Tuesday, 30 April 2019

शिंकजी वाले सरदार जी

मैं भी कई बार सोचता हूँ कि आप तक पहुंचाने के लिए नए –नए किस्से कहाँ से लाऊं | इसीलिए अक्सर अपने सभी परिचितों को कहता रहता हूँ कि आप लोग भी कुछ आगे बढिए , कुछ अपनी भी कहिये, कुछ अपनी भी सुनाइये | अपने किस्सों को भी इस ब्लॉग की दुनिया का हिस्सा बनाइये | इस बार का किस्सा आप सब के लिए खोज कर लायें हैं तीन दोस्तों की तिगडी – प्रियंक , अतुल और अभिषेक जिन्होंने अपनी हाल में ही अपनी हिमाचल प्रदेश की सैर सपाटे के दौरान एक बड़ी मनोरंजक हस्ती के बारे में मुझे बताया | आपकी याददास्त के लिए बता दूँ कि यह वही तिकड़ी उसी घुमक्कड़ मस्त्त टीम का हिस्सा है जो कभी हिमाचल प्रदेश के सत्तरह हज्जार फीट के ऊँचें बियाबान बर्फीले इलाके में बुरी तरह से फंस गए थे और आर्मी के सहायता दल ने इनकी जान बचाई थी | इनका मजेदार किस्सा ब्लॉग के "सफ़रनामा:  बुरे फँसे" लिंक पर मौजूद है | 
प्रियंक
अतुल


अभिषेक

इस बार ये दोस्त गए थे तीर्थन( यह जगह का नाम है, इसे आप तीर्थ यात्रा मत समझ लेना ) जो कि हिमाचल प्रदेश के मशहूर हिल स्टेशन कुल्लू के पास है | बहुत ही सुन्दर जगह है और यहाँ के मौसम का तो कहना ही क्या | बस यह समझ लीजिए कि धरती पर मानो स्वर्ग है | पर इस बार बात उस हिल स्टेशन और हिमाचल के स्वर्ग की नहीं हो रही है | इस बार का किस्सा है एक सरदार जी का , जो बताने का कम और देखने की चीज़ ज्यादा है | 

तो हुआ कुछ यूँ कि जब कुछ दिनों की छुट्टियां पहाड़ पर बिताने के बाद घर की ओर वापसी की यात्रा पर थे | कार पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर सरपट दौड़ रही थी | आखिरकार ऊँचा-नीचा पहाड़ी रास्ता पूरा हुआ और तलहटी का समतल सफ़र शुरू हुआ | अब हम कीरतपुर साहिब के पास से गुज़र रहे थे | अचानक देखा सड़क के किनारे कुछ भीड़ सी लगी हुई थी | बड़े-बूढ़े कह गए थे कि पैसा पैसे को खींचता है, पर हमारा मानना है कि इस देश में भीड़ भी भीड़ को खींचती है | यकीन न हो तो सड़क के किनारे डुगडुगी बजा कर बन्दर नचाना शुरू कर दीजिए | फिर देखिए कैसे थोड़ी सी ही देर में पूरा मज़मा लग जाएगा | वजह साफ़ है, हमारे यहाँ कहने को तो हर चीज़ की कमीं है , अगर कोई चीज़ बहुतायत में है तो वह है समय | सो हम भी गाड़ी सड़क किनारे खडी कर शामिल हो गए उसी भीड़ का हिस्सा बन कर | दरअसल वहां एक छोटा सा रेहड़ी नुमा खोखा लगा था जिस में एक सरदार जी बड़ी ही मस्ती से शिंकजी बना कर लोगों को पिला रहे थे | सरदार जी की शिकंजी बनाने की अदा ही इतनी जबरदस्त थी कि जिसे देखकर रजनीकांत और सलमान खान का स्टाइल भी फीका पड़ जाए | किसी ने सच ही कहा है , दुनिया में कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता | आपके उस काम करने की महारत ही आपको सब लोगों की भीड़ से अलग करती है और पहुंचा देती है कामयाबी के ऊँचें मुकाम पर जहां यह शिंकजी वाले सरदार जी भी बहुत जल्द पहुँचने वाले हैं | 

( वीडिओ क्लिप श्री प्रियंक के सौजन्य से )
इन शिकंजी वाले सरदार जी ने कुछ साल पहले ही यह काम बड़े छोटे पैमाने पर एक रेहड़ी लगा कर शुरू किया था | काम के प्रति इनकी लगन और एक अनोखा स्टाइल इन्हें धीरे-धीरे  मशहूर करता चला गया | आज लोगों को हँसते -हँसाते लेमन- सोड़ा  पिला कर इज्ज़त से अपना छोटा सा परिवार जिसमें अपने बूढ़े  माँ -बाप, पत्नी और बच्चे  को पाल-पोस रहें हैं |
अंत में यही कहूँगा - जब भी कभी कुल्लू, मनाली की और जाते हुए कीरतपुर साहब की तरफ से गुजरें , उन सरदार जी का  लेमन सोड़ा जरूर पीयें और जब पी कर  डकार आये तब जोर से बोलिएगा ठण्ड पा | 

Tuesday, 23 April 2019

अजब तेरी दुनिया - अजब तेरे खेल

मनसा देवी मंदिर - हरिद्वार 
सच मानिए ,यह ज़िंदगी और यह दुनिया इतने चमत्कारों से भरी हुई है कि आप गिनते-गिनते थक जायेंगे पर उस ऊपर वाले की जादूगरी ख़त्म होने का नाम नहीं लेगी | कई ऐसी-ऐसी घटनाएं इस जीवन में हो जाती हैं जो समय के साथ भी कभी भी धुंधली नहीं पड़ती | आप उन चमत्कारी घटनाओं को सारी जिन्दगी बस सोचते ही रह जाते हैं कि ऐसा कैसे हो गया | आप हमेशा के लिए अपनी खोपड़ी खुजाते रह जाते हैं पर यह जटिल पहेली अनसुलझी ही रह जाती है| आज ऐसी ही एक अजीबोगरीब घटना से आपका परिचय कराने जा रहा हूँ जिसे सुनकर आप भी एक बार उस ईश्वरीय शक्ति के बारे में सोचने को मजबूर हो जायेंगे | 

