़ कर नहीं देखा | जीवन में जो चाहा मिल गया – अच्छी नौकरी, मोटी तनख़्वाह, भली से पत्नी और दो भोले-भाले प्यारे से बच्चे |
अनिल शर्मा :: मिलर के रूप में 

आज का सुखी परिवार : पत्नी और बच्चों के साथ 
अनिल का मानना है की इस सारी सफलता में उसके परिवार का पूरा सहयोग है विशेषकर पत्नी का | पत्नी स्वयं स्नातक हैं जिसका अनिल की अधूरी पढ़ाई को पूरा करवाने में उल्लेखनीय योगदान है | इन सबसे ऊपर वह विशेष कारण जिसकी वजह से भाग्य भी मेहरबान रहा – वह है ईश्वर पर अटूट आस्था | अनिल हनुमान भक्त है और राजबन सीमेंट फेक्टरी  की रामलीला में विगत बारह वर्षों से हनुमान का पार्ट सफलता पूर्वक अदा कर रहा है | हनुमान की भूमिका निभाने के दौरान अनिल को अपने शरीर में अद्भुत शक्ति का संचार महसूस होता है | एक हाथ से ही रसोई गैस का भरा हुआ सिलेन्डर अपने कंधे पर रखने की ताकत आ जाती है जो सामान्य दिनों में संभव नहीं होती |  वह रामलीला का एक मँजा हुआ कलाकार है और आवश्यकता पड़ने पर जोकर से लेकर मंथरा और राजा जनक से लेकर रावण सेना के गण  तक का रोल बखूबी निभा लेता है | रामलीला के एक से बढ़ कर एक मज़ेदार किस्से-कहानियों का भंडार है अनिल के पास- पर उन सब के लिए एक अलग से ही ब्लाग कभी लिखना पड़ेगा |
अनिल - हनुमान रूप में 
सिगरेट शराब जैसे व्यसनों से दूर अनिल की  भविष्य के प्रति सुनहरी योजनाएँ हैं | सबसे पहले अपने आपको ग्रेजुएट होते हुए देखने का इरादा  | एक बड़ी सी गाड़ी खरीद कर परिवार को सैर -सपाटा करने का सपना | मुझे विश्वास है राम जी इस रामलीला के साक्षात हनुमान की मनोकामना अवश्य पूरा करेंगे |
यह थी रामलीला के हनुमान अनिल  के उथल - पुथल भरे जीवन  की एक छोटी सी बानगी जो हमें याद दिलाती है एक बहुत ही पुराने गीत की :

गर्दिश में हो तारे, ना घबराने प्यारे ,
गर तू हिम्मत ना हारे तो होंगे वारे-न्यारे |

