Monday, 30 March 2020

मैँ शर्मिंदा हूँ


कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि आप कुछ ऐसा लिख जाते हैं जिसे कुछ समय बाद आप जब खुद पढ़ते हैं और ठंडे दिमाग से समझते हैं तो लगता है यह मैं क्या लिख गया । मन में कभी ग्लानि होती है तो कभी पछतावा । मुझे तो इस समय खुद अपने ऊपर शर्मिंदगी भी हो रही है । चलिए ज्यादा पहेलियाँ न बुझाते हुए सीधे असल बात पर आता हूँ । 

आजकल जब मैं यह किस्सा लिख रहा हूँ पूरे विश्व में कोरोना वायरस की महामारी का जान लेवा संकट सब के सर पर मंडरा रहा है । हमारे देश में भी लॉक -डाउन घोषित किया जा चुका है । इस ताला बंदी ने सारे समाज को आइस क्रीम की तरह से जमा कर रख दिया । जहाँ तक नजर दौड़ाते हैं सब कुछ बंद – इंसान घर में बंद, सड़कों पर ट्रेफिक बंद, कारखाने बंद, दुकाने बंद और इन सब की वजह से वातावरण में प्रदूषण बंद, शोर बंद । घर की छत पर बैठ कर मैं नीले आकाश को निहार रहा था । पंछी सामने के पार्क में चहचहा रहे थे । रात के समय आसमान में फिर से तारे भी नज़र आने लगे थे जो महानगर के प्रदूषित वातावरण से कभी के गायब हो चुके थे । हद तो तब हो गई जब नोएडा की वीरान पड़ी सड़कों पर नील गाय को भी घूमते पाया । लगता था जैसे दुनिया अब से तीस साल पहले के समय में पहुँच गई हो जब साँस लेने के लिए साफ हवा भी नसीब हो जाती थी । इस बदली हुई आबो-हवा में तरो-ताजगी महसूस करते हुए कुछ दिनों पहले मैंने एक कविता लिखी : 


दिल की आवाज

सच में मैंने आज गौर से,
रूप नया दुनिया का देखा,
सारे दिन जो व्यस्त रहे थे,
उन्हें भी कविता लिखते देखा,

नील गगन पर सुबह - सवेरे
स्वर्णिम सूरज उगते देखा ।
नजर नहीं आया करते,
उन पंछी को भी उड़ते देखा।

भूली बिसरी यादों के
मीठे सपनो को फिर से देखा।
छत के नीचे अपनों को
प्यार से गपशप करते देखा।
अम्मा - दादी के साथ बैठ कर,
वक्त बिताते हंसते देखा ।

लेकिन फिर भी
हाथ जोड़ कर
दुआ मांगता
मालिक से,
दीन दुखी की रक्षा करना,
संकट हरना विपदा से ।


इस कविता को मैंने सोशल मीडिया पर भी पोस्ट कर दिया । दोस्तों को पसंद भी आई , अच्छे-अच्छे कमेंट्स भी मिले । पर आज मुझे लगता है कि कुछ दोस्तों ने शायद इस कविता को पढ़ कर खामोश रहना ही उचित समझा होगा । उन्होंने शायद सौजन्यता-वश अपने दिल की बात दिल में ही दबा ली होगी क्योंकि सच्चाई कड़वी जो होती है । लेकिन उनकी इस खामोशी की भाषा ने भी मुझे बता दिया कि दर्द बयाँ करने के लिए जुबान की जरूरत नहीं है । 


दरअसल मेरे दिल को गहरी चोट तब लगी जब समाचारों के जरिए रोज़ की रोटी रोज़ कमाने वाले गरीब मजदूरों की बेबसी को जाना । जीविका की तलाश में दिल्ली -मुंबई जैसे महानगरों में बसेरा किए हुए रिक्शा चलाने वाले, खोमचा -फेरी लगाने वाले, दिहाड़ी पर काम करने वाले, फैक्ट्रियों के कामगार – सभी एक ही झटके में आसमान से गिरे पंख-कटे पंछी की तरह से फड़फड़ा रहे थे । उन गरीबों की तड़प थी – मजदूरी छिनने की, रोटी छिनने की , घर -बार-बसेरा छिनने की । इक्कीस दिनों तक घर का गुजारा कैसे होगा यह उनकी खाली जेब और पेट की समझ में नहीं आ रहा था । इक्कीस दिनों के बाद भी क्या हालात होंगे यह भी तो कुछ पक्का नहीं था । ताला -बंदी की लक्ष्मण रेखा के बावजूद भी भूखे पेट ने मजबूर कर दिया उन दीन -हीन इंसानों को घर के बाहर कदम रखने को । जब सरकारी भोंपुओं के झूठे वादे भी रोटी का जुगाड़ नहीं कर सके तब सर पर पोटली और गोद में छोटे-छोटे बच्चों को उठाए उन बदनसीबों का कारवां निकल पड़ा अपनी मंजिल की ओर । यह मंजिल थी सैकड़ों मील दूर बसे वे गाँव जिनमें आज भी उनके सगे-संबंधी रहते हैं । वही गाँव जिन्हें रोज़ी -रोटी की मजबूरी में छोड़ कर आना पड़ा था पर आज भी यह यकीन है कि वापिस पहुंचेंगे तो दो रोटी तो जरूर दे देंगें । महानगरों की तरह कम से कम भूखा तो नहीं मरने देंगे । पेट की आग और अपने गाँव पहुँचने की चाह ने उनके कमजोर शरीर में भी वह ताकत भर दी जिसे ना तो पुलिस के डंडे रोक पाए और ना ही तपती धूप में पैदल चलने की मजबूरी । रेल नदारत , बस नदारत – यातायात का कोई साधन नहीं फिर भी निकल पड़े भूखे -प्यासे लंबे सफ़र पर । मैं अंदर तक हिल गया जब ऐसे ही किसी मजबूर इंसान को यह कहते सुना कि कोरोना तो बाद में मारेगा उससे पहले तो हम भूख से ही मर जाएंगे ।