तो यह बात है आज से लगभग बीस-बाईस साल पुरानी | उन दिनों मेरी तैनाती हिमाचल प्रदेश में थी | हरिद्वार वहां से लगभग 2 घंटे की दूरी पर था | अक्सर छुट्टी के दिनों में परिवार सहित गंगा स्नान का कार्यक्रम बन जाता | बच्चे तब छोटे ही थे | रविवार का दिन था, हरिद्वार में मनसा देवी के दर्शन करने पहुँच गए | मेरे परिवार के साथ , एक घनिष्ट मित्र का परिवार भी था | मनसा देवी के मंदिर में दर्शन किए | मंदिर के प्रांगण के बाहर एक लम्बी से ढलानदार संकरी गली थी जिसकी किनारे पर साथ-साथ खाने-पीने के सामान की छोटी-छोटी दुकानें थी | इन हलवाई की दुकानों पर मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की भरपूर भीड़ रहती जो मंदिर की पूजा के बाद सीधे पेट-पूजा के लिए इन दुकानों पर टिड्डी-दल की तरह से हमला बोल देते | हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ | मैं और श्रीमती जी तो मंदिर के गलियारे में ही रुक गए और मेरी बिटिया- साँची , जो उस समय यही कोई पांच वर्ष की होगी, मेरे मित्र परिवार के साथ ही गली पार हलवाई की दुकान पर चली गयी | वे कह कर गए थे कि आप कहाँ परेशान होंगें , यहीं रुकिए, हम खाने-पीने का सामान यहीं लेकर आते हैं , बाद में सब साथ बैठ कर खायेंगे | 

इस बीच में जब मित्र गली के दूसरी ओर हलवाई से सामान लेने में व्यस्त थे, मेरी बिटिया चुपचाप हमारे पास आने के लिए गली पार करने लगी | हम अभी तक बिलकुल अनजान थे कि अचानक बहुत जोरों से लोगों की चीख-पुकार और हल्ला-गुल्ला सुनकर उस गली की और झाँका | क्या देखते हैं कि उस संकरी से ढलवां गली में दस-पन्द्रह गायों का झुण्ड दौड़ लगाता आ रहा है | 

उस गायों के रेवड़ की चपेट में आने से बचने की कोशिश में लोग अपने आप को इधर –उधर कूद –फांद कर बचाने की कोशिश कर रहे थे | सब तरफ शोर-गुल और अफरा-तफरी का नज़ारा था | लोग गली के किनारे से ही घबरा कर कुछ इशारे भी कर रहे थे | अब हम भी अचानक एक अनजाने डर से अंदर तक काँप गए | गली में साँची का कहीं अता-पता नहीं था | बस नज़र आ रहा था तो वह भयानक गति से दौड़ता हुआ मवेशियों का झुण्ड | अब हम भी समझ चुके थे – साँची रेवड़ की चपेट में आकर नीचे गली में ही गिर चुकी थी जिसके ऊपर से वह रेवड़ उसके ऊपर से सरपट दौड़ता जा रहा था | साफ़ लगा कि बिटिया तो बस गयी राम जी के पास | घबराहट के मारे चक्कर सा आ गया, सारा खून  जैसे जम कर बर्फ हो चुका था | जितनी तेजी से वह रेवड़ दौड़ता हुआ आया , उतनी ही तेजी से वह रेवड़ दौड़ता हुआ निकल भी गया | देखा बीच गली में साँची ओंधे मुंह गिरी पड़ी थी | लोगों ने तुरंत दौड़ उसे कर गोद में उठाया |अब तक हम भी दौड़ कर वहां पहुँच चुके थे | साँची बुरी तरह से घबराई हुई और चीखें मार कर रोये जा रही थी | झपट कर तुरंत अपनी गोदी में लेते ही उसकी चोटों का मुआयना किया | पर यह क्या , शरीर पर तो एक भी खरोंच का निशान भी नहीं था | आँखों को मानो यकीन ही नहीं हो रहा था | फिर दोबारा से ध्यान से देखा कि कहीं अंदरूनी चोट तो नहीं , कोई हड्डी तो नहीं टूटी | सब कुछ सही सलामत पाकर जान में जान आयी | सब से बड़े अचम्भे की बात यही कि इतनी रफ़्तार में इतना बड़ा मवेशियों का झुण्ड ऊपर से गुजर जाने के बाद भी नन्हीं साँची को हल्की सी खरोंच भी नहीं आयी | कारण आज तक समझ नहीं आया | इतना अवश्य है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने गए भगवान के मंदिर में जो इतना घोर संकट टल गया, उससे उस परम पिता परमेश्वर के प्रति आस्था और मजबूत हुई | और हाँ , शायद उन भागते हुए मवेशियों में भी इतना ज्ञान और संवेदना मौजूद थी जिन्होनें अपने पांवों की एक भी टाप, उस अबोध छोटी सी बच्ची के शरीर पर नहीं पड़ने दी| गलत नहीं होगा अगर मैं कहूँ कि उस समय ईश्वर की सम्पूर्ण शक्ति उन मवेशियों में उतर आयी थी जिसके कारण साँची के प्राण बच सके |

Thursday, 4 April 2019

भोलू : दर्द से दिल्लगी और दिलेरी तक का सफ़र

आज आप के लिए कोई कहानी- किस्सा नहीं | बस एक छोटी सी खबर | कुछ दिनों पहले आपको सड़क के एक छोटे से पिल्ले भोलू के उस दर्दनाक वाकये के बारे में बताया था जिसमें कार की टक्कर से उसकी टांग की हड्डी टूट गयी थी (अगर नहीं पढ़ा है तो अब पढ़ लीजिए - लिंक : भोलू का दर्द) | कई दिनों तक वह बेचारा जबरदस्त दर्द से गुजरा | बाद में उसकी टांग की महरम पट्टी और प्लास्टर चढ़वाया गया | उस टांग पर चढ़े प्लास्टर से भी लगभग एक महीने तक भोलू का चलना फिरना काफी कठिनाई भरा रहा | मैंने आप सब से अनुरोध किया था कि भोलू के पाँव के ठीक होने के लिए भगवान से दुआ करें क्योंकि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है | बस एक छोटी सी खुशखबरी | मैंने आप से वादा किया था कि जिस दिन भोलू अपने पैरों पर दौड़ेगा मैं आपको वह खुशखबरी भी जरूर दूंगा | आप सब की शुभकामनाओं से नन्हे से भोलू का दर्द अब हो चुका है एकदम गायब, उतर चुका है उसका प्लास्टर और दर्द में कराहता परेशान भोलू अब बन चुका है उछलता- कूदता मस्त- मलंग भोलू | विश्वास नहीं होता तो खुद देख लीजिए नज़ारा|