Saturday, 22 December 2018

चमचे की चित्रकारी



22 साल की उम्र में वर्ष  1978 में सीमेंट कॉर्पोरेशन आफ़ इंडिया के हिमाचल प्रदेश स्थित  राजबन फेक्ट्री में नयी-नयी नौकरी लगी थी | उम्र और तजुर्बा, दोनों के ही मामले में पूरी तरह से अपरिपक्व | यह उम्र का वह दौर था जब बचपन पूरी तरह से गया नहीं था और जवानी पूरी तरह से आयी नहीं थी | बस यह समझ लीजिए कि बीच की दहलीज पर थे | मेरा मानना है कि नौकरी के लिहाज से उम्र की वह दहलीज बड़ी खतरनाक होती है क्योंकि उस समय तक दुनियादारी की पूरी तरह समझ आयी नहीं होती है और दफ्तर में भी कालेज जैसी शरारतें इस हद तक कर दी जाती हैं कि अगर नौकरी सरकारी है तो सालाना रिपोर्ट खराब हो सकती है, ट्रांसफ़र हो सकता है| बदकिस्मती से अगर प्राइवेट सेक्टर या लाला  की नौकरी है तब तो ऐसी नादान कारस्तानियाँ घर बिठाने की नौबत भी ले आती हैं| एक बारगी ऐसे ही किसी खुराफ़ाती लम्हें में अपने एक दक्षिण भारतीय सहकर्मी की  नेम प्लेट के नीचे चुपके से बड़ा सुंदर सा चमचे का चित्र बना दिया था | कारण सिर्फ इतना था कि वह सहकर्मी तत्कालीन महाप्रबंधक का खासम-खास मुंह लगा सिपहलसार था | यानी पल पल की चुगलखोर खबरें  बिजली की भी तेज रफ़्तार से मास्टर कंप्यूटर तक पहुंचाने वाला उस ज़माने का वाई-फाई | इन हरकतों की वजह से बस यह समझ लीजिए कि ‘ सारी दुनिया - सारा जहान, सारे दुखी- सारे परेशान’ | अब नज़ारा देखने लायक था – जो भी कारीडोर में उस मित्र के कमरे के आगे से गुजरता, नेम प्लेट पर नज़र पड़ते ही जबरन मुस्कराहट को रोकने का प्रयत्न करता | कारगिल पर हुई पाकिस्तानी घुसपैठ की हरकत की तरह  बाहर की हलचलों से अनजान हमारा जासूस  मित्र अन्दर कमरे में अपने काम -काज में व्यस्त था जब तक कि उस जासूस के भी जासूस ने उसे बताया कि मी लार्ड ! कोई अनाम हिन्दुस्तानी सिरफिरा क्रांतिकारी आपको सरे आम  बाकायदा चमचे की पदवी से सम्मानित कर चुका है | मित्र सब काम छोड़ कर झटपट तुरंत दरवाजे की और लपके | दरवाजे पर लगी नेम प्लेट पर बना सुंदर सा चमचा मानों गागर में सागर भरे उन्हें मुंह चिढ़ा रहा था |  उन्होंने भी शायद अपने जीवन काल में नेम प्लेट पर नाम के साथ सम्पूर्ण चरित्र-चित्रण का इतना संक्षिप्त परिचय शायद ही कभी देखा हो | यह देखते ही मित्र की त्योरियां चढ़ गयीं, पहले से ही सांवली रंगत वाला चेहरा गुस्से से तमतमा कर और काला पड़ गया | लगभग दौड़ते हुए साथ लगे हुए कमरे में आए और अपनी पतली सी कांपती आवाज में मदरासी लहज़े में सभी को सुनाते हुए  चीख कर बोले- ‘किसने किया है ये सब | मैं छोडूंगा नहीं |’ इतना धमाका करने के बाद दिवाली के अनार की तरह जितनी जल्दी वह आये उतनी ही  जल्दी दनदनाते हुए मिसाइल की तरह नदारत भी  हो गए| कमरे में बैठे लोग, जिसमें इस सारे खुराफ़ात की असली जड़ - मैं भी शामिल था, उस अचानक हुए हवाई हमले के लिए तैयार नहीं थे| कुछ देर तक उस कमरे में बिलकुल पिन ड्राप सन्नाटा छा गया | धीरे-धीरे कमरे की चहल-पहल फिर से लौट आई और लोग चटकारे ले-ले कर उस घटना का मज़ा लेते हुए उस अज्ञात वीर सेनानी की  ( यानी मेरी ) हिम्मत की तारीफ़ में जुट गए जिसने सीधे –सीधे इतने मजाकिया अंदाज़ में कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया था | अब एक कोने में चुपचाप बैठे हुए मुझे उस बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी | मेरी हालत तो उस सींकिया पहलवान से भी बदतर हो रही थी जो भांग के  नशे में शेर के  ऊपर सवार तो हो गया पर नशा उतरने पर यही सोच कर अधमरा हुआ जा रहा था कि अपने हिस्से का काम तो मैंने कर दिया अब बाकी का काम शेर जी के हवाले | कहने वाले सच ही कह गए हैं कि चोर के पाँव नहीं होते | अन्दर ही अन्दर हालत पतली हो रही थी | अब जिसका डर था वही हुआ | अब अगर हमला इजराइल पर होगा तो शिकायत तो अमरीका तक जानी ही थी | कुछ ही देर बाद जनरल मेनेजर का चपरासी हाजिर हो गया इस फरमान के साथ कि चलो बुलावा आया है, जी.एम ने बुलाया है | जहाँ तक मुझे याद पड़ता है उस समय जी .एम  भूटियानी साहब थे, जो कि एक अच्छे-खासे डील-डोल के गोरे – चिट्टे सिंधी व्यक्ति थे | बहुत ही शांत स्वभाव के मधुर भाषी इंसान | पर भाई, जी.एम तो आखिर जी.एम ही होता है, यानी पूरी फेक्ट्री का एक तरह से खुदा तो खुदा से खौफ़ तो लाज़मी ही था | सो उस खुदा की दरगाह में मन ही मन राम-राम कहते दाखिल हुआ | दरगाह के एक कोने में वही मद्रासी  फरियादी रुआंसी चमचेनुमा शक्ल बनाए खड़ा था | अब तक मैं भी समझ चुका था कि लगता है मास्टर कंप्यूटर में मेरी शिकायत पहले ही वाई –फाई द्वारा अपलोड की जा चुकी है | चमचे की चित्रकारी से सजी मित्र की नेम-प्लेट सामने मेज पर अपराध के सबूत के रूप में रखी थी जो मुझे तिरछी नज़रों से देख कर इशारों में ही मानों पूछ रही थी कि गुरु मुझे पहचाना या नहीं ? हम भी मन में ठान चुके थे ,कुछ भी हो जाए, चाहे तो डी.एन.ए टेस्ट हो जाए इस नामुराद नेम प्लेट का, इस नामाकूल को हम भी मरहूम  एन.डी तिवारी की तरह से कतई अपना नहीं मानेंगे | जी.एम साहब की दबी हुई मुस्कान से यह तो जाहिर हो रहा था कि  मामला की असल वजह तो जान चुके थे पर अमरीका और इज़राइल के बीच की रिश्तेदारी की भी तो इज्जत मजबूरीवश ही सही पर  निभानी तो  पड़ेगी ही , बेशक सरसरी तौर पर ही सही | सो उन्होंने मुस्कराते हुए ही मुझसे पूछा इस नेम प्लेट को देखा है | मैनें नेम प्लेट और मित्र दोनों को ही एक नज़र से देखते हुए कहा – सर बहुत बार देखा है , पर यह चमचा पहली बार देखा है | अब साफ़ लगने लगा कि हँसी रोकना उनके लिए भी भारी सा पड़ने लगा था | फिर से पूछा कि यह तुम्हारा काम है ?  मुझे अच्छी तरह से पता था कि मेरी कारस्तानी का कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं है, सो बे-धड़क कहा ‘नहीं सर , चाहे तो मेरी हेंड-राइटिंग मिल लीजिए’ | जवाब सुनकर भूटियानी साहब ने मुस्कराते हुए अपने सर पर हाथ फेरते हुए एक ठंडी सांस छोड़ी और कहा यही तो दिक्कत है, तुम्हारी  हेंड राइटिंग से किसी भी लिखावट को तो मिलवा सकता हूँ पर इस चमचे को नहीं | कहने की बात नहीं मुकदमा बर्खास्त, मुलजिम बाइज्ज़त बरी और फरियादी वापिस अपने कमरे में जिस पर अब कोई नेम प्लेट नहीं थी |
खैर यह किस्सा तब के लिए ख़त्म हो गया | अपने उस साथी से भी मुझे किसी भी प्रकार का वैर नहीं था जो वह भी अच्छी तरह से जानते थे |स्कूल - कालेज के दिनों की तरह यह  शरारती कांड भी मेरी मौज मस्ती का ही भाग था।  उन्होंने भी शिकायत केवल संदेह के आधार पर ही की थी | स्वभाव मेरा भी शुरू से ही मजाकिया रहा इस लिए बाद में सब कुछ सामान्य हो गया | कुछ वर्षों के बाद ट्रांसफर होने पर उन मित्र के साथ बाद में एक अन्य स्थान पर भी साथ ही काम किया पर अपनी कारस्तानी की बात उनके सामने उतनी ही गोपनीय रखी जितनी आज के समय में राफेल हवाई जहाज़ की कीमत रखी जा रही है |
उस घटना को हुए तब लगभग पच्चीस साल बीत चुके होंगें | मैं तब तक देहरादून जोनल आफिस में नियुक्त था | मेरे उसी मित्र का दक्षिण भारत के किसी कोने से फोन आया कि तुम्हारी तरफ घूमने आ रहा हूँ, संभव हो तो ठहरने का इंतजाम करवा देना | यह कोई बड़ी बात नहीं थी, सब इंतजाम हो गया | दोस्त से मिलने की खुशी भी थी | पत्नी सहित पधारे मित्र से बड़े प्यार से मुलाक़ात हुई | रात को खाने की मेज पर खाने के साथ-साथ हँसी-मज़ाक भी चल रहा था | दोस्त बातें करते हुए बहुत स्वाद लेते हुए सूप पी रहे थे | अचानक मेरा ध्यान उनके हाथ में थामें सूप के चम्मच पर पड़ा | पल भर में ही मेरे शरारती खोपड़ी में पच्चीस साल पुरानी कारस्तानी घंटियाँ बजने लगीं | बहुत ही मासूमियत से मित्र को मैंने उस पुरानी घटना की याद दिलाई | याद आते ही मित्र बोले “हाँ कुछ ऐसा हुआ तो था, मेरी अच्छी-खासी नेमप्लेट का किसी नालायक  ने सत्यानाश कर दिया था | पता नहीं वह कम्बखत कौन था ?” मित्र की आँखों में आँखें डालते हुए एक शरारती मुसकराहट के साथ मैंने धीरे स्वर में धमाकेदार बम फोड़ा – “ वह नालायक, नामुराद, कमबख्त  मैं ही था जो अब तुम्हारे सामने बैठा तुम्हारे हाथ के चमचे को देख रहा हूँ |” सुनते ही हाथ का चमचा टन्न की आवाज करता सूप के बाउल में जा गिरा और दोस्त मुझे आश्चर्य से ऐसी नज़रों से घूर रहा था कि अगर शाकाहार मजबूरी न होती तो शर्तिया आज मैं उसके डिनर का हिस्सा बन जाता| दोस्त के चेहरे पर एक के बाद एक रंग तेजी से आ रहे थे, जा रहे थे । पर अंत में उनके मुंह से जोरदार हंसी का ठहाका निकला और मेरे लिए  तारीफ के दो शब्द : YOU SCOUNDREL!!