सच मुझे शर्मिंदगी हुई अपनी स्वार्थी सोच पर । मैं कविता की दुनिया में क्यों इनके दर्द को महसूस नहीं कर पाया । क्यों मुझे केवल स्वच्छ नीला आसमान और उड़ते पंछी ही नजर आए – सड़क पर भीड़ में लँगड़ाते हुए अपने गाँव जाता अपाहिज इंसान क्यों नहीं दिखा । मेरी आँखों पर क्यों पट्टी बँध गई थी उस वक्त – यही सोच कर मैं शर्मिंदा हूँ । 
चलते -चलते , जो गलती मुझ से हुई वह आप मत करिएगा । कोरोना की मार के आगे सब एक समान हैं । यह चुटकले बाजी और लतीफों का पुलिंदा नहीं है । मैं आपको डरा नहीं रहा हूँ – यह बहुत भारी मुसीबत है – मौत की दस्तक है । इसे हल्के में मत लीजिए, मौत से मज़ाक मत कीजिए । यह मुसीबत का समय सभी पर अपनी छाप छोड़ेगा – चाहे अमीर या गरीब । सवाल केवल वक्त का है । गरीब पर मार तुरंत हो रही है – पर जो समाज के ऊंचे तबके के लोग हैं वह प्रभावित तो होंगें पर जरा देर से । इसलिए समझदारी इसी में है कि दूसरों के दुख: दर्द में शामिल रहें, आने वाले कल में आपको भी हमदर्दी की जरूरत हो सकती है ।

Thursday, 5 March 2020

गुंजन की गूंज

कहानी का ऑडियो संस्करण  यूट्यूब पर देखने के लिए नीचे ➤ के निशान पर क्लिक करें 

कविता एक ऐसा झरना है जो पहाड़ की किसी भी चोटी से, जंगलों के बीच, चट्टानों के पीछे से किसी शरारती बच्चे की तरह खिलखिलाते हुए प्रकट हो जाता है । उसे चाहिए बस अनुकूल आबो-हवा और उचित वातावरण जिसके अभाव में वह सूख कर अदृश्य भी जाता है। इन कविताओं को रचने वाला किसी खास साँचे में नहीं ढला होता । वह आपको आम ज़िंदगी में मौजूद किसी भी सीधे-सादे सरल इंसान के रूप में नजर आ जाएगा । कभी वह मुझे अपने पिता श्री रमेश कौशिक में मिला, कभी प्रशासन की चक्की चला रहे विपिन वत्स, डा० चंद्रभान आनंद में और कभी विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक- प्रोफेसर डा० वीर सिंह में । यह सभी मेरे ब्लाग की दुनिया के जीते-जागते पात्र रह चुके हैं ।  इस बार मुझे सच में आश्चर्य हुआ जब जिन हाथों में सर्जरी का नश्तर होता है उन्ही हाथों  में कलम को भी बखूबी कमाल करते देखा । आज आपको एक छोटी सी झलकी दिखाता हूँ एक ऐसी ज़िंदगी की जो अपने ही ढंग से इस समाज की सेवा कर रही है – कर्म से भी और विचारों से भी । 
डा ० गुंजन नगरकोटी 
कंप्यूटर के की-बोर्ड पर फर्राटे से दौड़ती उँगलियाँ सामने मानीटर पर शब्दों और भावनाओं का रूप लेते जा रहे थे । वे भावनाएं जो गुंजन की अंतरात्मा को अक्सर रह-रह कर कचोटती रहती थी । अपने ही लिखे को गुंजन ने एक बारगी फिर से पढ़ा, गहरी साँस ली और सोच में पड़ गई – क्यों होता है ऐसा ???

जब सीता का तिरस्कार हुआ,
सब तब भी थे सिर्फ मूक श्रोता,
तो फिर क्या सतयुग, क्या द्वापर, क्या त्रेता .. 
अग्नि परीक्षा दी सीता ने,
तब, जब वो “मैया” थी....
मर्यादा पुरुषोत्तम की पत्नी,
वो तो बस एक “गैया” थी । 

एक अनजान पुरुष ने लांछन लगाया,
मां के दर्द को झूठ बताया । 
क्रोधित तो वो भी थी .. 
इतनी कि, धरती की बेटी थी, धरती में समा गई । 

जब उस मर्यादा वाले युग में भी, नारी के चरित्र पर वार हुआ ,
उसकी मर्यादा को प्रमाणित करने के लिए, अग्नि का आवाह्न् हुआ,
तो यह तो बस कलयुग है,
नारी आज तो ना है देवी,
ना मैया, और ना ही है गैया .. 

आज भी उस पर लांछन लगते,
आज भी उस पर लोगों के शब्द हैं चुभते,
बचती- बचाती खुद को छुपाती,
मर्यादा की लकीरों में खुद को दबाती,
क्रोधित तो वो भी है,
क्रोध इतना कि व्योम को चीर दे,
चीख ऐसी जो समस्त संसार को भेद दे,
पर वो मैया नहीं कि अग्नि में चढ़ जाए,
या धरती में समा जाए .. 
मैया नहीं है वो,
बस एक साधारण नारी .. 
क्रोधित, घायल और आहत । 

