Friday, 12 July 2019

भारत माता की जय


भारत माता मंदिर
सच कहूँ तो मैं कोई पोंगा पंडित नहीं हूँ | कर्मकांडी भी नहीं हूँ | हाँ उस ऊपर वाले ईश्वर में अलबत्ता जरुर आस्था रखता हूँ | कभी-कभार मंदिर में भी अगर जाना पड़े तो मत्था टेक लेता हूँ उसी श्रद्धा से जिससे गुरुद्वारे में अपना शीश नवाता हूँ | सबकी अपनी - अपनी सोच है , अपने विचार हैं | मेरा मानना है कि धर्म के मामले में किसी पर भी अपनी राय, अपने विचार दूसरे पर नहीं थोपने चाहिए | अब अगर हम मंदिर की बात करते हैं तो मन में एक ख़ास तरह की परिकल्पना उभरती है - देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजा धजा पूजा-अर्चना का पवित्र स्थान | पर कभी-कभी कुछ ऐसा होता है जिससे आपको अपनी परम्परागत सोच से हट कर अपने विचार बदलने को मजबूर होना पड़ता है | ऐसा ही कुछ –कुछ मेरे साथ हुआ जब मैं फिलहाल में हरिद्वार की यात्रा से लौटा |


हरिद्वार का नाम आते ही मन में याद आ जाती है गंगा मैय्या , हर की पौड़ी और हरिद्वार- ऋषिकेश स्थित अनगिनत छोटे –बड़े मंदिर और आश्रम | परिस्थितियां कुछ ऐसी बन पड़ी कि अपने एक बड़े भाई तुल्य अभिन्न मित्र श्री विजय कुमार उपाध्याय जी के साथ हरिद्वार जाना पड़ा | उनके सुझाव पर ही दर्शन करने पहुंचे भारत माता मंदिर | हो सकता है आप में  से बहुत से पाठक मित्र  इस मंदिर के बारे में पहले से ही जानते हों, पर जो इससे अपरिचित हैं उन्हें यह जानकारी रोचक लगेगी | वास्तव में अपने नाम के अनुरूप ही भारत माता मंदिर अपने आप में एक व्यापकता समेटे हुए है | यह हरिद्वार में गंगा किनारे, सप्तऋषि आश्रम मार्ग पर बना हुआ है | यह लगभग 180 फीट ऊँचा है जिसमें आठ मंजिलें हैं | हर मंजिल पर आपको एक अलग ही थीम और विचारधारा का अनुभव होता है | 

मात्र दो रुपये का टिकट लेकर मंदिर की सबसे ऊपर की आठवीं मंजिल तक आप सीधे लिफ्ट से पहुँच सकते हैं | यहाँ भगवान शिव का मंदिर है | यहाँ से आपको आध्यात्मिक शान्ति के अलावा हरिद्वार की प्राकृतिक सुन्दरता के भी दर्शन होते हैं | 

वापिस नीचे सीढ़ियों से उतरने पर सातवीं मंजिल पर भगवान विष्णु के दस अवतारों को देखा जा सकता हैं । भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उनके मत्स्य , कुर्म , वाराह , नर्सिहा , वामन , परशुराम , राम , कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतारों की सुन्दर झाकियां दर्शायी गयी है | 

छठवीं मंजिल पर बने “शक्ति मंदिर” में आदि शक्ति की प्रतीक विभिन्न देवियों - माँ दुर्गा , पार्वती , राधा , काली , सरस्वती आदि की मूर्तियाँ प्रदर्शित की गयी हैं|
अभी तक जो भी हमने देखा वह सब अन्य दूसरे मंदिरों जैसा ही था | पर अब जैसे ही आप पांचवी मंजिल पर उतरते हैं, आपको अब एहसास होने लगता है कि यह मंदिर दूसरे अन्य सामान्य मंदिरों से अलग क्यों है | इस खंड में भारत के विभिन्न प्रदेशों और राज्यों की संस्कृति को चित्रों के माध्यम से बहुत ही रोचक तरीके से दिखाया गया है | यहाँ की दीर्घा का एक चक्कर मात्र लगाने से आपको कर्नाटक, गोवा, गुजरात, राजस्थान, जम्मू –काश्मीर, कश्मीर पंजाब, हिमाचल प्रदेश का मानो सजीव दर्शन करा देता है | यह खंड विभिन्न धर्मों की झांकियां ,इतिहास ,एवं भारत के विभिन्न भागों की लोक कला को सुंदरता से प्रदर्शित करता  है । 

चौथी मंजिल पर है संत मंदिर | यहाँ उन सब संत पुरुषों और समाज सुधारकों की प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं जिन्होनें धर्म और समाज के क्षेत्र में एक नयी चेतना लाकर अभूतपूर्व योगदान दिया | यहाँ आपको बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मगुरुओं के भी दर्शन होंगें जैसे - गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, महर्षि बाल्मिकी , संत ज्ञानेश्वर, गुरुनानक जी, गुरु गोविंद सिंह जी, स्वामी विवेकानंद , स्वामी दयानंद सरस्वती , महर्षि अरविन्द , परमहंस रामकृष्ण जी | 

तीसरी मंजिल बना खंड समर्पित है स्त्री शक्ति के नाम | इस मंदिर का नाम है “ मातृ मंदिर” | प्रेम, वात्सल्य और भक्ति और समाज सेवा के प्रतीक रानी पद्मिनी , सती सावित्री , सती चमखर देवी,  मीरा बाई , हेलन केलर , एनी बेसेंट की मूर्तियां यहाँ स्थापित हैं | अब आपको भी लग रहा है ना आश्चर्य | अभी देखते जाइये आगे भी | 

दूसरी मंजिल पर है शूर मंदिर | अपने नाम के अनूरूप यह मंदिर देश के वीर सपूतों को समर्पित है जिनके योगदान और बलिदान को आज का भारत कभी नहीं भूल सकता |इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर लिखी राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की देश के बलिदानियों को वन्दना करती कविता की  यह पंक्तियाँ पढ़कर चलते कदम मानों बरबस ठिठक गए :
तुमने दिया देश को जीवन,
देश तुम्हें क्या देगा,
अपनी आग, तेज रखने को,
नाम तुम्हारा लेगा |

मंदिर के इस खंड  में सरदार पटेल, महात्मा गाँधी , सुभाष चन्द्र बोस , लाल बहादुर शास्त्री , गुरु गोविन्द सिंह , महाराणा प्रताप , शिवाजी महाराज , झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई , भगत सिंह , सुखदेव , चन्द्र शेखर आज़ाद, राजगुरु आदि भारत माता के वीर सपूतों की मूर्तियाँ लगी है | यह सब देखकर मन सोचने पर विवश हो जाता है कि समय काल के साथ-साथ यही महापुरुष हजारों वर्ष के अंतराल पर देवताओं के रूप में शायद याद किये और पूजे जायेंगे | 

