Thursday, 21 March 2019

हैदर का हौसला

ज्यादा पुरानी बात नहीं है | बहुत दिनों से घर पर बैठा बोर हो रहा था | घर से बाहर निकलना ही था सो घूमते- फिरते जा पहुंचा हुमांयू के मकबरे पर जो कि मेरे घर से कोई ख़ास दूर भी नहीं है | यह मकबरा दिल्ली के ख़ास दर्शनीय स्थानों में से एक है जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जा चुका है इस जगह पर मुग़ल सल्तनत के बादशाह हुमांयू और उसके वशंजों और ख़ास दरबारियों को यहीं दफनाया गया था | हरे-भरे बाग़ में बसी यह यह सुन्दर सी इमारत मुग़ल वास्तु-कला का जीता-जागता नायाब नमूना है | | ऐतिहासिक महत्त्व का होने के कारण इस जगह पर देशी –विदेशी सैलानियों की भरमार लगी रहती है | किसी समय हरी-भरी दिल्ली आज इस मुकाम पर पहुँच चुकी है कि ताज़ी हवा में सांस लेने के लिए भी मकबरे और कब्रिस्तानों का आसरा लेने की नौबत आ चुकी है | 

हरियाली में घिरा हुमांयू का मकबरा 
तो उस दिन हुआ कुछ ऐसा कि मकबरे में घूमते-घामते, वहां के बाग़ तक भी टहलते हुए पहुँच गया | भीड़-भाड़ से दूर उस हरे-भरे पार्क में एक अनोखी शान्ति विराजमान थी | ताज़ी आबो-हवा और हरियाली उस पूरे माहौल को एक अलग ही ऐसी रंगत दे रही थी जिसे शब्दों में बताना भी मुश्किल है | एक पेड़ की छाँव में बैठा हुआ इस पूरे आलौकिक वातावरण के आनंद में पूरी तरह से खोया हुआ था कि अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज में आलाप लेता हुआ एक बीस-बाईस साल का लड़का नज़र आया | वह उस पार्क के चक्कर काट रहा था पर लगता था जैसे किसी और ही दुनिया में खोया हुआ है | पहली नज़र से देखने में ही वह एक अलग ही दुनिया का बाशिंदा महसूस हो रहा था क्योंकि उसके गले से संगीत की मीठी स्वर-लहरियां किसी पहाड़ी झरने की तरह से फूट रहीं थी | मेरे पास से जैसे ही वह गुज़रा, मैं स्वयं को उससे बात करने से रोक नहीं पाया | उसने अपने बारे में जो भी बताया वह मेरे दिमाग़ को झकझोरने के लिए काफी था | आइये आज आपसे भी उस बातचीत को साझा करता हूँ -
हैदर का बचपन  

उस लड़के का नाम है - हैदर अंसारी | बचपन से निहायत ही गरीबी के माहौल से टक्कर लेते हुए किसी तरह से गुज़र-बसर हो रही है | पिता की मौत तभी हो गयी जब हैदर महज सात साल का था | 
दिवंगत अब्बू के साथ हैदर 
हालात इतने खराब हो चले कि जिस माँ ने कभी घर से बाहर कदम नहीं रखा, परिवार पालने के लिए बेचारी को पान के खोखे पर बैठना पड़ा | बचपन से ही हैदर और उसके भाइयों को भी इस काम में हाथ बटाने के लिए दुकान पर भी बैठते |
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं
इस तंगहाल ज़िंदगी से परेशान हूँ मैं 

(फोटो सौजन्य : मौहम्मद समीर)
हुमांयू के मकबरे के इलाके में ही बसी हुई झौंपड-पट्टी में रहा | कुछ साल पहले मकबरे की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का काम जब आगा खां ट्रस्ट और भारत सरकार द्वारा हाथ में लिया गया तब उस बस्ती को ही गिरा दिया गया | सर पर जो आसरा था वह भी छिन गया | वह तो गनीमत थी कि सरकार ने इस बात का ख्याल रखा कि बस्ती से उजड़ कर जाने वालों को तीस किलोमीटर दूर रहने की जगह दिलवा दी | पर हालत तो अब इस मायने में और बुरी हो गयी कि रिहाइश दिल्ली के एक कोने में और काम-धंधा वहां से इतनी दूर | हैदर को इस बात का बहुत मलाल है कि माँ को रोज काम के सिलसिले में ३० किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है | पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर हैदर ने बताया कि वह बारहवीं कक्षा तक दिल्ली पब्लिक स्कूल , मथुरा रोड से पढ़ा है | यह दिल्ली का नामी-गिरामी स्कूल है जहां पर अच्छे-अच्छे अमीर और खासे रसूख वाले लोग भी अपने बच्चों का दाखिला करवाने के लिए तरसते हैं | हैदर वहां कैसे पहुँच गया ? खुद हैदर ने यह राज़ खोला कि इस इतने नामचीन स्कूल में दाखिला मिलने में भी आखिर उसकी गरीबी ही काम आयी | सरकारी दिशानिर्देशों के कारण उन पब्लिक स्कूलों के लिए आस-पास के इलाकों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए भी दाखिला देने की बाध्यता होती है | सुनकर एक बारगी तो मैं भी सोच में पड़ गया- पैसा जहां काम न आया, ग़ुरबत ने अपना काम कर दिया | हाँ इतना जरूर था कि सुबह के समय साहबी बच्चों के बाद ही उन गरीब बच्चों के लिए स्कूल में शाम के समय अलग शिफ्ट में पढ़ाई करवाई जाती जिससे राजा और रंक में हमेशा से चला आ रहा फर्क आगे आने वाली नस्लों में भी बाकायदा बरकरार रहे |
अब बात आयी संगीत के शौक की तो हैदर ने बताया कि यह जुनून तो उसमें बचपन से ही है | हाँ इतना जरूर है कि पैसे की किल्लत के कारण इसकी विधिवत शिक्षा उस प्रकार से नहीं ले पाया जैसी होनी चाहिए थी | इस बात का मलाल आज भी उसे है कि संगीत के गुरू का हाथ अगर सर पर होता तो शायद आज वह भी उस मुकाम से बहुत बेहतर होता जहां आज है | वह महसूस करता है कि उसकी हालत बहुत कुछ उस नौसीखिए तैराक की तरह है जिसे समुद्र में सीधे धकेल दिया गया हो| अपने हाथ-पाँव मार कर , संगीत के प्रति जन्मजात रुझान और शौक की वजह से और दूसरे अच्छे गायकों को सुन-सुन कर ही खुद रियाज़ कर लेता है | जहां कहीं भी कोई संगीत का कार्यक्रम होता है कोशिश होती है अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिल जाए , चाहे पैसा न भी मिले | 
गाने का दीवाना : हैदर अंसारी 
हैदर बताते हैं कि इनके कई गाने यू ट्यूब पर भी हैं | पैसे की तंगी के बावजूद , इन गानों की वीडिओ रिकार्डिंग भी किसी न किसी तरह से करवा ही लेते हैं| कभी दोस्तों से उधार ले कर तो कभी मदद लेकर | यही कारण है कि ज्यादातर म्यूजिक वीडिओ में हैदर किसी और के साथ नज़र आते हैं | ये दूसरे कलाकार अक्सर वही होते हैं जो उस वीडिओ के लिए आर्थिक योगदान देने में सक्षम होते हैं | यह बात नहीं है कि इन साथी कलाकारों के हुनर में किसी प्रकार की कमीं है , उनकी गायकी अपनी जगह और आर्थिक सहायता अपनी जगह | स्वभाव से ही संवेदनशील हैदर बहुत कम बोलने वाला और अपनी ही दुनिया में खोया रहता है | दिमाग में उधेड़-बुन चलती रहती है जब कोई नया गीत जन्म ले रहा होता है | अपनी माँ के प्रति आदर और सम्मान देने के लिए अन्य साथी कलाकार- अल्ताफ शाह  के साथ एक म्यूजिक वीडिओ बनाया है जिसे आप भी पसंद करेंगे | हैदर की यही दिली इच्छा है कि संगीत की दुनिया में इतना नाम कमाए कि माँ को मेहनतकश ज़िंदगी से निजात मिल सके | नीचे के लिंक पर आपके लिए उसी गीत को दे रहा हूँ , जरूर सुनिएगा :

और हाँ , चलते-चलते मेरे दिमाग में एक फितूरी ख्याल भी मंडरा रहा है | पुराने ज़माने में बादशाहों के दरबारियों में संगीतज्ञों और गायकों की ख़ास इज्ज़त होती थी जैसे तानसेन, बैजूबावरा | मुझे लगता है उन जैसे ही किसी की आत्मा हैदर के रूप में आज भी उस मकबरे में सोये पड़े शाही खानदान का सुरीला मनोरंजन कर रही है |