दोस्त की बात तो वही जाने पर उस रहस्य का पर्दाफ़ाश करके मैं तो उस रात भरपूर नींद सोया, कहते हैं ना सच बोल कर दिल का बोझ हल्का हो जाता है |अब आप भी कुछ ज्यादा ही सीरियस मत हो जाना..... उस दोस्त से अभी भी खूब मस्ती की गप्पबाजी होती रहती हैं |         



Tuesday, 20 November 2018

एक थी केरी : (भाग एक )


राजबन का सौन्दर्य 

बात फिलहाल की नहीं तो कोई ख़ास पुरानी भी नहीं है | वर्ष 2014  के दौरान हिमाचल प्रदेश के राजबन फेक्ट्री में उन दिनों मेरी तैनाती थी |

शहरों के भीड़-भड़क्के और शोर-शराबे से दूर बसा राजबन, पर्वतों और जंगलों के निर्मल वातावरण में  कुदरत की सुन्दरता का जीता-जागता उदहारण है | अगर आपको याद हो तो  इस देवभूमि के रोचक इतिहास की बानगी अपने लेख “सिरमौर – राजा का बन और उजाड़ नगरी में पहले भी दे चुका हूँ|  फेक्ट्री की टाउनशिप  में ही रिहायशी कोठी मिली हुई थी | पत्नी, बच्चे और अम्मा नोएडा में ही रह रहे थे पर  पारिवारिक मजबूरी कुछ ऐसी थी कि अकेले ही रहना पड़ रहा था | आप प्रकृति की खूबसूरती का आनंद भी अपने घर-परिवार के साथ ही उठा सकते हैं वरना अकेले बन्दे का तो वही हाल होता है – जोरू न जाता, अल्ला मियाँ से नाता | दफ्तर का समय तो व्यस्तता में गुजर जाता था पर शाम को अकेलेपन का अहसास कुछ ज्यादा ही होने लगता था | समय काटने के लिए दारुबाजी और यारी-दोस्ती के  जग-प्रसिद्ध घिसे-पिटे नुस्खे अपने किसी काम के थे नहीं |  ऐसे समय ही अक्सर बड़े-बूढों की कही बात दिमाग़ में गूँजा करती कि यह सब पापी पेट का सवाल है ;  जो खेल न दिखाए वही कम है | अपना शौक अखबार पढ़ने, टी.वी. देखने, घर के काम-काज और बागवानी तक ही सीमित रह जाता था और समय भी उसी में कट जाता | अब आप ही बताइये कोई भलामानस कितना तो अखबार पढेगा, कितना  टी .वी. देख लेगा और कितनी बगीचे में घास खोद लेगा | रेडियो सुनने बैठे तो गाना भी दिल जलाए – तेरी दो टकिया की नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए |  अब पहले वाली बात नहीं रह गई है – अब तो जब  नौकरी भी लाखों की हो चुकी थी  तो उसके आगे  हमारे लिए तो सावन ही दो टके का रह गया था | बस ज़िंदगी की नीरस दौड़ में राजबन की हसीं वादियाँ भी  एक उजाड़, वीरान रेगिस्तान सी लग रहीं थीं |
केरी-चम्पू और मेरा घर  