भारत माता की प्रतिमा 
सबसे नीचे मंदिर की पहली मंजिल पर तिरंगा  झंडा हाथ में लिए भारत माता की भव्य मूर्ति है | साथ में ही धरती पर रेत , मिट्टी और सीमेंट के मिश्रण से बना विशाल भारत के नक़्शे का माडल है जिसे देखने मात्र से ही बहुत ही आलौकिक अनुभव होता है | रात के समय रंग –बिरंगी रोशनी में इसकी छटा देखते ही बनती है | 
इस मंदिर के दर्शन करने के बाद आपको एक विचित्र अनुभव होता है जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है | एक ओर आध्यात्मिक शान्ति का अनुभव होता है लेकिन साथ ही साथ हमें गर्व की अनुभूति होती है भारत भूमि की ऐतिहासिक विरासत के बारे में जान कर| यह इतिहास हमें  बताता है कि हजारों वर्ष पूर्व जब आज के तथाकथित उन्नत पश्चिमी देश के लोग भेड़-बकरियां चरा रहे थे तब यहाँ भारत देश में वेद और पुराणों की रचना की जा रही थी | यह मंदिर हमें याद दिलाता है उन समाज सुधारकों के योगदान को जिन्होंने समाज में फ़ैली कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई और समाज को नयी चेतना और दिशा दी  | इस मंदिर में आकर हमारा सर श्रद्धा से झुक जाता है उन शूर-वीर स्वतन्त्रता सैनानियों के लिए जो इस देश को आज़ाद कराने के लिए हंसते हुए अपनी जान पर खेल गए | यहाँ आकर मुझे लगा मानों भगवान् , देवताओं और महापुरुषों में बस केवल एक महीन सी विभाजन रेखा है | इन सबके सद्कर्मों का आशीर्वाद ही तो है जो आज हम सब आज़ादी की हवा में सांस ले रहे हैं | शत शत नमन उन सब को | 
ब्रह्मलीन गुरु महामंडलेश्वर सत्यमित्रानंद गिरि जी 
साथ ही नमन उस सोच को जिन्होनें इस मंदिर की स्थापना की | इस मंदिर का निर्माण प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु महामंडलेश्वर सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज ने करवाया था | मई 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका उदघाटन किया था | अभी पिछले माह ही 25 जून 2019 को 87 वर्ष की आयु में स्वामी जी का निधन हो गया |  समाज के प्रति विभिन्न अभूतपूर्व योगदान और परमार्थ सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित भी किया जा चुका है | ऐसे गौरवशाली महापुरुष की श्रद्धांजली में केवल यही सबसे सार्थक शब्द हो सकते हैं : 
                 |भारत माता की जय |

Monday, 8 July 2019

तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय

(इस जानकारी पूर्ण लेख के सभी तथ्य और फोटो देहरादून निवासी  श्री राय धर्मेश प्रसाद के सौजन्य से प्राप्त हुए जिसके लिए उनका हार्दिक धन्यवाद ) 


राय धर्मेश प्रसाद 
अक्सर लोग कहा करते हैं – दोस्ती करो या दुश्मनी, जो भी करो जम कर करो | सीधी सपाट बात है, आसानी से समझ भी आ जाती है और ठीक भी लगती है | दोस्ती के किस्से तो आप लोगों ने खूब सुने होंगे और दुश्मनी के भी | इतिहास तो ख़ास तौर से दुश्मनी के किस्से-कहानियों से भरा पड़ा है | राजे – महाराजाओं और नवाबों को तो मानों सिवाय जंग लड़ने और खून बहाने से फुर्सत ही नहीं होती थी | पर शत्रु को इज्ज़त और सम्मान देने वाली बात हो तो ऐसे लोग तो बिरले ही होते हैं | रामायण का किस्सा आप को याद होगा जब तीर लगाने पर रावण प्राण त्यागने वाला था तब श्री राम ने लक्ष्मण को कहा कि रावण बहुत विद्वान और प्रकांड पंडित है उनसे अंतिम समय में कुछ ज्ञान की सीख प्राप्त कर लो | लक्ष्मण ने रावण के सर की ओर खड़े होकर कुछ ज्ञान की बातें बताने को कहा जिस पर रावण चुप रहा | इस पर श्री राम ने ही लक्षमण को समझाया था कि आदर पूर्वक चरणों में बैठ कर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है | इसी प्रकार सिकंदर –पोरस का किस्सा भी याद आ जाता है | युद्ध में हारने पर राजा पोरस को बंदी बना कर सिकंदर के सामने पेश किया जाता है| सिकंदर राजा पोरस से पूछते हैं कि तुम्हारे साथ कैसा सलूक किया जाए | जवाब मिलता है – जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है | कहते हैं इस ज़वाब ने सम्राट सिकंदर को इतना प्रभावित किया कि उसने राजा पोरस को न केवल आज़ाद कर दिया बल्कि जीता हुआ राज्य भी वापिस कर दिया | यह थे इतिहास के पन्नों से सुने-सुनाये कुछ किस्से जो कितने सच्चे या झूठे हैं कोई दावे के साथ नहीं कह सकता | पर बहादुर दुश्मन को भी इज्ज़त और सम्मान देने का एक सचमुच की ऐतिहासिक घटना को प्रमाण के साथ मेरी जानकारी में लाने का श्रेय देहरादून निवासी मेरे एक अत्यंत घनिष्ठ सहकर्मी मित्र श्री धर्मेश राय प्रसाद को जाता है | उनके द्वारा बताई गयी जानकारी को मैंने आप तक पहुंचाने से पहले सत्यता की कसौटी पर अनेक माध्यमों से परखा और ठीक पाया | 

तो चलिए बात शुरू करते हैं और पहुँच जाते हैं आज से 200 लगभग साल पीछे | यह कहानी शुरू होती है वर्ष 1814 में जब देहरादून घाटी का क्षेत्र नेपाली गुरखाओं के शासन के आधीन था | नालापानी की पहाड़ियों पर खालंगा नाम के स्थान पर एक किला था जिसकी सुरक्षा का जिम्मा नेपाली सेनापति वीर बलभद्र थापा के अधीन था | इस किले मे लगभग 600 सैनिक अपने परिवारों के साथ रहते थे | अपने साम्राज्य को ज्यादा से ज्यादा विस्तार देने की नीति के अनुसार अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज ने सहारनपुर की ओर से देहरादून पर हमला बोल दिया | यहाँ पर गोरखाओं के सेनापति बलभद्र थापा ने ब्रिटिश सेना के कमाण्डर जनरल जिलेस्पी के साथ बड़ी बीरता से युद्ध किया था। ब्रिटिश सेनाओं के पास उस समय के आधुनिक हथियार बंदूके, तोपे 3000 से अधिक सैनिक थे। ब्रिटिश कमाण्डर जिलेस्पी को लगता था कि वह आसानी से कुछ ही समय में युद्ध को जीत लेंगे पर यह इतना आसान नहीं था। दूसरी तरफ गोरखाओं के सेनापति बलभद्र के पास लगभग 600 सैनिक थे जिनमे औरतें और बच्चे भी शामिल थे और हथियारो के नाम पर तलवारें, भाले और तीर कमान ही थे लेकिन फिर भी उन्होंने अपने युद्ध कौशल से अंग्रेजों का पूरे एक महीने तक पूरी दृढता से सामना किया। इस लड़ाई में जनरल जिलेस्पी शहीद हो जाते है। अंत में और कोई रास्ता न देख कर, जब अंग्रेजो को लगा की ये युद्ध जीतना असंम्भव है, तो उन्होंने इस किले तक जो पीने का पानी आता था उसकी सप्लाई बंद करवा दी | इसके बाद गुरखा सैनिक 3 से 4 दिनों तक प्यासे ही लड़ते रहे | लेकिन जब वीर बलभद्र थापा को लगा कि बिना पानी पिए यह युद्ध लड़ना सम्भव नहीं है तो वो अपने बचे-खुचे 70 सैनिको के साथ किले का द्वार खोल देते है और अंग्रेजो के सामने उनकी पूरी सेना आत्मसमर्पण कर देती है लेकिन वह खुद वहाँ से अंग्रेजो को चकमा देकर भाग जाते है। कई लोग यह भी मानते है की वह भी इस युद्ध में शहीद हो गए थे। कुछ इतिहासकारों का मत है कि है कि गोरखा सेनापति अफगानी फौज के साथ युद्ध करते समय शहीद हुऐ जिसमे यह राजा रणजीत सिंह का साथ दे रहे थे। सच्चाई जो भी रही हो , पर इतना जरूर है कि अंग्रेज गोरखा सेनापति और उसकी सेना की बहादुरी के कायल हो गए | इसके बाद इस बहादुरी को सम्मान देते हुए ही अंग्रेजों ने इस युद्ध में जो सैनिक शहीद हुऐ थे अपने उन अंग्रेज साथियों के साथ –साथ उन सभी गोरखा सैनिकों के शौर्य और की याद में भी इस स्मारक का निर्माण करवाया |
अपनी कहानी खुद बोलते शिला लेख 