गुंजन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह सिर्फ एक नारी नहीं है , नारी के साथ -साथ वह अत्याधिक संवेदनशील है । उस संवेदना ने ही उसके अंदर के रचनात्मक पहलू को कवयित्री के रूप में उभारा है जिसके परिणामस्वरूप वह आज की नारी का ही नहीं , आज से हजारों वर्ष पूर्व की सीता का दु:ख और वेदना भी बहुत गहराई से महसूस करती है । दर्द को महसूस करना एक बात है और उसका निदान ढूँढना अलग बात । आश्चर्य की बात यह है कि गुंजन इन दोनों ही कसौटियों पर खरी उतरती है । वह खुद एम.बी.बी.एस डाक्टर है । एम.डी की पढ़ाई भी कर रही है और आजकल देहरादून के श्री महंत इंद्रेश हॅास्पिटल में सीनियर रेजिडेंट डाक्टर है । वह अपने आस-पास की दुनिया की व्यथा को भरसक दूर करने का प्रयत्न करती है – अपने डाक्टरी के ज्ञान के जरिए । समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी वह दर्पण दिखा देती है अपनी कविताओं के माध्यम से । आप यह भी कह सकते हैं कि उसने बीड़ा उठाया हुआ है मानव के तन और साथ ही साथ मन का भी उपचार करने का । उसके साथ केवल एक दिक्कत है – उसके अंदर मौजूद कवयित्री कभी उसे चैन से नहीं बैठने देती । हर किसी का दु:ख-दर्द इस हद तक महसूस कर लेती हैं कि साथी डाक्टर भी अक्सर समझाते हैं कि डाक्टर – मरीज़ का आपसी रिश्ता एक सीमा तक ही ठीक है । अपने को लाख संभालने के बावजूद भी इस डाक्टर को अपने घर में भी मरीजों का कष्ट अक्सर परेशान करता है । अस्पताल में सुबह ड्यूटी नौ बजे से शुरू होती है पर डाक्टर गुंजन पहुँच जाती है सुबह सात बजे ही । वजह - दूर-दराज के पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों से पहुँचने वाली गरीब, अशिक्षित महिला मरीज़ जो अपनी इस डाक्टर दीदी के इंतजार में बैठी होती हैं । उन मरीजों को वापिस अपने गाँव पहुँचने की भी जल्दी होती है । जल्दी इसलिए कि गाँव में उन्हें घर के काम -काज निबटाने हैं, पशुओं को संभालना है और सबसे जरूरी – घर के बुजुर्गों की देखभाल करनी है । डा० गुंजन का मानना है कि आज भी पहाड़ों की बहु-बेटियाँ समाज में दबी - कुचली ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं । कुछ तो पहाड़ों पर स्वास्थ-सेवा का वैसे ही अभाव है पर ग्रामीण महिलाओं के इलाज में खुद उनका अपना परिवार भी उदासीनता बरतता है । इक्कीसवी सदी में यह बात विचित्र जरूर लगती है पर है सौलह आना सच । गुंजन खुद इसी पहाड़ की बेटी है इसीलिए वह यह दर्द भली -भाँति समझती है । यही वजह है कि इतने काम के बोझ को बहुत ही जिम्मेदारी के साथ खुशी – खुशी निभा रही है यह डाक्टर । 
डा ० गुंजन और उनका प्यारा सा एक मरीज़ 
भविष्य के लिए गुंजन के बहुत ही आशावादी और आदर्शवादी सपने हैं जिसकी प्रेरणा पिता श्री हरेन्द्र नगरकोटी से मिली । वह कहा करते हैं “ हजारों की भीड़ में खो मत जाना, बस भले काम करना और नाम कमाना"। इसी ब्रह्मवाक्य को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है इस डाक्टर ने । आज से दस वर्ष के अनुभव के बाद वह नैनीताल के पास बसे अपने पुश्तैनी गाँव लामगढ़ में एक छोटा सा ऐसा अस्पताल बनाना चाहती हैं जहाँ इलाज की मूलभूत सुविधाएं सरकारी रेट पर मिल सकें । उसे विश्वास है इस नेक काम के लिए उसे अपने जैसे ही अन्य नेकदिल लोगों का सहयोग जरूर मिलेगा । 

डाक्टर गुंजन अपने परिवार से बहुत घनिष्ठता से जुड़ी है । नाते-रिश्तेदारों और बुजुर्ग सास-ससुर से भरा-पूरा ऐसा कुनबा जिसे संयुक्त परिवार कहते हैं - उसीमें गुंजन की जान बसती है । मानवीय मूल्यों को इस हद तक वरीयता देती है कि अपने हम-पेशा डाक्टर बिरादरी को भी तिलांजली देते हुए एक सीधे-सरल इंसान – प्रतीक डालाकोटी, (एक प्रतिष्ठित व्यवसायी)  को अपना जीवन साथी चुना। 
प्रतीक डालकोटी 
गुंजन की कहानी केवल एक कविता नहीं है – यह एक महा-काव्य है। जो कुछ मैं थोड़ा बहुत आपको बताया पाया हूँ वह बस एक छोटी सी बानगी भर है । कभी मौका मिला तो आपको उसके आदर्शवादी जीवन के अन्य रोचक किस्से भी आप तक पहुंचा दूंगा ।

