Wednesday, 30 January 2019

ऊँची उड़ान (भाग 6 ) : मेरे प्रेरणा-स्रोत की

पिछले काफी समय से मैं इस ब्लॉग की दुनिया से दूर रहा | कारण आज की  इस कहानी में ही छिपा है | 

ले० कर्नल एच .सी. शर्मा (रि 0)
हापुड़ जिले का एक छोटा सा गाँव है नान, जी हाँ वही जिसकी नाम-राशि की चपाती को आप होटल में बड़े स्वाद से खाते हैं | उसी गाँव में एक अच्छा –खासा, खाता-पीता किसान परिवार था श्री होशियार सिंह जी का | गाँव के गिने-चुने सम्मानित और प्रभावशाली परिवारों में से एक| उन्हीं के तीन बेटों में से एक थे श्री हुकुम चंद –यानी आज की कहानी का नायक | अपने सीधे-सरल स्वभाव के कारण यह बच्चा गाँव में सभी की आँख का तारा | सीमित साधनों के बावजूद पढ़ाई -लिखाई में तेज़ | अभी बारह  साल का था कि माँ का निधन हो गया | उस बच्चे के लिए इतना बड़ा सदमा सहना आसान नहीं था | बाल-मन पर पड़ा यह घाव जीवन भर रहा और कभी भी माँ की कमीं से उबर नहीं पाया | अब उस बिन माँ के बच्चे का दिल न तो घर पर लगता था और ना ही बाहर संगी-साथियों के बीच | अच्छा-ख़ासा हंसता-खेलता बच्चा यकायक मानों रातों-रात खामोशी की चादर ओढ़े एक गंभीर इन्सान में परिवर्तित हो गया | माँ की याद वैसे तो किसी भी तरह से भुलाई नहीं जा सकती, पर उस बालक ने आखिर एक तरीका ढूँढ ही लिया उस याद को कम करने का | और वह उपाय था खुद को पूरी तरह से पढ़ाई में समर्पित करना | दिमाग तो पहले से ही तेज था, ऊपर से यह मेहनत , नतीजा सभी परीक्षाओं में अव्वल नंबरों से पास होते चले गए | आठवीं तक की पढ़ाई गाँव के ही स्कूल में और उसके बाद पास के शहर हापुड़ में | गाँव से स्कूल जाने के लिए कभी-कभी हालत ऐसे भी बन जाते कि कपड़ों की पोटली को सर पर बाँध कर रास्ते में पड़ने वाली नदी को तैर कर पार करना पड़ता | इन कठिन परिस्थितियों में मेट्रिक और उसके बाद विज्ञान विषयों के साथ इंटर प्रथम श्रेणी के नंबरों के साथ पास किया | 

उन दिनों शादी कम उम्र में ही कर दी जाती थी | उस बालक,जो कि अब किशोरावस्था में था, के साथ भी ऐसा ही हुआ | अब शादी तो हो चुकी थी पर गौना नहीं हुआ था | यानी पत्नी अपने गाँव में पिता के घर ही रह रहीं थी और हमारी कहानी का हीरो अपने पिता के पास अपने गाँव में | अब यहाँ आता है कहानी में एक जबरदस्त मोड़ |अचानक एक दिन सुबह-सुबह पड़ोसी होशियार सिंह जी के पास पहुंचता है और अनुरोध करता है "मेरा बेटा हापुड़ जा रहा है जहां फ़ौज के लिए भर्ती चल रही है| रास्ते में साथ के लिए अपने बेटे हुकुम को भी भेज दीजिए तो मेरी चिंता दूर हो जायेगी |" अब वहां पहुँच कर पता नहीं क्या सूझी कि हीरो भी लाइन में लग गए और तकदीर का खेल , जिसे भर्ती करवाने आये थे वह तो रह गया टांय-टांय फिस्स और चुन लिया गया हमारा हीरो| अब गाँव में जाकर जब सबको बताया तो मच गया कोहराम और रोआ-पीटन | परिवार का कोई भी बड़ा-बूढ़ा इस पक्ष में नहीं था कि हुकुम जाकर फ़ौज की नौकरी करे | उनका सोचना भी एक हद तक जायज़ था | पहले और दूसरे विश्व-युद्ध की बर्बादी झेल चुके बुजुर्गों के लिए फ़ौज की नौकरी में खतरा ही खतरा था | पर जो होना था सो तो हो चुका था सो बुझे मन से दिल पर पत्थर रख कर घर-परिवार ने हालात को स्वीकार करने में ही भलाई समझी और इस के बाद मन में जोशीले अरमान लिए घर-बार छोड़, निकल पड़ा हमारा बहादुर सिपाही एक नई मंजिल की ओर | वह साल था वर्ष 1954 का | 


अब अगर थोड़े में कहूँ तो फ़ौज की नौकरी इस बहादुर हीरो ने कुछ इस अंदाज़ में की जैसे जंगल में शेर की चहल कदमी | इस बात का अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि सिपाही के रूप में भर्ती हुए इस लाजवाब इंसान ने तरक्की की हर हद को एक के बाद एक आश्चर्यजनक ढंग से पार करते हुए अपने 34 वर्ष के सेवा-काल में लेफ्टिनेंट कर्नल के ओहदे तक पहुँच कर ही दम लिया | इसके लिए काम के प्रति पूरा समर्पण और स्वयं के विकास के लिए लगातार अध्ययन जारी रख कर शैक्षिक योग्यता बढाते रहे | सेना में रहते हुए ही विभिन्न तकनीकी कोर्स के अलावा उन्होंने बी.एस.सी , बी .एड, मेनेजमेंट और विधि क्षेत्रों की  शैक्षिक  योग्यताएं अर्जित की | ईमानदारी से अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए, बिना किसी सिफारिश की बैसाखी का सहारा लिए, जो कुछ पाया बस अपने बल-बूते पर | यही ईमानदारी और सिद्धांत कहीं उनकी नौकरी-नैय्या की पतवार बने तो कहीं इन्हीं जीवन-मूल्यों ने आगे बढ़ने के रास्ते में अड़चने भी खडी कर दीं वरना शायद एक - दो अतिरिक्त प्रमोशन भी मिल गए होते | पर इस बात का उन्हें कभी कोई दुःख नहीं रहा जैसा कि वह स्वयं कई बार कहते भी थे कि जीवन मूल्यों के साथ समझौता करके कोई भी लाभ उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं | अपने सेवा-काल में तीनों मुख्य –युद्ध – 1962 चीन के साथ , 1965 और 1971 पाकिस्तान के साथ , में सीमा पर बहुत बहादुरी से दुश्मन का मुकाबला किया | भूटान में हुए सत्ता-संघर्ष के समय विद्रोहियों से निपटने के लिए भेजी गयी भारतीय सेना की पहली टुकड़ी के सदस्य थे जहां बहुत ही खतरनाक हालातों का सामना करना पड़ा | एक से एक कठिन सीमावर्ती स्थानों पर तैनाती रही जिसे बखूबी निभाया | 1962 के भारत-चीन के युद्ध के समय जब इनकी पोस्टिंग बार्डर पर थी, तब अपने पिता श्री होशियार सिंह जी को भी खो बैठे | दरअसल  रेडियो पर आरही लड़ाई और शहीद सैनिकों के समाचारों को सुनते-सुनते ही वृद्ध पिता अपने बेटे की चिंता में हार्ट-अटेक का झटका नहीं झेल पाए थे  |
इनकी उच्च-श्रेणी की ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा को देखते हुए भारतीय सेना के सिग्नल्स कोर की बहुत ही गोपनीय और संवेदनशील साइफर ब्रांच में कार्यरत रहे| इनके कार्य-कलापों की संवेदनशीलता और गोपीनयता का सम्मान करते हुए मैं इस विषय में अधिक विस्तार से नहीं जा रहा हूँ | केवल इतना कह सकता हूँ कि यह मेरे रोल माडल रहे, जिनसे मैंने सीखा ( या सच कहूँ तो सीखने का प्रयत्न किया पर पूरी तरह से आज तक सफल नहीं हो पाया ) कि कभी भी किसी की बुराई मत करो | उतना बोलो जितना आवश्यक है | जहां तक हो सके लोगों की मदद करो | एक बात और - मेहनत और ईमानदारी अगर आप के पास है तो ज़िन्दगी में सब कुछ हासिल किया जा सकता है |शायद इस ब्लॉग के माध्यम से आप सब तक यही नसीहतें पहुंचाना ही मेरा उद्देश्य है |   


मेरे यह रोल माडल, प्रेरणास्रोत हैं लेफ्टिनेंट कर्नल एच. सी. शर्मा ( सेवा निवृत ) जो अभी कुछ दिन पूर्व ही अचानक 19 जनवरी 2019 को सदगति को प्राप्त हो गए |अपने पीछे भरा-पूरा, सुखी-संपन्न परिवार छोड़ कर जाने वाले कर्नल शर्मा सबकी नज़रों में यूँ तो मेरे स्वसुर थे पर मेरे लिए सही मायने में एक ऐसे पथ-प्रदर्शक रहे जिनकी कमी जीवन- पर्यंत मुझे खलती रहेगी | अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने उनसे कहा था कि आपके इतने प्रेरणादायी और साहसिक व्यक्तित्व के बारे में एक लेख लिखूँगा | मुझे यह नहीं आभास था कि थोड़ी से देर के कारण यह लेख श्रद्धांजली-सुमन के रूप में अर्पित  करना पड़ेगा |   