और दिनों की तरह उस देर शाम भी दफ्तर की मगज खपाई और कलम घसीट कामकाज निबटाकर कदम घसीटते हुए थकी-हारी  चाल से  अपने घोंसले को लौट रहा था |  जाड़े के मौसम ने धीरे-धीरे दस्तक देनी शुरू कर दी थी | दिन छोटे होने लगे थे | शाम के साढ़े  सात बजे से ही कॉलोनी की सुनसान सडकों पर कर्फ्यू जैसा माहौल छाया हुआ था | हल्की-हल्की  धुंध स्ट्रीट लाईट की सत्ता को जैसे चुनौती दे रही हो | बस बेकग्राउंड में भूतों की पिक्चर के डरावने गाने की कसर थी |  मेरे लिए उस वक्त भी शापिंग सेंटर तक जाना मजबूरी थी | रोजमर्रा की तरह  सुबह के नाश्ते के लिए  खरीदारी जो  करनी थी | शापिंग सेंटर में भी बस कोई इक्का-दुक्का इंसान ही नज़र आ रहा था| दो भाइयों  विपुल-सुलभ की किरयाने की दुकान पर पहुँच कर एक कोने में चुपचाप खड़ा हो गया | दूकान के मालिक विपुल ने मुस्कराते हुए मुझे रोज का खरीद कोटा यानी एक दूध का पेकेट और एक ब्रेड हाथ में थमा दिया | वापिस जाने के लिए मैं मुड़ा और चंद कदम चलने पर ही मुझे महसूस हुआ कि मेरे पीछे-पीछे कोई आ रहा है | पलट कर देखा तो एक छोटा सा पिल्ला अपने नन्हे-नन्हे कदमों की लुढ़कती-पुढ़कती चाल से मेरे पीछे लगभग दौड़ लगा रहा है | पहली नज़र में ही उस छुटपुटे अँधेरे में भी मुझे उसकी छोटी से मासूम आँखों में पता नहीं क्या दिखा मैंने अनायास ही पुचकारते हुए होठों से ही सीटी बजा दी | बस फिर क्या था, उस नन्हीं सी जान में पता नहीं क्या जादुई शक्ति आगई और मेरा पीछा करने की उसकी दौड़ और अधिक तेज हो गई | कोठी के मेन गेट को खोल कर अन्दर घुसा तो वह नन्हा खिलौना भी मेरे पीछे | अब मुझे भी उस गरीब पर तरस आने लगा सो अंदर रसोई से कुछ बिस्किट लाकर उसे खिलाने लगा | शायद वह काफी भूखा था इसलिए जीभ के चटकारे लेते हुए आनन-फानन में चार –पांच बिस्किट चट कर गया | उसे बाहर बरामदे में ही छोड़कर मैंने अन्दर बेडरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया और सोने चला गया |
फेक्ट्री का ड्यूटी टाइम सुबह सवेरे आठ बजे से था, इसलिए मेरी दिनचर्या भी प्रात: छह बजे से ही शुरू हो जाती थी |सोकर उठा तो कुछ आहट सुनकर दरवाजा खोला,  सामने बरामदे में वही रात वाला दुबला पतला खिलौना ठण्ड में काँपता, सहमा सा अपनी चिंदी सी  आँखों से मुझे टुकुर-टुकुर ताकते हुए मानों कुछ कहना चाह रहा था | मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि करूँ तो क्या करूँ | खैर इतना तो समझ ही गया कि इसे भूख लगी है सो एक कटोरी में दूध और ब्रेड मिलाकर दिया|स्वाद से खाकर एक कुम्भकर्णी  संतुष्टी की नींद लेने के लिए वह फिर से नींद बाहर बागीचे के हरी-हरी घास पर ही लोट लगाकर सो गया | मैं भी कुछ देर बाद तैयार होकर आफिस के लिए निकल लिया | फेक्ट्री और कॉलोनी अगल-बगल होने के कारण दोपहर का लंच घर पर ही आकर किया करता था | दोपहर को घर पहुँचा तो  वह बिन-बुलाया मेहमान मेन गेट पर ही मेरे स्वागत के लिए मानों तैयार खड़ा था | उसे देखकर अब मानों मेरे दिमाग की खतरे की घंटी ने बजना शुरू कर दिया कि पंडित जी तुम्हारे अपने खाने का इंतजाम तो जैसे-तैसे होता है अब इस चमगादड़ से जान कैसे छुडाओगे | खैर उस गले पड़ी बला को दोपहर का लंच भी बाकायदा करवाना ही पड़ा | उसी दिन मुझे आफिस के जरूरी काम से दिल्ली जाना पड़ा जोकि मेरे लिए दोगुनी खुशी का कारण था | पहला दिल्ली  में अपने परिवार से मिलने का मौक़ा और दूसरा इस चिपकू बला से  फिलहाल के लिए ही सही पर छुटकारा |
दिल्ली में मेरे पांच दिन कैसे फुर्र से निकल गए पता ही नहीं चला | वापिस राजबन आया तो बंगले के मेन गेट पर पहुँचते ही एक जबरदस्त जोर का झटका धीरे से लगा | वह छोटा सा पिल्ला अभी भी बरामदे में बाकायदा धरना देकर बैठा था | मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि धरना देने की कला इसने धरना कुमार मुख्यमंत्री  से सीखी या  उन्होंने  स्वयं इसे गुरु माना | मेरे सोचने-समझने की क्षमता लगभग समाप्त हो चली थी | पता नहीं इतने दिन उसने क्या खाया, कैसे रहा | पर एक बात मेरा अन्तर्मन साफ़ इशारा कर रहा था कि यह गले पडी बला अब आसानी से पीछा कतई नहीं छोड़ने वाली | अभी घर में अन्दर घुसा ही था कि पीछे-पीछे  गेस्ट हाउस अटेंडेंट रणदीप भी आ गया | दिल्ली जाने से पहले मैं उसे सुरक्षा की दृष्टि से ताकीद कर गया था कि बीच –बीच में  घर पर नज़र रखना | आते ही उसने दो बातें बताईं | पहली कि मेरे पीछे इस बिन बुलाए धरना-सम्राट को खाना वह ही खिला देता था | और दूसरी बात यह कि यह खिलौना मेहमान पिल्ला  नहीं वरन पिल्लिया थी | खैर मेरे लिए इस सब से कोई अंतर नहीं पड़ रहा था क्योंकि अब तक उसे टालने के - आलतू जलालतू आई बला को टाल तू- जैसे मेरे अभी तक के सभी  मन्त्र बेकार साबित हो रहे थे | खोपड़ी की ट्यूब लाईट रह-रह कर कौंध कर यही सन्देश दे रही थी कि पंडित जी अब तुम्हारी इज्ज़त अपनी हार स्वीकार कर लेने में ही है | यह अनारकली तो बाकायदा मुगले आज़म को ही  गाना गा कर चुनौती ही दे रही है – उनकी तम्मना दिल में रहेगी, शमा इसी महफ़िल में रहेगी | उसी क्षण मन बना लिया कि यह मुसीबत तो गले पड़ ही चुकी है, अब चाहे हँस कर निभाओ या रो कर झेलो |  मेरा दिल भी मुझे समझा रहा था कि खुशी-खुशी हँसना ही सबके लिए बेहतर है जिसे मैंने तुरंत स्वीकार भी कर लिया | अब अगले ही पल वह मासूम जान  मेरे लिए वह कोई आफत, मुसीबत या बला नहीं रह गई थी बल्कि उसमें मुझे दिख रहा था एक नन्हा सा खिलौना|
अब मेरा सबसे पहला काम था इस खिलौने का नामकरण और झटपट सोच कर नाम भी रख दिया – केरी | दूसरा काम उसको स्पंज बाथ  करा के साफ़ सुथरा करना और बाहर बरामदे में ही उसके लिए पुरानी चादर और पर्दे से एक बिस्तर तैयार करके बिछाना | केरी चुपचाप एक मशीनी चाबी के टेडी बीयर की तरह से जाकर अपने बिस्तर पर अपने शरीर को गोलाकार बनाते हुए सिकुड़ कर बैठ तो गई पर ठण्ड से बुरी तरह से कांप भी रही थी | मैं भी आखिर क्या करता.... दिल ही तो था.... पसीज गया | उठाकर अपने कमरे में ही ले आया और हीटर के पास ही केरी का बोरिया बिस्तर जमा दिया |  यह थी अब तक की यात्रा केरी की जो शुरू हुई शोपिंग सेंटर से और सड़क से होते हुए मेरे घर के बरामदे और बरामदे से आखिर घर के कमरे तक फिलहाल पहुँच चुकी थी |

केरी के आने के बाद मेरी जिन्दगी की नीरसता काफी हद तक दूर होने लगी | दिनचर्या में भी काफी फर्क आया | पहले देर शाम तक दफ्तर में बैठा रहता था कि घर पहुँच कर भी क्या करना है, पर अब महसूस होता कि घर पर भी कोई इंतज़ार कर रहा है | सुबह दफ्तर जाने के समय केरी का बिस्तर बाहर बरामदे में लगा देता | वहीं पर उसके खाने-पीने के बर्तन भी रहते | कोठी का कम्पाउंड ख़ासा लंबा-चौड़ा था जिसमें हरी-भरी घास का लान और बगीचा भी था | केरी को भी यह उन्मुक्त वातावरण पूरी तरह से पसंद आ गया था | दोपहर को लंच टाइम में कोठी के बरामदे में  बैठी मिलती और मुझे देखते ही दूर से ही अपने छोटे-छोटे कदमों से हिरन की तरह से कुलांचे मारते मेन गेट पर ही मेरे पांवों से लपक कर चिपट जाती | दफ्तर की सारी परेशानियाँ और उलझनें उसके एक  स्पर्श मात्र से छू- मंतर हो जातीं | मेरे से पूरी तरह से घुल-मिल गई थी केरी | जो नाश्ता, लंच, डिनर  मैं खाता वही राशन-पानी केरी का रहता |
 