इतिहास की गवाही 

आपस में लड़े, पर मर कर भी साथ-साथ   
यह शायद दुनिया का अकेला ऐसा युद्ध स्मारक है जिसमें विजयी सेना के साथ-साथ पराजित सेना के सेनापति की भी बहादुरी की प्रशंसा में सयुंक्त श्रद्धांजली के रूप में स्थापित किया  गया हो | इस स्मारक के शिलालेख में गोरखा सेनापति को “बहादुर दुश्मन ” के रूप में सम्मान दिया गया है | अगल-बगल में खड़े दो विजय स्तम्भ जो एक दूसरे के दुश्मन सेनापति की याद में हैं मानों आज स्वर्गीय शैलेन्द्र के पुराने गीत की याद दिला रहे हैं : –
तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय,
ना तुम हारे , ना हम हारे | 
सफ़र साथ जितना था हो ही गया तय , 
ना तुम हारे, ना हम हारे |


Sunday, 30 June 2019

मुखौटा

चेहरे पर चेहरा 
मशहूर शायर मुनीर नियाजी की ग़ज़ल का एक बड़ा प्यारा सा शेर है :
ये जो ज़िंदगी की किताब है ,
ये किताब भी क्या किताब है ,
कहीं रहमतों की हैं बारिशें ,
कहीं जान लेवा *अज़ाब है | ( * अज़ाब = पीड़ा / दर्द )

बस एक तरह से यह जान लीजिए कि इस ज़िंदगी की किताब से हमें बहुत कुछ सीखने को मिल जाता है | हाँ, इतना जरूर है कि हमारे आँख, नाक , कान और इन सबसे ऊपर दिमाग खुला होना चाहिए | इसी ज़िंदगी में हमें तरह-तरह के इंसान मिलते हैं , अच्छे भी और बुरे भी | सीख हमें दोनों से ही मिलती है | कहीं न कहीं मुझे लगता है भले लोगों की बजाय बुरे लोगों से ज्यादा सीखने को मिल जाता है | यही कि कुछ भी कर लो पर इस गलत इंसान की तरह तो बर्ताव कतई मत करो | आज बरबस एक ऐसे ही शख्स की याद आ गयी | 

यह श्रीमान मेरे संस्थान में ही एक तरह से सर्वे-सर्वा थे | सबके सामने तो बहुत ही ठन्डे, विनम्र स्वभाव के | छोटी-छोटी बातों में ईमानदारी की जीती जागती मिसाल | एक बार मेरे दफ्तर के निरीक्षण दौरे पर आये | शाम को जब उन्हें होटल तक पहुंचाने जा रहा था तो रास्ते में उन्होंने गाड़ी रुकवा ली और पानी की बोतल और बिस्किट के पेकेट के लिए अनुरोध किया  | साथ चल रहे अपने सहायक को मैंने इशारा किया जो पास की दुकान से सामन ले आया | साहब ने जेब में हाथ डाला और उस सामन की कीमत जो लगभग 28 रुपये थी, मेरे मना करने के बावजूद भी जबरदस्ती थमा दी | अब भाई हम तो सच में मुरीद हो गए साहब की साफगोई और ईमानदारी के | सब जगह जिक्र करते कि साहब हो तो उन जैसा | भगवान को शुक्रिया भी अदा करते कि तूने हमें ज़िंदगी में ऐसे भले इंसान के नीचे काम करने का मौक़ा दिया | 

समय बीतता गया | पता चला हमारे  संस्थान से भी ज्यादा बड़े एक महा नवरत्न सरकारी कंपनी के सर्वोच्च पद पर नियुक्त हो कर चले गए | मेरे सच्चे मन से आवाज निकली वाह भले और ईमानदार लोगों का भला ऊपर वाला भी देखता है | बीच-बीच में उन साहब के बारे में खोज-खबर भी मिलती रहती की सफलता की सीढ़ियों पर ऊँचे चढ़ते जा रहे हैं | 
मुझे आज भी वह सुबह अच्छी तरह से याद है | सुबह - सुबह की चाय पी रहा था कि फोन की घंटी बजी | लाइन पर दूसरी ओर मेरे एक बहुत ही ख़ास दोस्त थे | छूटते ही बोले : आज टी.वी की न्यूज देखी क्या ? अगर नहीं तो देखो | इतना कह कर उन्होंने फोन झटके से रख दिया | अब मैं बहुत ही अचम्भे और आश्चर्य की पराकाष्ठा पर पहुँच गया | आखिर ऐसा क्या हो गया .... कौन सा पहाड़ टूट गया | टी.वी के न्यूज चेनल को खोला | सामने जो समाचार चल रहे थे उन्हें देख और सुन कर लगा जैसे बिजली का चार सौ चालीस वोल्ट का झटका लगा | आँख और कानों पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था | समाचार आ रहे थे कि हमारे उन्हीं आराध्य और पूज्यनीय ईमानदारी के जीते –जागते अवतार को सी.बी.आई ने मोटी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया है | उस से भी दुःखदायी बात यह कि इस सारे रिश्वत - काण्ड में उनकी पत्नी की भी अहम् भूमिका रही सो उन्हें भी साथ ही गिरफ्तार किया गया | दोनों ही पति-पत्नी की जोड़ी से पहले सी.बी.आई ने कड़ी पूछताछ की और बाद में कोर्ट में पेशी हुई | अदालत से जमानत नहीं मिली और दोनों को ही तिहाड़ जेल भेज दिया गया जहां लम्बे समय तक रहना पड़ा | 

यह बात जब भी याद आती है, मैं सोच में पड़ जाता हूँ | आखिर क्या कमी थी उन्हें अपनी शानदार वैभवशाली ज़िंदगी में | जीवन के उस अंतिम पड़ाव पर जब वह प्रसिद्धि और कामयाबी की ऊँचाइयों के आसमान को छू रहे थे तो लालच के चंगुल में ऐसे फँसे कि बदनामी की कालिख ने सब करे धरे पर पानी फेर दिया | नौकरी तो गयी ही , सब अखबारों में कारनामों के ऐसे चर्चे हुए कि अडोस –पड़ोस और रिश्तेदारी में भी कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे | आज भी मुंह छिपा कर चोरों की ज़िंदगी जी रहे हैं |कभी-कभी सड़क से गुजरते हुए देखता हूँ कि जिस घर के आगे हमेशा चहल-पहल रहा करती थी आज भूत बंगले की सी वीरानी छाई रहती है |

यदि उनकी जगह कोई और शख्स होता तो मुझे इतना कष्ट नहीं होता | दुःख तब होता है जब आपका भ्रम टूटता है | यहाँ भी ऐसा ही हुआ - उनके चेहरे पर ता- उम्र इतना खूबसरत मुखोटा रहा कि बस कुछ पूछिए मत | पर चेहरे से ईमानदारी का नकाब उतारा तो असल सूरत नज़र आयी | ऐसी शक्ल जिसे दुनिया ने देखा, और सिर्फ देखा ही नहीं बल्कि मारे अचरज के दांतों तले उंगली दबा ली | इस पूरे किस्से से मैं तो यही सीखा हूँ कि ज़िंदगी सीधे-सादे तरीके से अपने असल चेहरे के साथ बिना किसी बनावट के गुज़ारिये | बनावट का कोई भी मुखौटा हमेशा के लिए आप की असलियत को नहीं छुपा सकता | 