                   सादर नमन – श्रद्धांजली

Wednesday, 9 January 2019

बात अंतिम कविता की

स्व० श्री रमेश कौशिक 

वर्ष 2018 बीत गया और अब जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ, नए साल के नए माह ने हमारे आप के जीवन मे अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया है |ऐसे समय में जब ज्यादातर लोग नए साल की ओर बड़ी आशा से देख रहें हैं, भविष्य के लिए नई-नई योजनाएं बना रहें हैं, आदर्शवाद से भरपूर तरह-तरह के संकल्प ले रहे हैं, एक मैं हूँ जो बीते हुए समय को पीछे मुड़कर ध्यान से देख रहा हूँ | याद कर रहा हूँ उन सभी की मीठी यादों को जो कभी साथ थे पर आज नहीं | वक्त के थपेड़ों ने जिन्हें दूर, बहुत दूर कर दिया, इतना दूर जहां से कोई वापिस नहीं आता | बहुत सारे हैं ऐसे बिछड़ने वाले पर कुछ ऐसे होते हैं, सच में जो सबसे ख़ास होते हैं | और ख़ास भी कोई यूं ही नहीं बन जाता, उस ख़ास में बात भी कुछ ख़ास होनी चाहिए यानी ऐसी बात जो हो सबसे अलग | यह वह ख़ासियत ही है जो सब की भीड़ में उस शख्स को सबसे अलग खड़ा करती है और साल दर साल गुजरने के बाद भी उसकी यादों की भीनी-भीनी महक से आपको हर दम महकाए रखती है | कुछ ऐसे ही शानदार, दमदार और प्रभावशाली और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के मालिक थे मेरे पूज्य पिता स्वर्गीय श्री रमेश कौशिक, काव्य-जगत के जाने-माने स्तम्भ | कविता के प्रति उनका रुझान बचपन से ही रहा जिसका श्रेय वे अपने पिताश्री (मेरे दादा ) लावनी कलाकांत पंडित हरिवंश लाल जी को देते थे जिन्होंने 9-10 वर्ष की उम्र से ही कविता का अभ्यास कराना आरम्भ कर दिया था | उस अवस्था में लिखे एक दोहे का उल्लेख उन्होंने कविता संग्रह ‘कहाँ हैं वे शब्द’ के आत्मकथ्य में किया है :


सत के कारण हरिश्चंद्र ने, झेले कष्ट अपार|

राज पाट, नारी सुत तजके, करे श्वपच घर कार || 


विगत में भी उनकी लिखी कविताओं से समय-समय पर आपको परिचित करवाता ही रहा हूँ | उनसे जुड़ेअनगिनत प्रेरणादायक संस्मरण आज भी मेरे मनो-मस्तिष्क में इस तरह ताज़ा हैं जैसे कल की ही बात हो| 



यहाँ यह बताना उचित रहेगा कि मेरे पिता ने पार्किनसंस जैसे गंभीर रोग की विभीषिका को लगभग बारह वर्ष के लम्बे समय तक झेला पर अंत समय तक हार नहीं मानी | इस दौरान भी वह शरीर की दिनों-दिन क्षीण होती जा रही शक्ति के बावजूद अपने काव्य-लेखन पर उसी उत्साह से लगे रहे | एक के बाद एक कविता संग्रह आते रहे और जिन्दादिली और मनोबल की हालत यह कि अस्पताल में भर्ती होने पर भी डाक्टरों को भी अपनी कविताएँ सुना दिया करते जिसमें एक मुझे आज भी याद है : 

सब के सब बीमार
मरीज तो मरीज 
डाक्टर भी 
इसलिए मदद कर नहीं सकते 
एक-दूसरे की 

लाचार | 
सब-के-सब बीमार 
कोई आँख से 
कोई कान से 
कोई तन से 
कोई मन से | 

दुनिया एक बहुत बड़ा अस्पताल 
किन्तु कोई नहीं तीमारदार 
सब-के-सब बीमार| 

अभी पिछले दिनों उनका कविता संग्रह - प्रश्न हैं उत्तर नहीं की कविता मृत्यु पढ़ रहा था| यह संग्रह वर्ष 2006 में प्रकाशित हुआ था | कविता इस प्रकार से है : 


मृत्यु

ओ श्यामा सुन्दरी 

मुझे यह तो पता है 
कि एक दिन तुम 
मेरे पास निश्चय ही आओगी 
और अपने साथ चुपके-से ले जाओगी | 

किन्तु यह नहीं बताया कभी 
कि तुम कब आओगी 
कहाँ से आओगी 
और कहाँ ले जाओगी | 

कोई अतिथि यदि बिना बताए 
आ जाए अचानक 

तो स्वागत में कमीं बने रहने का 
अंदेशा रहता है 
अगर तुम्हारे साथ हो गया कुछ ऐसा ही 
तो मुझको यह अच्छा नहीं लगेगा | 

अत: अभी बता दो मुझको 
कब आओगी 
ताकि तुम्हारे स्वागत की 
तैयारी कर लूँ | 

************************************* 
वर्ष 2009 का उत्तर्राद्ध आते-आते रोग ने अपनी पकड़ और मजबूती से कर ली | शरीर और अधिक क्षीण हो चला | खाना-पीना भी सब नाक में डाली गयी ट्यूब के रास्ते | पूरी तरह से रोग-शैय्या पर | अधिकाँश समय नीम-बेहोशी की अवस्था में सोते हुए ही गुजरता | आवाज काफी हद तक अस्पष्ट हो चुकी थी | ऐसी ही अवस्था में फिर भी एक दिन बहुत ही हिम्मत करके कागज़ कलम लेकर स्वयं ही कुछ लिखना चाहा | आधी-अधूरी, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं और शब्दों के द्वारा कुछ लिखने का भरसक प्रयास कर रहे थे | बहुत कोशिश करने पर भी बात नहीं बन पायी | अंत में मेरी मां ने कुर्सी-मेज पर बैठ कागज़-कलम संभाला और पत्नी हेमलता ने सिराहने बैठ उनके फुसफुसाते स्वर के अस्फुट शब्दों को कान लगाकर सुनने का भरसक प्रयास किया | अब पत्नी उन शब्दों को सुन और समझ कर बोल रहीं थी जिन्हें मेरी मां तुरंत लिखती जा रही थी | इस सारी बौद्धिक कवायत में जैसे-तैसे वह कविता पूरी हुई | माँ की तमाम नाखुशी के बावजूद भी पिता ने यह कहते हुए कि यह उनकी आखिरी कविता है, रचना का शीर्षक दिया अंतिम कविता | उस बालक की, जिसने आठ साल की उम्र से ही कविता को जीवन भर के लिए अत्यंत प्रगाढ़ रूप से आत्मसात कर लिया था, 79 वर्ष की आयु में गहन रोग शैया पर लेटे, नितांत कष्ट में लिखी यह रचना सच में जीवन की अंतिम कविता ही साबित हुई | मात्र पंद्रह दिन के अंतराल पर एक रात उन्होंने इशारे से माँ को पास बुलाया और उनकी बांह पर अपनी कांपती उंगली से कुछ लिखा | पूरी तरह से न समझ पाने पर माँ ने मेरी पत्नी को पास बुलाया| इस बार पिता ने फिर वही दोहराया जिसे पत्नी समझ गयी | उन्होंने लिखा था : अब मैं मृत्यु चाहता हूँ|

शायद मृत्यु-देव उस समय कहीं आस-पास ही विचरण कर रहे थे जिन्होंने इच्छा जानकार तुरंत कह भी दिया होगा तथास्तु | अगले ही दिन 27 सितम्बर 2009 की सुबह उनके जीवन की अंतिम सुबह थी |

जीवन काल की वह अंतिम कविता इस प्रकार से है : 

अंतिम कविता 

वे आ रहे हैं 
श्याम वर्ण अश्वों पर सवार 

मेरे घर की ओर । 

उनके काम बता दिए गए 
एक का काम है
मुझको नहीं बोलने देने का 
वाणी को छीन लें । 

दूसरे का काम है 
न सुनने देने का 
ताकि मैं उनके आने की 
आहट न सुन सकूँ । 

तीसरे का काम है 
आँख बन्द करने का- 
ताकि मैं उनका आतंक न देख सकूँ । 

चौथे का काम है 
मेरे दाँत तोड़ने का 
ताकि मैं चलते समय 
किसी पर आक्रमण न करूँ । 

कुछ देर रुक कर 
फिर एक गहन सन्नाटा। 
**************************

 श्याम वर्ण अश्वों पर सवार मृत्यु-दूत ? ? ? ?  ? 

कहते हैं जब कविता जीवन के अनुभवों से जुड़ी होती है तो उसमें बसी सच्चाई दिलो-दिमाग में कहीं गहरे तक असर करती है | मैनें महसूस किया कि व्यक्ति वही है, विषय-वस्तु भी वही है पर बदली है तो केवल एक चीज - परिस्थिति | इस बदली परिस्थिति ने पूरी कविता को एक नया ही कलेवर और आयाम दिया है | गुजरते वक्त के साथ-साथ जीवन के शाश्वत सत्य – मृत्यु पर बदलता हुआ दृष्टिकोण उनकी तीन कविताओं में स्पष्ट झलकता है | अस्पताल के बीमार मरीज, बीमार डाक्टर के वातावरण जहां कोई तीमारदार नहीं से शुरू होता सफ़र, रास्ते में कहीं पल भर को ठहर कर मृत्यु से अनुरोध करता है कि बिना किसी पूर्व-सूचना के अतिथि की भांति मत आना, जब भी आओ बता कर आना जिससे तुम्हारे स्वागत में कोई कमी न रह जाए | जब अश्व पर सवार यही अतिथि रूपी मृत्यु साक्षात नज़र आती है तो अपने दुर्बल शरीर की लाचारगी प्रबल रूप से महसूस होती है | 

इस नए वर्ष पर मैं अपने पिताश्री को श्रद्धा पूर्वक नमन करता हूँ जिन्होंने सिखाया – जीवन अपनी शर्तों पर जिओ, साफगोई से जिओ, सच्चाई से जिओ | 