केरी 
घर का अच्छा खाना खाते-पीते केरी की सेहत भी अब धीरे-धीरे सुधरने लगी | शरारतें और दबंगपने की हरकतों में भी इजाफा हो रहा था | डर किस चिड़िया का नाम है उसे पता ही नहीं था | घर के बगीचे में कई फलदार पेड़ भी थे जिन पर उत्पाती बन्दर सेना का उत्पात होता रहता था पर केरी ने अब उन बंदरों से बाकायदा दमदार टक्कर लेनी शुरू कर दी | नतीजा यह होता कि मेरे घर से केरी द्वारा भगाए गए खिसियाए बन्दर पड़ोसी  ए.के गुप्ता जी की कोठी के आम के पेड़ों पर अपनी झुंझलाहट निकालते | बन्दर तो बन्दर, कॉलोनी, फेक्ट्री और दफ़्तर के भी किसी आदमी की क्या मजाल जो कोठी के कम्पाउंड में कदम रख दे | लोग-बाग़ मेरे घर में घुसने से पहले बाहर मेन गेट से ही   मोबाइल से फोन कर के कहते कि कौशिक जी आप से मिलने आये हैं पर पहले अपने शेर को बाँध लीजिए | एक तरह से देखा जाए तो वह मेरी पर्सनल सुरक्षा अधिकारी थी जिसके रहते घर में कोई भी आलतू-फालतू बन्दा घुस ही नहीं सकता था |  राजबन की सल्तनत में  यह था दबदबा केरी का | पर साथ ही साथ उसमें इतना अनुशासन भी था कि जब तक उसे खाने का आदेश न दिया जाए तब तक खाने के बर्तन को छूती तक नहीं थी |                                 
केरी की बदोलत मेरा समय बहुत ही मज़े में गुज़र रहा था | रविवार का दिन घर और कपडे-लत्तों की सफाई का होता, तो उसी दिन केरी की भी धुलाई-पुछाई यानी स्नान-ध्यान होता जो कि अपने आप में बड़ी कवायद होती क्योंकि पानी और केरी के बीच वैसा ही रिश्ता था जैसा आज के दिन में मोदी जी और राहुल जी के बीच है | नहलाने के चक्कर में केरी से ज्यादा मेरी खुद की धुलाई हो जाती थी |
हर-हर गंगे 

इसी बीच एक ओर घटनाक्रम के तहत हुआ कुछ यूँ कि हमारे शहजादे सलीम को भी नोएडा में कुत्ता पालने का शौक चर्राया | अब वही बात हो गयी कि बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्ला | उन्होंने एक प्यारा सा पिल्ला पाल तो लिया पर उसकी जिम्मेदारी ढंग से संभाल नहीं सके | सो उन हालातों में यही ठीक समझा गया कि उस फ़ौजी नंबर दो पिल्ले  को भी मेरे पास ही राजबन के वनवास पर भेज दिया जाए | अब तक हम भी पूरी तरह से राजबन के वनों के जीव-जंतुओं के आदी हो चुके थे सो यही सोच कर दिल को समझा लिया कि चलो जहां एक पल रहा है , दूसरा भी सही | इस दूसरे शैतान पिल्ले का नाम था – चम्पू |
मैं हूँ चम्पू 

यह भी चम्पू भी अपने आप में एक अलग ही नमूना था| अब उस बड़े से घर की जनसंख्या के हिसाब से बन्दा एक और कुत्ते दो | अब केरी को चम्पू का साथ क्या मिला, बस यह समझ लीजिए कि दोनों ने मिलकर शरारतों और दादागिरी की एक नई ही मिसाल पूरी कॉलोनी में पेश कर दी |
जोड़ी - टेढ़ी  दुम केरी और  सीधी दुम चम्पू 
मस्ती की दोस्ती केरी -चम्पू 
आगे तुम पीछे हम :केरी - चम्पू  

दांत काटी दोस्ती 

रणदीप , केरी और चम्पू 



सब की गुज़र-बसर राम जी की  कृपा से ठीक हो रही थी | रोज की तरह से अपने दफ्तर में बैठा काम काज निबटा रहा था | अचानक चपरासी ने आकर एक बंद लिफाफा हाथ में थमाया | लिफ़ाफ़े के ऊपर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था 
          CONFIDENTIAL ( गोपनीय)

यह जानने के लिए कि देखें इसमें से क्या सांप-बिच्छू निकलते हैं, धड़कते दिल और कांपते हाथों से उस लिफ़ाफ़े को खोला | अन्दर से सांप-बिच्छू तो नहीं निकले  पर जो निकला वह किसी बम से कम भी नहीं था |  वह मेरा ट्रांसफर आर्डर था – दिल्ली के लिए |मेरे दिमाग में पहला ख्याल आया अब दिल्ली जैसे शहर जाने से पहले केरी और चम्पू का क्या करूँ | इसी सवाल के जवाब खोजने की उधेड़बुन में मेरा दिमाग मानों एक शून्य में खोता जा रहा था |

बाद में क्या हुआ केरी और चम्पू का ...... जानने के लिए करिए इंतजार बस कुछ दिन बाद आने वाली इसी किस्से के शेष भाग का ......⏳

Thursday, 1 November 2018

सिरमौर : राजा का बन और उजाड़ नगरी


गिरी नदी और पर्वतों के बीच आज का सिरमौर  गाँव 

हिमाचल प्रदेश में एक जिला है सिरमौर जहाँ पर पावंटा साहिब नाम का सिक्खों का प्रमुख धार्मिक स्थल है | यहीं से लगभग 12 कि.मी. दूर राजबन स्थित है | यहाँ पर भारत सरकार की एक सीमेंट फेक्ट्री है और रक्षा मंत्रालय के अधीन डी.आर.डी.ओ. का अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण संस्थान भी है | राजबन का नाम  जितना सुन्दर है उससे अधिक सुन्दर यह जगह है|  मन को खुश करने को आपको जो भी चाहिए सब कुछ यहाँ है – घना जंगल, पर्वत, गिरी नदी, प्रदूषण रहित स्वच्छ, शांत वातावरण, सुहावना मौसम और सबसे बढ़कर प्यारे सीधे-सादे इंसान, कहाँ तक इसकी तारीफ़ गिनवाऊं | बस कुछ यूँ समझ लीजिए कि यहाँ पहुँच कर आपको लगेगा कि यदि देवलोक कहीं है तो यहीं है | ऊँचें-ऊँचे साल के वृक्ष जिनसे गर्मियों के मौसम में गिरते हुए पराग-कणों की भीनी-भीनी सुगंध पूरे वातावरण को आलोकिक छटा में रंग देती है | कैसी विडम्बना है कि जब यहाँ दिल्ली में  खुद इंसान के पैदा किए दमघोंटू, धूल-धक्कड़ और धुएं से भरे वातावरण में सांस लेने की मजबूरी है, ईश्वर ने  यहाँ अपनी स्नेहिल गोद में हमें सब कुछ स्वच्छ, निर्मल और साफ़-सुथरा दिया है| दिल्ली में यमुना इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसे देखने की भी जरूरत नहीं है | जब चार्टेड बस से आफिस जाता था तो ऊँघते हुए, बंद आँखों से भी बदबू का भभका आने पर पता लग जाता था कि यमुना के कालिंदी कुंज के पुल के ऊपर से जा रहा हूँ | यही पवित्र यमुना नदी  पांवटा साहिब में इतनी निर्मल है कि तलहटी के पत्थर तक साफ़ नज़र आते हैं |
  