शुक्रिया आप सब का 




मुझे पूरा विश्वास है आज की इस खबर ने ही आपका दिल खुश कर दिया होगा |

Thursday, 21 March 2019

हैदर का हौसला

ज्यादा पुरानी बात नहीं है | बहुत दिनों से घर पर बैठा बोर हो रहा था | घर से बाहर निकलना ही था सो घूमते- फिरते जा पहुंचा हुमांयू के मकबरे पर जो कि मेरे घर से कोई ख़ास दूर भी नहीं है | यह मकबरा दिल्ली के ख़ास दर्शनीय स्थानों में से एक है जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जा चुका है इस जगह पर मुग़ल सल्तनत के बादशाह हुमांयू और उसके वशंजों और ख़ास दरबारियों को यहीं दफनाया गया था | हरे-भरे बाग़ में बसी यह यह सुन्दर सी इमारत मुग़ल वास्तु-कला का जीता-जागता नायाब नमूना है | | ऐतिहासिक महत्त्व का होने के कारण इस जगह पर देशी –विदेशी सैलानियों की भरमार लगी रहती है | किसी समय हरी-भरी दिल्ली आज इस मुकाम पर पहुँच चुकी है कि ताज़ी हवा में सांस लेने के लिए भी मकबरे और कब्रिस्तानों का आसरा लेने की नौबत आ चुकी है | 

हरियाली में घिरा हुमांयू का मकबरा 
तो उस दिन हुआ कुछ ऐसा कि मकबरे में घूमते-घामते, वहां के बाग़ तक भी टहलते हुए पहुँच गया | भीड़-भाड़ से दूर उस हरे-भरे पार्क में एक अनोखी शान्ति विराजमान थी | ताज़ी आबो-हवा और हरियाली उस पूरे माहौल को एक अलग ही ऐसी रंगत दे रही थी जिसे शब्दों में बताना भी मुश्किल है | एक पेड़ की छाँव में बैठा हुआ इस पूरे आलौकिक वातावरण के आनंद में पूरी तरह से खोया हुआ था कि अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज में आलाप लेता हुआ एक बीस-बाईस साल का लड़का नज़र आया | वह उस पार्क के चक्कर काट रहा था पर लगता था जैसे किसी और ही दुनिया में खोया हुआ है | पहली नज़र से देखने में ही वह एक अलग ही दुनिया का बाशिंदा महसूस हो रहा था क्योंकि उसके गले से संगीत की मीठी स्वर-लहरियां किसी पहाड़ी झरने की तरह से फूट रहीं थी | मेरे पास से जैसे ही वह गुज़रा, मैं स्वयं को उससे बात करने से रोक नहीं पाया | उसने अपने बारे में जो भी बताया वह मेरे दिमाग़ को झकझोरने के लिए काफी था | आइये आज आपसे भी उस बातचीत को साझा करता हूँ -
हैदर का बचपन  

उस लड़के का नाम है - हैदर अंसारी | बचपन से निहायत ही गरीबी के माहौल से टक्कर लेते हुए किसी तरह से गुज़र-बसर हो रही है | पिता की मौत तभी हो गयी जब हैदर महज सात साल का था | 
दिवंगत अब्बू के साथ हैदर 
हालात इतने खराब हो चले कि जिस माँ ने कभी घर से बाहर कदम नहीं रखा, परिवार पालने के लिए बेचारी को पान के खोखे पर बैठना पड़ा | बचपन से ही हैदर और उसके भाइयों को भी इस काम में हाथ बटाने के लिए दुकान पर भी बैठते |
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं
इस तंगहाल ज़िंदगी से परेशान हूँ मैं 

(फोटो सौजन्य : मौहम्मद समीर)
हुमांयू के मकबरे के इलाके में ही बसी हुई झौंपड-पट्टी में रहा | कुछ साल पहले मकबरे की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का काम जब आगा खां ट्रस्ट और भारत सरकार द्वारा हाथ में लिया गया तब उस बस्ती को ही गिरा दिया गया | सर पर जो आसरा था वह भी छिन गया | वह तो गनीमत थी कि सरकार ने इस बात का ख्याल रखा कि बस्ती से उजड़ कर जाने वालों को तीस किलोमीटर दूर रहने की जगह दिलवा दी | पर हालत तो अब इस मायने में और बुरी हो गयी कि रिहाइश दिल्ली के एक कोने में और काम-धंधा वहां से इतनी दूर | हैदर को इस बात का बहुत मलाल है कि माँ को रोज काम के सिलसिले में ३० किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है | पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर हैदर ने बताया कि वह बारहवीं कक्षा तक दिल्ली पब्लिक स्कूल , मथुरा रोड से पढ़ा है | यह दिल्ली का नामी-गिरामी स्कूल है जहां पर अच्छे-अच्छे अमीर और खासे रसूख वाले लोग भी अपने बच्चों का दाखिला करवाने के लिए तरसते हैं | हैदर वहां कैसे पहुँच गया ? खुद हैदर ने यह राज़ खोला कि इस इतने नामचीन स्कूल में दाखिला मिलने में भी आखिर उसकी गरीबी ही काम आयी | सरकारी दिशानिर्देशों के कारण उन पब्लिक स्कूलों के लिए आस-पास के इलाकों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए भी दाखिला देने की बाध्यता होती है | सुनकर एक बारगी तो मैं भी सोच में पड़ गया- पैसा जहां काम न आया, ग़ुरबत ने अपना काम कर दिया | हाँ इतना जरूर था कि सुबह के समय साहबी बच्चों के बाद ही उन गरीब बच्चों के लिए स्कूल में शाम के समय अलग शिफ्ट में पढ़ाई करवाई जाती जिससे राजा और रंक में हमेशा से चला आ रहा फर्क आगे आने वाली नस्लों में भी बाकायदा बरकरार रहे |
अब बात आयी संगीत के शौक की तो हैदर ने बताया कि यह जुनून तो उसमें बचपन से ही है | हाँ इतना जरूर है कि पैसे की किल्लत के कारण इसकी विधिवत शिक्षा उस प्रकार से नहीं ले पाया जैसी होनी चाहिए थी | इस बात का मलाल आज भी उसे है कि संगीत के गुरू का हाथ अगर सर पर होता तो शायद आज वह भी उस मुकाम से बहुत बेहतर होता जहां आज है | वह महसूस करता है कि उसकी हालत बहुत कुछ उस नौसीखिए तैराक की तरह है जिसे समुद्र में सीधे धकेल दिया गया हो| अपने हाथ-पाँव मार कर , संगीत के प्रति जन्मजात रुझान और शौक की वजह से और दूसरे अच्छे गायकों को सुन-सुन कर ही खुद रियाज़ कर लेता है | जहां कहीं भी कोई संगीत का कार्यक्रम होता है कोशिश होती है अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिल जाए , चाहे पैसा न भी मिले | 
गाने का दीवाना : हैदर अंसारी 
हैदर बताते हैं कि इनके कई गाने यू ट्यूब पर भी हैं | पैसे की तंगी के बावजूद , इन गानों की वीडिओ रिकार्डिंग भी किसी न किसी तरह से करवा ही लेते हैं| कभी दोस्तों से उधार ले कर तो कभी मदद लेकर | यही कारण है कि ज्यादातर म्यूजिक वीडिओ में हैदर किसी और के साथ नज़र आते हैं | ये दूसरे कलाकार अक्सर वही होते हैं जो उस वीडिओ के लिए आर्थिक योगदान देने में सक्षम होते हैं | यह बात नहीं है कि इन साथी कलाकारों के हुनर में किसी प्रकार की कमीं है , उनकी गायकी अपनी जगह और आर्थिक सहायता अपनी जगह | स्वभाव से ही संवेदनशील हैदर बहुत कम बोलने वाला और अपनी ही दुनिया में खोया रहता है | दिमाग में उधेड़-बुन चलती रहती है जब कोई नया गीत जन्म ले रहा होता है | अपनी माँ के प्रति आदर और सम्मान देने के लिए अन्य साथी कलाकार- अल्ताफ शाह  के साथ एक म्यूजिक वीडिओ बनाया है जिसे आप भी पसंद करेंगे | हैदर की यही दिली इच्छा है कि संगीत की दुनिया में इतना नाम कमाए कि माँ को मेहनतकश ज़िंदगी से निजात मिल सके | नीचे के लिंक पर आपके लिए उसी गीत को दे रहा हूँ , जरूर सुनिएगा :