Thursday, 3 January 2019

ऊँची उड़ान ( भाग पांच ) : चाहत की चाहत

सब से पहले सुनिए सुनिए चाहत -सौरव के संगीत निर्देशन में फिल्म नारायण के कुछ गीत 

शायद आपको याद हो कुछ माह पहले उड़ान श्रंखला (भाग तीन) के अंतर्गत संगीत के एक दीवाने की कहानी लिखी थी – सौरव मिश्रा : संघर्ष का सुरीला सफ़र | सौरव मिश्रा की बेहतरीन गायकी और उस मुकाम तक पहुँचने में संघर्ष से भरे रास्ते से आपको परिचित करवाया था | अगर आप भूल चुके हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके अपनी याद ताज़ा कर लीजिए|  दरअसल सौरव अकेले तो काम करते नहीं हैं, उनके जोड़ीदार हैं चाहत कक्कड़, तो मेरा पहले लिखा ब्लॉग तब तक अधूरा है जब तक उसमें चाहत की कहानी भी नहीं जुड़ जाती है | इसके अलावा भी सौरव मिश्रा की कहानी पढ़ कर बहुत सारे पाठकों ने मुझ से गब्बर सिंह के अंदाज में पूछा भी था – कहाँ हे रे फ़ौजी नंबर दो ? तो चलिए आज इसी फौजी नंबर दो यानी चाहत कक्कड़  से आपकी मुलाक़ात करवाता हूँ | वैसे आपको यह भी बता दूँ कि इस फ़ौजी नंबर दो में कहीं से भी पहलवान के लक्षण नहीं हैं | पहली नज़र में ही हर तरह से कलाकार नज़र आता है, गोरा चिट्टा रंग, दर्मियाना कद , चेहरा निहायत ही मासूम पर उस मासूमियत को नज़रंदाज़ करती  शरारती आंखें | चेहरे पर एक ऐसी नटखट और निर्मल मुस्कान जिसे देखकर नई पीढी को शाहिद कपूर और मुझ जैसे को अमोल पालेकर याद आ जाए | 
चाहत कक्कड़ 

कहते हैं कि जो नज़र आता है वह दरअसल होता नहीं है और जो असल वास्तविकता होती है वह नज़रों से कोसों दूर होती है| कुछ ऐसी ही कहानी है चाहत की | जब मैं इनके जोड़ीदार सौरव मिश्रा यानी फ़ौजी नंबर एक की कहानी पर काम कर रहा था तब अपनी सीमित जानकारी की वजह से दिमाग में चाहत के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियां पाल बैठा था | दोष मेरा भी नहीं था | सौरव की संघर्ष-गाथा पर ही पूरी तरह से केन्द्रित रहा | मुझे प्रारंभ से ही कुछ ऐसा लगा कि चाहत उन गिने-चुने खुशनसीबों में से है जिन्हें पारिवारिक रसूख की वजह से जिन्दगी में सब कुछ चांदी की थाली में परोसा हुआ हर सुख, वैभव और उपलब्धि सरलता से प्राप्त हो जाती है | बाद में मुझे पता चला कि मैं थोड़ा-बहुत नहीं, इस मामले में पूरी तरह से गलत था | अगर सच कहूँ तो जिन्दगी की हर परेशानियों की सौगात उन्हें कुछ ज्यादा ही मिली जिसने उन्हें इतने पापड़ बेलने को मजबूर किया कि अगर आज संगीत की दुनिया से नहीं जुड़े होते तो कसम से लिज्ज़त पापड से ज्यादा “कक्कड़ पापड” की दूकान चल रही होती | पर चाहत की किस्मत और शौक ने-तो कोई और ही मंजिल चुन कर रख ली थी – संगीत की मंजिल | आज के दिन चाहत एक उभरते हुए संगीतकार,स्टेज शो के जबरदस्त अदाकार होने के साथ-साथ ही साउंड रिकार्डिंग इंजीनियर भी हैं | संगीत के कई वाद्य यंत्र जैसे गिटार, पिआनो, ड्रम, तबला , कांगो, माउथ-आर्गन, की-बोर्ड बजाने में उनका कोई सानी नहीं है | अपने संगीत कार्यक्रमों में एक साथ कई वाद्य यंत्र बजा कर श्रोताओं को चकित और मंत्रमुग्ध कर देते हैं |

चलिए आज की राम कहानी चाहत कक्कड़  के नाम, सुनते हैं क्या कहते हैं अपने बारे में वो : 

******************* 

समझ में नहीं आ रहा कहाँ से शुरू करूँ अपनी कहानी | आज के बारे में बताऊँ जब संगीत के सागर में बहुत ही ठाठ से  तैर रहा हूँ या उस बीते समय की जब बचपन के ऊबड़-खाबड़ घोर परेशानियों से भरे दिनों की जिन्हें याद करके आज भी मैं भय से सहम जाता हूँ | मेरा बचपन पूरी तरह से दिल्ली में ही बीता, पढ़ाई-लिखाई भी ज़ाहिर सी बात है यहीं हुई | मेरे माता – पिता दोनों ही संगीत के इवेंट मेनेजमेंट के क्षेत्र से जुड़े थे | जगह-जगह संगीत कार्यक्रमों के स्टेज-शो में भाग लेते |घर पर भी गाने-बजाने का वातावरण रहता, जिसे सुन-सुन कर मेरी भी रूचि संगीत की और मुड़ती गयी | शुरुआती दौर में सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था | मुझे दिल्ली में जनकपुरी के एक अच्छे पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया | उन दिनों ही  अचानक घर की वित्तीय स्थिति में जैसे भूचाल सा आ गया | पिता जी ने जो अपने गाढ़े खून-पसीने की बचत पूंजी छोटे मोटे व्यवसाय में लगा रखी थी वह साझीदारों की बेईमानी की वजह से ड़ूब गयी | घर खर्चों में कटोती साफ़ नज़र आने लगी | पर हालात थे कि बद से बदतर होते जा रहे थे | समय पर स्कूल फीस नहीं दे पाने के कारण मेरे पिता जी को भी स्कूल बुलवा लिया जाता | जो चीजें आप फिल्मों में देखते हैं, वे सब मेरे साथ सचमुच हुई हैं जैसे फीस के कारण ही मुझे सब बच्चों के सामने अपमानित करके, क्लास से बाहर कर दिया जाता | आप समझ सकते हैं इन सब कड़वी यादों का मेरे बाल-मन पर कितना गहरा आघात पहुंचता होगा | क़र्ज़ का दीमक घर में घुस चुका था और धीरे-धीरे नींव खोखली करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था | मेरे बड़े भाई गौरव  को इस दौरान अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी | मैं हिम्मत और धैर्य की सराहना करता हूँ अपने माता-पिता और बड़े भाई का जिन्होंने इन विकट परिस्थितियों से जूझते हुए भी मेरी शिक्षा पर कोई आंच नहीं आने दी | 

माँ -पापा - श्रीमती सुमन व श्री गुलशन कक्कड़

बारहवी क्लास की बोर्ड की परीक्षा पास करने के बाद यही सोच थी कि अब आगे क्या | घर के संगीतमय वातावरण के कारण मेरा झुकाव आवाज़ की दुनिया के आस-पास ही मंडरा रहा था सो एशियन एकेडेमी ऑफ़ फिल्म एंड टेलीविजन, नोएडा से साउंड रिकॉर्डिंग के डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया| मेरे पास सीनियर सेकेंडरी में विज्ञान विषय नहीं थे जबकि साउंड इंजीनियरिंग के लिए फिजिक्स की अच्छी जानकारी होनी चाहिए | इस विषय को मैंने अलग से काफी मेहनत से पढ़ा और उस बेच में मैं सबसे ज्यादा नंबर लेकर पहला स्थान प्राप्त किया | इसके बाद पत्रकारिता और मॉस कम्युनिकेशन में स्नातक कोर्स भी कर लिया | प्रयाग संगीत समिति. इलाहाबाद से शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा भी प्राप्त की | 

अब नौकरी के लिए भी जोर-शोर से हाथ पैर मारने शुरू कर दिए थे | एक जगह नौकरी शुरू भी कर दी पर यह जो ऊपर वाला है, वह भी कुछ कम नहीं है | हमारी हिम्मत और सब्र के इम्तिहान में उसे शायद अब भी कुछ कमी नज़र आ रही थी सो हमारे सर पर एक बम और फूटा – माँ को केंसर हो गया | घर की पहले से ही जर्जर नैया जो अब तक मझदार में गोते लगा रही थी, इस केंसर के तूफ़ान से मानों पूरी तरह से बीच समुद्र में पलट चुकी थी | हालात इतने बुरे हो चुके थे कि एक तरह से दो वक्त खाने के भी लाले पड़ने लगे | अब दुनिया की सारी परेशानियां एक तरफ और माँ की जानलेवा बीमारी दूसरी तरफ| सर पर पहले से ही भारी क़र्ज़ का बोझ, ऊपर से बीमारी के इलाज़ के महंगे और कमरतोड़ खर्चे | पिछली बार जब घर पर आर्थिक संकट आया था तब बड़े भाई गौरव को अपनी पढाई छोड़ कर नौकरी पर लगना पड़ा , पर इस बार माँ की बीमारी के कारण उनकी देखभाल के लिए मुझे अपनी नौकरी ही छोड़नी पड़ी | पूरे परिवार की ज़िंदगी का एक ही मकसद रह गया था – किसी भी कीमत पर माँ की जान बचाना | पर सवाल था कीमत का, उस कीमत के लिए पैसे कहाँ से लायें | ले-देकर आसरे के नाम पर एक छोटा सा मकान था, मजबूरी में वह २५ लाख का मकान आधी कीमत में ही मन मार कर बेचना पड़ा | इस तरह ,सर पर जो छत थी, हमारा आसरा था वह भी छिन गया | किराए के छोटे से मकान में जाना पड़ा | माँ का इलाज लगातार चला | अगर मैं गलत नहीं हूँ तो लगभग 96 बार कीमियोथेरापी हुई | इस सबके बाद हमारे लिए खुशी की बात यह कि सभी शुभचिंतकों की दुआ और ईश्वर के आशीष से माँ स्वस्थ हो गयी | शायद अब तक भगवान को भी हम पर तरस आ गया था | 