Monday, 24 June 2019

साहब का पाजामा बनाम हाथी के दांत ( सत्य घटना से प्रेरित लघु कथा )



नहा कर निकला ही था पर पहनने के लिए पाजामे का अता-पता ही नहीं | तौलिया बांधे पागलों की तरह से अलमारी खंगाल रहा था कि  पीछे से  श्रीमती जी ने आकर खोज निकाला और मुस्कराते हुए कहा – क्यों आसमान सर पर उठा रखा है | तुम्हारा पाजामा न हो गया मानों कोहनूर हीरा हो गया | बिना बहस किये चुपचाप  खिसिया कर  पाजामा ले लिया और वहां से  खिसक लिया  | अब उन्हें कौन समझाए कि किसी भी चीज़ की अहमियत को कम कर के नहीं आंकना चाहिए | इस बात को मुझसे ज्यादा कोई नहीं समझ सकता , आखिर भुक्तभोगी जो ठहरा | वह घटना आज तक मुझे अच्छी तरह से याद है |
यह बात उन दिनों की है जब मैं देहरादून में कार्यरत था | एक दिन सूचना मिली कि बड़े साहब का निरीक्षण दौरा होने जा रहा है | आनन-फानन में सारी तैयारियां मुक्कमल करीं गयी |  आखिर वह नियत दिन आ पहुँचा | शहर के एक बड़े होटल में मीटिंग का प्रबंध किया गया | दफ्तर के सभी महत्वपूर्ण अधिकारी अपनी पूरी तैयारी के साथ धड़कते दिल से और राम-नाम जपते हुए हाज़िर हो गए | मीटिंग शुरू हुई और हर अधिकारी के काम-काज की समीक्षा और चीर-फाड़ शुरू हुई | अब साहब का हाल यह कि वह किसी से भी खुश नहीं | हर किसी को  धमकाते  और लताड़ते | सभी के लिए एक ही उपदेश – सुधर जाओ | मार्केटिंग के आदमी हो, कभी दफ्तर से भी बाहर निकला करो | अपने दफ्तर के खर्चे कम करो | फालतू के टी.ए बिल पसंद नहीं , वगैरह ...वगैरह | सभी बंद दिमाग से कान दबा कर महापुरुष के सत्य वचन  सुन रहे थे और  दम साधे  इस प्रवचन सभा की सकुशल समाप्ति का इंतज़ार  कर रहे थे |  खैर हर बुरे वक्त की तरह उस सर्कस मजमें का भी अंत हुआ | देर रात हो चुकी थी |खाना-पीना हुआ और इसके बाद साहब का फरमान जारी हुआ..... “बाहर से आये सभी अफसर अपनी –अपनी नियत जगहों के लिए अभी  रवाना हो जाएँ | रात को कोई होटल में नहीं ठहरेगा | सरकारी खर्चे कम करिए |”  अब यह बात अलग है कि खुद  साहब तो  खा-पी कर सारी मीटिंग  बिरादरी को धकिया कर, लतिया कर  , रोता कलपता छोड़, खुद उस आलीशान होटल के शानदार कमरे में खर्राटेदार नींद का लुत्फ़ लेने के लिए सिधार गए |
अगले दिन सुबह का नाश्ता-पानी करने  के बाद साहब बहादुर  फ्लाईट से वापिस दिल्ली उड़ चले | आयी बला के टलने  पर इधर मैंने भी चैन की सांस ली |  शाम के समय साहब के पी.ए का फोन आया – साहब बात करेगें | साहब लाइन पर आये | दो-चार मिनिट इधर-उधर की बातें करने के बाद बोले – “मेरा पाजामा होटल में रह गया है | जरा देख लेना |” अब इस देख लेना के क्या मायने होते हैं यह मुझे देखना था | अब यह कोई ब्लाक-बस्टर पिक्चर बाहुबली  का पाजामा तो था नहीं जो थियेटर में जा कर देख आता | अपने स्वर्गीय पूज्य पिताश्री की अक्सर दोहराए जाने वाली कहावत याद आ गयी  : गूंगे की बात गूंगा जाने, या जाने उसकी मैय्या | साहब की बात का मतलब समझ में आ गया कि जनाब जान की सलामती चाहते हो तो पजामा तुरंत खोजो और हाज़िर करो | दफ्तर बंद होने का समय हो चला था पर तुरंत आपातकालीन मीटिंग बुलाई गयी | एक शख्स को फटाफट मौका-ए-वारदात यानि उस होटल को रवाना किया गया इस हिदायत के साथ कि ग्राउंड जीरो से पूरी तफ्शीश करके रिपोर्ट भेजी जाए | कुछ देर बाद रिपोर्ट भी मिल गयी – साहब का पजामा मिल गया | सुनकर सचमुच इतनी खुशी हुई जितनी शायद नासा को मंगल गृह पर पानी मिलने पर भी नहीं हुई होगी | पसीने में लथपथ, हांफता-कांपते वापिस लौटे हनुमान जी ने संजीवनी बूटी की तरह से पजामा हाज़िर कर दिया | समय कम था, तुरंत सुन्दर सी पेकिंग में उस पजामे को विराजमान करने के बाद एक अन्य कर्मचारी की तैनाती हुई इस हिदायत के साथ कि भाई रात्री बस सेवा से दिल्ली के लिए रवाना हो जाओ और मुर्गे की पहली बांग से पहले, ब्रह्ममुहूर्त में   साहब  के दौलतखाने में इस आफत की बला से छुटकारा पा आओ | एक्शन प्लान पर सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर निहायत ही बारीकी से अमल किया गया और बिना किसी जान-माल के नुक्सान के, हमारा बहादुर सेनानी, साहब ( जान के दुश्मन) के खेमे से सुरक्षित वापिस लौट आया | 
हर युद्ध के लिए कुछ कीमत भी चुकानी पड़ती है | यह पजामा अन्वेषण अभियान भी कोई अपवाद नहीं था | जब उन बिलों पर साइन करने बैठा तो जो इस अभियान से जुड़े थे, तो पता चला खर्चा आया लगभग साढ़े तीन हज़ार रुपयों का | उस समय दिमाग में एक और कहावत याद आ रही थी : हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और |

(*इस सत्य कथा के सभी पात्र काल्पनिक हैं ....... किसी भी प्रकार की समानता संयोगवश हो सकती है , पर संयोग भी इसी दुनिया का सच है | अब आप सच-झूठ का फैसला करते रहिए , मैं तो चला |)