Friday, 15 March 2019

भोलू का दर्द

उस दिन सुबह-सुबह एक पिल्ले की दर्दनाक चीखों की आवाज सुनकर बिस्तर छोड़ कर घर के बाहर निकला | मैं मोहल्ले की उस पूरी कुत्ते और पिल्ले बिरादरी से पहले से ही भली तरह से परिचित था | आप यह भी समझ सकते हैं कि एक तरह से वो सब मेरे दोस्त रहें हैं – और मेरे घर के रेम्प पर ही उनका रात भर जमावड़ा रहता है | हर सुबह घर से बाहर निकलने पर सबसे पहले उनकी टीम ही मेरा उछल-कूद कर हार्दिक अभिनन्दन करती है | महानगरों की आज की संस्कृति में, जब पड़ोसी भी पड़ोसी को नहीं पहचानता है, ऐसे में ये बेजुबान दोस्त ही रह जाते हैं इंसानों को यह याद दिलाने के लिए कि इस दुनिया में अगर आप भूल चुके हैं अपनेपन की भावना को तो हम से सीखो | क्या देखता हूँ सड़क के किनारे एक पिल्ला भयंकर पीड़ा में पड़ा रो रहा है | उसकी इन चीखों को सुनकर उसकी माँ भी तुरंत दौड़ती हुई आ गयी | उसी पिल्ले के , जिसे हम आगे भोलू के नाम से पुकारेंगे, छोटे-छोटे अन्य साथी भी आनन-फ़ानान में आ पहुँचे | उन साथियों में से एक ने तो महीन सी आवाज में रोना भी शुरू कर दिया | एक दूसरे साथी ने शायद भोलू का ध्यान बटा कर दर्द कम करने की कोशिश में, उसके साथ हल्का सा खिलवाड़ करने की तरकीब आजमानी चाही | पर हुआ इसका ठीक उल्टा असर – भोलू की माँ को यह कोशिश नागवार गुज़री और उस शरारती दोस्त को बुरी तरह से झिंझोड़ कर ऐसा करने से रोक दिया | भोलू की माँ का गुस्सा पूरे सातवें आसमान पर था | गुस्से में उसने सड़क के पास से निकलने वाले एक राहगीर को काटने की भी कोशिश की | अब तक मैं वहां खड़ा सारी स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहा था | क्या देखता हूँ कि थोड़ी ही दूर सड़क पर एक कार खडी हुई है | अब मैं समझ चुका था , यह वही तेज रफ़्तार कार थी जो कुछ ही देर पहले भोलू की टांग को बुरी तरह से कुचलती हुई आगे निकल गयी थी | गाड़ी में बैठा नवयुवक, अन्दर से ही रियर- व्यू मिरर से अपनी करनी का नतीजा देख रहा था | पता नहीं कैसा इंसान था, इतनी मानवता भी नहीं थी कि कम से कम गाडी से नीचे उतर कर उस रोते हुए बेजुबान निरीह प्राणी को एक नज़र देख तो लेता | कुछ ही देर में उसने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और चलता बना | 

भोलू का अब भी रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था | कुछ देर बाद बेचारे ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपने तीन टांगों के सहारे से ही सड़क के किनारे एक पेड़ की छाँह तक पहुंचा और निढाल हो कर एक तरह से बेहोश हो कर पड़ गया | अभी तक मैं भी उसे उठाने की कोशिश नहीं कर रहा था और उससे पहले लगी चोट का जायजा लेना चाह रहा था | भाग्यवश भोलू को बाहर से खून नहीं निकला था पर पैर में शायद अंदरूनी चोट थी| दोपहर तक भी उस गरीब का वही खराब हाल था | अब सोचा इसे किसी डाक्टर को दिखा देता हूँ , पर मेरे घर के पास का डाक्टर तो साहबों के कीमती कुत्तों का डाक्टर था और उसकी मोटी ताज़ी फीस भी मुझ रिटायर्ड आदमी की पहुँच से बाहर | एक और एन.जी.ओ. डिस्पेंसरी का पता चला जो काफी हद तक ठीक –ठाक थी| दोपहर को उस अस्पताल में भोलू को लेकर पहुंचा | डाक्टर ने मुआयना करके दो इंजेक्शन लगा दिए और कहा इससे ही आराम आ जाना चाहिए | अब भोलू को वापिस ले आया | बेचारे का दर्द दो दिन के बाद भी वैसा ही | फिर से उसी अस्पताल में भोलू को ले कर गया | इस बार डाक्टर ने भी मेरे आग्रह करने पर और ज्यादा ध्यान से मुआयना किया क्योंकि मैं उसे इस बार भी भुगतान करने का आश्वासन भी दे चुका था | पता चला भोलू के पाँव में फ्रेक्चर था | अब उस फ्रेक्चर पर बाकायदा प्लास्टर चढ़ाया गया | उस पूरे समय भोलू बेचारा दर्द से चीखें मारता रहा | खैर .... जैसे- तैसे प्लास्टर करवा कर वापिस घर आया | तौलिये में लिपटे भोलू को देखते ही उसकी सारी दोस्तों की मंडली ने खुश होकर घेर लिया और उसकी माँ की खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही नहीं था | मेरे घर में भोलू ज्यादा देर नहीं रुका | उसके दोस्त गेट के बाहर से ही शोर मचा-मचा कर मानों पूछ रहे हों – हाल कैसा है जनाब का |आखिर घर के बाहर पार्क में बने उसके पुराने अड्डे पर उसे छोड़ दिया | प्लास्टर बंधी टांग से पहले दिन तो भोलू परेशान रहा पर अगले दिन से उसे काफी हद तक आराम मिला | उसके दोस्त अब आस-पास ही घूमते रहते हैं जिससे भोलू का मन भी लगा रहता है | आइये आप को भोलू के दर्शन भी करवा देता हूँ :
भोलू का बेड रेस्ट 


दोस्त मेरे साथ है - अब पहले से कुछ आराम है 

अब अगर आराम है तो थोडा घूमने में क्या बुराई है 
मेरी आप सभी से केवल एक गुजारिश है : जब कभी भी अपनी गाड़ी में बैठें, उससे पहले एक बारगी नीचे झाँक कर अवश्य देख लें कहीं कोई बेसहारा कुत्ता, गर्मी से बचने के लिए , छांह की आस में , उसके नीचे तो नहीं बैठा | हम सब इंसान हैं इसलिए सड़क पर गाड़ी भी इंसानों की तरह से ही चलायें जिससे किसी को भी चोट न लगे – चाहे वह इंसान हो या जानवर | अगर आप को ध्यान हो , केरी की दर्दनाक मौत भी स्कूल बस की लापरवाही से ही हुई थी | (एक थी केरी -  भाग 2 )
अब तो मुझे बस इंतज़ार है जब चालीस दिनों के बाद भोलू के पाँव का प्लास्टर कटेगा | मैं उसके पाँव के ठीक होने की ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ और आप भी करिए क्योंकि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है | जिस दिन भोलू अपने पैरों पर दौड़ेगा मैं आपको वह खुशखबरी भी जरूर दूंगा | आप भी इंतज़ार कीजिए |

Saturday, 9 March 2019

लैला, मजनूं और कर्नल


लैला, मजनूं और कर्नल - लगता है ना बड़ा ही अजीबो-गरीब जोड़-तोड़ | आप भी सोच रहे होंगें इन तीनो का क्या मेल | यह तो बिलकुल ऐसा ही लगता है जैसे तोता-मैना और बंदूक का आपस में हिसाब-किताब हो | आपका सोचना भी अपनी जगह ठीक हो सकता है पर कभी-कभी असल ज़िंदगी में जब ये आपस में टकरा जाते हैं तो वाकई में ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है कि न उगलते बनता है और न निगलते | चलिए अब बात को और न उलझाते हुए सीधे किस्से  पर आते हैं| 

तो हुआ कुछ यूँ कि एक दिन बैठे-बिठाए अपने एक मित्र से मिलने का मन कर आया जो कि एक नामी –गिरामी अस्पताल में अच्छे-खासे ऊँचे ओहदे पर काम करते हैं | पहुँच गए उनसे मिलने | बहुत ही व्यस्त रहते हैं – सो इससे पहले कि उनके आफिस तक पहुंचता, वे अस्पताल की लॉबी  में ही चहल-कदमी करते नज़र आ गए | आदत के अनुरूप, तपाक से बड़ी गर्मजोशी से मिले और अपने आफिस की और ले चले | लाबी से दफ्तर तक के रास्ते में अनगिनत नमस्ते और सलामों की बारिशों का अपनी मुस्कान से उत्तर देते हुए अपने कमरे तक पहुंचे | सीट पर बैठते ही चपरासी ने चाय पेश कर दी | चाय की चुस्कियां लेते हुए इधर-उधर के हाल-चाल पूछते हुए अचानक उनसे सवाल कर बैठा – “गुरु , यह बताओ आखिर आप इस अस्पताल में करते क्या हो ? मैं आज तक तुम्हारे काम-काज के बारे में आज तक नहीं जान पाया हूँ |” चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने जवाब दिया - बस यह समझ लो कि हर किसी के पंगे का निपटारा करने की मुसीबत मेरे ही सर पर है | मैंने कहा समझा नहीं तो बोले आप चाय पीजिए , जल्द ही समझ भी जायेंगे और खुद देख भी लेंगें | 