संगीत का शौक मुझे बचपन से ही रहा | अपने स्कूल में कांगों बजाना अपने-आप ही सीखा | शायद नवीं क्लास में पढ़ता था तब स्कूल के ही कुछ और बच्चों के साथ मिलकर एक म्यूजिक-बैंड बनाकर पहला गाना बाकायदा रिकार्ड करवाया | स्कूल के संगीत के कार्यक्रमों में ड्रम भी बजाया करता | बाद में गिटार सीखने के लिए श्री ललित हिमांग जी की शरण में गया | गिटार जल्दी- से- जल्दी सीखने की इतनी ललक रही कि रोज आठ से दस घंटे अभ्यास करता | उँगलियों के पोर बुरी तरह से छिल जाते पर गुरु के आशीर्वाद से मैं दो माह में ही काफी हद तक गिटार पर अच्छी पकड़ बना चुका था | गिटार ने मुझे सुर-ताल का अच्छा ज्ञान दिया | रही सही कसर एशियन एकेडेमी ऑफ़ फिल्म एंड टेलीविजन में साउंड रिकार्डिंग की तकनीकी शिक्षा ने पूरी कर दी | इस पढ़ाई के दौरान मैं वहां के प्रोफेसर श्री राजेन्द्र गांधी जी से बहुत प्रभावित रहा | 
गिटार के तार - मेरा पहला प्यार 

अब मेरी नौकरी की शुरूआत हो चुकी थी | जगह –जगह हाथ पैर मारे, नामी –गिरामी रिकार्डिंग स्टूडियो में संगीतकार और साउंड इंजीनियर के रूप में काम किया, खूब अनुभव बटोरा और ख़ासा पैसा भी | पर इस बीच जैसा मैंने पहले भी आपको बताया, माँ की बीमारी की वजह से अच्छी-भली नौकरी छोड़ी क्योंकि माँ है तो सब कुछ है वरना कुछ नहीं | कुछ समय बाद दोबारा से नई शुरुआत करी लेकिन इस बार मेरे साथ एक ऐसा दोस्त मेरे साथ जुड़ गया था जो भाई से भी बढ़ कर था | जी हाँ – ये थे सौरव मिश्रा जो आज तक मेरे जोड़ीदार हैं | सुरीली आवाज के बेताज बादशाह, इनके गले में मानों साक्षात सरस्वती का वास तो था ही, साथ ही साथ गीत लिखने और धुन बनाने में भी अच्छी पकड़   | बस अब क्या था,  हम दोनों की आवाज और साज़ ही बहुत थे दुनिया में धूम मचाने के लिए | अब हम ऐसी अटूट जोड़ी बन चुके थे जिसकी सोच एक थी, राह एक थी और मंजिल एक थी | हमनें नौकरी के बंधन से दूर स्वतन्त्र रूप से काम करने की ठान ली | अब जो भी करते मिल कर करते – स्टेज शो किये, म्यूजिक वीडिओ बनाए, गानों की धुनें बनाईं, नारायण और तीन ताल जैसी फिल्मों के लिए पार्श्व संगीत दिया, मोबाइल फोन के लिए रिंग टोन्स बनाई, वीडियो गेम्स के लिए भी संगीत बनाया, रेडियो और टी.वी के लिए जिंगल्स तैयार किए   | एक तरह से देखा जाए तो यह जोड़ी ऐसे हरफनमौला दो कलाकारों की है जिसमने दोनों ही गायन, वादन और  संगीत रचना और स्टेज-शो के सही मायने में खिलाड़ी हैं |  
सौरव और मेरी जोड़ी 

मेरा बहुत ही विनम्र भाव से यह सोचना है कि अब जो भी हम काम कर रहें है, उसके बारे में अब हम नहीं बोलेंगें वरन काम बोलेगा | हमारे बनाए गाने संगीत-प्रेमियों को पसंद आ रहे हैं यही हमारे लिए संतोष की बात है | मेरे लिए सबसे बड़े आत्म-संतोष की बात यह है कि मेरे संगीत के शौक ने आज मुझे उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां मैं आज की तारीख में परिवार के सर पर सवार भारी-भरकम कर्जे के अधिकाँश भाग से मुक्ति पा-चुका हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आप सब के आशीर्वाद और शुभकामनाओं से इस सबसे अगले एक वर्ष में पूरी तरह से छुटकारा मिल जाएगा |अपने परिवार के सर पर किराये की छत नहीं, बल्कि अपनी छत दे पाऊं यही मेरी  सबसे बड़ी अभिलाषा है|

इस आप-बीती कहानी में अगर अपने जीवन साथी पूजा का जिक्र न करूँ तो सब कुछ अधूरा है | मेरे सबसे मुश्किल दिनों में पूजा ने सहारा दिया - न केवल मुझे वरन मेरी बीमार माँ को, मेरे पूरे परिवार को | अगर उसने इतनी जिम्मेदारी से यह घर नहीं सम्भाला होता तो शायद मैं अपने काम पर इतना ध्यान नहीं दे-पाता और इस मुकाम पर नहीं पहुँच पाता जहां आज मैं हूँ | समझ नहीं आता इस सबके लिए उसे क्या कहूँ – धन्यवाद, आभार, शाबाश या और कोई शब्द जिसका निर्णय मैं आप पर ही छोड़ता हूँ |

बस इक 'पूजा' और न कोई दूजा 

*********************
तो दोस्तों , कैसी लगी चाहत की कहानी जो ऊबड़ -खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अब कामयाबी के हाई-वे पर दौड़ रही है | मेरी शुभकामनाएँ  - ईश्वर चाहत की हर चाहत पूरी करे |

Wednesday, 26 December 2018

ऊँची उड़ान ( भाग चार ) : परिश्रम और भाग्य की श्रंखला

जिन्दगी में किस चीज़ का ज्यादा महत्त्व है – मेहनत का या भाग्य का, यह सवाल अरसे से मेरे दिमाग में घूमा करता था और हो सकता है मेरी तरह से आप भी बहुत से लोगों को यह सवाल परेशान करता हो | इस सीधे से पर टेढ़े सवाल का जवाब खोजने में लोगों को बरसों लग गए पर आज भी सवाल वहीं का वहीं है, बिना किसी भी जवाब के, ठीक उसी तरह जैसे कोई पूछे कि मुर्गी पहले आयी या अंडा ? कुछ-कुछ इसी तरह के जलेबी की तरह गोल सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है आज की कहानी – एक जीते –जागते इंसान की सच्ची आपबीती | 

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले बुलंदशहर के लगभग नामालूम से कस्बे खुर्जा से शुरू होती है यह कहानी | यह कहानी घूमती है एक ऐसी मेधावी छात्रा के इर्द –‍‍‍‍‍ गिर्द     जिसकी अब तक की उथल-पुथल से भरी ज़िंदगी में लगातार जंग होती रही, समय – समय पर टकराने वाली मुसीबतों से, जिनकों को पार करने के लिए कभी सामना किया मेहनत से और कभी सहारा मिला किस्मत का | बस यही तो है आज की दिलचस्प कहानी का छोटा सा परिचय | संघर्षों से लड़ने वाले जिन किरदारों से आपको ‘उड़ान’ श्रंखला के अंतर्गत अब तक आपसे मिलवाया है, आज का किरदार उम्र में उन सबसे छोटा है | मज़े की बात यह कि इस किरदार का नाम भी श्रंखला ही है – जी हाँ, श्रंखला पालीवाल, एक कुशाग्र छात्रा, जो एम.बी.बी.एस की पढाई कर रही हैं –जवाहर लाल नेहरु राजकीय मेडीकल कालेज, अजमेर से | अगर अपनी कहानी खुद श्रंखला ही सुनाए तो शायद ज्यादा अच्छा रहे | तो शुरू होती है श्रंखला की कहानी खुद उसी की ज़ुबानी : 
*******************


      मैं : श्रंखला पालीवाल 

नाम तो अब तक आप मेरा जान ही चुके हैं, दोबारा दोहराने से कोई लाभ नहीं | मुझे खुद यह कभी नहीं लगा कि अब तक जिन्दगी में कुछ ऐसा ख़ास घटा है जिससे मैं स्वयं को विशेष समझ पाऊं | वजह केवल यही रही कि होने वाली हर घटना को बहुत ही सामान्य तरीके से लिया | मेरी बाल-बुद्धि बस यही कहती है कि अपने आप को जितना आम ( खाने वाला नहीं ) समझेंगे, यह जीवन उतना ही सरल रहेगा | मेरा बचपन एक बहुत ही छोटे से शहर खुर्जा में बीता | बहुत ही साधारण पर अनोखी पारिवारिक पृष्ठभूमि, जिसमें शिक्षा और खेती-बाड़ी, कस्बे और ग्रामीण संस्कृति का अद्भुत संगम था | 



बचपन की मेरी पहली यादें जाकर पहुँचती हैं मेरे दादा जी- श्री शिव चरण पालीवाल जी पर जो आज इस दुनिया में नहीं हैं, पर जिनका प्रभावशाली व्यक्तित्व आज भी मेरी स्मृति में पूरी तरह से स्पष्ट है | उनकी दी हुई नसीहतें और समझदार सोच आज तक मुझे समय-समय पर रास्ता दिखाती हैं | मेरे दादा अपने ज़माने के लखनऊ विश्वविद्यालय से इंग्लिश और मनोविज्ञान में डबल एम.ए थे | आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र के वह जाने-माने रेडिओ-एनाउंसर थे | मेरी दादी भी इस मामले में कम नहीं रहीं, वह भी मेरी मां की तरह, आगरा यूनिवर्सिटी से एम.ए हैं | अब खुर्जा एक छोटा सा कस्बे-नुमा दकियानूसी शहर जहाँ लड़के और लड़कियों की पढ़ाई में अभी भी भेद-भाव किया जाता है | वह तो भला हो मेरे दादा-दादी के प्रगतिशील विचारों का जो अड़ गए कि पोती भी वहीं दाखिला लेगी जहाँ पोता | इस तरह भारी-भरकम कमर तोड़ फीस के बावजूद मेरे भाई के साथ मुझे भी शहर के जाने-माने महंगे पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया| यह किस्मत की परी की मेरे लिए पहली सौगात थी जो इतने समझदार दादा-दादी और माँ - पापा के रूप में मेरी जिन्दगी में आए |