Thursday, 13 June 2019

चम्पू का बन्दरकाण्ड

चम्पू
आज के इस किस्से का हीरो कोई दो पैरों वाला इंसान नहीं वरन चार पैरों वाला एक प्राणी है | उस चुलबुले प्राणी का नाम है चम्पू | जितना प्यारा उसका नाम है उतनी ही रंग-बिरंगी और चंचल उसकी शक्सियत है | अरे पर अभी तक आपको यह तो बताया ही नहीं कि यह चम्पू महाशय हैं कौन | यह दरअसल मेरा पालतू कुत्ता है जिसके लिए कुत्ता शब्द कहने में भी मेरी जुबान सही मायने में लड़खड़ा जाती है | बहुत छोटा था, यह तभी से पिछले पांच वर्षों से मेरे पास है इसलिए एक तरह से यह मेरे परिवार का सबसे छोटा सदस्य है | आज के प्रचलित फैशन के अनुसार इसे खरीदा नहीं था, बल्कि कई परिवारों से तिरस्कृत कर ठुकराए जाने के बाद इसे बड़े प्यार से एक तरह से गोद ही लिया था | तभी से यह हम सब का आँखों का तारा है | इसका संक्षिप्त सा परिचय और कारगुजारियों की जानकारी आपको एक छोटी सी कविता में भी मिल जाएगी जिसका लिंक साथ में ही दिया गया है “चम्पू” | चम्पू की सबसे बड़ी खासियतों में शामिल है इसका तेज दिमाग और निडर स्वभाव | शराफत का आलम यह है कि हर सुबह, मेनगेट से अखबार उठा कर मुझे बिस्तर पर ही लाकर हाज़िर कर देता है | 
मजेदार जिन्दगी 


जनाब इंसान नहीं, उसकी कुर्सी बोलती है  
अब रही बात बदमाशी की तो जनाब बस कुछ यूँ समझ लीजिए के चम्पू कुछ हद उस गली-मौहल्ले में पले- बढे उस इंसान की तरह है जो पढ़-लिख कर किसी मल्टी-नेशनल कंपनी का सफ़ेदपोश बड़ा अफसर तो बन गया पर जिसके खून में से गुंडागर्दी के बदमाशी कीटाणू अभी तक जोर मार रहे हैं | नतीजा यह होता है कि छोटी कद –काठी का होने के बावजूद मोहल्ले की गली के सारे आवारा कुत्तों का निर्विवाद स्वघोषित दादा है | हाँ यह बात अलग है कि कभी कभी अमरीका जैसे देश की भी हर जगह पंगे लेने की आदत की वजह से कई बार बुरी तरह से फजीहत हो जाती है | ऐसा ही कई बार चम्पू के साथ भी हो जाता है जब मोहल्ले के सारे विद्रोही कुत्ते महागठबंधन बना कर हमला बोल देते हैं और राणा सांगा की तरह पूरे शरीर पर नोच-खसोट के निशान लिए चम्पू घर पर लुटे-पिटे दाखिल होते हैं | वह सब देख कर हम भी समझ जाते हैं कि बस अब इलाज के मेडीकल बजट में बढ़ोत्तरी करने के लिए तैयार हो जाइए | पर एक बात काबिले तारीफ़ है , इतने सब के बावजूद चम्पू के हौसले में कोई कमीं नहीं आती और ठीक होने के बाद नई जंग के लिए फिर से चाक-चौकस और तैयार | लगता है उसने मशहूर शायर अज़ीम बेग “अज़ीम” का यह शेर अपने दिलो-दिमाग में पूरी तरह से बसा लिया है :
गिरते हैं शह-सवार ही मैदाने जंग में,
वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले |
(* तिफ्ल = छोटा बच्चा )| 
यकीन मानिए मुझे कई बार लगता है कि अमरीका और चम्पू की जन्मकुंडली में बहुत समानता होगी | लड़ाई- झगड़े और हर मामले में टांग अड़ाने की अपनी आदत बदलने को दोनों में से कोई भी तैयार नहीं | 

इसी सिलसिले में मुझे एक वाकया याद आ रहा है – ऐसा वाकया जिसे आप हल्के – फुल्के अंदाज़ में बन्दरकाण्ड कह सकते हैं या फिर बचाव अभियान भी | पूरा किस्सा पढ़ने के बाद आप क्या सोचते हैं यह आप पर निर्भर है |
तो भाई लोगों हुआ कुछ यूँ कि अपने कमरे में बैठा टी.वी देख रहा था | एक कोने में चम्पू भी अलसाई मुद्रा में अपनी दोपहर की नींद का मज़ा लूट रहां था | अचानक घर के बाहर से कुछ चीख-पुकार और शोर-शराबा सुनाई पड़ा | बाहर झाँक कर देखा तो बड़ा ही खौफ़नाक नज़ारा था | सड़क के एक ओर एक छोटा सा बच्चा गिरा पड़ा था और जोर-जोर से डर के मारे रोये जा रहा था | डर का कारण था मोटे-ताज़े, हट्टे- कट्टे बंदरों का झुण्ड जिन्होंने उस बच्चे को घेर रखा था | अपने बड़े-बड़े दांत निकाल कर बहुत ही भयानक तरीके से तरह की आवाजें निकाल कर उस सड़क पर गिरे बच्चे को डरा रहे थे | अब वह बेचारा बच्चा तो बच्चा ठहरा, उस नज़ारे को देख कर किसी भी मजबूत से मजबूत कलेजे वाले का भी खून जम जाए | उस बच्चे की माँ दूर एक तरफ खड़ी चिल्ला-चिल्ला कर मदद की गुहार लगा रही थी | इस शोरोगुल के आलम में सड़क पर ही लोगों का जमावड़ा इकठ्ठा हो गया था | महानगरों में प्रचलित परिपाटी के अनुसार उस भीड़ में मददगार कोई नहीं, सब के सब तमाशबीन | यहाँ तो वह हाल होता है कि बन्दा सड़क पर पड़ा मदद की आस में दम तोड़ देता है पर मदद नहीं मिलती | मदद तो तब मिले जब लोगों को सेल्फी खींचने से फुर्सत मिले | तो यहाँ भी कमोबेश कुछ वैसा ही नज़ारा था | दूर खड़े लोग बस जोर –जोर से शोर कर रहे थे जिससे बन्दर डरना तो दूर, गुस्से में आकर और अधिक आक्रामक हो रहे थे | यह सब देख कर एक बारगी तो मेरा कलेजा भी मुंह को आ गया | दिमाग मानों सुन्न पड़ गया | कुछ समझ नहीं आ रहा था कि करूँ तो करूँ क्या | बड़े ही तनाव से भरे और उधेड़बुन के क्षण थे और समय था कि निकलता जा रहा था | किसी भी समय उस बच्चे के साथ कुछ भी अनहोनी घट सकती थी | संकट के समय कई बार आपको मदद ऐसी जगह से मिलती है जिसे आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है | मेरे दिमाग में भी अचानक जैसे कोई बिजली सी कौंध गई और बेसाख्ता ही मेरे मुंह से जोरदार चीख निकली ..... चम्पू ....... चम्पू !!! इधर मेरे मुंह से पुकार निकली और उधर आवाज सुनते ही बिजली की रफ़्तार से घर के अन्दर से दौड़ लगाता चम्पू मेरे सामने हाज़िर | आँखों में सवाल लिए मेरे चेहरे को देखते हुए मानो पूछ रहा था कि क्या हुआ ? घबराई आवाज में सड़क की तरफ इशारा करते हुए मेरे मुंह से केवल यही शब्द निकले : बन्दर..... बन्दर ! ! इतना सुनना था कि बिना कोई आगा-पीछा सोचे उस छोटे से चम्पू ने सरपट दौड़ लगा दी उन बंदरों के झुण्ड की तरफ | उस बच्चे को बीच में घिरा देख कर चम्पू भी उस हालात की गंभीरता को समझ चुका था | अब चम्पू को मैं दौड़ा तो चुका था पर अब मेरी भी हालत खराब हो चली थी | दरअसल बन्दर इतने मोटे-ताजे और मुशटंडे किस्म के थे कि चम्पू के चीथड़े-चीथड़े कर सकते थे | पर इंसान और जानवर में शायद यही बुनियादी फर्क है – इंसान सोचता ज्यादा है, पर जानवर अपनी जान पर खेल कर भी वह कर गुजरता है जो हर इंसान के बूते की बात नहीं होती | अब तक चम्पू उन बंदरों के झुण्ड में लगभग घुस ही चुका था | बन्दर भी इस अचानक आयी आफत के लिए तैयार नहीं थे | उन्होंने पहले तो बुरी तरह से डराने की कोशिश की पर चम्पू पर उस सब का कोई फर्क नहीं पड़ा | जोरदार आवाज में भौंक-भौंक कर चम्पू ने उन बंदरों के झुण्ड को पूरी तरह से तितर-बितर कर दिया | आज मुझे लगता है बंदरों से नहीं डरने के पीछे , चम्पू का हिमाचल प्रदेश के जंगलों में मेरे साथ बीता वह बचपन रहा , जब वह आये दिन पहाड़ी बन्दर और लंगूरों को मेरे घर के बगीचे से धड़ल्ले से भगा दिया करता था | बंदरों में भगदड़ मचते ही सबसे पहले उस रोते हुए बच्चे की माँ ने दौड़ कर अपने उस बच्चे को अपनी बाहों में जकड़ कर उठा लिया | माँ उस बच्चे का मुंह बेतहाशा चूमे जा रही थी | बड़ी-बड़ी आँखों से चम्पू कुछ देर तक उन्हें टकटकी बांधे देखता रहा | कुछ देर बाद तमाशबीनों की भीड़ भी छंटने लगी | दस तरह के लोग, दस तरह की बातें | कोई बंदरों के बढ़ते उत्पात का जिक्र कर रहा था तो कोई नगर प्रशासन की लापरवाही की | सब की नज़रों पर अगर चश्मा चढ़ा था तो उस बेजुबान पर बहादुर चम्पू के लिए जिसने अपनी जान पर खेल कर उस बंदरों के झुण्ड से बच्चे को बचाया था | चम्पू को भी शायद किसी तारीफ़ की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि उसे पता था कि जैसे ही वह मेरे पास आयेगा मैं  भी आँखों में खुशी के आसूँ  लिए उसे बच्चे की तरह ही  अपनी बांहों में वैसे ही भर लूंगा जैसे उस बच्चे को उसकी माँ ने | चम्पू ने ठीक ही  सोचा था |