अभी चाय ख़त्म भी नहीं हुई थी कि अचानक उनके फोन की घंटी बजी | फोन सुनकर कहा- अभी आता हूँ| मेरी तरफ देखते हुए बोले - चलिए कौशिक जी , मोर्चे पर | अपने दफ्तर से निकल कर जैसे ही वार्ड की तरफ चले, रास्ते में ही मित्र को नमस्कार करते हुए एक सज्जन मिले और बोले मैंने ही आपको फोन किया था | मेरा नाम कर्नल गुप्ता है, फिलहाल बड़ी परेशानी में हूँ, मदद कीजिए | पहली नज़र से देखने से ही कर्नल साहब के पसीने छूटते साफ़ महसूस किये जा सकते थे | वे बार-बार एक ही बात दोहरा रहे थे, मेरा मोबाइल वापिस करवा दीजिए | पूरी बात सुनने पर एक अजीब ही कहानी सामने आयी | दरअसल कर्नल साहब, जिनकी उम्र होगी यही कोई सत्तर साल के आस-पास , अपनी कार में कहीं जा रहे थे | कार उनका ड्राइवर चला रहा था | अचानक एक तेज़ गति से आ रही मोटर-साइकिल ने धड़ाम से कार की पिछाड़ी में इतनी जोरदार टक्कर मारी कि पूरी कार इस बुरी तरह से धमाके से हिल उठी जैसे सर्जिकल स्ट्राइक की बमबारी हो गयी हो | कार के अन्दर बैठे कर्नल साहब भी एक क्षण को भौंचक रह गए कि हुआ तो हुआ क्या | बाहर निकल कर देखा तो पाया उनकी कार की पिछाड़ी का रखवाला बम्पर, मोह-माया से मुक्त योगी की भांति, कार से अपने सभी सम्बन्ध तोड़ कर, सड़क पर दंडवत मुद्रा में पड़ा था | उस बम्पर की बगल में ही वह कबाड़ पड़ा था जिसे कुछ समय पहले तक मोटर साइकिल के नाम से जाना जाता था पर जो सड़क पर हवाई करतब दिखा रही थी | और उन सबसे कुछ दूर सड़क पर ही टूटी-फूटी हालत में पड़ा था डेढ़ पसली का जां-बाज हीरो जो सड़क को अपनी खानदानी मिल्कियत की हवाई पट्टी और अपनी मोटर साइकिल को फाइटर प्लेन समझ कर सड़क पर ही उड़ा रहा था| अब कर्नल साहब ने अपनी फ़ौजी परम्परा और मानवता का परिचय देते हुए उस घायल युवक की सहायता को तुरंत पहुंचे | अपना फोन दिया कि अपने घर वालों को सूचित कर दो | अपनी कार में लेकर अस्पताल तक लाये , भर्ती करवाया | कुछ ही देर में उस घायल युवक के कुछ दोस्त और पिता भी अस्पताल पहुँच गए | कर्नल साहब ने यहाँ भी मानवता का परिचय देते हुए कहा कि हालांकि उनकी कोई गलती नहीं है फिर भी वह इलाज़ में भी रुपये-पैसे से मदद करने को तैयार हैं | इस अफरा-तफरी में अब कर्नल साहब को अपने मोबाइल का ध्यान आया जो कुछ समय पहले उन्होंने उस घायल युवक को सड़क पर आपातकालीन अवस्था में पकड़ाया था | जब उन्होंने उस युवक से अपने फोन को वापिस मांगा तो बन्दे ने यह कह कर साफ़ मना कर दिया कि मुझे आपने कोई फोन कभी दिया ही नहीं था | अब कर्नल साहब की सिट्टी-पिट्टी गुम | कहते हैं आदमी बदमाशी की जंग तो बहुत आसानी से जीत लेता है पर इन्सानियत की लड़ाई में अकसर हार जाता है | यहाँ भी मामला काफी कुछ ऐसा ही लगा रहा था और इस परेशानी में कर्नल साहब को मेरा अस्पताली  मित्र याद आया | मित्र ने सबसे पहले यह बात साफ़ करी कि अस्पताल का इस मामले में कुछ लेना-देना नहीं है , यह आप दोनों के बीच का मसला है फिर भी देखता हूँ कि क्या कर सकता हूँ | उस युवक के पिता जी हक्के -बक्के खड़े थे, मानो उन्हें कुछ समझ ही नहीं आ रहा हो | इस बीच मेरे मित्र ने जोर से सबको सुनाते हुए कर्नल साहब को सुझाव दिया कि आप मोबाइल के बारे में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दीजिए | पुलिस यहीं अस्पताल में मौजूद है, सारी तहकीकात हो जायेगी और सच भी सामने आ जाएगा | इतना सुनते ही उस घायल सड़क छाप हवाई पायलट के चेहरे पर मानों आफत के तीतर-बटेर एक साथ उड़ने लगे | कभी वह अपने दोस्तों की मंडली को देखता तो कभी अपने अब्बा को | इतने में उसके एक दोस्त ने मेरे अस्पताली मित्र का हाथ पकड़ कर एक कोने में ले गया और धीमे स्वर में लगभग फुसफुसाती आवाज में कहा – “ सर , हाथ जोड़ता हूँ , यह पुलिस का झमेला मत करिए | मोबाइल आप को वापिस मिल जाएगा| बस आप बात समझिए |” अब गुर्राने की बारी कर्नल की थी, लगभग धमकी के अंदाज़ में बोले “ साफ़-साफ़ बात बोलो,इससे से पहले कि कुछ और गलत हो जाए |” युवक के दोस्त ने अब जो बताया उसने पूरी कहानी को एक नया ही मोड़ दे दिया | दरअसल अब इस किस्से में एक लैला की भी एंट्री हो चुकी थी | उस दिन मौसम बहुत ही सुहावना था और वह युवक जिसे हम अब मजनूं  भी पुकार सकते हैं, अपनी फटफटी पर लैला को लेकर निकल पड़े थे  सड़क पर तूफानी रफ़्तार से | उस ट्रेफिक से भरपूर सड़क पर लैला-मजनूं  का दुपहिया जहाज़ मानों उड़ा ही चला जा रहा था | उस रफ़्तार को देख कर एक बारगी तो भारतीय वायुसेना को भी लग रहा था कि उन्होंने राफेल हवाए जहाज़ के आर्डर देकर शायद गलती कर दी | जब उस मजनूं  की मोटर साइकिल अनियंत्रित होकर कर्नल की कार की पिछाडी से जा कर भिड़ी तब कर्नल से मिले मोबाइल को उसने अपनी लैला को सौप दिया क्योंकि वह खुद फोन करने की हालत में नहीं था | अब लैला ठहरी नए ज़माने की | पुराने ज़माने की होती तो मजनूं  का सर सड़क पर ही अपनी गोद में रख कर दुपट्टे से हवा कर रही होती | यहाँ तो उसने जैसे ही भीड़ जुटती देखी, मोहतरमा हो गयीं तुरंत ही नौ-दो- ग्यारह | अब लैला फुर्र और लैला के साथ कर्नल का मोबाइल भी फुर्र | अब इधर अस्पताल में भर्ती मजनूं  की हालत अपने बाप के जूते के डर से और भी पतली | अपने बाप से कहे भी तो कहे क्या – यही कि बापू, कर्नल का मोबाइल आपकी होने वाली बहू के पास है जिसे साथ बिठा कर मैं सड़क पर हवाई जहाज़ उड़ा रहा था| अब अगर लैला नए ज़माने की थी तो यह मजनूं  भी शर्तिया उसी की टक्कर का था | पुराना मजनू नहीं डरा था पत्थरों के वार से , पर इस मजनूं की तो बत्ती बंद हो गयी थी बापू की मार से | यही सोचकर उस मजनूं की डर के मारे सच बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी | कुल मिला कर इस दास्ताने लैला-मजनूं का हर किरदार परेशान : 

मजनूं परेशान कहीं बापू को पता न चल जाए,
लैला परेशान कहीं इस सारे लफ़ड़े में बदनामी न हो जाए ,
कर्नल परेशान हाय कहाँ गया मेरा मोबाइल,
और सबसे ज्यादा परेशान मेरा अस्पताल वाला मित्र यह सोच कर कि ये सारे बेमतलब के पंगे सुलटाने के लिए मेरे ही हिस्से में क्यों आते हैं |

खैर सारी कहानी का अंत इस आश्वासन के साथ हुआ कि कर्नल को उसका मोबाइल गुपचुप तरीके से वापिस करवा दिया जाएगा | अब यह सचमुच हो पाया या नहीं यह मैं आप सबकी कल्पना पर छोड़ता हूँ क्योंकि उस दिन के बाद मैनें भी अपने अस्पताली मित्र की कोई खोज-खबर नहीं ली है |

Tuesday, 12 February 2019

गंगा मैया – पार उतारे सबकी नैया

इससे पहले कोई लाए,
तुम्हें  लोटे या जार में,
इक बार तो आ जाइए ,
जीते-जी हरिद्वार में |