                               दादा -दादी

अब मैनें भी उसी स्कूल में जाना शुरू कर दिया जहाँ मेरा बड़ा भाई रजत जाता था | मैं तब सबसे छोटी क्लास के.जी. में थी| सुबह-सुबह रोज की तरह स्कूल बस में बैठ कर स्कूल के लिए जा रही थी | तबियत कुछ खराब सी थी और रास्ते में ही बस में ही मुझे उल्टी आ गयी | स्कूल पहुँच कर जब सब बच्चे बस से उतर रहे थे, मैं अपनी पानी की बोतल से बस के फर्श पर उस फ़ैली हुई गन्दगी को साफ़ करने में लगी हुई थी | तब तक सब बच्चे बस से उतर चुके थे और मेरी मौजूदगी से अनजान ड्राइवर ने बस आगे बढ़ाना शुरू कर दिया| बस चलती देख कर मैं बुरी तरह से घबरा गयी और अपने नन्हे-नन्हे कदमों से लगभग दौड़ते हुए ही बस के दरवाजे तक पहुँची और नीचे उतरने का प्रयत्न किया | इस सब हड़बड़ाहट में, बस के पायदान पर मेरा संतुलन लड़खड़ा गया और मैं धड़ाम से नीचे गिर गयी जहाँ एक नुकीली ईंट सीधे मेरी आँख से कुछ ऊपर माथे में बुरी तरह से घुस गयी | खून का एक जोरदार फव्वारा मेरे माथे से फूट निकला और जैसे बेहोशी के अंधे कुँए में अपने आप को मैंने गिरते हुए महसूस किया | इतनी छोटी सी बच्ची होने के बावजूद भी मुझे इतना होश था कि बस आगे बढ़ रही है और मैंने अपने बचाव में तुरंत एक करवट ली वरना पिछला टायर मेरे ऊपर से निकल जाता | इसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा | जब होश आया तो मैंने अपने आप को एक अस्पताल में पाया | बाद में पता चला कि उस भयानक हादसे के बाद मुझे मुझे स्कूल वाले ही शहर के ही अस्पताल ले गए जहाँ उन्होंने प्राथमिक उपचार के बाद हाथ खड़े कर दिए और सलाह दी कि जान बचाने के लिए तुरंत दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर दिया जाए | दिल्ली में सर गंगा राम अस्पताल में मेरे चेहरे के एक के बाद कई आपरेशन किए गए | जख्म इतने गंभीर थे कि आंख और दिमाग तक पर असर पड़ने के आसार थे | डाक्टरों ने साफ़ कह दिया कि अव्वल तो जान ही खतरे में है, अगर जान बच भी गयी तो आँखों की रोशनी जा सकती है, साथ ही याददाश्त भी जा सकती है | मैं उस समय एक छोटी सी नन्ही सी जान, आपरेशन के बाद पट्टियों में लिपटा चेहरा, हड्डियों तक को दर्द से पिघला देने वाला दर्द और उन सबसे ऊपर मेरे दुःख से ज्यादा दुखी मेरे मम्मी-पापा | खैर ..... थोड़े में अगर कहूँ तो, डाक्टरों की लगातार बारह साल की मेहनत और भगवान की कृपा से मुझ पर किये गए सभी आपरेशन और प्लास्टिक सर्जरी सफल रहे, मेरी जान , मेरी आँख और मेरी याददाश्त सभी बच गयी | यह किस्मत की परी की मेरे लिए दूसरी सौगात थी जिसने मुझे एक नई जिन्दगी दी |

मेरी जिन्दगी स्कूल की पढाई और अस्पतालों के बीच घड़ी के पेंडुलम की तरह घूम रही थी | शायद उस समय ही सफ़ेद कोट पहने डाक्टरों को देख कर दिमाग के किसी कोने में में खुद एक डाक्टर बनने का सपना पाला| बस पढाई में और ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया | इसी बीच मेरे दादा बहुत ही गंभीर रूप से बीमार हो गए |तमाम प्रयत्नों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका| कहीं कुछ लगा कि इलाज मे शायद लापरवाही हुई है | डाक्टर बनने की इच्छा ने और मजबूती से संकल्प का रूप ले लिया| मेरी माँ ने हर वक्त मेरी हिम्मत बंधाई| 



अपनी दादी और माँ -पापा के साथ

इसी बीच हालात कुछ ऐसे बने कि खुर्जा छोड़ कर जयपुर बसना पड़ा | अगर ऐसे समय में हमें अपनी पुरवा बुआ जी का सहारा न मिला होता तो आज शायद कहानी ही कुछ और ही होती | जयपुर आ कर  स्कूल की पढाई के साथ मेडीकल कॉलेज के दाखिले के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की भी शुरुआत कर दी | ऐसे समय में मेरे अपने फूफा जी, जिनका खुद का अपना कोचिंग सेंटर था, मेरे लिए मानों साक्षात भगवान के रूप में अवतरित हो गए | उनकी निगरानी में मेरी तैयारी और अधिक व्यवस्थित हो गयी | यह किस्मत की परी की मेरे लिए तीसरी सौगात थी जिसने मुझे छोटे से शहर खुर्जा से जयपुर पहुंचाया और अपने कोचिंग सेंटर वाले फूफा जी से मिलवाया जिन्होंने मेरी पढाई को एक निश्चित दिशा दी| अक्सर यह सोचती हूँ कि यहाँ साक्षात किस्मत की परी मेरी बुआ जी  श्रीमती पुरवा और देवदूत के रूप में विशाल  फूफा जी ही थे | 
किस्मत की परी और देवदूत - मेरी पुरवा बुआ और विशाल फूफा जी 
पढाई मेरी लगातार पूरी मेहनत से हो रही थी | सभी परीक्षाओं में नंबर भी अच्छे आ रहे थे पर मेरा लक्ष्य तो था मेडीकल में दाखिले का | वह मेडीकल जिसमें केवल एक प्रतिशत प्रतियोगी ही दाखिले के लिए सफल हो पाते हैं | वर्ष 2015 में केवल एक फ़ार्म भरा राजस्थान के कालेजों के लिए | परीक्षा हुई पर जब रिजल्ट आया तो मेरा नाम सफल छात्रों की लिस्ट में नहीं था जो कि एक बहुत गहरा आघात था मेरे लिए | सारी आशा, सारे सपने, सारा आत्म-विश्वास  मानों पल भर में चकनाचूर हो गए | कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ | अचानक एक दिन पता चला कि उस दाखिले की परीक्षा में पेपर लीक होने की शिकायत के कारण, पूरा रिजल्ट ही कैंसिल  कर दिया गया है और दाखिले की परीक्षा दोबारा से होगी | मेरे लिए यह खबर किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं थी | पिछली बार के अनुभव से सबक लेते हुए इस बार और अधिक पढाई, और अधिक मेहनत और जब रिजल्ट आया तो .... हुर्रा .... इस बार मैं सफल थी | मैंने अपने सपने के महल में पहला कदम रख दिया था | मेरी मेहनत तो थी ही पर किस्मत की परी ने इस बार मुझे चौथी बार ऐसा अनौखा उपहार दिया था जो हर किसी को नसीब नहीं होता | असफल होने पर पूरी परीक्षा का ही केंसिल होकर दोबारा सफल होने का मौक़ा भला कितनों को नसीब हो पाता है |

खैर मेडीकल कालेज में दाखिला हो गया | हर साल प्रतिभागी छात्रों के समग्र व्यक्तित्व और बुद्धि-कौशल के मानक माप-दंडों पर कालेज में नई छात्राओं में से मिस फ्रेशर का चुनाव किया जाता है| वर्ष 2015  की मिस फ्रेशर मैं चुनी गयी| कौन यकीन करेगा कि एक छोटे से कस्बे की साधारण सी वह लड़की जिसका कभी दुर्घटना में चेहरा  बुरी तरह से बिगड़ चुका था, याददाश्त बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, वह लड़की अपनी अब तक पाली गयी सभी हीन-भावनाओं को पूरी तरह से नकार कर, गौरव से अपना सर ऊँचा कर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पुरस्कार ले रही थी | उस दिन पहली बार मुझे महसूस हुआ कि मेहनत और किस्मत की परी के साथ-साथ , मुझे यहाँ तक पहुंचाने का श्रेय जाता है मेरे दादा-दादी, मम्मी-पापा, फूफा जी और सभी गुरुजनों को | इन सभी को मेरा सादर नमन |                  
फिलहाल मैं मेडीकल के तीसरे वर्ष में हूँ | इंतज़ार है पढाई पूरी करने के बाद, सफ़ेद कोट को पहन कर लोगों की जान बचाऊं, ठीक उसी तरह जैसे किसी ने मेरी जान बचाई थी |

**********
श्रंखला की इस आपबीती कहानी सुनकर क्या आपको भी मेरी तरह  ऐसा नहीं लगता कि किस्मत की परी भी उसी के पास आती है जो संघर्षों के रास्ते पर चल कर मेहनत के पसीने की कीमत जानता है |