Thursday, 27 February 2020

नया सवेरा : मंजु पालीवाल



“आप क्या लेना पसंद करेंगी ?” – मीठी आवाज में ये शब्द सुनते ही मैं अचानक जैसे अचकचा कर मानों नींद से ही जाग गई । सामने स्मार्ट एयर होस्टेस केटरिंग ट्राली के साथ बहुत ही विनम्र भाव से खड़ी थी । मुस्कराते हुए गर्दन हिलाकर मैंने अनिच्छा ज़ाहिर की और गर्दन दूसरी ओर घुमाकर विमान की खिड़की के पार देखने लगी । अपने बेटे – सुमित से मिलने की लालसा ने भूख-प्यास सब उड़ा दी थी । सीट के सामने लगे मानीटर स्क्रीन के अनुसार विमान इस समय आकाश में पैंतीस हज़ार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था । नीचे सफ़ेद बादलों की चादर समुद्र की तरह फैली नज़र आ रही थी । यह सब देख कर दुनिया के दस्तूर पर हंसी भी आ रही थी – जब इंसान ऊंचाइयों पर उड़ रहा होता है – जब वह समर्थ होता है – जब उसे किसी चीज़ की कमी नही होती - -- तब सारी दुनिया ही खैरियत पूछने में लग जाती है । जब पैर हकीकत की कठोर ज़मीन पर संघर्ष कर रहे होते हैं तब दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आता – सिवाय एक-दो को छोड़ कर । हाँ – गर्दिश के दिनों में जो साथ दे वही तो सच्चे इंसान और उसकी इंसानियत की परख है । 
यादों का सफर 
अमेरिका जा रहे इस विमान में मेरा वक्त काटे नहीं कट रहा था ।अभी भी बारह घंटे की यात्रा इसी उड़न-चिड़िया के भीतर ही बितानी थी । जब वर्तमान में आपके पास समय की बहुतायत होती है तो दिमाग आपको भूतकाल की यादों में पहुंचा देता है । मैं भी अपने विगत समय की यादों में धीरे-धीरे उलझती चली जा रही थी । ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका - जिसने मुझे जीते जी मार डाला – मुझे कहीं का नहीं छोड़ा । आसमान पर उन्मुक्त उड़ान भरते पंछी को सीधे धरती पर ला पटका । उस चोट का घाव भर तो गया है पर निशान अब भी बाकी है । 20 जून 1989 के उस मनहूस दिन की याद मुझे आज भी किसी बुरे सपने की तरह गहरी नींद में भी जगा देती है । हाँ वही दिन जिसने मुझसे मेरे पति – देवेन्द्र पालीवाल को अकलतारा सीमेंट फैक्टरी में हुई दुर्घटना में छीन लिया था । बचपन से लेकर अपने पति तक के राज में मेरा जीवन बहुत ही शान -शौकत से रहा । बचपन में राजकुमारी और विवाह के बाद रानी से किसी भी तरह से कम नहीं था मेरा रहन -सहन । ईश्वर की कृपा में कुछ कमी नहीं थी पर अचानक जाने किसकी ऐसी बुरी नज़र लगी कि सब कुछ एक पल में ही तहस-नहस हो गया । 

विमान के केबिन स्पीकर में अचानक केप्टन की आवाज़ गूंजने लगी : “मौसम खराब होने के कारण कुछ समय तक आपको विमान में झटके महसूस हो सकते हैं।अपना धैर्य बनाए रखें और सीट बेल्ट बांध कर रखें”। उस हिलते हुए विमान के मामूली से झटके, ज़िंदगी के उन झटकों से तो बहुत कम थे जिन्होने मुझे देवेन्द्र की अचानक हादसे में हुई मौत के बाद वास्तविकता की ज़मीन पर ला-पटका था । वह विशाल बरगद जिसके नीचे मैं खुद को सुरक्षित समझ रही थी, ऐसी ही किसी आसमानी बिजली - जो इस समय विमान के बाहर कड़क रही थी की चपेट में आकर मिट्टी में मिल चुका था । घर के आर्थिक हालात भी बहुत बुरे हो चले थे । पति की जान की कीमत महज़ बीस हज़ार रुपये मेरे हाथ में थमा दिए गए वह भी काफी जद्दो -जहद के बाद । नाते –रिश्तेदार भी अपनी तरफ से भरसक मदद कर रहे थे पर उनकी भी अपनी मजबूरियाँ और सीमा थी । इस डगमगा रहे विमान की तरह मुझे भी अपने जीवन की नाव खुद ही उस झंझावात से बाहर निकालनी थी ।बड़ा बेटा अमित 13 वर्ष और छोटा सुमित उस वक्त 12 वर्ष का ही तो था । देवेन्द्र के समय मुझे कभी घर से बाहर कदम रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी पर वक्त की मार ने दिन में ही तारे दिखा दिए । ऐसे ही तारे जो इस समय मुझे विमान की खिड़की से बाहर अंधेरे आकाश में टिमटिमाते नज़र आरहे थे । मदद मांगते हुए चप्पलें घिस गई कंपनी के हेडआफिस के चक्कर लगाते-लगाते । भगवान ने भले लोग दुनिया में सब जगह भेजे हैं – कंपनी में भी मौजूद थे ऐसे ही कुछ फरिश्ते । अब तक शायद भगवान को भी मेरे ऊपर दया आने लगी थी । सबके प्रयत्न और ईश्वर की कृपा से मुझे कंपनी ने एक छोटी -मोटी नौकरी दे ही दी । जिस कंपनी के सत्ता के गलियारे में मेरे पति देवेन्द्र की किसी जमाने में धाक जमी हुई थी – वहीं मेरी मजबूरी ही तो थी जिसने उस नौकरी को स्वीकार किया । उस नौकरी ने मेरी आर्थिक हालात के बुझते दिए में तेल डाल कर नया जीवन-प्रकाश दिया । हरिद्वार, इलाहबाद और दिल्ली कार्यालय में काम किया । नौकरी ने अभाव पूरी तरह तो नहीं भरे पर घाव पर हल्के से मरहम का काम जरूर किया । 

विमान अब शायद किसी शहर के ऊपर से जा रहा था । उड़ते हुए विमान की खिड़की से अब मुझे नीचे किसी शहर की झिलमिलाती रोशनी दिवाली का सा दृश्य दिखा रही थी । न चाहते हुए भी मुझे वह दिवाली याद आ गई जब उस त्योहार के दिन भी घर में एक फूटी कौड़ी नहीं थी । कंपनी में पूरे ग्यारह महीने तक वेतन नहीं मिल पाया था । बच्चों के घर आने वाले दोस्तों को खिलाने के लिए मिठाई मँगवाने तक का प्रबंध नहीं था सो खीर बना कर काम चलाया था । पर कुछ भी कहिए – यह तो सच है कि आग से निकल कर ही सोना कुन्दन बनता है।  उस अभावों से भरी ज़िंदगी ने दोनों बच्चों – अमित और सुमित को वक्त से पहले ही ज़रूरत से ज़्यादा समझदार बना दिया ।पुरानी घिसी हुई उनकी बनियान में छेद हो जाते थे पर कोई परवाह नहीं । लगे रहते थे दोनों अपने दिमाग को घिस-घिस कर बुद्धि तेज करने में । दोनों ने  पढ़ाई-लिखाई मेहनत से की – अव्वल रहे और आखिरकार मेहनत रंग लाई । दोनों ही बेटे अच्छी नौकरी और ऊंचे पद पर बैठे हैं । बड़ा बेटा अमित मुंबई में और छोटा अमेरिका में अपने-अपने छोटे से परिवार के साथ खुश हैं । 