आप पूछ सकते हैं इस जगह का नाम राजबन क्यों है ? राजबन का अर्थ है राजा का वन यानि राजा का  जंगल | अब यह इस जंगल में राजा कहाँ से आ गया यह जानने के लिए आप को राजबन से और आगे सड़क के रास्ते ऊपर  लगभग 4 कि.मी. चलना पड़ेगा | नीचे पर्वतों के बीच  खाई में एक छोटा सा  गाँव बसा है जिसका नाम है सिरमौर, जिसके पीछे गिरी नदी बह रही है  | वही सिरमौर जिसके नाम पर इस पूरे जिले का नाम पड़ा है | ज्यादातर मामलों मे जिले के मुख्यालय के नाम पर ही जिले का नाम पड़ता है पर यहाँ की बात ही निराली है | इस जिले का मुख्यालय  है नाहन नाम के शहर में पर यह जिला सिरमौर के नाम से जाना जाता है | सिरमौर पर राजपूत वंश के शासकों ने शासन किया था| सिरमौर भारत में एक स्वतंत्र साम्राज्य था, जिसकी स्थापना जैसलमेर के राजा रसलु ने लगभग वर्ष 1090 में की थी |  इनके एक पुरखे का नाम सिरमौर था जिसके नाम पर इन्होंने अपने राज्य को सिरमौर का  नाम दिया गया था। बाद में अपने मुख्य शहर नाहन के नाम पर ही  राज्य को भी  नाहन  के नाम से ही  जाना जाता रहा ।
कहा जाता है कि सबसे पहले सिरमौर के राजा का महल उसी जगह पर था जहां आज यह सिरमौर नाम का गाँव है |  दूसरे की सुनी-सुनाई बात पर क्या जाना, हाँ इतना जरूर है कि लगभग 40 साल पहले, जब मेरी पहली पोस्टिंग राजबन सीमेंट फेक्ट्री में हुई थी तब एक दिन घूमते-घूमते सिरमौर गाँव तक गया था और वहाँ पर उस पुराने महल के खंडहर मैंने स्वयं देखे थे | समय की मार के साथ उन खंडहरों का भी अब नामों-निशान मिट चुका है | उन खंडहरों के पत्थरों तक को गाँव के लोगों ने अपने मकान बनाने में लगा दिया | हाँ अगर किसी धरोहर को उनकी छूने की हिम्मत नहीं हुई तो वह थी  प्राचीन शिव मंदिर और गुफ़ा वाला मंदिर,  जो कि अभी भी सुरक्षित है | मेरे  पुराने मित्र श्री मुन्ना राम ने,  जो सिरमौर गाँव के ही निवासी हैं, उस जगह के कुछ फोटो  उपलब्ध कराये  हैं |


श्री मुन्नाराम

गुफ़ा मंदिर 


प्राचीन गुफा वाला मंदिर 




महल की प्राचीन मूर्तियों के अवशेष ( मंदिर के सभी फोटो श्री मुन्ना राम के सौजन्य से प्राप्त हुए )
उस भव्य महल के नष्ट होने की भी अपनी ही एक कहानी है जिससे लगभग हर सिरमौर वासी वाकिफ़ है | कहा जाता है कि राजा ने  नदी के आर-पार पर्वत की चोटियों पर रस्सी बंधवाई और एक नटनी को चुनौती दी कि अगर तुम इस रस्सी पर चलकर नदी पार करलो तो आधा राज्य ईनाम में दे दिया जाएगा | चुनौती स्वीकार करके नटनी ने रस्सी पर चलना शुरू किया और जब आधा रास्ता पूरा करके नदी के बीचों-बीच पहुँची तो आधा राज्य गवाँ देने के डर से राजा की नीयत में खोट आ गया और उसने रस्सी कटवा दी | नटनी ऊँचाई से गिरकर मर गई पर मरने से पहले राजा को श्राप दे गई कि तुम्हारा यह सारा राज-पाट नष्ट हो जाएगा | होनी की करनी भी कुछ ऐसी ही हुई कि बाद में वह महल भी किसी प्राकृतिक आपदा कारणवश मिट्टी में मिल गया |  यहाँ का राजवंश लगता है बाद में नाहन जाकर बस गया  |
मेरे पिता, जोकि एक प्रख्यात कवि थे,  अक्सर मेरे पास राजबन भी आया करते थे | उन दिनों के दौरान उन्हें  एक बार सिरमौर के खंडहर  दिखाने ले गया |  खंडहरों को देखकर उनके कवि मानस-पटल से एक कविता ने जन्म लिया जिसमें राजा और नटनी की कहानी को एक नया ही आयाम मिला | आप भी आनंद लीजिए उस कविता का :    
    

कवि  स्व० श्री रमेश कौशिक 
राजा और नटनी


नटनी को
वचन दिया राजा ने 

यदि कच्चे धागे पर चलकर
कर लेगी नदी पार
और वापस चली आएगी
तो आधा राजपाट उसका पाएगी |

नटनी ने विश्वास किया
राजा का 

आखिरकार प्रजा थी उसकी
कच्चे धागे पर चलकर
जब नदी पार कर ली उसने
और लगी वापस आने
तब राजा ने
आधा राजपाट देने के डर से
बीच धार कटवाया धागा |

गिरी नदी में नटनी
मर कर दूर बह गई
तब से नाम नदी का पड़ गया ‘गिरी’
विशवासघात के कारण
राजा का सिरमौर राज्य हो गया नष्ट |

अब आप कहेंगें
राजा बहुत बुरा था
नटनी से छलघात किया था
लेकिन वह भी तो मूरख थी
क्यों विश्वास किया राजा का |

राज अगर मिल भी जाता
तो भी क्या करती –
नाचा करती |
क्या करती .... बस नाचा करती 😄


लगभग चालीस वर्ष पहले लिखी यह कविता आज के राजनीतिक सन्दर्भ में भी सन्देश दे रही है कि अयोग्य व्यक्ति के हाथ में सत्ता आना कितना हानिकारक हो सकता है | 