और हाँ , चलते-चलते मेरे दिमाग में एक फितूरी ख्याल भी मंडरा रहा है | पुराने ज़माने में बादशाहों के दरबारियों में संगीतज्ञों और गायकों की ख़ास इज्ज़त होती थी जैसे तानसेन, बैजूबावरा | मुझे लगता है उन जैसे ही किसी की आत्मा हैदर के रूप में आज भी उस मकबरे में सोये पड़े शाही खानदान का सुरीला मनोरंजन कर रही है |



Friday, 15 March 2019

भोलू का दर्द

उस दिन सुबह-सुबह एक पिल्ले की दर्दनाक चीखों की आवाज सुनकर बिस्तर छोड़ कर घर के बाहर निकला | मैं मोहल्ले की उस पूरी कुत्ते और पिल्ले बिरादरी से पहले से ही भली तरह से परिचित था | आप यह भी समझ सकते हैं कि एक तरह से वो सब मेरे दोस्त रहें हैं – और मेरे घर के रेम्प पर ही उनका रात भर जमावड़ा रहता है | हर सुबह घर से बाहर निकलने पर सबसे पहले उनकी टीम ही मेरा उछल-कूद कर हार्दिक अभिनन्दन करती है | महानगरों की आज की संस्कृति में, जब पड़ोसी भी पड़ोसी को नहीं पहचानता है, ऐसे में ये बेजुबान दोस्त ही रह जाते हैं इंसानों को यह याद दिलाने के लिए कि इस दुनिया में अगर आप भूल चुके हैं अपनेपन की भावना को तो हम से सीखो | क्या देखता हूँ सड़क के किनारे एक पिल्ला भयंकर पीड़ा में पड़ा रो रहा है | उसकी इन चीखों को सुनकर उसकी माँ भी तुरंत दौड़ती हुई आ गयी | उसी पिल्ले के , जिसे हम आगे भोलू के नाम से पुकारेंगे, छोटे-छोटे अन्य साथी भी आनन-फ़ानान में आ पहुँचे | उन साथियों में से एक ने तो महीन सी आवाज में रोना भी शुरू कर दिया | एक दूसरे साथी ने शायद भोलू का ध्यान बटा कर दर्द कम करने की कोशिश में, उसके साथ हल्का सा खिलवाड़ करने की तरकीब आजमानी चाही | पर हुआ इसका ठीक उल्टा असर – भोलू की माँ को यह कोशिश नागवार गुज़री और उस शरारती दोस्त को बुरी तरह से झिंझोड़ कर ऐसा करने से रोक दिया | भोलू की माँ का गुस्सा पूरे सातवें आसमान पर था | गुस्से में उसने सड़क के पास से निकलने वाले एक राहगीर को काटने की भी कोशिश की | अब तक मैं वहां खड़ा सारी स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहा था | क्या देखता हूँ कि थोड़ी ही दूर सड़क पर एक कार खडी हुई है | अब मैं समझ चुका था , यह वही तेज रफ़्तार कार थी जो कुछ ही देर पहले भोलू की टांग को बुरी तरह से कुचलती हुई आगे निकल गयी थी | गाड़ी में बैठा नवयुवक, अन्दर से ही रियर- व्यू मिरर से अपनी करनी का नतीजा देख रहा था | पता नहीं कैसा इंसान था, इतनी मानवता भी नहीं थी कि कम से कम गाडी से नीचे उतर कर उस रोते हुए बेजुबान निरीह प्राणी को एक नज़र देख तो लेता | कुछ ही देर में उसने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और चलता बना | 

भोलू का अब भी रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था | कुछ देर बाद बेचारे ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपने तीन टांगों के सहारे से ही सड़क के किनारे एक पेड़ की छाँह तक पहुंचा और निढाल हो कर एक तरह से बेहोश हो कर पड़ गया | अभी तक मैं भी उसे उठाने की कोशिश नहीं कर रहा था और उससे पहले लगी चोट का जायजा लेना चाह रहा था | भाग्यवश भोलू को बाहर से खून नहीं निकला था पर पैर में शायद अंदरूनी चोट थी| दोपहर तक भी उस गरीब का वही खराब हाल था | अब सोचा इसे किसी डाक्टर को दिखा देता हूँ , पर मेरे घर के पास का डाक्टर तो साहबों के कीमती कुत्तों का डाक्टर था और उसकी मोटी ताज़ी फीस भी मुझ रिटायर्ड आदमी की पहुँच से बाहर | एक और एन.जी.ओ. डिस्पेंसरी का पता चला जो काफी हद तक ठीक –ठाक थी| दोपहर को उस अस्पताल में भोलू को लेकर पहुंचा | डाक्टर ने मुआयना करके दो इंजेक्शन लगा दिए और कहा इससे ही आराम आ जाना चाहिए | अब भोलू को वापिस ले आया | बेचारे का दर्द दो दिन के बाद भी वैसा ही | फिर से उसी अस्पताल में भोलू को ले कर गया | इस बार डाक्टर ने भी मेरे आग्रह करने पर और ज्यादा ध्यान से मुआयना किया क्योंकि मैं उसे इस बार भी भुगतान करने का आश्वासन भी दे चुका था | पता चला भोलू के पाँव में फ्रेक्चर था | अब उस फ्रेक्चर पर बाकायदा प्लास्टर चढ़ाया गया | उस पूरे समय भोलू बेचारा दर्द से चीखें मारता रहा | खैर .... जैसे- तैसे प्लास्टर करवा कर वापिस घर आया | तौलिये में लिपटे भोलू को देखते ही उसकी सारी दोस्तों की मंडली ने खुश होकर घेर लिया और उसकी माँ की खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही नहीं था | मेरे घर में भोलू ज्यादा देर नहीं रुका | उसके दोस्त गेट के बाहर से ही शोर मचा-मचा कर मानों पूछ रहे हों – हाल कैसा है जनाब का |आखिर घर के बाहर पार्क में बने उसके पुराने अड्डे पर उसे छोड़ दिया | प्लास्टर बंधी टांग से पहले दिन तो भोलू परेशान रहा पर अगले दिन से उसे काफी हद तक आराम मिला | उसके दोस्त अब आस-पास ही घूमते रहते हैं जिससे भोलू का मन भी लगा रहता है | आइये आप को भोलू के दर्शन भी करवा देता हूँ :
भोलू का बेड रेस्ट 