Saturday, 22 December 2018

चमचे की चित्रकारी



22 साल की उम्र में वर्ष  1978 में सीमेंट कॉर्पोरेशन आफ़ इंडिया के हिमाचल प्रदेश स्थित  राजबन फेक्ट्री में नयी-नयी नौकरी लगी थी | उम्र और तजुर्बा, दोनों के ही मामले में पूरी तरह से अपरिपक्व | यह उम्र का वह दौर था जब बचपन पूरी तरह से गया नहीं था और जवानी पूरी तरह से आयी नहीं थी | बस यह समझ लीजिए कि बीच की दहलीज पर थे | मेरा मानना है कि नौकरी के लिहाज से उम्र की वह दहलीज बड़ी खतरनाक होती है क्योंकि उस समय तक दुनियादारी की पूरी तरह समझ आयी नहीं होती है और दफ्तर में भी कालेज जैसी शरारतें इस हद तक कर दी जाती हैं कि अगर नौकरी सरकारी है तो सालाना रिपोर्ट खराब हो सकती है, ट्रांसफ़र हो सकता है| बदकिस्मती से अगर प्राइवेट सेक्टर या लाला  की नौकरी है तब तो ऐसी नादान कारस्तानियाँ घर बिठाने की नौबत भी ले आती हैं| एक बारगी ऐसे ही किसी खुराफ़ाती लम्हें में अपने एक दक्षिण भारतीय सहकर्मी की  नेम प्लेट के नीचे चुपके से बड़ा सुंदर सा चमचे का चित्र बना दिया था | कारण सिर्फ इतना था कि वह सहकर्मी तत्कालीन महाप्रबंधक का खासम-खास मुंह लगा सिपहलसार था | यानी पल पल की चुगलखोर खबरें  बिजली की भी तेज रफ़्तार से मास्टर कंप्यूटर तक पहुंचाने वाला उस ज़माने का वाई-फाई | इन हरकतों की वजह से बस यह समझ लीजिए कि ‘ सारी दुनिया - सारा जहान, सारे दुखी- सारे परेशान’ | अब नज़ारा देखने लायक था – जो भी कारीडोर में उस मित्र के कमरे के आगे से गुजरता, नेम प्लेट पर नज़र पड़ते ही जबरन मुस्कराहट को रोकने का प्रयत्न करता | कारगिल पर हुई पाकिस्तानी घुसपैठ की हरकत की तरह  बाहर की हलचलों से अनजान हमारा जासूस  मित्र अन्दर कमरे में अपने काम -काज में व्यस्त था जब तक कि उस जासूस के भी जासूस ने उसे बताया कि मी लार्ड ! कोई अनाम हिन्दुस्तानी सिरफिरा क्रांतिकारी आपको सरे आम  बाकायदा चमचे की पदवी से सम्मानित कर चुका है | मित्र सब काम छोड़ कर झटपट तुरंत दरवाजे की और लपके | दरवाजे पर लगी नेम प्लेट पर बना सुंदर सा चमचा मानों गागर में सागर भरे उन्हें मुंह चिढ़ा रहा था |  उन्होंने भी शायद अपने जीवन काल में नेम प्लेट पर नाम के साथ सम्पूर्ण चरित्र-चित्रण का इतना संक्षिप्त परिचय शायद ही कभी देखा हो | यह देखते ही मित्र की त्योरियां चढ़ गयीं, पहले से ही सांवली रंगत वाला चेहरा गुस्से से तमतमा कर और काला पड़ गया | लगभग दौड़ते हुए साथ लगे हुए कमरे में आए और अपनी पतली सी कांपती आवाज में मदरासी लहज़े में सभी को सुनाते हुए  चीख कर बोले- ‘किसने किया है ये सब | मैं छोडूंगा नहीं |’ इतना धमाका करने के बाद दिवाली के अनार की तरह जितनी जल्दी वह आये उतनी ही  जल्दी दनदनाते हुए मिसाइल की तरह नदारत भी  हो गए| कमरे में बैठे लोग, जिसमें इस सारे खुराफ़ात की असली जड़ - मैं भी शामिल था, उस अचानक हुए हवाई हमले के लिए तैयार नहीं थे| कुछ देर तक उस कमरे में बिलकुल पिन ड्राप सन्नाटा छा गया | धीरे-धीरे कमरे की चहल-पहल फिर से लौट आई और लोग चटकारे ले-ले कर उस घटना का मज़ा लेते हुए उस अज्ञात वीर सेनानी की  ( यानी मेरी ) हिम्मत की तारीफ़ में जुट गए जिसने सीधे –सीधे इतने मजाकिया अंदाज़ में कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया था | अब एक कोने में चुपचाप बैठे हुए मुझे उस बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी | मेरी हालत तो उस सींकिया पहलवान से भी बदतर हो रही थी जो भांग के  नशे में शेर के  ऊपर सवार तो हो गया पर नशा उतरने पर यही सोच कर अधमरा हुआ जा रहा था कि अपने हिस्से का काम तो मैंने कर दिया अब बाकी का काम शेर जी के हवाले | कहने वाले सच ही कह गए हैं कि चोर के पाँव नहीं होते | अन्दर ही अन्दर हालत पतली हो रही थी | अब जिसका डर था वही हुआ | अब अगर हमला इजराइल पर होगा तो शिकायत तो अमरीका तक जानी ही थी | कुछ ही देर बाद जनरल मेनेजर का चपरासी हाजिर हो गया इस फरमान के साथ कि चलो बुलावा आया है, जी.एम ने बुलाया है | जहाँ तक मुझे याद पड़ता है उस समय जी .एम  भूटियानी साहब थे, जो कि एक अच्छे-खासे डील-डोल के गोरे – चिट्टे सिंधी व्यक्ति थे | बहुत ही शांत स्वभाव के मधुर भाषी इंसान | पर भाई, जी.एम तो आखिर जी.एम ही होता है, यानी पूरी फेक्ट्री का एक तरह से खुदा तो खुदा से खौफ़ तो लाज़मी ही था | सो उस खुदा की दरगाह में मन ही मन राम-राम कहते दाखिल हुआ | दरगाह के एक कोने में वही मद्रासी  फरियादी रुआंसी चमचेनुमा शक्ल बनाए खड़ा था | अब तक मैं भी समझ चुका था कि लगता है मास्टर कंप्यूटर में मेरी शिकायत पहले ही वाई –फाई द्वारा अपलोड की जा चुकी है | चमचे की चित्रकारी से सजी मित्र की नेम-प्लेट सामने मेज पर अपराध के सबूत के रूप में रखी थी जो मुझे तिरछी नज़रों से देख कर इशारों में ही मानों पूछ रही थी कि गुरु मुझे पहचाना या नहीं ? हम भी मन में ठान चुके थे ,कुछ भी हो जाए, चाहे तो डी.एन.ए टेस्ट हो जाए इस नामुराद नेम प्लेट का, इस नामाकूल को हम भी मरहूम  एन.डी तिवारी की तरह से कतई अपना नहीं मानेंगे | जी.एम साहब की दबी हुई मुस्कान से यह तो जाहिर हो रहा था कि  मामला की असल वजह तो जान चुके थे पर अमरीका और इज़राइल के बीच की रिश्तेदारी की भी तो इज्जत मजबूरीवश ही सही पर  निभानी तो  पड़ेगी ही , बेशक सरसरी तौर पर ही सही | सो उन्होंने मुस्कराते हुए ही मुझसे पूछा इस नेम प्लेट को देखा है | मैनें नेम प्लेट और मित्र दोनों को ही एक नज़र से देखते हुए कहा – सर बहुत बार देखा है , पर यह चमचा पहली बार देखा है | अब साफ़ लगने लगा कि हँसी रोकना उनके लिए भी भारी सा पड़ने लगा था | फिर से पूछा कि यह तुम्हारा काम है ?  मुझे अच्छी तरह से पता था कि मेरी कारस्तानी का कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं है, सो बे-धड़क कहा ‘नहीं सर , चाहे तो मेरी हेंड-राइटिंग मिल लीजिए’ | जवाब सुनकर भूटियानी साहब ने मुस्कराते हुए अपने सर पर हाथ फेरते हुए एक ठंडी सांस छोड़ी और कहा यही तो दिक्कत है, तुम्हारी  हेंड राइटिंग से किसी भी लिखावट को तो मिलवा सकता हूँ पर इस चमचे को नहीं | कहने की बात नहीं मुकदमा बर्खास्त, मुलजिम बाइज्ज़त बरी और फरियादी वापिस अपने कमरे में जिस पर अब कोई नेम प्लेट नहीं थी |
खैर यह किस्सा तब के लिए ख़त्म हो गया | अपने उस साथी से भी मुझे किसी भी प्रकार का वैर नहीं था जो वह भी अच्छी तरह से जानते थे |स्कूल - कालेज के दिनों की तरह यह  शरारती कांड भी मेरी मौज मस्ती का ही भाग था।  उन्होंने भी शिकायत केवल संदेह के आधार पर ही की थी | स्वभाव मेरा भी शुरू से ही मजाकिया रहा इस लिए बाद में सब कुछ सामान्य हो गया | कुछ वर्षों के बाद ट्रांसफर होने पर उन मित्र के साथ बाद में एक अन्य स्थान पर भी साथ ही काम किया पर अपनी कारस्तानी की बात उनके सामने उतनी ही गोपनीय रखी जितनी आज के समय में राफेल हवाई जहाज़ की कीमत रखी जा रही है |
उस घटना को हुए तब लगभग पच्चीस साल बीत चुके होंगें | मैं तब तक देहरादून जोनल आफिस में नियुक्त था | मेरे उसी मित्र का दक्षिण भारत के किसी कोने से फोन आया कि तुम्हारी तरफ घूमने आ रहा हूँ, संभव हो तो ठहरने का इंतजाम करवा देना | यह कोई बड़ी बात नहीं थी, सब इंतजाम हो गया | दोस्त से मिलने की खुशी भी थी | पत्नी सहित पधारे मित्र से बड़े प्यार से मुलाक़ात हुई | रात को खाने की मेज पर खाने के साथ-साथ हँसी-मज़ाक भी चल रहा था | दोस्त बातें करते हुए बहुत स्वाद लेते हुए सूप पी रहे थे | अचानक मेरा ध्यान उनके हाथ में थामें सूप के चम्मच पर पड़ा | पल भर में ही मेरे शरारती खोपड़ी में पच्चीस साल पुरानी कारस्तानी घंटियाँ बजने लगीं | बहुत ही मासूमियत से मित्र को मैंने उस पुरानी घटना की याद दिलाई | याद आते ही मित्र बोले “हाँ कुछ ऐसा हुआ तो था, मेरी अच्छी-खासी नेमप्लेट का किसी नालायक  ने सत्यानाश कर दिया था | पता नहीं वह कम्बखत कौन था ?” मित्र की आँखों में आँखें डालते हुए एक शरारती मुसकराहट के साथ मैंने धीरे स्वर में धमाकेदार बम फोड़ा – “ वह नालायक, नामुराद, कमबख्त  मैं ही था जो अब तुम्हारे सामने बैठा तुम्हारे हाथ के चमचे को देख रहा हूँ |” सुनते ही हाथ का चमचा टन्न की आवाज करता सूप के बाउल में जा गिरा और दोस्त मुझे आश्चर्य से ऐसी नज़रों से घूर रहा था कि अगर शाकाहार मजबूरी न होती तो शर्तिया आज मैं उसके डिनर का हिस्सा बन जाता| दोस्त के चेहरे पर एक के बाद एक रंग तेजी से आ रहे थे, जा रहे थे । पर अंत में उनके मुंह से जोरदार हंसी का ठहाका निकला और मेरे लिए  तारीफ के दो शब्द : YOU SCOUNDREL!!