Sunday, 19 May 2019

चुनाव ड्यूटी का मारा : इक टीचर दुखियारा

दिमाग में बहुत दिनों से एक अजीब सी उलझन चल रही थी | यही सोच रहा था कि अपनी बात आप से साझा करूं या चुप रहना बेहतर रहेगा | दरअसल किसी भी भले इंसान या आसपास की दीनो-दुनिया की अच्छाई के बारे में बात करो तो खुद को भी खुशी होती है और सुनने वाले को भी सुकून मिलता है | पर दुनिया में सब कुछ तो भला-चंगा नहीं है और कहीं तो मजबूरन ऐसे हालात बन जाते हैं कि आपको लगता है कि अब तो हद हो चुकी है| ऐसे मौकों पर खामोशी कमजोरी की निशानी मान ली जाती है जिससे समाज में गलत लोगों और खराब व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है | एक जिम्मेदार नागरिक होने का फ़र्ज़ निभाते हुए आपको इन हालातों में अक्सर सामने वाले को आईना दिखाते हुए कहना ही पड़ता है कि हुजूर बस करिए , बहुत हुआ अब सुधर जाइए | मेरे घर के आस-पास कभी सड़क की लाईट हफ़्तों खराब पडी रहती है तो कभी सामने के पार्क में गंदगी बिखरी रहती है | जनता-जनार्दन ऐसी कि जान कर भी अनजान बने रहते हैं | मैं ऐसे मौकों पर संबंधित महकमों पर शिकायत दर्ज करवा ही देता हूँ जिस पर मेरी श्रीमती जी भी ताने मार देती हैं कि जब सब चुप बैठे हैं तो तुम्हें ही क्या पड़ी है | कभी मैं खामोश रह जाता हूँ तो कभी जवाब देता हूँ कि सभी अगर चुप रहें तो आखिर काम कैसे चलेगा | 

तो चलिए अब आते हैं सीधे मुद्दे की बात पर | पिछले काफी दिनों से देश में हर जगह चुनाव का माहौल अपनी पूरी सरगर्मी पर है | अखबार , टी.वी. , सोशल मीडिया , जहां देखिए सब चुनाव के रंग में रंगे पड़े हैं | जिसे देखो सब अपना राग अलाप रहे हैं | इस सारे शोर-शराबे में अगर कोई खामोश है , जिनकी आप आवाज नहीं सुन पा रहें हैं तो ये वे भुक्तभोगी कर्मयोगी हैं जिनके कन्धों पर सवार होकर चुनाव का महात्यौहार सफलता पूर्वक पूरा हुआ | अगर आप चुनाव आयोग के बारे में सोच रहें हैं तो लगे हाथों आपकी गलतफहमी भी दूर कर देता हूँ | इस मामले में चुनाव आयोग की भूमिका तो खच्चर पर बैठे मदमस्त, अड़ियल और हठीले हाथ में चाबुक लहराते सवार जैसी है | वजन से लदे-फदें उस मरियल खच्चर पर कोई रहम नहीं खाता जो कोड़ों की बेदर्द मार से पूरी तरह से पस्त होने के बावजूद उस मुटल्ले सवार को मुश्किल से मुश्किल रास्तों से गुजरते हुए मंजिल तक समय पर पहुँचाने में कामयाब ही रहता है | जी हाँ , चुनाव को संपन्न करवाने के लिए जिन सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं ली जाती हैं , उनमें सबसे अधिक पढ़े-लिखे पर मजबूर शोषित कर्मचारियों का समूह होता वे हैं अध्यापक का | कहने को दुनिया जितनी चाहे बातें बना ले , पर सच्चाई यही है कि इतना सम्माजनक प्रोफेशन होने के बावजूद भी इन्हें बदकिस्मती से समाज वह इज्ज़त नहीं देता जिसके ये असली हकदार हैं | अब यहाँ सवाल उस व्यवहार का नहीं है जो चुनाव आयोग के बददिमाग निरंकुश अधिकारी उन लोगों से करते हैं जिनकी सेवाएं वे उधार के सिंदूर की तरह प्राप्त करते हैं, यहाँ हम बात कर रहें हैं उस बद-इंतजामियत की जिसकी मार चुनाव ड्यूटी पर लगे कर्मचारियों पर पड़ती है | और यह मार भी ऐसी कि चोट खाया मुलाजिम डर के मारे उफ्फ तक नहीं कर सकता कि आवाज उठाई तो कहीं सस्पेंड ना कर दिया जाऊं | यह वह डर ही है जिसकी वजह से जिनकी चुनाव ड्यूटी की आपबीती राम कहानी का मैं ज़िक्र करने जा रहा हूँ उन्होंने गुमनाम रहने में ही अपनी भलाई समझी | अब आप ही सोचिए उन सबके बारे में जो अपने रिटायरमेंट की दहलीज़ पर हैं , जिनकी शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है पर मजबूर हैं फ़ौजी स्टाइल में चौबीस घंटे की लगातार ड्यूटी देने के लिए | खाना तो दूर पानी भी मिल जाए तो गनीमत है | यह बात मैं बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कह रहा | किसी की सच्ची आपबीती है | बीच में उठ कर बाथरूम तक जाने का समय नहीं | चुनाव के बाद ईवीएम मशीन को देर रात तक जमा करवाने के लिए भेड़-बकरियों की तरह सर-फोडू मेहनत-मशक्कत | 
सुखद व्यवस्था का मनमोहक नज़ारा 