छोटी सी दुनिया : मेरे साथ अमित-सुमित परिवार 
मैं खुद उस चिड़िया की तरह से हूँ जिसने अपने पूरी तरह से बिखरे हुए घोंसले को फिर से अपनी ही हिम्मत से तिनका -तिनका कर फिर से बनाया । जब तक शरीर में ताकत और दिल में हिम्मत है किसी पर भी आश्रित न रहूँ यही मेरी सोच है। बच्चों की ज़िद के बावजूद, इसीलिए फिलहाल नौकरी से रिटायरमेंट के बाद अपने पुश्तैनी शहर मुरादाबाद में रह रही हूँ । बाहर रह कर भी बच्चे पूरा ध्यान रखते हैं – और मैं भी उनके मोह से जुड़ी मुरादाबाद, मुंबई और अमेरिका की परिक्रमा करती रहती हूँ । हाँ – एक जगह और जिसका मोह सबसे ऊपर है – बाँके कृष्ण मुरारी की मथुरा वृन्दावन नगरी । भक्ति ही तो आज मेरी शक्ति का स्त्रोत हैं। 

मेरे तो गिरधर गोपाल 
विमान की खिड़की से आती तेज़ धूप की कौंध ने मुझे गहरी नींद से जगा दिया था । पूरी रात मैं अपनी बीती ज़िंदगी के सपने में ही खोयी रही थी । विमान ने भी नार्थ केरोलिना के उस हवाई अड्डे पर उतरने की तैयारी शुरू करदी थी जहाँ मेरा बेटा सुमित इंतज़ार कर रहा है । इंतज़ार अपनी माँ का – इंतज़ार माँ को अपनी बड़ी सी गाड़ी में बैठा कर बड़े से घर में ले जाने का । सोच कर ही मेरे चेहरे पर बरबस मुस्कान आ गई – काली रात के बाद सुबह की खिलती धूप उस भगवान का ही तो दूसरा रूप होती है ।




( प्रस्तुतकर्ता : मुकेश कौशिक )

Sunday, 16 February 2020

एक कहानी अधूरी सी : देवेन्द्र कुमार पालीवाल

एक बात बताइएगा - आपने कभी यादों के शीशे पर जमा धूल को हटा कर देखा है ? अगर नहीं, तो एक बार ज़रूर देखिएगा, कभी- कभी भूले-भटके सुनहरी यादों के समंदर में से ऐसे-ऐसे नायाब मोती निकल आएंगे जिनकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी । मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । अखबार में पढ़ रहा था कि सरकार ने निर्णय लिया है कि काम नहीं करने वाले नाकारा-निकम्मे कर्मचारियों को वक्त से पहले ज़बरन रिटायर कर घर भेज दिया जाएगा । ठीक भी है – मुफ्त की रोटियाँ तोड़ने वालों को कोई आखिर कब तक बरदास्त करेगा । जिस काम के लिए मोटी – ताजी तनख़्वाह मिलती है उसे तो करना ही पड़ेगा । अब उसे चाहे हँस कर करिए या रोते हुए यह आप पर निर्भर है । मेरा तो ऐसे -ऐसे छटें हुए गुरु घंटाल किस्म के सरकारी मुलाजिमों से भी पाला पड़ा है जो बहुत ही बेशर्मी से खुले आम ढ़ोल  पीटते हुए भरे दफ्तर बीच मुनियादी करते थे कि वेतन तो दफ्तर में कुर्सी पर बैठने के लिए मिलता है । काम करने की फीस तो रिश्वत के रूप में मुट्ठी गरम करके अर्पित करने ही पड़ेगी । मुझे पक्का यकीन है आप में से शायद ही कोई ऐसा खुशनसीब होगा जिसका इस किस्म के लालची – निखट्टुओं से पाला नहीं पड़ा हो । इन कामचोरों की दुनिया के ठीक उलट मुझे आज याद आ रही है अपने एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी श्री देवेन्द्र कुमार पालीवाल की जिनकी काम के प्रति लगन और समर्पण आज भी मुझे प्रेरणा देती है | 