दोस्त की बात तो वही जाने पर उस रहस्य का पर्दाफ़ाश करके मैं तो उस रात भरपूर नींद सोया, कहते हैं ना सच बोल कर दिल का बोझ हल्का हो जाता है |अब आप भी कुछ ज्यादा ही सीरियस मत हो जाना..... उस दोस्त से अभी भी खूब मस्ती की गप्पबाजी होती रहती हैं |         



Wednesday, 12 December 2018

पंजाब दा पुत्तर - पम्मा

अभी पिछले दिनों ही एक बहुत ही करीबी सिख परिवार की शादी में सम्मिलित होने के लिए लुधियाना ( पंजाब) जाना हुआ | शादी दिन की थी | धार्मिक परम्परा के अनुसार दुल्हा- दुल्हन के फेरे गुरूद्वारे में हुए और उसके बाद एक तो पंजाब और ऊपर से शादी भी सरदारों के यहाँ जो वैसे ही अपनी जिंदादिली और तड़क-भड़क के लिए मशहूर हैं, तो धूम-धड़ाका, हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा होना तो स्वाभाविक ही था | एक कोने में चुपचाप बैठा इसी मौज- मस्ती का आनंद उठा रहा था कि अचानक सामने कुछ हलचल सी नज़र आयी | एक नवयुवक बार- काउंटर पर सर्व कर रही लड़की के पास आ कर सेल्फी लेने का प्रयत्न कर रहा था | जाहिर तौर पर वह लड़की इस मनचले की हरकत के लिए तैयार नहीं थी | पर वही बात , दारू के नशे में हर शख्स किसी शहंशाह से कम नहीं होता और उस शहंशाह को जमीन पर उतारने के लिए बात या फिर लात का ही सहारा लेना पड़ता है | तभी क्या देखता हूँ कि वहां पर न जाने कहाँ से अचानक काले सफारी सूट में एक भीमकाय, बलिष्ठ नौजवान अलादीन के जिन्न की तरह से प्रकट हो जाता है | पहली नज़र में देखते ही दिमाग चकरा जाता है कि उसे नौजवान कहूँ या पहलवान | हमारी- आपकी गर्दन से मोटी तो उस शख्स की बाहों के डोले थे |
बाउंसर पम्मा 
उस पहलवानी शांतिदूत ने बड़े ही प्यार से उस मनचले शहंशाह को अमन का सन्देश मुस्कराते हुए बातों के द्वारा ही इस प्रकार से दे दिया कि नवाब साहब ने वहां से इज्ज़त बचाकर भागने में ही भलाई समझी | आसान शब्दों में बस यह समझ लीजिए कि बातों से ही काम बन गया और लात रूपी ब्रह्मास्त्र की आवश्यकता ही नहीं पड़ी | 

बैठे –बिठाए दिमाग में ख्याल आया कि भाई यह भीम तो बड़े काम की चीज है ठीक उसी तरह जैसे क्लास में मानीटर होता था | शरारती बच्चों को काबू में लाने का जिम्मा उसी का होता था | मिलने पर बहुत ही अदब से उसने मुझे बताया कि सर मेरा नाम है पम्मा और मेरा काम है बाउंसर का | काम का नज़ारा आप देख ही चुके हैं | 
मैं और पम्मा (बाएं से)  
मैंने उसे सुझाव दिया कि चलो पम्मा भाई, कहीं बैठ कर शांति से बात कर लेते हैं | पम्मा ने फिर वही अपनी चिर-परिचित मुस्कराहट के साथ जवाब दिया कि सर मैं ड्यूटी पर हूँ और बैठ नहीं सकता | बस इसके बाद डी.जे के कानफाडू संगीत के शोर-शराबे के बीच ही शुरू हो गया पम्मे से बातचीत का एक ऐसा सिलसिला जिससे उसकी ज़िंदगी और प्रोफेशन के बहुत सारे रोचक और भावुक कर देने वाली छुए –अनछुए पहलू निकल कर सामने आये | 
एक तस्वीर बचपन की 
मैं यहीं लुधियाना से तकरीबन 40 कि.मी दूर एक कस्बा है – जगरांव , वहीं का रहने वाला हूँ | वहीं पैदा हुआ , पला – बढ़ा पर बदकिस्मती से कुछ ख़ास पढ़-लिख नहीं पाया जिसका मुझे आज तक मलाल है | अपने गाँव में एक हज़ार रुपये महीने पर भी एक दुकान में काम किया | अगर मैनें पढ़ाई की होती तो आज मैं कुछ और बेहतर हालात में होता | हमारे गाँव में भी वही समस्या है जिससे सारा पंजाब आज भी जूझ रहा है – नशे की लत | घर-घर में नशे का जहर आज की नयी पीढी को बरबाद कर रहा है | हालत यहाँ तक पहुँच चुकी है कि हर कमजोर शरीर के बच्चे और जवान पर नशेड़ी होने का शक किया जाता है| आज जो आप मेरा पहलवानी शरीर देख रहे हैं उसे बनाने के पीछे भी यही वजह है कि लोग मुझे भी नशेड़ियों की जमात में शामिल न समझें | नशे से मुझे सख्त नफरत है| 
मजबूत कंधो  पर जिम्मेदारी भी भारी 
मेरे घर के हालात अच्छे नहीं रहे | पुरखों ने अपनी जमीन – जायदात काफी हद तक दान- पुण्य में गवां दिया | अब मुझे जिन्दगी के बहुत ही मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है | मेरा यह फौलादी जिस्म ही मेरा खेत, खलिहान , पूंजी सब कुछ है | रोज एक से डेढ़ घंटे की कसरत नियमित रूप से करता हूँ | पर इसे बरकरार रखने के लिए जरूरत के हिसाब से सही ढंग का खान-पान बनाए रखना भी मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती है| बाउंसर का काम मैं करता जरूर हूँ पर मजबूरी में | इस काम में इज्ज़त नहीं है | जब लोग समारोहों में सबके सामने हमसे बहुत ही बे-अदबी से पेश आते हैं, अबे-तबे कह कर बात करते हैं, सच कहता हूँ दिल पर सीधे चोट लगती है | उन बदतमीजियों का माकूल जवाब तो मैं भी दे सकता हूँ पर घूम फिर कर बात वहीं रोजी-रोटी पर आ कर ठहर जाती है इस लिए हाथ बंधे ही रखने पड़ते हैं | एक बात और – मुझे भले लोग भी मिले हैं | वर्जिश करने के लिए मैं जिस जिम में जाता हूँ उसके मालिक सतनाम जी ने मेरे हालात देख कर मुझ से आज तक कोई फीस नहीं ली | अपने दोस्तों का भी मुझे भरपूर प्यार मिला है जो मेरे हर सुख दुःख में मेरा साथ देते हैं | 
मेरे दोस्त 
मेरा सपना है किसी तरह से विदेश चला जाऊं | पाई-पाई करके पैसे भी जोड़ रहा हूँ | वहां जा कर अपने लायक काम तो मैं खोज ही निकालूँगा, इतना तो खुद पर भरोसा है | आखिर 23 साल की उम्र में 105 किलो का यह 6 फीट का शरीर कब काम आयेगा | 
खुदा खैर करे - बुरी नज़र से 
अपने तजुर्बे से आप सब दोस्तों के लिए मेरा बस यही सन्देश है : पढ़ाई –लिखाई जरूर करिए और नशे से दूर रहें, कामयाबी आप के कदम जरूर चूमेगी |
*********************
हमेशा की तरह से इस बार भी मैं आप से अनुरोध करूंगा कि पंजाब के इस भीम-पुत्र पम्मा के चमकदार भविष्य के लिए आप सच्चे मन से दुआ करेंगे जो इतना दिल का सच्चा इंसान है जिसने मुझे यह भी बता दिया कि आप जो लिखेंगे उसे मैं अपने दोस्तों से ही पढ़वा कर सुनूंगा क्योंकि मैं पढ़ाई –लिखाई में कच्चा हूँ |

Wednesday, 5 December 2018

कविता पर बवाल

एक  पुराना चित्र -कवि सुमित्रानंदन पन्त जी  (बाएँ) साथ मेरे पूज्य पिता श्री रमेश कौशिक  