Saturday, 1 September 2018

भगवान की महिमा


तो जनाब , अगर आप के  ज़हन में 'किस्साए कोल पत्तर 'है , जिसमें चरखी दादरी के गेस्ट हाउस कीपर का अफ़साना था , तो उससे एक बात तो क़तई साफ़ हो जाती है कि भाई दुनिया में सब से पंगा ले लेना ( चाहे जोरू का भाई ही क्यों ना हो) पर ग़लती से भी रसोईये से मत उलझ जाना वरना आपके फ़रिश्तों को भी पता नहीं चल पाएगा कि आपके साथ हुआ क्या । हाँ ये बात अलग है कि दुनिया में ज़रूर आपके क़िस्से मशहूर हो जाएँगे । इस बार की ख़ास हस्ती जिनसे आपको मिलाने जा रहा हूँ वो जनाब राजबन ( हिमाचल प्रदेश ) सी सी आई के गेस्ट हाउस में काम करते थे । अगर मेरा अनुमान सही है तो अबतक तो शायद रिटायर भी हो चुके होंगे । नाम उनका भगवान सिंह ,हिमाचल के ही मूल निवासी , स्वभाव से फ़क्कड़ । गेस्ट हाउस में आने जाने वाले हर शक्स की सेवा में कोई कोर कसर नहीं रखते । ता उम्र गेस्ट हाउस से ही जुड़ें रहे ।
अब  सीधा-साधा पहाड़ी बंदा, और उन दिनों (सन 1980में )उम्र रही होगी यही कोई 24 -25 साल के आस-पास की । नाम से भगवान , पर तभी तक जब तक सुरा अपना असर ना दिखा दे । सो एक बार हुआ कुछ यूँ कि गेस्ट हाउस में किसी गेस्ट का पदार्पण हुआ । पदार्पण इसलिए कि सामान्य लोगों का तो आगमन होता है पर ख़ास लोगों का पदार्पण । अब बंदा ख़ास है तो उसकी हर बात भी ख़ास ही होगी । सो उन्होंने आने के साथ ही भगवान सिंह को हिदायतें जारी कर दीं - नाश्ते से लेकर रात के डिनर तक की  या कह लीजिए सुबह के आमलेट से लेकर फूले हुए फुल्के तक के बारे में । कहते हैं बात से ज़्यादा बात कहने का ढंग असर करता है । असर तो यहाँ भी हुआ पर कुछ उलटा ही । शायद इसलिए कि जिस समय हिदायतों की कक्षा चल रही थी , हमारे भगवान  का सुर शायद सुरा - प्रभाव से बेसुरा होने की कगार पर था । बोले तो कुछ नहीं, सबकुछ सुनकर चुपचाप अपने रसोई रूपी रणक्षेत्र में चले  गए । लगा बात आई गयी हो गई ।
कुछ दिन शांति से ऐसे ही बीते , लगा सब कुछ ठीक चल रहा है , पर मुझे यह नहीं पता था कि यह तो तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी है । एक दिन अचानक किसी कार्यवश किचिन में जाना पड़ गया । शादी ब्याह तब तक अपना हुआ नहीं था इसलिए खाने पीने के लिए  कम्पनी का गेस्ट हाउस ज़िंदाबाद । हाँ तो किचन में घुसते ही क्या देखा कि मेरी उपस्थिति से क़तई अनजान ,हमारे अन्नदाता भगवान सिंह जी सर झुकाए नाश्ते की तैयारी में मशगूल हैं ।  लेकिन यह क्या ...... आमलेट के लिए जो अंडा फेंटा जा रहा था उसमें से पीला योक तो सीधा उनके पेट के हवाले हो रहा था , और अंडे की सफ़ेद ज़र्दी में हल्दी डालकर क्या चम्मच से ज़बरदस्त फेंटाई करी । हद तो तब हो गई जब किचिन में साहब के लिए फुल्के (रोटी) फूलते हुए देखी । हमारे भगवान महाराज बड़े प्रेम से रोटी का कोना काट कर , उस कटे हुए कोने को शंख की तरह से मुँह से लगाकर ग़ुब्बारे कीं तरह से हवा भरकर रोटी को फुल्के के अवतार में बदल रहे थे ।
अब इसे हाथों का हुनर कहिए या चटोरी जीभ का कमाल, अंदर डाइनिंग हाल में साहब बहादुर यही हल्दी आमलेट, फुल्के के साथ  सपड़-सपड़ जीम रहे थे और अंग्रेज़ी में कहते जा रहे थे : भगवान सिंह ! वेरी गुड, वेरी गुड । बाई गॉड की क़सम, उस वक़्त का भगवान सिंह के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान के साथ छाया आत्मसंतोष का भाव आज तक मुझे याद है ।

Friday, 31 August 2018

कहानी कम्बल के दंगल की


एक बार तो शायद आपको भी लगा होगा की कहीं नज़रों का धोखा तो नहीं है , जी नहीं आपने बिलकुल सही पढ़ा है । आपने चम्बल की कहानियाँ तो बहुत पढ़ी होंगी पर इस बार लगे हाथों एक क़िस्सा कम्बल का भी सुन ही लीजिए ।
कभी आपने सोचा है क़िस में गरमी ज़्यादा है , आदमी में या कुर्सी में ? कहने को तो बड़े बूढ़े कह गए हैं कि आदमी माटी का पुतला है , पर  इस दिल का क्या करें जो  कम्बख़्त मानता ही नहीं वरना किसी शायर को यह क्यूँ कहना पड़ता :
हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं ।



अब और कुछ हो या ना हो पर इतना ज़रूर है कि ये ज़मीं के ख़ुदा या फ़रिश्ते और किसी काम के हों या ना हों पर अपने पीछे ऐसे अनगिनत सिरफिरे क़िस्सों और कारनामों की एक ऐसी लम्बी फ़ेहरिस्त छोड़ जाते है जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ तक चटकारे ले लेकर खाना हज़म करतीं हैं । तो भाई मेरे , इस बार भी बात घूम फिर कर गेस्टहाउस पर ही आकर टिक जाती है । कारण साफ़ है , अगर आप को किसी तथाकथित  'महापुरुष' का असली रूप देखना है तो ऐसी जगह पकड़िए जहाँ वो जनसामान्य की पहुँच से दूर हों और इस मामले में गेस्ट हाउस से बढ़ कर और कौन सी जगह हो सकती है । बात जब भी हँसी - ठिठोली की होती तो दबी ज़ुबान यार लोग कहने में गुरेज़ नहीं करते कि घर पर साहब लोग बेशक फटी लुँगी में घूमते हों पर सरकारी आतिथ्य पर आते ही साहब बहादुर को शहंशाह के गिरगिटी रूप में आने में देर नहीं लगती । भरी मीटिंगों में शोर -शराबे  और हंगामे की वजह काम काज की शिथिलता से कहीं अधिक होती थी - चाय ठंडी क्यों है, ज़्यादा गरम क्यों है, स्ट्रॉंग क्यों है । अब फ़ेक्ट्री की परफ़ोरमेंस गई तेल लेने ,  बताइए महामहिम को उनकी चाय इतनी स्ट्रोंग क्यों ? अब क्या बताएँ मुगलेआज़म को कि हुज़ूर आप होटल में नहीं , हिमाचल प्रदेश के दूरदराज़ के जंगल में स्थित छोटी सी फ़ेक्ट्री के पिद्दी से गेस्ट हाउस के तख़्ते ताउस पर विराजमान हैं । अब मज़े की बात लगे यह कि जब क़भी शहंशाह के दिल्ली दरबार में उनके व्यक्तिगत आतिथ्य में जो चाय नसीब होती थी ( जिसे वो  अंजीर और अखरोट के साथ सड़ाप से पूरे मज़े से गटक जाते थे)ऐसी चाय अगर हमारी फ़ेक्ट्री में पेश कर दी जाती तो बंदा तो  क्या चीज़ है, बंदा और बंदे का जीएम दोनों ही आसाम के चाय बाग़ानों में कमर पर टोकरी लटकाए चाय की ताज़ी पत्तियाँ बीनते नज़र आते।