स्व ० देवेन्द्र कुमार पालीवाल 
बात बरसो पुरानी है – वह दौर था आज से लगभग 37 वर्ष पहले यानी 1982-83 के आसपास का । मैं भी उम्र के उस पड़ाव से गुजर रहा था जिसे युवावस्था कहा जाता है । वह उम्र होती भी है खुराफ़ातों और शरारतों से भरी मौज -मस्ती की । मेरा भी वही हाल था । हरियाणा में एक जगह है चरखी-दादरी – वहीं पर सीमेंट फ़ैक्टरी में उन दिनों मेरी पोस्टिंग थी ।
चरखी दादरी की पोस्टिंग के दौरान मैं - मुकेश कौशिक 
दिन में दफ़्तर और शाम को अपनी येजदी फटफटिया पर सैर-सपाटा और मटरगस्ती बस यही अपनी ज़िंदगी थी । घर – परिवार की दुनिया में कदम रखा नहीं था । मुझे सबसे अच्छा वही लगता था जो शाम को चाय-नाश्ता करवा दे । दुनिया भी इसी विश्वास पर चल रही है कि भूखे ब्राह्मण का कोई पेट भर दे इससे बड़ा पुण्य और कुछ नहीं हो सकता । शायद पालीवाल जी का भी यही विश्वास था इसीलिए समय – समय पर उनके घर से खाने-पीने का न्योता मिल जाता था जिसका मैं भी पूरा फायदा उठाता था । पालीवाल जी फैक्टरी में प्रॉडक्शन डिपार्टमेन्ट के प्रमुख थे। बहुत ही मिलनसार , सरल और हँसमुख स्वभाव के थे । शाम के समय बिना किसी संकोच के अपने किसी भी छोटे -बड़े कर्मचारी का हाल-चाल पूछने परिवार सहित उसके घर पहुँच जाते । उनके मन के किसी भी कोने में अपने ऊँचे ओहदे का लेश-मात्र भी कोई घमंड नहीं था । उम्र में काफी छोटा होने के कारण मुझे तो हमेशा बच्चों की तरह ही माना । मुझे अच्छी तरह से याद है यद्यपि मैं अलग मार्केटिंग डिपार्टमेन्ट में काम करता था पर शादी के तुरंत बाद उन्होने मुझे पत्नी सहित अपने घर बहुत ही स्नेह से डिनर पर बुलाया था । फ़ैक्टरी की रामलीला कमेटी के प्रमुख सदस्य थे।
रामलीला कमेटी में पालीवाल जी 
समय -समय पर होने वाले सामाजिक उत्सवों में भी उनकी तरफ़ से पूरा सहयोग रहता। सबसे बड़ी बात – अपने काम में पूरी तरह से कुशल और मेहनती थे । यही कारण था कि फैक्टरी में सख्त से सख्त माने जाने वाले जनरल मेनेजर भी पालीवाल जी को बहुत पसंद करते थे । 

लगे हाथों आपको बताता चलूँ – मेरी नौकरी भारत सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान सीमेंट कॉर्पोरेशन आफ़ इंडिया में थी । उन दिनों कंपनी की 11 फ़ैक्टरी और विशाल मार्केटिंग नेटवर्क पूरे देश में फैला हुआ था । कुछ -कुछ समय के अंतराल पर हम अधिकारी वर्ग के लोगों के बोरिया-बिस्तर समेत ट्रांसफर होते रहते थे । अपने साथियो से मिलना – बिछड़ना एक तरह से ज़िंदगी का रूटीन बन चुका था । कुछ समय के साथ के बाद मेरा ठिकाना भी अलग और पालीवाल जी भी कहीं और चले गए । उन दिनों आज की तरह दूरसंचार के साधन इतने सुलभ नहीं थे अत: संगी -साथियों की खोज-खबर भी बमुश्किल ही मिल पाती थी । साल-दर - साल इसी प्रकार से गुजरते जा रहे थे । समय का मैं भी ठीक से हिसाब नहीं रख पाया । 

काफी समय के बाद मेरा ट्रांसफर दिल्ली स्थित कंपनी के हेडक्वाटर में ही हो गया । वहाँ पहुंचा तो रिसेप्शन डेस्क पर श्रीमती पालीवाल को देख कर दंग रह गया - निस्तेज चेहरा और चेहरे पर फीकी सी मुस्कान । वहाँ पर मौजूद कई लोगों के सामने मैं ज्यादा कुछ पूछने की स्थिति में नहीं था ।बरसों पहले चरखी दादरी में उनके सौम्य चेहरे पर जो चमक, तेज और प्रसन्नता की लालिमा हर दम मौजूद रहती थी वह अब दूर दूर तक नज़र नहीं आ रही थी । 

अपने मन में उठ रहे तरह-तरह के ढेर सारे सवालों को दिल में ही दबाए उस वक्त वहाँ से चला गया । पर बाद में अपने एक पुराने सहयोगी मित्र से इस बारे में पूछा । जो कुछ भी मेरे मित्र ने बताया वह मेरे दिमाग की सारी नसें चीर देने के लिए काफ़ी था । 

जैसा मैंने पहले ही बताया - दरअसल पालीवाल जी अपने काम में बहुत ही माहिर और मेहनती थे । अब ऐसे डाक्टर को जिसके पास हर मर्ज की दवा हो उसे तो हर कोई अपने पास रखना चाहेगा ही । चरखी दादरी से उन्हें मध्यप्रदेश के अकलतारा सीमेंट फ़ैक्टरी में भेजा गया था जहाँ अक्सर कोई न कोई समस्या मुँह उठाए खड़ी रहती थी । अपनी आदत के अनुरूप पालीवाल जी इन सब दिक्कतों से बिना माथे पर कोई शिकन लाए पूरी हिम्मत और ताकत से जूझते और सुलझाते रहते । ऐसा ही एक दिन था 20 जून 1989 का । श्रीमती पालीवाल अकेले ही अपने मायके मुरादाबाद गई हुई थीं । अकलतारा में पालीवाल जी अकेले ही थे क्योंकि उन्हें काम की वजह से लंबी छुट्टी नहीं मिल पायी थी । उनके पास एक फिएट कार हुआ करती थी जिसे उन्होने कुछ दिन पहले मरम्मत के लिए पास के ही एक शहर भिजवाया हुआ था । उस कार की वापिस लाने के लिए पालीवाल जी ने एक दिन की छुट्टी ले ली थी और सुबह – सवेरे ही पास के अकलतारा  स्टेशन पहुँच गए जहाँ से उन्हें ट्रेन पकड़नी थी ।