ज़िंदगी का पूरा फ़लसफ़ा महज़ कुछ शब्दों में बयाँ करती ये पंक्तियाँ अपने आप में एक पूरी कहानी समेटे हुए है | कहानी आपकी क्षण-भंगुर ज़िंदगी की, कहानी एक शहर की और सबसे बड़ी कहानी आपके लोक-परलोक और उस शहर के बीच अनंत सम्बन्ध की जिसे हरिद्वार के नाम से जाना जाता है | आज की कहानी में आपको उसी हरिद्वार के दर्शन होंगें और साथ ही मुलाक़ात होगी वहाँ के एक रोचक किरदार से जिससे आपका कभी न कभी जरूर सामना हुआ होगा और जिन्हें आप पण्डे या तीर्थ पुरोहित के नाम से जानते हैं | इनके पास आपके पूर्वजों का वह लेखा-जोखा मिल सकता है जिससे देख कर आप अचम्भे में पड़ जाएगें | 
तो चलिए शुरू करते हैं बात हरिद्वार की | हरिद्वार दरअसल हिन्दुओं का बहुत ही पवित्र और प्राचीन धार्मिक स्थान है | उत्तराखंड में गौमुख /गंगोत्री से निकली भागीरथी नदी आगे रुद्रप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा का रूप लेती है तो ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों से लगभग 250 कि.मी की यात्रा इठलाती, बल खा कर, हिलोरे  लेेती जब मैदानी इलाके में आकर शांत भाव ग्रहण करती है वह गंगा का प्रवेश द्वार हरिद्वार ही है | एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार धन्वन्तरी जब समुद्र मंथन के बाद निकले अमृत को जब कलश में लेकर जा रहे थे तो उसमें से अमृत की कुछ बूंदें जिन चार जगहों पर गिर गयी थीं उनमें से एक हरिद्वार भी था | अन्य तीन स्थान थे – नासिक, प्रयाग और उज्जैन | इन सभी तीर्थ स्थानों की महिमा अपरम्पार है | धार्मिक ग्रंथों के अनुसार हरिद्वार के बारे में यह मान्यता है कि यहाँ गंगा मैय्या में स्नान करने वाला सभी पाप कर्मों से मुक्ति पा जाता है | यहाँ प्राण त्यागने वाला सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है और जिसका भी पिंडदान या अस्थिविसर्जन होता है वह भी सीधे बैकुंठ धाम की प्राप्ति कर लेता है | तीर्थ स्थान है तो सीधी सी बात है कि यहाँ पर पूजा-पाठ और कर्मकांड के लिए आने वाले श्रद्धालु और इन सब धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न करवाने वाले पंडित तो होंगे ही | शायद आपने भी सुना तो होगा ही - इन श्रद्धालुओं को कहते हैं यजमान और पंडित जी को – तीर्थ पुरोहित या पंडा | इन तीर्थ-पुरोहितों की कार्य शैली भी उतनी ही अदभुत  है जितनी कि मुम्बई की डब्बे वालों की | फर्क सिर्फ इतना है कि जहां डिब्बे वाले बहुत ही सटीकता और कुशलता से खाने के डिब्बे लोगों के घरों से उनके दूर दराज स्थित दफ्तरों तक समय पर पहुँचा देते हैं, वहीं दूसरी ओर तीर्थ पुरोहितों के पास अपने यजमानों के पूर्वजों की कई पीढ़ियों तक का लेखा-जोखा इतने व्यवस्थित रूप से रखा जाता है कि आज के जमाने के कम्प्यूटरों में रिकार्ड रखने वाले बड़े से बड़े लाइब्रेरियन भी दाँतों तले उंगली दबा लें | 

आपके पुरखों का लेखा-जोखा 
आप हरिद्वार की हरकी पौड़ी पर कदम रखेंगे ही कि आपको एक तरह से घेर लिया जाएगा और ऊपर से पड़ेगी सवालों की बौछार – “ पूजा करवानी है ? कहाँ से आये हो ? कौन सा राज्य .... कौन जिला .... कौन जाति ... कौन सा गौत्र ?” विश्वास कीजिए अगर आप सचमुच किसी धार्मिक अनुष्ठान के उद्देश्य से आए हैं तो पूछे गए हर सवाल का अपना महत्त्व है | आपका जवाब ही आपको पहुंचाएगा आपको उस विशेष पुरोहित तक जिसे आप फेमिली डाक्टर की तर्ज़ पर फेमिली पंडित भी कह सकते हैं | वही फेमिली पंडित जिसके पुरखों तक ने आपके पुरखों के लिए पूजा-पाठ संपन्न करवाया है और आज भी उसके पास इसका लिखित सबूत भी मिल सकता है | यही है आपका तीर्थ पुरोहित | 
तीर्थ पुरोहित पंडित धीरज शर्मा 
इन तीर्थ पुरोहितों के बारे में ही अधिक जानने के लिए मेरी मुलाक़ात हुई हरिद्वार के ही पंडित धीरज शर्मा जी से | वह स्वयं हरिद्वार के प्रख्यात तीर्थ पुरोहितों में से एक हैं | उनसे इस विषय में बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी मिली | प्राचीन काल से ही लोग हरिद्वार की यात्रा करते थे | हरिद्वार एक पवित्र तीर्थ स्थल होने के कारण, यह यात्रा या तो धार्मिक  उद्देश्य से होती थी या परिवार के सदस्यों की मृत्यु होने पर रीति रिवाजों के अनुसार अस्थि विसर्जन करने हेतु | अब से लगभग सैकड़ों वर्षो पहले  न तो आज जैसे यातायात के साधन थे और न ही हरिद्वार में ठहरने के लिए इतने होटल और धर्मशालाएं थी | 
वर्ष  1866 का हरिद्वार का गंगा तट 


आज की हर- की -पैडी में हर हर गंगे 
उस समय तीर्थ यात्री पैदल ही या घोड़ों पर कई –कई दिनों की कठिन यात्रा करके हरिद्वार आते थे | ऐसे समय में उनके राज्य, जिले के लिए सम्बंधित तीर्थ पुरोहित ही उनके लिए पूजा पाठ तो करते ही थे बल्कि जरूरत पड़ने पर उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी अपने घरों में ही करते थे | ऐसा प्रगाढ़ और घरेलू किस्म का विश्वास से भरा रिश्ता होता था यजमान और उनके पुरोहित का | तीर्थ यात्री अपने वंश वृक्ष की समस्त जानकारी जैसे बाप-दादा का नाम, आने का प्रयोजन आदि सब कुछ उस बही-खाते में दर्ज करवाते, अपने और साथ आए रिश्तेदारों के हस्ताक्षर भी करते | यही परम्परा पीढी- दर- पीढी से चली आ रही है | अगली बार आने पर यजमान अपने परिवार के विवरण में जरूरी फेरबदल करवा लेते  | यह सब कुछ इसी तरह से है जैसे सरकार द्वारा जन्म - मृत्यु पंजीकरण रिकार्ड| आश्चर्य की बात यह है कि सरकारी रिकार्ड की सुईं तो पचास साल पहले जा कर ही टें बोल जायेगी पर आपके पंडे जी आपके सामने 800 साल पहले का भी खाता आपके सामने पेश कर देंगे | यह बात मैं हवा में नहीं मार रहा हूँ, आपको बाकायदा प्रमाण सहित कह रहा हूँ |
आठ  सौ वर्ष पुराना बही - देवनागरी और उर्दू लिखित 

पहले यह बही भोज पत्रों पर लिखी जाती थी, फिर समय के साथ कागज़ का प्रचलन चला | ताम्र पत्रों पर भी कुछ वंशावलियों का उल्लेख है | हरिद्वार में करीब 2500 तीर्थ पुरोहित हैं | यह सब वे ब्राह्मण पंडित हैं जो पीढी दर पीढी से अपने यजमानों का लेखा-जोखा वंशावलियों के रूप रखते आए हैं | प्रत्येक जिले की पंजिका जिसे बही भी कहते हैं, का विशिष्ट पंडित होता है।इन हाथ से लिखी बही में यजमानों और उनके पूर्वजों का विवरण उनके असली जिलों व गांवों के आधार पर वर्गीकृत करने के बाद सहेज कर रखी गयीं हैं। यहाँ तक कि भारत के विभाजन के उपरांत जो जिले व गाँव पाकिस्तान में रह गए व हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहाँ हैं। कई मामलों में तो उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम अपितु ईसाई भी हैं। 
पंडित जी की गद्दी 

इतना जानने के बाद पंडित धीरज शर्मा जी से पूछ बैठा कि कुछ अपने बारे में भी बताइए | उन्होंने बताया कि उनके भी पीढी-दर-पीढी यही काम चला आ रहा है |उनके पिता का सात भाइयों का परिवार था | अगली पीढी के इच्छुक सदस्य को विरासत में यही काम सौंप दिया जाता है | उनके द्वारा सैकड़ों वर्षो का हस्तलिखित बही जिनमें यजमानों का रिकार्ड होता है वही उनकी पूंजी है | पंडित जी ने एक बहुत दिलचस्प बात भी बताई | वह स्वयं बी.ए , एल.एल.बी हैं , कुछ समय वकालत में भी हाथ आजमाया पर पिता की मृत्यु के बाद उनकी इस विरासत को सम्भाला | कर्मकांड की विधिवत शिक्षा अपने ताऊ जी श्री ज्ञान चंद्र शास्त्री जो कि राष्ट्रपति पुरस्कार से अलंकृत रहे और ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन से सम्बद्ध रहे , से प्राप्त की | अपने इस पवित्र सेवा कार्य से पूरी तरह से संतुष्ट हैं | बच्चे पढाई कर रहे हैं – बड़ा बी.सी.ए में और छोटा नवीं कक्षा में | अभी से कुछ नहीं कह सकते कि बच्चे भी यही गद्दी संभालेंगे, सब कुछ उनकी इच्छा पर है | अगर ऐसा होता है तो गद्दी की व्यवस्था परिस्थितियों के अनुसार की जायेगी | अपने रोचक अनुभवों को बताते हुए पंडित जी बताते हैं कि संपत्ति की विरासत को लेकर उपजे मुकदमें के चक्कर में एक बार उन्हें अपनी बही (रिकार्ड) के साथ यमुना नगर की कोर्ट में पेशी पर जाना पड़ा था | बही में दर्ज विवरण को कानूनी मान्यता प्राप्त है | मुझे लगता है कोर्ट में उस समय पंडित जी ने एक बारगी माथे पर पसीना पोछते हुए एक बारगी सोचा तो जरूर होगा – बुरे फँसे पुरोहिताई में | 