चलिए अब मुद्दे की बात पर आता हूँ क्योंकि अब  आप भी कह रहे होंगे कि पंडित जी बहुत हो गया , ये कम्बल के क़िस्से में चाय का अफ़साना कहाँ से उठा लाए । तो हुआ कुछ यूँ  कि  वाक़या रहा होगा यही कोई दिसम्बर 2014 का । दिल्ली मुख्यालय से  उपमहामहिम का राजबन फ़ेक्ट्री का दौरा हुआ । सारे दिन भर सल्तनत में उठा पटक और गहमागहमी चलती रही । उन दिनों मैं वहाँ के  कार्मिक  और प्रशासन विभाग को देख रहा था सो  सीधी सी बात है बम का गोला यानी गेस्ट हाउस की भी ज़िम्मेदारी थी । गेस्ट हाउस को बम का गोला इसलिए कह रहा हूँ कि जब तक आपकी जन्मकुंडली में ग्रह नक्षत्र सही दिशा में हैं , तब तक आप मंगल आपके लिए मंगलमय है , पर ग़लती से भी अगर शनि की कुदृष्टि पड़ गई तो राम क़सम थानेदार से हवलदार बनने में गिनती के मिनट दो लगेंगे ।

सो हमारा तो उस दिन का मुंगेरी लाल का हसीन ख़्वाब यही था कि सब कुछ ठीक रहे और डिनर करके शेरे बब्बर अपनी मांद में प्रस्थान करें । सब कुछ भली प्रकार चलता रहा और डिनर करके श्रीमान अपने कमरे में सोने चले भी गए । साहब  को गुड नाइट बोलते हुए हमारे दिमाग़ के किसी कोने से आवाज़ आई चलो मन की मुरादऔर आज की दिहाड़ी तो पूरी हुई ।  मैं वापिस जाने को मुड़ा ही था कि कमरे का दरवाज़ा फिर से खुला और साहब बहादुर ने अंदर आने का इशारा किया । धड़कते दिल से मैंने सोचा अब क्या आफ़त आई। एक तरह से आफ़त ही थी क्योंकि हुकुमनामा जारी किया जा रहा था -  Kaushik ! I Want brand new blanket , absolutely unused. अब अपलोग उस वक़्त शेर की मांद में  मुझ ग़रीब मेमने  की हालत समझ सकते हैं । रात के साढ़े ग्यारह बजे, उस जंगल में इस विविध भारती के पंचरंगी कार्यक्रम की ये अजीबोग़रीब सिरफ़िरी फ़रमाइश कैसे और कहाँ से पूरी करूँ । फ़रमाइश एक तरह से अटपटी इसलिए भी थी क्योंकि उनके कमरे का कम्बल भी दो चार दिन पहले ही ख़रीदा गया था। पर यहाँ तो सवाल था ऐसे कम्बल का जो नवजात (nascent) हो , जिसमें से गर्मागर्म भाप उठ रही हो गोया कि कम्बल ना हुआ भैंस का ताज़ा ताज़ा दूध हो गया । पर फिर वही बात , अब उन्हें समझाए तो समझाए कौन , और सच कहूँ तो थानेदार से हवलदार बनने का शौक़ मुझे भी नहीं था । करता क्या , चुपचाप बाहर आकर लाबी में लगे सोफ़े पर बैठकर अपने सारे इष्ट देवों को याद करके प्रार्थना करने लगा कि हे भगवान , क्या कलयुग में अलादीन के जिन्न का अवतार नहीं हो सकता । भगवान का तो पता नहीं पर शाहरुख़ खान का एक डायलाग़ याद आ गया : अगर किसी चीज़ को शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे पूरी करने में लग जाती है । 
गेस्ट हाउस अटेंडेंट जो आस पास ही मंडरा रहा था , मुझे परेशान देखकर कारण पूछा । वजह जानकर चुपचाप चला गया पर पाँच मिनट बाद ही वापिस लौटा । इस बार उसके होठों पर मीठी मुस्कान थी और हाथ में बाक़ायदा एक नयी नकोर पेकिंग में चमकता दमकता कम्बल था । एक बारगी तो आँखों को विश्वास नहीं हुआ , होले  से पूछा - कहाँ से लाए ये चमत्कार । एक भोली सी पहाड़ी मुस्कराहट बिखेरते हुए बोला - सर दिवाली पर जो कम्बल  मुझे गिफ़्ट में सीसीआई से मिला वही है । अभी तक बक्से में बंद पड़ा था घर से निकाल कर लाया हूँ । सच मानिए उस भाई की बात सुनकर दिल में जो भाव आए , आजतक उनके लिए उचित शब्द नहीं मिले । कुल मिलाकर कुछ ऐसा ही लगा होगा राम जी को जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आए होंगे। हँसने की बात नहीं है पर यह सच है उस वक़्त वो कम्बल मेरे लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं था ।
अब आइये इस फ़िल्म के क़्लाएमेक्स सीन पर - हमारे मुगले आज़म तो अब तक हमें टेंशन देकर आराम से सोने की पूरी तैयारी में लगभग चले ही गए थे । सच्चाई से शायद वो भी वाक़िफ़ रहे होंगे , सोचा होगा सोने में ही भलाई है क्योंकि अब आधी रात को तो जंगल में भेड़ भी नहीं मिलेंगी जिनके ऊन से शायद नया कम्बल बुना जाएगा । पर यहाँ तो वर्दी से फ़ीत उतरने का ख़तरा था सो राम का नाम लेकर बजा दी डोरबेल । आँख मिचमिचाते हुए ज़िल्ले इलाही ने एक नज़र हम को देखा, फिर देखा  अटेंडेंट के हाथ में 'नवजात कम्बल ' फिर जैसे विश्वास न हुआ हो सो करने लगे कम्बल का उसके पेकेट समेत सूक्ष्म निरीक्षण । संतुष्ट होने पर आख़िरी गोली दाग़ी - इस वक़्त इसे लाए कहाँ से ? एक बारगी तो दिल ने कहा सच बयाँ कर दूँ पर तभी दिमाग़ ने कहा तुम्हारा सच इन लोगों को हज़म नहीं हो पाएगा क्योंकि सवाल हाकिम की मूँछ और पूँछ दोनों का है । एक अदने से मुलाजिम के घर से लाए कम्बल में, बेशक वह नया ही क्यों न हो , हाकिम को नींद कैसे आ सकती है ।
श्रीमान के प्रश्न के जवाब को एक मीठी नम्र मुस्कराहट के साथ टालते हुए गुड़नाइट कहकर चुपचाप खिसकने में ही मुझे भलाई लगी।




भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...