ईवीएम मशीन जमा करने की धक्का-मुक्की  

अब चुनाव आयोग बेशक अपनी पीठ खुद कितनी ही थपथपा ले, पर असलीयत में ज़मीनी हालात का जाएजा आपको इस कविता के माध्यम से बखूबी मिल जाएगा | यह कविता मुझे व्हाट्सएप पर किसी ने भेजी, जिसे प्राप्त सन्देश के अनुसार सुश्री मीनाक्षी खंतवाल ‘मीना’ ने लिखी है | मुझे कोई शक नहीं यह किसी की आपबीती ही है जिसमें वह शायद स्वयं भी हो सकती हैं | कविता लम्बी अवश्य है पर जब कष्ट अपरम्पार हैं तो उन कष्टों का बखान करती कविता भी कुछ लम्बी ही होगी जिसे पढ़ने के लिए  आपमें धीरज तो होना ही चाहिए |

शिक्षक बनाम चुनाव 

जो धीमे धीमे हाथ में सफ़ेद थैला लिए जा रहा है,
लोकतंत्र की रक्षा का भार कंधे पर धरे जा रहा है....
उसी पर तो इन दिनों सरकार का पूर्ण भरोसा है,
वो कभी कोई ग़लती नहीं करेगा,उसीसे ये आशा है...
सरकारी महकमों में यही कौम गाय सरीख़ी होती है,
किसी और महकमे की क़ौम मिर्च सी तीखी होती है,
उन पर तो सरकार मजबूरी में ही हाथ डालती है,
क्योंकि वो तो फ़ाइलों को भी कल पर टालती है,
शिक्षक की कॉपी डायरी सब अप टू डेट रहती है,
तब भी ये क़ौम अधिकारियों के ताने ही सहती है..
उसी सहनशक्ति की परीक्षा चुनावी ड्यूटी होती है,
शिक्षक के कंधे पर बोझ रख राजनीति चैन से सोती है..
चुनावी घोषणा होते ही हमारा दिल ज़ोर से धड़कने लगा,
बायीं या दायीं आँख का पता नहीं,अंग अंग फड़कने लगा,
सुबह और शाम की पूजा में ये प्रार्थना भी शामिल हो गयी,
स्कूल पहुँच के ड्यूटी पायी तो ये आस भी धूमिल हो गयी,
कोई हमारी नहीं सुनता ,ये तो जग ज़ाहिर है,
पर ये भगवान भी हमे धोखा देने में माहिर है!
ड्यूटी न आने की प्रार्थना पर कैसे मुस्काता था,
भगवान तब तेरा वो रूप हमें कितना भाता था,
जो प्रिंसिपल दारुण दुःख में भी छुट्टी नहीं देता है,
चुनाव आयोग के सामने कितना बेबस होता है,
अब तो शिक्षक सिर्फ़ फ़ोन पर सन्देश दिखाते हैं,
उसी प्रिंसिपल से 'अभी जाओ' का आदेश पाते हैं,
दुःख तो होता है ड्यूटी का , फिर भी धीरज धरते हैं,
' चलो सबकी ड्यूटी आई है' सोच गहरी साँस भरते हैं,
पहुँचे जब पंडाल में तो एक बिछड़ा साथी मिल गया,
चुनाव आयोग से मेरा बैर कुछ क्षण को टल गया,
एक दूसरे के सुख दुःख पूछते ट्रेनिंग भी हो गयी,
मित्र की छोटी बच्ची उसकी गोद में ही सो गयी,
'अक्कड़ बक्कड़'खेल कर पोलिंग पार्टी बनायीं गयी,
किसी तरह'भानुमति' के कुनबे की ईंटें जुटाई गयी,
यूँ हर कोई एक दूजे के लिए अजनबी था,अनजान था,
पर अब तो एक टीम थे ,और सामने बिखरा सामान था,
ज़मीन पर बैठ कर सामान की गिनती कर रहे थे,
कुछ रह ना जाये, प्रिसाइडिंग इसी फ़िक्र में मर रहे थे,
पोलिंग अफ़सर दो और तीन तो निरे बेफ़िक्रे थे,
ये सब तो पोलिंग एक और पीठासीन के ठीकरे थे,
सबसे ज़्यादा एक दूजे के लिए वही फिक्रमंद थे,
वे दोनों मानो एक ही गीत के तुकांत छंद थे,
दोनों मनाते थे कि सामने वाला समझदार हो,
चुनाव के दिन का उसी पर दारोमदार हो...
सुबह चार बजे जब घर से शिक्षक बाहर निकलता है,
उसकी बेबसी पर गली का कुत्ता भी नहीं भौंकता है,
अँधेरी सड़कों पर पोस्टमॉर्टम से सफ़ेद थैले चमक रहे हैं,
लोकतंत्र बचाने के स्तंभ, शिक्षकों के चेहरे दमक रहे हैं,
राह चलते वो गाड़ी रोक औरों को लिफ़्ट देता है,
इस तरह मानव दूजे को मानवीयता का गिफ़्ट देता है,
पोलिंग बूथ को बच्चे के घरौंदे-सा मनोयोग से सजाता है,
कर्तव्यनिष्ठा में वो गुरु,शिष्य को भी लजाता है...
चौदह घंटे एक सीट पर भूखा प्यासा बैठा रहता है,
तब भी मुस्कुराता है जब कोई मतदाता ऐंठा रहता है,
मशीन जमा करवाने के लिए,बसों में ठूंसा जाता है,
रहा सहा ख़ून भी जमा करवाते वक़्त चूसा जाता है,
इस तरह शिक्षकों का चुनावी मेला हो ख़त्म होता है,
उधर छह बजे के बाद नेताओं के घरों में जश्न होता है....
नेताओं के भक्त उनकी ज़ोरशोर से जयकार कर रहे हैं,
उन्हें कोई नहीं जानता,जो इनके लिए24 घंटे से मर रहे हैं,
अपना काम निकालने के बाद,सब वादे तोड़ देते हैं,
चुनाव करानेवालों को आधी रात सड़क पर छोड़ देते हैं,
इनके लिए रात्रि में कोई बस या मैट्रो सेवा नहीं चलती है,
इस क़ौम को सरकार काम निकालने हेतु यूँ ही छलती है,
रात के डेढ़ बजे हैं और मैं मदर्स डे के सन्देश पढ़ रही हूँ,
कई मदर्स अभी भी सड़कों पर हैं,ये सोच शर्म से गढ़ रही हूँ|
(मीनाक्षी खंतवाल'मीना')
13 मई 2019 

वैसे तो इस मामले से जुड़ी मन को झकझोर देने वाली घटनाओं का अंत नहीं है पर फिलहाल तो मैं केवल इतनी ही कामना कर सकता हूँ कि ईश्वर चुनाव आयोग और सरकार को इतनी सद्बुद्धि , क्षमता और संवेदना दे कि भविष्य में चुनाव कार्यों में लगे सभी छोटे-बड़े कर्मचारियों से इंसानों की तरह से सलूक हो | चुनाव में सभी को एक त्यौहार का एहसास हो, किसी के मरने पर ग़मगीन तेहरवीं का नहीं |