पंडित धीरज शर्मा जी हरिद्वार में समाज सेवा के कार्यों में भी अत्यंत व्यस्त रहते हैं | किसी भी कठिनाई या समस्या की हालत में उनसे निसंकोच संपर्क 9760339460 नंबर पर किया जा सकता है | उन्होंने  एक अपील भी की है | वह कहते हैं कि अब संयुक्त परिवार रहे नहीं, उनकी जगह नाभकीय परिवारों ने ले ली है यानि पति-पत्नी और बच्चे | ऐसे समय में अपनी पीढी का लेखा-जोखा भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के लिए, जब भी हरिद्वार आयें, अपने पुरखों, दादा-दादी और अपने कुनबे के अन्य सदस्यों के नाम, रहने के पुराने जिले के नाम, परिवार में हुए शादी -ब्याह और मृत्यु की पूरी जानकारी के साथ आयें| इस जानकारी को अपने तीर्थ पुरोहित के पास दर्ज भी कराएं | आने वाली पीढ़ी के लिए हम कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं | 
प्राचीन बही
पुराने होते रिकार्ड को नष्ट होने से बचाने के लिए रिकार्ड को कम्प्यूटर में संरक्षित रखने के विषय में मेरी कई अन्य परिचितों से भी बात हुई | इस पर कुछ का मत था कि तकनीकी साधनों का प्रयोग अपनी जगह कुछ हद तक उचित हो सकता है पर यह उस असली बही की जगह कभी नहीं ले सकता | पुरोहित की गद्दी पर बैठ कर बही के उस असली कागज़ में अपने बाप-दादाओं के हस्ताक्षर , उनके परिवार का लेखा-जोखा देख कर भावना यजमान के मन में उमड़ती है कि इसी जगह पर मेरे पुरखे आकर अपना ब्योरा दर्ज करवा कर गए थे | कंप्यूटर के स्क्रीन पर उन कागजात की आभासी तस्वीर शायद भावनाओं का वह रोमांच पैदा न कर सके | नए ज़माने की तेज़ रफ़्तार का वैसे तो मैं भी समर्थक हूँ पर लगता है यहाँ यजमान जी भी  शायद ठीक कह रहे हैं | 

( आभार : इस लेख में संग्रहित सामग्री के लिए श्री संजय कुमार झाड़, गंगा सभा, हरिद्वार एवं श्री राजेश शर्मा, हरिद्वार   का विशेष योगदान रहा )

Tuesday, 5 February 2019

अनिल भैया : छुक –छुक- छैयां




आज के इस शीर्षक को पढ़ कर शायद एक बारगी तो आपका अच्छा-भला दिमाग भी चकरा गया होगा | इस छुक –छुक-छैयां में समाई हुई हैं रेलगाड़ी की ढेरों रूमानियत से भरपूर बचपन की यादें, वे यादें जो जुड़ी हुई हैं दूर-दराज के छोटे-मोटे रेलवे स्टेशनों पर बिताए बचपन की जहाँ मेरे नाना स्टेशन मास्टर हुआ करते थे | मेरे उस बचपन की बानगी से अगर आप अब तक अनजान हैं तो संस्मरण “कण-कण में भगवान (भाग- 1 ):  बचपन की बहार - पथरी की पुकार” को भी अवश्य पढ़ लीजिएगा, जिसका लिंक शीर्षक के साथ ही दिया हुआ है |
रेलगाड़ी से जुड़ी कभी एक जीवन-सीख देने वाली कविता भी पढी थी :
**********
अगर तुम्हारा पथ
निश्चित है
तब तो घने अँधेरे में भी
पहुँच जाओगे अपनी मंजिल
जैसे ट्रेने दौड़ लगातीं
रातों में भी
पहुँचा करती हैं स्टेशन |


अगर नहीं
तो भरी दोपहरी में भी
अपना पथ भूलोगे
जैसे नावें भटका करती हैं
सागर में |

********
( साभार : स्व० श्री रमेश कौशिक, कविता संग्रह: मैं यहाँ हूँ ) 
******** सो ज़ाहिर सी बात है रेल तो आज तक मेरे दिलो-दिमाग में छुक-छुक-छैय्याँ कर ही रही है | 

उन्हीं यादों को फिर से ताज़ा करने के लिए बैठे-बिठाए दिमाग में फितूर उठा कि चलो रेल म्यूजियम चलते हैं | नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित रेल म्यूजियम, भारतीय रेल के इतिहास और विकास दोनों को ही बहुत आकर्षक और मनोरंजक रूप में प्रस्तुत करता है | यहीं का एक प्रमुख आकर्षण है छोटी से रेलगाड़ी जिसमें बैठ कर बच्चे और बड़े सभी एक सामान आनंदित होते हैं | उस छोटी सी रेलगाड़ी के छोटे से स्टेशन के छोटे से प्लेटफार्म पर बच्चे और बड़ों की भीड़ में चहलकदमी करते हुए दिल के किसी कोने से आवाज उठी कहाँ है वह शख्स जो इस छोटी सी खिलौना ट्रेन को चलाता है और सभी को बहुत बड़ी खुशी दे रहा है | मन में एक धूमिल सी तस्वीर थी कि कैसा होगा वह इंसान – शायद ढीले-ढाले बेतरतीब से कपड़ों में अधेड़ उम्र का, कच्चे-पक्के बालों वाला जिसकी आँखों पर नज़र का मोटा सा चश्मा लगा होगा | इसी दिमागी-तस्वीर से मेल खाता इंसान खोजने की कोशिश कर रहा था पर नाकामयाब रहा | हाँ , अलबत्ता इंजिन के पास ही सूट-बूट पहने एक बहुत ही स्मार्ट, गोरा –चिट्टा नवयुवक दिखाई पड़ा| कुल मिलाकर व्यक्तित्व ऐसा कि एक बार देखकर भी दोबारा नज़र चुम्बक की तरह मजबूरन वापिस खिंची चली जाए | सच में, मुझे संकोचवश शब्द भी नहीं मिल रहे थे कि पूंछ लूँ- “क्या यह रेलगाड़ी आप ही चलाते है ?” समय कम था और मन में उमड़ रहे सवाल कहीं ज्यादा अत: हिम्मत करके सवाल का जवाब मिल ही गया – “आपने सही पहचाना | मैं अनिल सेंगर हूँ जो इस छुक-छुक गाड़ी को चलाता हूँ |” बस फिर क्या था मन में बसे ढेरों सवाल और उन सवालों के बहुत ही विनम्रता से दिए गए शालीन जवाब जो अपनी कहानी खुद ही बयाँ कर रहे हैं, और इसी पर आधारित है आज की कहानी – अनिल भैय्या – छुक-छुक छैयां 
छोटा इंजिन पर जिम्मेदारी बड़ी 