दोस्त मेरे साथ है - अब पहले से कुछ आराम है 

अब अगर आराम है तो थोडा घूमने में क्या बुराई है 
मेरी आप सभी से केवल एक गुजारिश है : जब कभी भी अपनी गाड़ी में बैठें, उससे पहले एक बारगी नीचे झाँक कर अवश्य देख लें कहीं कोई बेसहारा कुत्ता, गर्मी से बचने के लिए , छांह की आस में , उसके नीचे तो नहीं बैठा | हम सब इंसान हैं इसलिए सड़क पर गाड़ी भी इंसानों की तरह से ही चलायें जिससे किसी को भी चोट न लगे – चाहे वह इंसान हो या जानवर | अगर आप को ध्यान हो , केरी की दर्दनाक मौत भी स्कूल बस की लापरवाही से ही हुई थी | (एक थी केरी -  भाग 2 )
अब तो मुझे बस इंतज़ार है जब चालीस दिनों के बाद भोलू के पाँव का प्लास्टर कटेगा | मैं उसके पाँव के ठीक होने की ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ और आप भी करिए क्योंकि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है | जिस दिन भोलू अपने पैरों पर दौड़ेगा मैं आपको वह खुशखबरी भी जरूर दूंगा | आप भी इंतज़ार कीजिए |

Saturday, 9 March 2019

लैला, मजनूं और कर्नल


लैला, मजनूं और कर्नल - लगता है ना बड़ा ही अजीबो-गरीब जोड़-तोड़ | आप भी सोच रहे होंगें इन तीनो का क्या मेल | यह तो बिलकुल ऐसा ही लगता है जैसे तोता-मैना और बंदूक का आपस में हिसाब-किताब हो | आपका सोचना भी अपनी जगह ठीक हो सकता है पर कभी-कभी असल ज़िंदगी में जब ये आपस में टकरा जाते हैं तो वाकई में ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है कि न उगलते बनता है और न निगलते | चलिए अब बात को और न उलझाते हुए सीधे किस्से  पर आते हैं| 

तो हुआ कुछ यूँ कि एक दिन बैठे-बिठाए अपने एक मित्र से मिलने का मन कर आया जो कि एक नामी –गिरामी अस्पताल में अच्छे-खासे ऊँचे ओहदे पर काम करते हैं | पहुँच गए उनसे मिलने | बहुत ही व्यस्त रहते हैं – सो इससे पहले कि उनके आफिस तक पहुंचता, वे अस्पताल की लॉबी  में ही चहल-कदमी करते नज़र आ गए | आदत के अनुरूप, तपाक से बड़ी गर्मजोशी से मिले और अपने आफिस की और ले चले | लाबी से दफ्तर तक के रास्ते में अनगिनत नमस्ते और सलामों की बारिशों का अपनी मुस्कान से उत्तर देते हुए अपने कमरे तक पहुंचे | सीट पर बैठते ही चपरासी ने चाय पेश कर दी | चाय की चुस्कियां लेते हुए इधर-उधर के हाल-चाल पूछते हुए अचानक उनसे सवाल कर बैठा – “गुरु , यह बताओ आखिर आप इस अस्पताल में करते क्या हो ? मैं आज तक तुम्हारे काम-काज के बारे में आज तक नहीं जान पाया हूँ |” चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने जवाब दिया - बस यह समझ लो कि हर किसी के पंगे का निपटारा करने की मुसीबत मेरे ही सर पर है | मैंने कहा समझा नहीं तो बोले आप चाय पीजिए , जल्द ही समझ भी जायेंगे और खुद देख भी लेंगें | 