स्टेशन पर बैठ कर इंतज़ार कर रहे थे – पता चला कि ट्रेन लेट है और आने में अभी समय लगेगा।फ़ैक्टरी और रेलवे स्टेशन पास-पास ही थे । उन्होने सोचा कि स्टेशन पर इतने समय बैठ कर इंतज़ार करने के बजाय एक चक्कर फ़ैक्टरी का ही लगा लिया जाए । छुट्टी पर होने के बावजूद पालीवाल जी पहुँच गए प्लांट का मुआयना करने कि कहीं कोई दिक्कत तो नहीं आ रही । फ़ैक्टरी में सचमुच एक जगह गंभीर समस्या आ रही थी । उन्होने आव देखा ना ताव , पहुँच गए खुद उन मशीनों के बीच । अपने आस-पास मौजूद अन्य इंजीनियरों को वहाँ से हटने का आदेश दिया क्योकि उस छोटी सी जगह में ज्यादा लोगों की उपस्थिती और अधिक खतरा पैदा कर सकती थी । पालीवाल जी ने एक तरह से उन खतरनाक हालात में भी पूरी तरह से बिना डरे मोर्चा संभाला हुआ था । अचानक भयंकर आवाज के साथ मशीनों की लंबी -चौड़ी पाइप में फँसा हुआ 900 डिग्री के तापमान वाला गरम सीमेंट का विशालकाय ढेर ऊपर से नीचे आ गिरा । उस गरम, धधकते सीमेंट के ढेर के नीचे पालीवाल जी और एक अन्य मजदूर दब चुके थे । यह सब इतना अचानक हुआ कि संभलने का मौका तक नहीं मिला । चारों और हाहाकार मच गया । जब तक उन्हें बाहर निकाला गया , बहुत देर हो चुकी थी । कुछ ही देर पहले तक मौजूद उस हंसते - खेलते इंसान का शरीर उस प्रचंड गरम सीमेंट के ढेर में फँस कर इतनी बुरी तरह से झुलस चुका था कि पहचान भी उनकी पहनी घड़ी, बेल्ट और अंगूठी द्वारा ही हो सकी। ।
पालीवाल जी तो ऐसी दुखद और दर्दनाक परिस्थितियों में इस दुनिया को छोड़ कर चले गए पर अपने पीछे छोड़ गए एक सवाल और एक मिसाल । सवाल उन सुस्त , कामचोर और मुफ़्त की तंख्वाह लेने वाले निकम्मे लोगों के लिए – कि भाई हराम की रोटी तुम्हें हजम कैसे हो पाती है ? अगर दुनिया में सभी तुम्हारी तरह हो जाएँ तो समाज का काम कैसे चलेगा ? पालीवाल जी तो जब तक जीवित रहे खुद एक मिसाल रहे मेहनत और काम और कर्तव्य के प्रति संजीदगी बरतने वाले इंसान के रूप में । उनकी ज़िंदगी तो थी ही , अंतिम सांस भी काम के प्रति ज़िम्मेदारी को पूरी संजीदगी से निभाते हुए ईश्वर को समर्पित कर दी । आप ही सोचिए – हम से कितनों में है इस तरह का जज़्बा और हिम्मत । आप में से कुछ यह भी कह सकते हैं कि होनी को कौन टाल सकता है । दुर्घटना थी - हो गई । पर मेरे भाई – आप ज़रा उन हालात पर भी तो गौर फरमाइए जब यह सब हुआ । अच्छे भले छुट्टी पर जा रहे उस इंसान को किस कीड़े ने काट लिया जो वापिस फ़ैक्टरी में जा पहुंचा और लग गया बंद मशीनों की खराबियों को दूर करने में। उसे क्या ज़रूरत थी खुद उस खतरनाक जगह पर काम करने की । खुद बड़ा अफसर था – किसी भी इंजीनियर या सुपरवाइज़र को आगे कर सकता था । पर उसने तो खतरा भाँप कर, मौके पर मौजूद अन्य कर्मचारियों को भी वहाँ से हटा दिया वरना इस हादसे में बहुत सारी ज़िंदगियाँ चली जातीं । इन सब सवालों का एक ही जवाब है – हाँ , उस शक्स को वाकई में एक कीड़े ने काट खाया था जिसकी वजह से उसे अंत में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा । वह कीड़ा था – ज़िम्मेदारी का, फर्ज़ का, ईमानदारी का, नेकनीयत का । आज के चापलूसी और मक्कारी से भरी दफ्तरों की दुनिया में जिन सीधे-सच्चे इन्सानों को यह आदर्शवाद का कीड़ा काट लेता है उन्हें बौड़म -बैल समझा जाता है । काम लेने के मामले में उनका जमकर शोषण होता है । तरक्की के मामले में मक्खन-बाज चापलूस बाज़ी मार ले जाते हैं । बौड़म-बैल रह जाते हैं अपने गैर-जिम्मेदार , उच्च-अधिकारियों की गलतियों पर लीपा-पोती करने और उसका दंड भुगतने के लिए । नौकरशाही का सीधा सा उसूल है – राजा कभी गलती नहीं कर सकता । इसीलिए राजा की गलती तुरंत उसके मातहत के गले में यह कह कर डाल दी जाती है कि अब आगे तुम जानो और तुम्हारा काम । यह सब मैं उस अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ जिसे पालीवाल जी के परिवार ने महसूस किया और एक ज़माने में जिससे मैं खुद भी गुज़रा । यह कहानी अधूरी रह जाएगी बिना यह जाने कि केवल 47 साल की अल्पायु में ही कच्ची गृहस्थी छोड़ कर दुनिया से विदा लेने वाले इस कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के परिवार को बाद मे किन-किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ा । इसके लिए इस कहानी की अगली कड़ी का इंतज़ार कीजिए । 

चलते -चलते सिर्फ एक बात आपसे कहनी है : ईमानदारी, नेकनीयती और मेहनत का रास्ता कठिन ज़रूर है पर तमाम दिक्कतों के बावजूद इस पर चलने में भी गरूर है, एक अजब नशा है जिसे दिवंगत देवेन्द्र कुमार पालीवाल जैसे इंसान ही समझ सकते हैं ।