मेरा नाम अनिल सेंगर है | भारतीय रेलवे में काम करता हूँ , लोको पायलेट के पद पर | वैसे मेरी कहानी में कहने को कुछ भी ख़ास नहीं है, पर दूसरी तरह से सोचा जाए तो बहुत कुछ है | मेरा बचपन एक तरह से गाँव, कस्बे और शहर का मिला-जुला खिचडी रूप रहा है | आठवीं तक की पढाई दिल्ली में ही हुई जहां मेरे पिता जी की पोस्टिंग थी जो रेलवे में ही काम करते थे | लिहाजा उसके बाद हाथरस से विज्ञान विषयों से इंटरमीडिएट किया | सच कहूँ तो मुझे एक तरह से नौकरी करने की जल्दी थी | वजह मुझे आजतक खुद भी नहीं पता | अब नतीज़ा यह कि इंटर के बाद जहां मेरे दूसरे साथी बी.ए या बी.एस.सी में दाखिला लेने की जुगाड़ में थे, मैं पहुँच गया आई.टी.आई के तकनीकी कोर्स में दाखिला लेने | जो मेरे पिता ने समझाया मैंने उसी पर आँखें मूंद कर विश्वास ही नहीं, वरन अमल भी किया | आज के जमाने में जब बी.ए , एम्.ए और अब तो एम्.बी.ए की डिग्री लेने की भेड़ –चाल है, ऐसे बेरोज़गारी के समय में भी तकनीकी शिक्षा लेने वाला कभी और कुछ हो- या- न- हो , पर कम-से-कम भूखा तो नहीं मरेगा, ऐसा उनका विश्वास था | उनका विश्वास और भरोसा समय की कसौटी पर खरा उतरा | आई.टी.आई. का कोर्स करने के बाद ही मैं भारतीय रेलवे की नौकरी में वर्ष 2003 में आ गया | शुरुआत में यहाँ के मेंटेनेंस डिपार्टमेंट की वर्कशाप में काम सीखा, काम किया, मेहनत से किया | हाथ और कपड़े तेल और ग्रीस में भरपूर काले - काले पर माथे पर कोई शिकन नहीं | बस मन के कोने में यही एक विश्वास था कि मेहनत रंग जरूर लाएगी – बेशक देर-सवेर ही सही | और कहा जाए तो मेरे मामले में, यह देर भी कुछ ख़ास नहीं रही | साल 2013 मेरे लिए एक खुशी लाया | मैं लोको रनिंग स्टाफ के केडर के लिए चुन लिया गया | आप इसे कुछ यूं समझ सकते हैं – अब निर्धारित ट्रेनिंग पूरी करने के बाद मैं रेलगाड़ी को चला सकता था | 
रेलगाड़ी भी बड़ी और जिम्मेदारी भी बड़ी 
प्रमोशन पर बढ़ा हुआ वेतन अपने साथ ज्यादा खुशियाँ तो लाता ही है पर साथ ही लाता है ज्यादा जिम्मेदारियां और अगर नौकरी रेलवे की है तो उन जिम्मेदारियों में निहित पेशेवर जोखिम | बस यह समझ लीजिए मामला कुछ ऐसा ही है जो आप रेलवे स्टेशन के हर सिग्नल केबिन की दीवार पर लिखा पाते हैं – सावधानी हटी, दुर्घटना हुई | एक छोटी सी भूल, लापरवाही, या किसी भी प्रकार की अपराधिक तोड़फोड़ की गतिविधि, हमारे साथ-साथ हज़ारों यात्रियों की जान-माल का खतरा बन जाता है | घर से ड्यूटी पर जाने के समय से ले-कर जब तक वापिस नहीं आ जाते, घर वालों की सांस आफ़त मे अटकी रहती है | जान से बढ़ कर कुछ प्यारा नहीं होता, इसी लिए मोटी तनख्वाह और एलाउंस जिन्दगी का मोल नहीं हो सकती, ऐसा उन लोगों को जरूर समझना चाहिए जिनकी नज़र लोको पायलेट्स की पगार पर रहती है | अगर मुझसे पूछा जाए तो  शायद इन्हीं सब वजहों से मैं  खुद अपने बच्चों को लोको पायलट के रूप में नहीं देखना चाहता |
निकल पड़े अपने सफ़र पर 
कई बार ऐसी दुखद घटनाएं भी हो जाती हैं जिन पर हम चाह कर भी बचाव नहीं कर पाते | 100 कि.मी. प्रति घंटे की तेज गति से चल रही गाड़ी के आगे अचानक कोई भी आ-जाए, गाडी को तुरंत नहीं रोका जा सकता | हम भी आखिर हैं तो इंसान ही, ऐसी कोई भी दुर्घटना होने पर अन्दर तक बुरी तरह से हिल जाते हैं | अब तक लगभग बीस जीवन मेरी ट्रेन के नीचे आकर समाप्त हुए होंगें | अपने सरपट तेज रफ़्तार दौड़ते इंजिन में घटी सबसे पहली बार की भयानक याद मुझे आज तक ताज़ा है| मैं दिल्ली से ट्रेन लेकर अजमेर तक जा रहा था | रोहतक से कुछ पहले एक पुल के पास , बहुत ही बूढी औरत जल्दबाजी में ट्रेन की पटरी पार करने की कोशिश में नाकामयाब रही और इस बुरी तरह से घबरा गयी कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि करे तो क्या करे | मैं बुरी तरह से लगभग पागल-सा होकर लगातार चेतावनी की सीटी बजाये जा रहा था पर कुछ नहीं कर पाया | उस दैत्याकार चिंघाड़ मारते इंजिन ने सरपट दौड़ते हुए उस कमजोर, दुबली-पतली बूढी काया को टक्कर मार कर दूर हवा में मानों उछल कर फेंक दिया | उसकी चीख भी उस इंजिन की गर्जना और पहियों की खटर-पटर के शोरगुल में शायद कहीं गुम हो गयी होगी | ड्यूटी समाप्त होने पर गंतव्य स्टेशन के रिटायरिंग रूम में गया |परेशानी का आलम इस कदर कि न-तो खाना खा पाया और ना- ही एक पल को सो पाया | आँख बंद करते ही उस वृद्धा के क्षत-विक्षत शरीर के चिथड़े हवा में उड़ते नज़र आते |घबराहट के मारे मेरा पूरा शरीर मानों पसीने में भीग रहा था | दिल का कोई कोना कचोट-कचोट कर कह रहा था – जो कुछ भी हो, आखिर उस बूढी की जान गयी तो तुम्हारे इंजिन के पहियों के तले आकर ही-ना | रात की तरह से ही सुबह भी मेरे वरिष्ठ साथी समझाने पर लगे थे कि इस प्रकार की दुर्घटनाएं अक्सर होती ही रहती हैं और अगर पटरी पर दौड़ते इंजिन की नौकरी अगर करनी है तो मन तो मजबूत रखना ही पड़ेगा | मुझे लगता है शायद उस वृद्धा में मुझे अपनी नानी का अक्स नज़र आया था तभी तो वापिस जब अपने घर पहुंचा तो अपनी नानी को एक ही बात तोते की तरह बोले जा रहा था कि पटरी जब भी पार करो, ट्रेन के गुजर जाने के बाद बाद | यही सीख आज भी मैं अपने हर चिर-परिचित को देता हूँ कि जीवन अनमोल है, उसे अपनी लापरवाही से व्यर्थ न गवाओं | 

रही बात रेल म्यूजियम की बच्चा ट्रेन चलाने की, तो जब कभी भी नियमित स्टाफ छुट्टी पर चला जाता है तो ऐसी स्थिति में मेरी ड्यूटी भी लग जाती है | अपने रोजमर्रा के एक ही ढंग के काम से हटकर यहाँ आकर हंसते-खिलखिलाते बच्चों को देखकर मैं पूरी तरह से तरोताज़ा हो जाता हूँ | मुझे अपना खुद का बचपन याद आ जाता है जब मेरे पिता जी ने मुझे इसी बच्चा ट्रेन में सैर करवाई थी | सच मानिए बड़ी ट्रेन की तो बात ही छोडिये , उस वक्त मैंने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि एक दिन इस खेल-गाड़ी को भी मैं स्वयं चलाऊंगा|  मेरी जिन्दगी इस खेल-गाडी और रेल- गाड़ी  के बीच आप सबकी शुभकामनाओं से बहुत ही आनंद से गुज़र रही है |
कड़ी मेहनत के बाद मौज - मस्ती भी जरुरी 
और हाँ..... चलते-चलते एक बात और | मेरा मानना है कि जीवन के प्रति एक सकारात्मक सोच रखिए | अपने और अपने परिवार के बारे में तो सभी सोचते हैं , कुछ देश के बारे में भी सोचिए | मैं स्वयं भारतीय प्रादेशिक सेना में भी अपनी सेवाएं दे रहा हूँ जिसके लिए प्रति वर्ष एक माह की ट्रेनिंग पर भी जाता हूँ | भारतीय फौज के साथ बिताया यह एक माह मुझे पूरे वर्ष के लिए इतने उत्साह और ऊर्जा से भर देता है जिसे मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता | 

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तो दोस्तों , यह थी कहानी हमारे अनिल भैया उर्फ़ छुक-छुक-छैय्याँ की | कैसी लगी ?  आप सबसे मेरा अनुरोध है कि इस जोशीले नौजवान के सुरक्षित और सफल भविष्य के लिए कामना करें | यदि हमारा- आपका  अनिल सुरक्षित रहेगा तभी तो अपनी-अपनी मंजिलों तक पहुँचने का हमारा-आपका सफ़र सुरक्षित होगा | 

Wednesday, 30 January 2019

ऊँची उड़ान (भाग 6 ) : मेरे प्रेरणा-स्रोत की

पिछले काफी समय से मैं इस ब्लॉग की दुनिया से दूर रहा | कारण आज की  इस कहानी में ही छिपा है | 