अभी चाय ख़त्म भी नहीं हुई थी कि अचानक उनके फोन की घंटी बजी | फोन सुनकर कहा- अभी आता हूँ| मेरी तरफ देखते हुए बोले - चलिए कौशिक जी , मोर्चे पर | अपने दफ्तर से निकल कर जैसे ही वार्ड की तरफ चले, रास्ते में ही मित्र को नमस्कार करते हुए एक सज्जन मिले और बोले मैंने ही आपको फोन किया था | मेरा नाम कर्नल गुप्ता है, फिलहाल बड़ी परेशानी में हूँ, मदद कीजिए | पहली नज़र से देखने से ही कर्नल साहब के पसीने छूटते साफ़ महसूस किये जा सकते थे | वे बार-बार एक ही बात दोहरा रहे थे, मेरा मोबाइल वापिस करवा दीजिए | पूरी बात सुनने पर एक अजीब ही कहानी सामने आयी | दरअसल कर्नल साहब, जिनकी उम्र होगी यही कोई सत्तर साल के आस-पास , अपनी कार में कहीं जा रहे थे | कार उनका ड्राइवर चला रहा था | अचानक एक तेज़ गति से आ रही मोटर-साइकिल ने धड़ाम से कार की पिछाड़ी में इतनी जोरदार टक्कर मारी कि पूरी कार इस बुरी तरह से धमाके से हिल उठी जैसे सर्जिकल स्ट्राइक की बमबारी हो गयी हो | कार के अन्दर बैठे कर्नल साहब भी एक क्षण को भौंचक रह गए कि हुआ तो हुआ क्या | बाहर निकल कर देखा तो पाया उनकी कार की पिछाड़ी का रखवाला बम्पर, मोह-माया से मुक्त योगी की भांति, कार से अपने सभी सम्बन्ध तोड़ कर, सड़क पर दंडवत मुद्रा में पड़ा था | उस बम्पर की बगल में ही वह कबाड़ पड़ा था जिसे कुछ समय पहले तक मोटर साइकिल के नाम से जाना जाता था पर जो सड़क पर हवाई करतब दिखा रही थी | और उन सबसे कुछ दूर सड़क पर ही टूटी-फूटी हालत में पड़ा था डेढ़ पसली का जां-बाज हीरो जो सड़क को अपनी खानदानी मिल्कियत की हवाई पट्टी और अपनी मोटर साइकिल को फाइटर प्लेन समझ कर सड़क पर ही उड़ा रहा था| अब कर्नल साहब ने अपनी फ़ौजी परम्परा और मानवता का परिचय देते हुए उस घायल युवक की सहायता को तुरंत पहुंचे | अपना फोन दिया कि अपने घर वालों को सूचित कर दो | अपनी कार में लेकर अस्पताल तक लाये , भर्ती करवाया | कुछ ही देर में उस घायल युवक के कुछ दोस्त और पिता भी अस्पताल पहुँच गए | कर्नल साहब ने यहाँ भी मानवता का परिचय देते हुए कहा कि हालांकि उनकी कोई गलती नहीं है फिर भी वह इलाज़ में भी रुपये-पैसे से मदद करने को तैयार हैं | इस अफरा-तफरी में अब कर्नल साहब को अपने मोबाइल का ध्यान आया जो कुछ समय पहले उन्होंने उस घायल युवक को सड़क पर आपातकालीन अवस्था में पकड़ाया था | जब उन्होंने उस युवक से अपने फोन को वापिस मांगा तो बन्दे ने यह कह कर साफ़ मना कर दिया कि मुझे आपने कोई फोन कभी दिया ही नहीं था | अब कर्नल साहब की सिट्टी-पिट्टी गुम | कहते हैं आदमी बदमाशी की जंग तो बहुत आसानी से जीत लेता है पर इन्सानियत की लड़ाई में अकसर हार जाता है | यहाँ भी मामला काफी कुछ ऐसा ही लगा रहा था और इस परेशानी में कर्नल साहब को मेरा अस्पताली  मित्र याद आया | मित्र ने सबसे पहले यह बात साफ़ करी कि अस्पताल का इस मामले में कुछ लेना-देना नहीं है , यह आप दोनों के बीच का मसला है फिर भी देखता हूँ कि क्या कर सकता हूँ | उस युवक के पिता जी हक्के -बक्के खड़े थे, मानो उन्हें कुछ समझ ही नहीं आ रहा हो | इस बीच मेरे मित्र ने जोर से सबको सुनाते हुए कर्नल साहब को सुझाव दिया कि आप मोबाइल के बारे में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दीजिए | पुलिस यहीं अस्पताल में मौजूद है, सारी तहकीकात हो जायेगी और सच भी सामने आ जाएगा | इतना सुनते ही उस घायल सड़क छाप हवाई पायलट के चेहरे पर मानों आफत के तीतर-बटेर एक साथ उड़ने लगे | कभी वह अपने दोस्तों की मंडली को देखता तो कभी अपने अब्बा को | इतने में उसके एक दोस्त ने मेरे अस्पताली मित्र का हाथ पकड़ कर एक कोने में ले गया और धीमे स्वर में लगभग फुसफुसाती आवाज में कहा – “ सर , हाथ जोड़ता हूँ , यह पुलिस का झमेला मत करिए | मोबाइल आप को वापिस मिल जाएगा| बस आप बात समझिए |” अब गुर्राने की बारी कर्नल की थी, लगभग धमकी के अंदाज़ में बोले “ साफ़-साफ़ बात बोलो,इससे से पहले कि कुछ और गलत हो जाए |” युवक के दोस्त ने अब जो बताया उसने पूरी कहानी को एक नया ही मोड़ दे दिया | दरअसल अब इस किस्से में एक लैला की भी एंट्री हो चुकी थी | उस दिन मौसम बहुत ही सुहावना था और वह युवक जिसे हम अब मजनूं  भी पुकार सकते हैं, अपनी फटफटी पर लैला को लेकर निकल पड़े थे  सड़क पर तूफानी रफ़्तार से | उस ट्रेफिक से भरपूर सड़क पर लैला-मजनूं  का दुपहिया जहाज़ मानों उड़ा ही चला जा रहा था | उस रफ़्तार को देख कर एक बारगी तो भारतीय वायुसेना को भी लग रहा था कि उन्होंने राफेल हवाए जहाज़ के आर्डर देकर शायद गलती कर दी | जब उस मजनूं  की मोटर साइकिल अनियंत्रित होकर कर्नल की कार की पिछाडी से जा कर भिड़ी तब कर्नल से मिले मोबाइल को उसने अपनी लैला को सौप दिया क्योंकि वह खुद फोन करने की हालत में नहीं था | अब लैला ठहरी नए ज़माने की | पुराने ज़माने की होती तो मजनूं  का सर सड़क पर ही अपनी गोद में रख कर दुपट्टे से हवा कर रही होती | यहाँ तो उसने जैसे ही भीड़ जुटती देखी, मोहतरमा हो गयीं तुरंत ही नौ-दो- ग्यारह | अब लैला फुर्र और लैला के साथ कर्नल का मोबाइल भी फुर्र | अब इधर अस्पताल में भर्ती मजनूं  की हालत अपने बाप के जूते के डर से और भी पतली | अपने बाप से कहे भी तो कहे क्या – यही कि बापू, कर्नल का मोबाइल आपकी होने वाली बहू के पास है जिसे साथ बिठा कर मैं सड़क पर हवाई जहाज़ उड़ा रहा था| अब अगर लैला नए ज़माने की थी तो यह मजनूं  भी शर्तिया उसी की टक्कर का था | पुराना मजनू नहीं डरा था पत्थरों के वार से , पर इस मजनूं की तो बत्ती बंद हो गयी थी बापू की मार से | यही सोचकर उस मजनूं की डर के मारे सच बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी | कुल मिला कर इस दास्ताने लैला-मजनूं का हर किरदार परेशान : 

मजनूं परेशान कहीं बापू को पता न चल जाए,
लैला परेशान कहीं इस सारे लफ़ड़े में बदनामी न हो जाए ,
कर्नल परेशान हाय कहाँ गया मेरा मोबाइल,
और सबसे ज्यादा परेशान मेरा अस्पताल वाला मित्र यह सोच कर कि ये सारे बेमतलब के पंगे सुलटाने के लिए मेरे ही हिस्से में क्यों आते हैं |

खैर सारी कहानी का अंत इस आश्वासन के साथ हुआ कि कर्नल को उसका मोबाइल गुपचुप तरीके से वापिस करवा दिया जाएगा | अब यह सचमुच हो पाया या नहीं यह मैं आप सबकी कल्पना पर छोड़ता हूँ क्योंकि उस दिन के बाद मैनें भी अपने अस्पताली मित्र की कोई खोज-खबर नहीं ली है |