Thursday, 9 May 2019

दुआएं बेजुबान की

जीव- जंतुओं की दुनिया भी एक अलग ही मनोहारी दुनिया है | पर इसका आनंद भी हर किसी के भाग्य में नहीं होता | इसका मज़ा भी वही ले सकता है जिसके दिल में भावनाएं हैं , संवेदनशीलता है और जो इस बात को समझता है कि इन बेजुबान जानवरों में भी वही जीव बसता है जो खुद उनके अंदर भी है | बस एक बार अपने अंदर यह एहसास जगा कर देखिए और फिर आपको लगेगा जैसे आपने अपने लिए एक नयी दुनिया के कपाट खोल लिए जिसमें इंसान तो हैं ही , इसके अलावा आपके दोस्तों की लिस्ट में नए जीव-जंतु भी जुड़ गए | इन नए दोस्तों में आपके घर के आँगन में बैठने वाले परिंदे भी हो सकते हैं , कमरे में बोतल में लगा मनी-प्लांट का पौधा भी हो सकता है और सामने की गली में आपको अक्सर देखकर दुम हिलाने वाला कुत्ता भी हो सकता है | बस सवाल है मन के तार का जो जब भी झंकृत हो उठे और आप उस अजनबी जीव से एक दिल का रिश्ता कायम कर बैठें | आपमें से कुछ को मेरी बातें शायद ऊलजलूल और बेसिरपैर की लगें पर भाई मेरे मैं तो जो भी कह रहा हूँ अपने अनुभव की ही कह रहा हूँ | सारी ज़िंदगी भाग-दौड़ में कटी, उस हिमालयन कार रैली में भाग लेने वाले ड्राइवर की तरह जिसकी नज़र रही सिर्फ और सिर्फ सड़क पर और मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में जो आस-पास के खूबसूरत कुदरत के नजारों से बिलकुल अनजान रहा | रिटायमेंट के बाद अब समय की कोई कमीं नहीं, भाग-दौड़ की दुनिया से छुट्टी मिली और आराम-चैन के वतन में प्रवेश हुआ | अब वह दुनिया है जिसमें मेरे इर्द-गिर्द हैं कुछ चुनिन्दा दोस्त, सीमित परिवार , गिने-चुने बंधु-बांधव और भगवान की दुनिया का जीव-जंतु जगत | इसे कुछ यूँ भी समझ सकते हैं कि हर फालतू सामान से निजात क्योंकि अगर सफ़र का असली मज़ा लेना है तो अपने साथ सामान कम रखिए | तो ज़िंदगी के इस नए सफ़र में कई ऐसे लोगों से मुलाक़ात हुई जो लगता है इस दुनिया के हो कर भी मानों यहाँ के नहीं हैं | उनकी सोच सबसे हट कर है, उनके विचार अनोखे और दुनियादारी से बिलकुल अलग | इन लोगों से थोड़ी सी बातचीत भी रेगिस्तान में ठंडी और ताजी हवा के झोके का एहसास दे जाता है | अभी पिछले दिनों हालात कुछ ऐसे बने कि दीनो-दुनिया से अलग एक निहायत भले मानस से मुलाक़ात हो गयी |

दरअसल मेरे घर के मेनगेट पर गली के छोटे-बड़े कुत्तों का एक तरह से सदाबहार जमावड़ा लगा रहता है | शायद उन्हें भी इस बात का एहसास है कि इस घर में रहने वाला एक शख्स उन्हीं की तरह से ठलुआ है – मतलब बिना पोर्टफोलियो का मिनिस्टर |

सुबह-सवेरे की गेट मीटिंग  😂
कुछ अड़ोसी-पड़ोसियों के लिए ये शैतान आतंकवादी परेशानियों का कारण भी बनते रहते हैं | कभी किसी सड़क चलते राहगीर को दौड़ा दिया तो कभी किसी को काट खाया | रात को भौंक-भौंक कर इतना शोर मचा देते हैं मानो हवाई हमले का साइरन बज रहा हो | समय-समय पर इनकी शिकायतें भी मिलती रहती हैं पर मैं भी ठहरा अव्वल नंबर का ढीठ , उस अमरीका की तरह जो इजराइल की सब शरारते जान कर भी अनजान बना रहता है | सच कहूँ तो ये सारे मेरे मुंह –लगे बदमाश दोस्त हैं | सुबह शाम जब घर के सामने के पार्क में घूमने निकलता हूँ तो ये सारे कमबख्त भी जाने कहाँ से ऐन उसी वक्त टपक पड़ते हैं और मुझे घेर लेते हैं | 
पार्क में मस्ती 
पहले से ही कुछ की आँखों की किरकिरी बना मैं, अब और अटपटे हालात में आ जाता हूँ | इनके खाने-पीने का थोडा बहुत इंतजाम नियमित रूप से होता रहता है | कभी कोई शरारती इधर-उधर से पिट-पिटा कर या चोट खा कर आ जाता है तो उनकी दवा-पट्टी भी हो ही जाती है| पहले उन्हें आस-पास के डाक्टर के पास ले जाने में मेरी जेब का खासा दिवाला निकल जाता था | उन डाक्टरों को भी तो आखिर अपना परिवार पालना था | पर आखिर नोएडा की ही एक समाज सेवी संस्था का पता चला | नाम है सोसाइटी फॉर प्रीवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनीमल्स (SPCA )| मुझे सबसे अचम्भे की बात यह लगी कि इसमें काम करने वाला एक शख्स इतनी मेहनत, समर्पण और निष्ठा से अपना काम करता है जो कि आज के समय में कम ही देखने में नज़र आता है | इस प्यारे से इंसान का नाम है जितेन्द्र कुमार उर्फ़ जीतू | जीतू, एस.पी. सी. ए की एम्बुलेंस में ड्यूटी पर तैनात रहते हैं | 
जितेन्द्र कुमार : मैं और मेरी दुनिया  
जानवरों से इन्हें दिल से हद दर्जे का प्यार है | यही वजह है कि सुबह सवेरे से लेकर देर रात तक अपने काम में जुटे रहते हैं | इतने व्यस्त रहते हैं कि इनके बारे में , जितनी जानकारी में जुटाना चाहता था वह भी इन्हें बताने का वक्त नहीं | अभी कुछ दिनों पहले एक और छोटे से पिल्ले- कालू की टांग बुरी तरह से उसी प्रकार घायल हो गयी जैसे भोलू की हुई थी | ऐसे वक्त में इन्ही जीतू ने बिना कोई प्लास्टर बांधे, केवल कुछ इंजेक्शन और पट्टियों के सहारे कालू को भला चंगा कर दिया |
कालू की टूटी टांग का इलाज 
आज की दुनिया का दस्तूर देखते हुए जीतू अगर चाहता तो इस काम के मेरे से पैसे भी मांग सकता था , पर उसने यह सब निस्वार्थ सेवा भाव से खुशी-खुशी किया | जीतू ने बताया कि इलाज करने के दौरान कई बार घायल जानवर उन्हें चोट भी पहुंचा चुके हैं पर उनकी हिम्मत और प्यार में कोई कमीं नहीं आयी | सबसे खतरनाक काम तो तब हो जाता है जब जीतू को पागल कुत्ते को पकड़ना पड़ता है |इस काम के लिए भी उनमें हिम्मत और बहादुरी की कोई कमीं नहीं है | मैं अक्सर सोचता हूँ कि जीतू भाई के पास तो दुआओं का खजाना होगा - उन दुआओं का जो उन्हें उन सब जरूरतमंद, बेसहारा घायल और बीमार जानवरों ने इलाज़ के बाद चंगे हो कर दी होंगीं | मानवता  की तराजू में यह खज़ाना जीतू को दुनिया का सबसे अमीर इंसान बनाता है |   मेरे और मेरे नटखट बदमाश दोस्तों की टीम के लिए जितेन्द्र भाई एक मसीहा की तरह हैं जो हर जरूरत के वक्त अपनी एम्ब्युलेंस और दवाइयों के साथ हाज़िर हो जाते हैं – बिना किसी लोभ के , बिना किसी लालच के | जीव-जंतुओं से उनका भी दिल से रिश्ता है – और रिश्ते का यही तार उन्हें मुझसे भी जोड़ता है | उन्हें मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं |

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...