ले० कर्नल एच .सी. शर्मा (रि 0)
हापुड़ जिले का एक छोटा सा गाँव है नान, जी हाँ वही जिसकी नाम-राशि की चपाती को आप होटल में बड़े स्वाद से खाते हैं | उसी गाँव में एक अच्छा –खासा, खाता-पीता किसान परिवार था श्री होशियार सिंह जी का | गाँव के गिने-चुने सम्मानित और प्रभावशाली परिवारों में से एक| उन्हीं के तीन बेटों में से एक थे श्री हुकुम चंद –यानी आज की कहानी का नायक | अपने सीधे-सरल स्वभाव के कारण यह बच्चा गाँव में सभी की आँख का तारा | सीमित साधनों के बावजूद पढ़ाई -लिखाई में तेज़ | अभी बारह  साल का था कि माँ का निधन हो गया | उस बच्चे के लिए इतना बड़ा सदमा सहना आसान नहीं था | बाल-मन पर पड़ा यह घाव जीवन भर रहा और कभी भी माँ की कमीं से उबर नहीं पाया | अब उस बिन माँ के बच्चे का दिल न तो घर पर लगता था और ना ही बाहर संगी-साथियों के बीच | अच्छा-ख़ासा हंसता-खेलता बच्चा यकायक मानों रातों-रात खामोशी की चादर ओढ़े एक गंभीर इन्सान में परिवर्तित हो गया | माँ की याद वैसे तो किसी भी तरह से भुलाई नहीं जा सकती, पर उस बालक ने आखिर एक तरीका ढूँढ ही लिया उस याद को कम करने का | और वह उपाय था खुद को पूरी तरह से पढ़ाई में समर्पित करना | दिमाग तो पहले से ही तेज था, ऊपर से यह मेहनत , नतीजा सभी परीक्षाओं में अव्वल नंबरों से पास होते चले गए | आठवीं तक की पढ़ाई गाँव के ही स्कूल में और उसके बाद पास के शहर हापुड़ में | गाँव से स्कूल जाने के लिए कभी-कभी हालत ऐसे भी बन जाते कि कपड़ों की पोटली को सर पर बाँध कर रास्ते में पड़ने वाली नदी को तैर कर पार करना पड़ता | इन कठिन परिस्थितियों में मेट्रिक और उसके बाद विज्ञान विषयों के साथ इंटर प्रथम श्रेणी के नंबरों के साथ पास किया | 

उन दिनों शादी कम उम्र में ही कर दी जाती थी | उस बालक,जो कि अब किशोरावस्था में था, के साथ भी ऐसा ही हुआ | अब शादी तो हो चुकी थी पर गौना नहीं हुआ था | यानी पत्नी अपने गाँव में पिता के घर ही रह रहीं थी और हमारी कहानी का हीरो अपने पिता के पास अपने गाँव में | अब यहाँ आता है कहानी में एक जबरदस्त मोड़ |अचानक एक दिन सुबह-सुबह पड़ोसी होशियार सिंह जी के पास पहुंचता है और अनुरोध करता है "मेरा बेटा हापुड़ जा रहा है जहां फ़ौज के लिए भर्ती चल रही है| रास्ते में साथ के लिए अपने बेटे हुकुम को भी भेज दीजिए तो मेरी चिंता दूर हो जायेगी |" अब वहां पहुँच कर पता नहीं क्या सूझी कि हीरो भी लाइन में लग गए और तकदीर का खेल , जिसे भर्ती करवाने आये थे वह तो रह गया टांय-टांय फिस्स और चुन लिया गया हमारा हीरो| अब गाँव में जाकर जब सबको बताया तो मच गया कोहराम और रोआ-पीटन | परिवार का कोई भी बड़ा-बूढ़ा इस पक्ष में नहीं था कि हुकुम जाकर फ़ौज की नौकरी करे | उनका सोचना भी एक हद तक जायज़ था | पहले और दूसरे विश्व-युद्ध की बर्बादी झेल चुके बुजुर्गों के लिए फ़ौज की नौकरी में खतरा ही खतरा था | पर जो होना था सो तो हो चुका था सो बुझे मन से दिल पर पत्थर रख कर घर-परिवार ने हालात को स्वीकार करने में ही भलाई समझी और इस के बाद मन में जोशीले अरमान लिए घर-बार छोड़, निकल पड़ा हमारा बहादुर सिपाही एक नई मंजिल की ओर | वह साल था वर्ष 1954 का | 


अब अगर थोड़े में कहूँ तो फ़ौज की नौकरी इस बहादुर हीरो ने कुछ इस अंदाज़ में की जैसे जंगल में शेर की चहल कदमी | इस बात का अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि सिपाही के रूप में भर्ती हुए इस लाजवाब इंसान ने तरक्की की हर हद को एक के बाद एक आश्चर्यजनक ढंग से पार करते हुए अपने 34 वर्ष के सेवा-काल में लेफ्टिनेंट कर्नल के ओहदे तक पहुँच कर ही दम लिया | इसके लिए काम के प्रति पूरा समर्पण और स्वयं के विकास के लिए लगातार अध्ययन जारी रख कर शैक्षिक योग्यता बढाते रहे | सेना में रहते हुए ही विभिन्न तकनीकी कोर्स के अलावा उन्होंने बी.एस.सी , बी .एड, मेनेजमेंट और विधि क्षेत्रों की  शैक्षिक  योग्यताएं अर्जित की | ईमानदारी से अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए, बिना किसी सिफारिश की बैसाखी का सहारा लिए, जो कुछ पाया बस अपने बल-बूते पर | यही ईमानदारी और सिद्धांत कहीं उनकी नौकरी-नैय्या की पतवार बने तो कहीं इन्हीं जीवन-मूल्यों ने आगे बढ़ने के रास्ते में अड़चने भी खडी कर दीं वरना शायद एक - दो अतिरिक्त प्रमोशन भी मिल गए होते | पर इस बात का उन्हें कभी कोई दुःख नहीं रहा जैसा कि वह स्वयं कई बार कहते भी थे कि जीवन मूल्यों के साथ समझौता करके कोई भी लाभ उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं | अपने सेवा-काल में तीनों मुख्य –युद्ध – 1962 चीन के साथ , 1965 और 1971 पाकिस्तान के साथ , में सीमा पर बहुत बहादुरी से दुश्मन का मुकाबला किया | भूटान में हुए सत्ता-संघर्ष के समय विद्रोहियों से निपटने के लिए भेजी गयी भारतीय सेना की पहली टुकड़ी के सदस्य थे जहां बहुत ही खतरनाक हालातों का सामना करना पड़ा | एक से एक कठिन सीमावर्ती स्थानों पर तैनाती रही जिसे बखूबी निभाया | 1962 के भारत-चीन के युद्ध के समय जब इनकी पोस्टिंग बार्डर पर थी, तब अपने पिता श्री होशियार सिंह जी को भी खो बैठे | दरअसल  रेडियो पर आरही लड़ाई और शहीद सैनिकों के समाचारों को सुनते-सुनते ही वृद्ध पिता अपने बेटे की चिंता में हार्ट-अटेक का झटका नहीं झेल पाए थे  |
इनकी उच्च-श्रेणी की ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा को देखते हुए भारतीय सेना के सिग्नल्स कोर की बहुत ही गोपनीय और संवेदनशील साइफर ब्रांच में कार्यरत रहे| इनके कार्य-कलापों की संवेदनशीलता और गोपीनयता का सम्मान करते हुए मैं इस विषय में अधिक विस्तार से नहीं जा रहा हूँ | केवल इतना कह सकता हूँ कि यह मेरे रोल माडल रहे, जिनसे मैंने सीखा ( या सच कहूँ तो सीखने का प्रयत्न किया पर पूरी तरह से आज तक सफल नहीं हो पाया ) कि कभी भी किसी की बुराई मत करो | उतना बोलो जितना आवश्यक है | जहां तक हो सके लोगों की मदद करो | एक बात और - मेहनत और ईमानदारी अगर आप के पास है तो ज़िन्दगी में सब कुछ हासिल किया जा सकता है |शायद इस ब्लॉग के माध्यम से आप सब तक यही नसीहतें पहुंचाना ही मेरा उद्देश्य है |   


मेरे यह रोल माडल, प्रेरणास्रोत हैं लेफ्टिनेंट कर्नल एच. सी. शर्मा ( सेवा निवृत ) जो अभी कुछ दिन पूर्व ही अचानक 19 जनवरी 2019 को सदगति को प्राप्त हो गए |अपने पीछे भरा-पूरा, सुखी-संपन्न परिवार छोड़ कर जाने वाले कर्नल शर्मा सबकी नज़रों में यूँ तो मेरे स्वसुर थे पर मेरे लिए सही मायने में एक ऐसे पथ-प्रदर्शक रहे जिनकी कमी जीवन- पर्यंत मुझे खलती रहेगी | अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने उनसे कहा था कि आपके इतने प्रेरणादायी और साहसिक व्यक्तित्व के बारे में एक लेख लिखूँगा | मुझे यह नहीं आभास था कि थोड़ी से देर के कारण यह लेख श्रद्धांजली-सुमन के रूप में अर्पित  करना पड़ेगा |   