Tuesday, 12 February 2019

गंगा मैया – पार उतारे सबकी नैया

इससे पहले कोई लाए,
तुम्हें  लोटे या जार में,
इक बार तो आ जाइए ,
जीते-जी हरिद्वार में |

ज़िंदगी का पूरा फ़लसफ़ा महज़ कुछ शब्दों में बयाँ करती ये पंक्तियाँ अपने आप में एक पूरी कहानी समेटे हुए है | कहानी आपकी क्षण-भंगुर ज़िंदगी की, कहानी एक शहर की और सबसे बड़ी कहानी आपके लोक-परलोक और उस शहर के बीच अनंत सम्बन्ध की जिसे हरिद्वार के नाम से जाना जाता है | आज की कहानी में आपको उसी हरिद्वार के दर्शन होंगें और साथ ही मुलाक़ात होगी वहाँ के एक रोचक किरदार से जिससे आपका कभी न कभी जरूर सामना हुआ होगा और जिन्हें आप पण्डे या तीर्थ पुरोहित के नाम से जानते हैं | इनके पास आपके पूर्वजों का वह लेखा-जोखा मिल सकता है जिससे देख कर आप अचम्भे में पड़ जाएगें | 
तो चलिए शुरू करते हैं बात हरिद्वार की | हरिद्वार दरअसल हिन्दुओं का बहुत ही पवित्र और प्राचीन धार्मिक स्थान है | उत्तराखंड में गौमुख /गंगोत्री से निकली भागीरथी नदी आगे रुद्रप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा का रूप लेती है तो ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों से लगभग 250 कि.मी की यात्रा इठलाती, बल खा कर, हिलोरे  लेेती जब मैदानी इलाके में आकर शांत भाव ग्रहण करती है वह गंगा का प्रवेश द्वार हरिद्वार ही है | एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार धन्वन्तरी जब समुद्र मंथन के बाद निकले अमृत को जब कलश में लेकर जा रहे थे तो उसमें से अमृत की कुछ बूंदें जिन चार जगहों पर गिर गयी थीं उनमें से एक हरिद्वार भी था | अन्य तीन स्थान थे – नासिक, प्रयाग और उज्जैन | इन सभी तीर्थ स्थानों की महिमा अपरम्पार है | धार्मिक ग्रंथों के अनुसार हरिद्वार के बारे में यह मान्यता है कि यहाँ गंगा मैय्या में स्नान करने वाला सभी पाप कर्मों से मुक्ति पा जाता है | यहाँ प्राण त्यागने वाला सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है और जिसका भी पिंडदान या अस्थिविसर्जन होता है वह भी सीधे बैकुंठ धाम की प्राप्ति कर लेता है | तीर्थ स्थान है तो सीधी सी बात है कि यहाँ पर पूजा-पाठ और कर्मकांड के लिए आने वाले श्रद्धालु और इन सब धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न करवाने वाले पंडित तो होंगे ही | शायद आपने भी सुना तो होगा ही - इन श्रद्धालुओं को कहते हैं यजमान और पंडित जी को – तीर्थ पुरोहित या पंडा | इन तीर्थ-पुरोहितों की कार्य शैली भी उतनी ही अदभुत  है जितनी कि मुम्बई की डब्बे वालों की | फर्क सिर्फ इतना है कि जहां डिब्बे वाले बहुत ही सटीकता और कुशलता से खाने के डिब्बे लोगों के घरों से उनके दूर दराज स्थित दफ्तरों तक समय पर पहुँचा देते हैं, वहीं दूसरी ओर तीर्थ पुरोहितों के पास अपने यजमानों के पूर्वजों की कई पीढ़ियों तक का लेखा-जोखा इतने व्यवस्थित रूप से रखा जाता है कि आज के जमाने के कम्प्यूटरों में रिकार्ड रखने वाले बड़े से बड़े लाइब्रेरियन भी दाँतों तले उंगली दबा लें | 

आपके पुरखों का लेखा-जोखा 
आप हरिद्वार की हरकी पौड़ी पर कदम रखेंगे ही कि आपको एक तरह से घेर लिया जाएगा और ऊपर से पड़ेगी सवालों की बौछार – “ पूजा करवानी है ? कहाँ से आये हो ? कौन सा राज्य .... कौन जिला .... कौन जाति ... कौन सा गौत्र ?” विश्वास कीजिए अगर आप सचमुच किसी धार्मिक अनुष्ठान के उद्देश्य से आए हैं तो पूछे गए हर सवाल का अपना महत्त्व है | आपका जवाब ही आपको पहुंचाएगा आपको उस विशेष पुरोहित तक जिसे आप फेमिली डाक्टर की तर्ज़ पर फेमिली पंडित भी कह सकते हैं | वही फेमिली पंडित जिसके पुरखों तक ने आपके पुरखों के लिए पूजा-पाठ संपन्न करवाया है और आज भी उसके पास इसका लिखित सबूत भी मिल सकता है | यही है आपका तीर्थ पुरोहित | 
तीर्थ पुरोहित पंडित धीरज शर्मा 
इन तीर्थ पुरोहितों के बारे में ही अधिक जानने के लिए मेरी मुलाक़ात हुई हरिद्वार के ही पंडित धीरज शर्मा जी से | वह स्वयं हरिद्वार के प्रख्यात तीर्थ पुरोहितों में से एक हैं | उनसे इस विषय में बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी मिली | प्राचीन काल से ही लोग हरिद्वार की यात्रा करते थे | हरिद्वार एक पवित्र तीर्थ स्थल होने के कारण, यह यात्रा या तो धार्मिक  उद्देश्य से होती थी या परिवार के सदस्यों की मृत्यु होने पर रीति रिवाजों के अनुसार अस्थि विसर्जन करने हेतु | अब से लगभग सैकड़ों वर्षो पहले  न तो आज जैसे यातायात के साधन थे और न ही हरिद्वार में ठहरने के लिए इतने होटल और धर्मशालाएं थी | 
वर्ष  1866 का हरिद्वार का गंगा तट 