अगर मैं सीधे-सीधे आपसे कहूँ कि किसी ज़माने में मेरे 
पूज्य पिता जी को सरकारी नौकरी के दौरान चार्ज-शीट मिली और अनुशासनिक कार्रवाई भी हुई तो आप तुरंत सोच लेंगें कि जरूर कोई घोटाला किया होगा या दफ्तर के काम में कोई लापरवाही की होगी | अरे ना भाई ना .... इतनी जल्दी इतनी दूर की मत सोचिए और इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर भी मत पहुँच जाइए| ज़रा धीरज रखिए ... सब कुछ बताता हूँ | अब आप की भी कोई गलती नहीं है, हमारे देश में में यह हाल है कि अगर किसी के घर में कोई सगा-संबंधी भी पुलिस की वर्दी में आपसे मिलने आपके घर आ tजाए तो मौहल्ले भर में तुरंत ही आपके बारे में कानाफूसी और चर्चे शुरू हो जाएंगे | अब क्या बताऊँ आपको, मेरे पिता जी- स्व० श्री रमेश कौशिक, सीधे-साधे व्यक्ति पर अत्यंत प्रख्यात साहित्यकार, दर्जनों पुस्तकों के लेखक और कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  पुरस्कार प्राप्त कवि, उनका इन दफ्तरी झमेलों और तिकड़म-बाजियों   से दूर-दूर का कोई सम्बन्ध नहीं | वह तो एक सरकारी संस्थान – दिल्ली परिवहन निगम में हिन्दी अधिकारी के पद पर सेवारत थे | सरकारी नौकरी भी मजबूरी वश ही कर रहे थे क्योंकि उनकी सोच थी कि केवल कविता के दम पर परिवार नहीं पाला जा सकता | अब हुआ कुछ यूं कि वर्ष1973  में उनका एक कविता संग्रह ‘चाहते तो ...’ प्रकाशित हुआ | उस कविता संग्रह में ही चार पंक्तियों की कविता थी जिसका शीर्षक था संसद |  तो भाई लोगो, वैसे तो कविता  रूमानियत से भरी होती है लेकिन  कभी-कभी इतनी विस्फोटक और हंगामेदार भी  हो जाती है कि स्वयं कवि को भी लेने के देने पड़ जाते हैं |  यह भी कुछ ऐसा ही मामला था|  कविता कुछ इस प्रकार से थी ;-
          संसद

          संसद
 
         एक दल-दल है 
          जहाँ हर मेंढक
 
          कमल है |

उक्त कविता पर इतनी तीखी प्रतिक्रया तत्कालीन सत्ताधारी राजनीतिक नेताओं द्वारा हुई कि उस कविता में निहित व्यंग को पचा भी नहीं सके | अपने खिसियाहट भरी खीज को उन्होंने संसद में प्रश्न पूछ कर निकाला | नतीजा कार्यालय की तरफ से बेचारे कवि के नाम चार्ज-शीट जारी हो गयी | नौकरी पर बन आई | कसूर केवल यह कि सरकारी नौकरी में होते हुए भी आपने संसद के प्रति अवमानना का भाव कविता के माध्यम से प्रदर्शित किया | अब अगर कवि के स्थान पर कोई भ्रष्ट रिश्वतखोर नौकरशाह होता तो ले-देकर बेधड़क साफ़ निकल जाता | किसी ज्ञानी संत ने कहा भी  है कि रिश्वत लेते पकड़े जाओ तो रिश्वत देकर छूट जाओ पर यहाँ तो लेखनी की मार के सताए लेखक को स्वयं लेखनी भी संकट से नहीं उबार पाती है | मरता क्या न करता .....नौकरी बचाने के लिए  उस कविता के संदर्भ में मिली चार्जशीट के जवाब में जो स्पष्टीकरण  अफसर-कवि ने दिया वह जितना विद्वतापूर्ण है उससे कहीं अधिक रोचक भी है | कविता तो आप पढ़ ही चुके हैं, अब आप उस जवाब को भी पढ़ लीजिए : 
                                                                        ***********

उपाध्यक्ष महोदय ने मेरे कविता संग्रह “चाहते तो ...’ की कविताओं के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण मांगा है | इससे पूर्व कि मैं रचनाओं के सम्बन्ध में कुछ कहूँ, यह बताना चाहूँगा कि साहित्य-क्षेत्र में मेरे अनेक विरोधी हैं|अभी पिछले दिनों अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने मेरी रचनाओं की प्रशंसा की है | इस प्रशंसा को मेरे विरोधी पचा नहीं पा रहे हैं | इसलिए हानि पहुंचाने के उद्देश्य से वे बहुत से षडयंत्र रच रहें हैं |

दूसरे मेरी कविताएं साहित्य के अंतर्गत आती हैं | मैंने ईमानदारी और सच्चाई से अपने कवि-धर्म का पालन किया है | महात्मा गांधी ने भी तो यही कहा है कि धर्म-पालन के रास्ते में मुसीबतें भी आयें तो डरना नहीं चाहिए | मेरी कविताओं को आपत्तिजनक मानने का कोई कारण नहीं है |

संसद कविता के सम्बन्ध में मेरा मत इस प्रकार है :-

संसार में संसद की परम्परा हज़ारों वर्ष से चली आ रही है | यह शब्द ऐसा नहीं है, जो केवल भारतीय संसद के लिए ही प्रयोग हो| ज्ञान मंडल लिमिटेड, वाराणसी से प्रकाशित ‘ वृहत हिन्दी कोश’ में संसद के जो अर्थ दिए हैं, वे इस प्रकार हैं :-
सभा, न्यायालय, न्याय, धर्म की सभा , चौबीस दिन चलने वाला एक यज्ञ, समूह, राशि, साथ बैठने वाला, यज्ञ में भाग लेने वाला |

उपर्युक्त अर्थों में कोई भी अर्थ ऐसा नहीं है जिससे यह सिद्ध होता हो कि संसद भारतीय पार्लियामेंट को ही कहते हैं | इस छोटी सी रचना में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे भारतीय संसद के सम्मानित सदस्यों के आदर में कुछ कमीं होती हो | ‘दल-दल’ शब्द का अर्थ कीचड़ ही क्यों लिया जाए ? ‘दल-दल’ दो शब्द हैं, एक नहीं |बीच का डेश इसी लिए लगा है | संसद में अनेक दल होते हैं, इसे कौन अस्वीकार करेगा | रही बात मेंढक शब्द की, जिस पर कुछ लोगों को आपत्ति है | उन्हें क्यों आपत्ति है, यह मेरी समझ में नहीं आता| गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण में लिखा है –

ईश्वर अंश जीव अविनाशी


चेतन अमल सहज सुख रासी

ईश्वर का जो अंश एक साधारण आदमी, या एक सम्मानीय सदस्य में है,वही मेंढक में भी है | हमारा अहं (ego) ही हमें दूसरों से अपने को श्रेष्ठ समझने के लिए बाध्य करता है, जो भ्रम है | भूतपूर्व राष्ट्रपति डा० राधाकृष्णन ने भी अपनी किसी पुस्तक में लिखा है कि यदि किसी पशु से भी पूछा जाए कि संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कौन है, तो वह अपने को ही बतायेगा | वास्तविकता से देखा जाए तो तुलना से मान-सम्मान का प्रश्न पैदा नहीं होता | यदि देखा जाए तो तुलना मेंढक से न होकर कमल से है | अपने देश में किसी की कमल से समानता कर दी जाए तो प्रसन्नता ही होनी चाहिए |

यदि यह मान भी  लिया जाए कि तुलना मेंढक से है तो ‘मेंढक’ शब्द का अर्थ यह भी है  - जो अपने ‘मैं’ को ढ़क  ले, यानी जो अपने अहं को ढक कर कमल की भांति ऊपर उठे | इस अर्थ से भी सदस्यों के गौरव में वृद्धि होती है|

जीव-विज्ञान और चिकत्सा-शास्त्र के विद्यार्थी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि मेंढकों के बलिदान ने मानवता की कितनी सेवा की है | इन सीधे-सच्चे जीवों की प्राण-आहुति पर ही आज की सर्जरी की नींव खड़ी है | ठीक ऐसे ही जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों पर हमारी आजादी का महल खड़ा है | इस जीवों से समानता किसी के लिए भी गर्व का कारण हो सकती है |
इसी सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास की एक और चौपाई का उल्लेख करना चाहूँगा | उन्होंने रामायण में लिखा है :-

दादुर धुनी चहुँ ओर सुहाई 


वेद  पढ़ेऊ जिमी वटु समुदाई 

इन पंक्तियों में ‘ दादुर-धुनि’ यानी मेंढकों की आवाज की ‘वेदवाणी’ से तुलना की है | वेदवाणी को हमारे देश में ईश्वरीय या ऋषि वाणी मानते हैं | वेद सर्वत्र समादरणीय हैं | किन्तु पिछले 400 वर्षों के इतिहास में एक भी व्यक्ति ने तुलसीदास पर यह आरोप नहीं लगाया कि मेंढकों की आवाज की वेद – वाणी से तुलना करके कवि ने वेदों का अपमान किया है | यही स्थिति मेरी कविता के सम्बन्ध में भी है | मैं इस बात को जोर देकर फिर कहना चाहूँगा कि इससे संसद सदस्यों के सम्मान में किसी भी प्रकार की कमीं नहीं हुई |

अंत में, मैं यह कहना चाहूँगा कि मुझे अपने देश, संसद, जनतंत्र और बापू जैसे महापुरुषों पर गर्व है | रचानाओं के पीछे मेरी ऐसी भावनाएं नहीं रहीं जिससे इनके सम्मान में कमी हो | मैं आशा करता हूँ, मेरे इस स्पष्टीकरण से उन भ्रमों का निवारण हो गया है, जो मेरे विरोधियों द्वारा फैलाए जा रहे हैं |               
                  *******************************
कहने की बात नहीं इतना सब स्पष्टीकरण देने के बावजूद भी वही हाल रहा कि  भैंस के आगे बीन बजाए भैंस खड़ी पगुराय |  स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना गया फिर भी गनीमत रही कि केवल चेतावनी पत्र से ही जान छूटी और नौकरी जाने का खतरा टल गया | इस पूरे  प्रकरण को पढ़ कर उस त्रासदी का अनुभव किया जा सकता है जिसमें से एक लेखक की सच्चाई बयान करती कलम को सत्ता और नौकरशाही का मदमस्त हाथी अपने पांवों तले कुचलता चला जाता है और वह भी केवल इसलिए कि उसके सर पर सरकारी डंडा सवार है |  बेचारा लेखक तो केवल यही गुनगुना कर रह जाता है –


      वो ना  समझे हैं ,


ना समझेंगे मेरे दिल की बात

या इलाही ये माजरा क्या है ?


  

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...