                   सादर नमन – श्रद्धांजली

Wednesday, 9 January 2019

बात अंतिम कविता की

स्व० श्री रमेश कौशिक 

वर्ष 2018 बीत गया और अब जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ, नए साल के नए माह ने हमारे आप के जीवन मे अपना स्थान बनाना शुरू कर दिया है |ऐसे समय में जब ज्यादातर लोग नए साल की ओर बड़ी आशा से देख रहें हैं, भविष्य के लिए नई-नई योजनाएं बना रहें हैं, आदर्शवाद से भरपूर तरह-तरह के संकल्प ले रहे हैं, एक मैं हूँ जो बीते हुए समय को पीछे मुड़कर ध्यान से देख रहा हूँ | याद कर रहा हूँ उन सभी की मीठी यादों को जो कभी साथ थे पर आज नहीं | वक्त के थपेड़ों ने जिन्हें दूर, बहुत दूर कर दिया, इतना दूर जहां से कोई वापिस नहीं आता | बहुत सारे हैं ऐसे बिछड़ने वाले पर कुछ ऐसे होते हैं, सच में जो सबसे ख़ास होते हैं | और ख़ास भी कोई यूं ही नहीं बन जाता, उस ख़ास में बात भी कुछ ख़ास होनी चाहिए यानी ऐसी बात जो हो सबसे अलग | यह वह ख़ासियत ही है जो सब की भीड़ में उस शख्स को सबसे अलग खड़ा करती है और साल दर साल गुजरने के बाद भी उसकी यादों की भीनी-भीनी महक से आपको हर दम महकाए रखती है | कुछ ऐसे ही शानदार, दमदार और प्रभावशाली और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के मालिक थे मेरे पूज्य पिता स्वर्गीय श्री रमेश कौशिक, काव्य-जगत के जाने-माने स्तम्भ | कविता के प्रति उनका रुझान बचपन से ही रहा जिसका श्रेय वे अपने पिताश्री (मेरे दादा ) लावनी कलाकांत पंडित हरिवंश लाल जी को देते थे जिन्होंने 9-10 वर्ष की उम्र से ही कविता का अभ्यास कराना आरम्भ कर दिया था | उस अवस्था में लिखे एक दोहे का उल्लेख उन्होंने कविता संग्रह ‘कहाँ हैं वे शब्द’ के आत्मकथ्य में किया है :


सत के कारण हरिश्चंद्र ने, झेले कष्ट अपार|

राज पाट, नारी सुत तजके, करे श्वपच घर कार || 


विगत में भी उनकी लिखी कविताओं से समय-समय पर आपको परिचित करवाता ही रहा हूँ | उनसे जुड़ेअनगिनत प्रेरणादायक संस्मरण आज भी मेरे मनो-मस्तिष्क में इस तरह ताज़ा हैं जैसे कल की ही बात हो| 



यहाँ यह बताना उचित रहेगा कि मेरे पिता ने पार्किनसंस जैसे गंभीर रोग की विभीषिका को लगभग बारह वर्ष के लम्बे समय तक झेला पर अंत समय तक हार नहीं मानी | इस दौरान भी वह शरीर की दिनों-दिन क्षीण होती जा रही शक्ति के बावजूद अपने काव्य-लेखन पर उसी उत्साह से लगे रहे | एक के बाद एक कविता संग्रह आते रहे और जिन्दादिली और मनोबल की हालत यह कि अस्पताल में भर्ती होने पर भी डाक्टरों को भी अपनी कविताएँ सुना दिया करते जिसमें एक मुझे आज भी याद है : 

सब के सब बीमार
मरीज तो मरीज 
डाक्टर भी 
इसलिए मदद कर नहीं सकते 
एक-दूसरे की 

लाचार | 
सब-के-सब बीमार 
कोई आँख से 
कोई कान से 
कोई तन से 
कोई मन से | 

दुनिया एक बहुत बड़ा अस्पताल 
किन्तु कोई नहीं तीमारदार 
सब-के-सब बीमार| 

अभी पिछले दिनों उनका कविता संग्रह - प्रश्न हैं उत्तर नहीं की कविता मृत्यु पढ़ रहा था| यह संग्रह वर्ष 2006 में प्रकाशित हुआ था | कविता इस प्रकार से है : 


मृत्यु

ओ श्यामा सुन्दरी 

मुझे यह तो पता है 
कि एक दिन तुम 
मेरे पास निश्चय ही आओगी 
और अपने साथ चुपके-से ले जाओगी | 

किन्तु यह नहीं बताया कभी 
कि तुम कब आओगी 
कहाँ से आओगी 
और कहाँ ले जाओगी | 

कोई अतिथि यदि बिना बताए 
आ जाए अचानक 

तो स्वागत में कमीं बने रहने का 
अंदेशा रहता है 
अगर तुम्हारे साथ हो गया कुछ ऐसा ही 
तो मुझको यह अच्छा नहीं लगेगा | 

अत: अभी बता दो मुझको 
कब आओगी 
ताकि तुम्हारे स्वागत की 
तैयारी कर लूँ | 

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वर्ष 2009 का उत्तर्राद्ध आते-आते रोग ने अपनी पकड़ और मजबूती से कर ली | शरीर और अधिक क्षीण हो चला | खाना-पीना भी सब नाक में डाली गयी ट्यूब के रास्ते | पूरी तरह से रोग-शैय्या पर | अधिकाँश समय नीम-बेहोशी की अवस्था में सोते हुए ही गुजरता | आवाज काफी हद तक अस्पष्ट हो चुकी थी | ऐसी ही अवस्था में फिर भी एक दिन बहुत ही हिम्मत करके कागज़ कलम लेकर स्वयं ही कुछ लिखना चाहा | आधी-अधूरी, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं और शब्दों के द्वारा कुछ लिखने का भरसक प्रयास कर रहे थे | बहुत कोशिश करने पर भी बात नहीं बन पायी | अंत में मेरी मां ने कुर्सी-मेज पर बैठ कागज़-कलम संभाला और पत्नी हेमलता ने सिराहने बैठ उनके फुसफुसाते स्वर के अस्फुट शब्दों को कान लगाकर सुनने का भरसक प्रयास किया | अब पत्नी उन शब्दों को सुन और समझ कर बोल रहीं थी जिन्हें मेरी मां तुरंत लिखती जा रही थी | इस सारी बौद्धिक कवायत में जैसे-तैसे वह कविता पूरी हुई | माँ की तमाम नाखुशी के बावजूद भी पिता ने यह कहते हुए कि यह उनकी आखिरी कविता है, रचना का शीर्षक दिया अंतिम कविता | उस बालक की, जिसने आठ साल की उम्र से ही कविता को जीवन भर के लिए अत्यंत प्रगाढ़ रूप से आत्मसात कर लिया था, 79 वर्ष की आयु में गहन रोग शैया पर लेटे, नितांत कष्ट में लिखी यह रचना सच में जीवन की अंतिम कविता ही साबित हुई | मात्र पंद्रह दिन के अंतराल पर एक रात उन्होंने इशारे से माँ को पास बुलाया और उनकी बांह पर अपनी कांपती उंगली से कुछ लिखा | पूरी तरह से न समझ पाने पर माँ ने मेरी पत्नी को पास बुलाया| इस बार पिता ने फिर वही दोहराया जिसे पत्नी समझ गयी | उन्होंने लिखा था : अब मैं मृत्यु चाहता हूँ|

शायद मृत्यु-देव उस समय कहीं आस-पास ही विचरण कर रहे थे जिन्होंने इच्छा जानकार तुरंत कह भी दिया होगा तथास्तु | अगले ही दिन 27 सितम्बर 2009 की सुबह उनके जीवन की अंतिम सुबह थी |

जीवन काल की वह अंतिम कविता इस प्रकार से है : 

अंतिम कविता 

वे आ रहे हैं 
श्याम वर्ण अश्वों पर सवार 

मेरे घर की ओर । 

उनके काम बता दिए गए 
एक का काम है
मुझको नहीं बोलने देने का 
वाणी को छीन लें । 

दूसरे का काम है 
न सुनने देने का 
ताकि मैं उनके आने की 
आहट न सुन सकूँ । 

तीसरे का काम है 
आँख बन्द करने का- 
ताकि मैं उनका आतंक न देख सकूँ । 

चौथे का काम है 
मेरे दाँत तोड़ने का 
ताकि मैं चलते समय 
किसी पर आक्रमण न करूँ । 

कुछ देर रुक कर 
फिर एक गहन सन्नाटा। 
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 श्याम वर्ण अश्वों पर सवार मृत्यु-दूत ? ? ? ?  ? 

कहते हैं जब कविता जीवन के अनुभवों से जुड़ी होती है तो उसमें बसी सच्चाई दिलो-दिमाग में कहीं गहरे तक असर करती है | मैनें महसूस किया कि व्यक्ति वही है, विषय-वस्तु भी वही है पर बदली है तो केवल एक चीज - परिस्थिति | इस बदली परिस्थिति ने पूरी कविता को एक नया ही कलेवर और आयाम दिया है | गुजरते वक्त के साथ-साथ जीवन के शाश्वत सत्य – मृत्यु पर बदलता हुआ दृष्टिकोण उनकी तीन कविताओं में स्पष्ट झलकता है | अस्पताल के बीमार मरीज, बीमार डाक्टर के वातावरण जहां कोई तीमारदार नहीं से शुरू होता सफ़र, रास्ते में कहीं पल भर को ठहर कर मृत्यु से अनुरोध करता है कि बिना किसी पूर्व-सूचना के अतिथि की भांति मत आना, जब भी आओ बता कर आना जिससे तुम्हारे स्वागत में कोई कमी न रह जाए | जब अश्व पर सवार यही अतिथि रूपी मृत्यु साक्षात नज़र आती है तो अपने दुर्बल शरीर की लाचारगी प्रबल रूप से महसूस होती है | 

इस नए वर्ष पर मैं अपने पिताश्री को श्रद्धा पूर्वक नमन करता हूँ जिन्होंने सिखाया – जीवन अपनी शर्तों पर जिओ, साफगोई से जिओ, सच्चाई से जिओ | 


भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...