आज की हर- की -पैडी में हर हर गंगे 
उस समय तीर्थ यात्री पैदल ही या घोड़ों पर कई –कई दिनों की कठिन यात्रा करके हरिद्वार आते थे | ऐसे समय में उनके राज्य, जिले के लिए सम्बंधित तीर्थ पुरोहित ही उनके लिए पूजा पाठ तो करते ही थे बल्कि जरूरत पड़ने पर उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी अपने घरों में ही करते थे | ऐसा प्रगाढ़ और घरेलू किस्म का विश्वास से भरा रिश्ता होता था यजमान और उनके पुरोहित का | तीर्थ यात्री अपने वंश वृक्ष की समस्त जानकारी जैसे बाप-दादा का नाम, आने का प्रयोजन आदि सब कुछ उस बही-खाते में दर्ज करवाते, अपने और साथ आए रिश्तेदारों के हस्ताक्षर भी करते | यही परम्परा पीढी- दर- पीढी से चली आ रही है | अगली बार आने पर यजमान अपने परिवार के विवरण में जरूरी फेरबदल करवा लेते  | यह सब कुछ इसी तरह से है जैसे सरकार द्वारा जन्म - मृत्यु पंजीकरण रिकार्ड| आश्चर्य की बात यह है कि सरकारी रिकार्ड की सुईं तो पचास साल पहले जा कर ही टें बोल जायेगी पर आपके पंडे जी आपके सामने 800 साल पहले का भी खाता आपके सामने पेश कर देंगे | यह बात मैं हवा में नहीं मार रहा हूँ, आपको बाकायदा प्रमाण सहित कह रहा हूँ |
आठ  सौ वर्ष पुराना बही - देवनागरी और उर्दू लिखित 

पहले यह बही भोज पत्रों पर लिखी जाती थी, फिर समय के साथ कागज़ का प्रचलन चला | ताम्र पत्रों पर भी कुछ वंशावलियों का उल्लेख है | हरिद्वार में करीब 2500 तीर्थ पुरोहित हैं | यह सब वे ब्राह्मण पंडित हैं जो पीढी दर पीढी से अपने यजमानों का लेखा-जोखा वंशावलियों के रूप रखते आए हैं | प्रत्येक जिले की पंजिका जिसे बही भी कहते हैं, का विशिष्ट पंडित होता है।इन हाथ से लिखी बही में यजमानों और उनके पूर्वजों का विवरण उनके असली जिलों व गांवों के आधार पर वर्गीकृत करने के बाद सहेज कर रखी गयीं हैं। यहाँ तक कि भारत के विभाजन के उपरांत जो जिले व गाँव पाकिस्तान में रह गए व हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहाँ हैं। कई मामलों में तो उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम अपितु ईसाई भी हैं। 
पंडित जी की गद्दी 

इतना जानने के बाद पंडित धीरज शर्मा जी से पूछ बैठा कि कुछ अपने बारे में भी बताइए | उन्होंने बताया कि उनके भी पीढी-दर-पीढी यही काम चला आ रहा है |उनके पिता का सात भाइयों का परिवार था | अगली पीढी के इच्छुक सदस्य को विरासत में यही काम सौंप दिया जाता है | उनके द्वारा सैकड़ों वर्षो का हस्तलिखित बही जिनमें यजमानों का रिकार्ड होता है वही उनकी पूंजी है | पंडित जी ने एक बहुत दिलचस्प बात भी बताई | वह स्वयं बी.ए , एल.एल.बी हैं , कुछ समय वकालत में भी हाथ आजमाया पर पिता की मृत्यु के बाद उनकी इस विरासत को सम्भाला | कर्मकांड की विधिवत शिक्षा अपने ताऊ जी श्री ज्ञान चंद्र शास्त्री जो कि राष्ट्रपति पुरस्कार से अलंकृत रहे और ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन से सम्बद्ध रहे , से प्राप्त की | अपने इस पवित्र सेवा कार्य से पूरी तरह से संतुष्ट हैं | बच्चे पढाई कर रहे हैं – बड़ा बी.सी.ए में और छोटा नवीं कक्षा में | अभी से कुछ नहीं कह सकते कि बच्चे भी यही गद्दी संभालेंगे, सब कुछ उनकी इच्छा पर है | अगर ऐसा होता है तो गद्दी की व्यवस्था परिस्थितियों के अनुसार की जायेगी | अपने रोचक अनुभवों को बताते हुए पंडित जी बताते हैं कि संपत्ति की विरासत को लेकर उपजे मुकदमें के चक्कर में एक बार उन्हें अपनी बही (रिकार्ड) के साथ यमुना नगर की कोर्ट में पेशी पर जाना पड़ा था | बही में दर्ज विवरण को कानूनी मान्यता प्राप्त है | मुझे लगता है कोर्ट में उस समय पंडित जी ने एक बारगी माथे पर पसीना पोछते हुए एक बारगी सोचा तो जरूर होगा – बुरे फँसे पुरोहिताई में | 

पंडित धीरज शर्मा जी हरिद्वार में समाज सेवा के कार्यों में भी अत्यंत व्यस्त रहते हैं | किसी भी कठिनाई या समस्या की हालत में उनसे निसंकोच संपर्क 9760339460 नंबर पर किया जा सकता है | उन्होंने  एक अपील भी की है | वह कहते हैं कि अब संयुक्त परिवार रहे नहीं, उनकी जगह नाभकीय परिवारों ने ले ली है यानि पति-पत्नी और बच्चे | ऐसे समय में अपनी पीढी का लेखा-जोखा भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के लिए, जब भी हरिद्वार आयें, अपने पुरखों, दादा-दादी और अपने कुनबे के अन्य सदस्यों के नाम, रहने के पुराने जिले के नाम, परिवार में हुए शादी -ब्याह और मृत्यु की पूरी जानकारी के साथ आयें| इस जानकारी को अपने तीर्थ पुरोहित के पास दर्ज भी कराएं | आने वाली पीढ़ी के लिए हम कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं | 
प्राचीन बही
पुराने होते रिकार्ड को नष्ट होने से बचाने के लिए रिकार्ड को कम्प्यूटर में संरक्षित रखने के विषय में मेरी कई अन्य परिचितों से भी बात हुई | इस पर कुछ का मत था कि तकनीकी साधनों का प्रयोग अपनी जगह कुछ हद तक उचित हो सकता है पर यह उस असली बही की जगह कभी नहीं ले सकता | पुरोहित की गद्दी पर बैठ कर बही के उस असली कागज़ में अपने बाप-दादाओं के हस्ताक्षर , उनके परिवार का लेखा-जोखा देख कर भावना यजमान के मन में उमड़ती है कि इसी जगह पर मेरे पुरखे आकर अपना ब्योरा दर्ज करवा कर गए थे | कंप्यूटर के स्क्रीन पर उन कागजात की आभासी तस्वीर शायद भावनाओं का वह रोमांच पैदा न कर सके | नए ज़माने की तेज़ रफ़्तार का वैसे तो मैं भी समर्थक हूँ पर लगता है यहाँ यजमान जी भी  शायद ठीक कह रहे हैं | 

( आभार : इस लेख में संग्रहित सामग्री के लिए श्री संजय कुमार झाड़, गंगा सभा, हरिद्वार एवं श्री राजेश शर्मा, हरिद्वार   का विशेष योगदान रहा )

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...