Tuesday, 28 January 2020

बदलती दुनिया

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अगर आप संगीत के शौकीन हैं तो वह फिल्मी गाना तो जरूर सुना होगा – जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह – शाम । अब अगर आप ज़िंदगी की डगर पर चलते जा रहे हैं तो ज़रूरी नहीं कि सड़क सीधी-सपाट ही मिले । राह कांटो भरी और टेढ़ी-मेढ़ी भी हो सकती है । अब अगर आप को अपनी मंज़िल तक पहुंचना है तो सड़क तो आपके हिसाब से ढलेगी नहीं – आपको खुद में ही बदलाव करने होंगे सड़क के आड़े-तिरछे मोड़ों के अनुसार । परिस्थितियों के अनुसार अपने-आप को ढाल लेने की काबलियत ही शायद जीवन को सफल और सरल बनाने का मार्ग है । अब मैं यह नहीं कह रहा कि बदलाव के नाम पर आप हर उस उल्टी-सीधी और गलत बात से भी समझौता कर लें जो सामने आ रही है । अगर ऐसा हो जाता है तब तो इंसान जी हुज़ूरी करने वाला, बिना रीढ़ की हड्डी का अवसरवादी, मौका-परस्त रंग बदलने वाला गिरगिट बन जाएगा । सही -गलत का फैसला तो आपको अपने विवेक के अनुसार ही लेना होगा । जिसे दिल गवाही दे वही सही है – बस अपने दिल की सुनिए औए इस कदर सुनिए कि कहीं किसी भी कोने से हल्की सी भी कोई विरोध की आवाज तो नहीं आ रही । जो भला लगे उसे बेझिझक कर डालिए और उसके लिए अपने आपमें कोई बदलाव भी लाना पड़े तो सोचिए मत । 
श्री पुरुषोत्तम कुमार 

अब इन बदलावों के बारे में बात करते हुए मुझे अपने दो दोस्तों की याद आरही है। दोनों ही मुझसे हर मामले में अत्यंत वरिष्ठ । उनके जीवन में परिवर्तन की श्रेणी भी बिलकुल अलग-अलग तरह की । पहले मित्र हैं पुरुषोत्तम कुमार जी – उन्हें किसी ज़माने में जीव-जंतुओं से कोई विशेष लगाव नहीं था । अपने इस स्वभाव और जीवन-शैली की वजह से उन्हें कोई समस्या भी नहीं थी । सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था । आज के ज़माने में अब ज़रूरी नहीं कि जिस रूप और आदतों के साथ हमने ज़िंदगी गुज़ार दी, हमारे बच्चे भी उसी रेल की पटरी पर चलें । कुमार साहब के बच्चे उस दुनिया से संबंध रखते हैं जिन्हें हम पशु-प्रेमी कहते हैं । ऐसे लोग अक्सर घरों में पालतू जानवर बहुत ही प्यार से रखते हैं । मेरे मित्र को शुरू में बच्चों की उस शौक से थोड़ी-बहुत हिचकिचाहट हुई पर बाद में उन्हें खुद लगा कि जीव-जगत की दुनिया से जुड़ने में कोई बुराई नहीं । यह तो एक प्रकार से आपके लिए अलग ही किस्म की खुशियों के दरवाजे खोल देता है। यह था कुमार साहब का आत्म-मंथन और सोच जिसे उन्होने समझदारी से खुशी-खुशी अपने जीवन में स्वीकार किया और लागू भी किया ।


 बच्चे भी खुश – कुमार साहब भी खुश और जीवन में एक अच्छे बदलाव के लिए उन्हें कोई विशेष प्रयत्न भी नहीं करना पड़ा । बस अपनी सोच बदली जोकि पूरी तरह से उन्हीं के हाथ में थी । 


अब बात उस दूसरी तरह के बदलाव की जो समस्या बन चुका है गुप्ता जी के लिए। देश के दवा-उद्योग से जुड़ी नामी-गिरामी कंपनी में वह अच्छी-ख़ासे ऊंचे ओहदे की नौकरी के करने के बाद आजकल रिटायर्ड जीवन बिता रहे हैं । बढ़ती उम्र के साथ जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ धीरे-धीरे उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बनती जा रहीं हैं । आज के दौर की बदलती टेक्नोलोजी को गुप्ता जी भी अपनाना चाहते हैं । वह ज्यादा की चाहत नहीं रखते – उन्हें बस आज के स्मार्ट फोन को इस्तेमाल करना सिखा दे – यही छोटा सा ख्वाब है । पर यह नेक काम करे तो करे कौन ? बच्चे अपने आप में व्यस्त हैं । सिखाने के लिए जो धैर्य और नम्रता चाहिए वह भी रेगिस्तान में पानी की तरह से गायब होती जा रही है । वह भूल जाते हैं कि जिन माँ-बाप और बुजुर्गों को नए ज़माने के इन गेजेट्स / उपकरण सिखाने के लिए उनके पास वक्त और इच्छा-शक्ति का अभाव है, उन्हीं माँ-बाप ने किसी समय उन्हें क-ख-ग और गिनती सिखाने में कितना धीरज रखा था । उन आज के नई पीढ़ी के युवकों को किसी ने  याद दिलाने की ज़हमत नहीं उठाई कि उनके बचपन में भी दिन में 24 घंटे, हफ्ते में सात दिन, माह में सात दिन और साल 365 दिनों का ही होता था । वक्त की कमी उनके माँ -बाप को भी रहती थी पर इस कमी को उन्होने कभी बच्चों के विकास के रास्ते में हावी कभी नहीं होने दिया ।  

यह किसी एक गुप्ता जी की कहानी नहीं है – आपको भी अपने इर्द -गिर्द जान-पहचान के बहुत से बुजुर्ग गुप्ता जी , शर्मा जी या सिंह साहब मिल जाएँगे जो कुछ नया सीखना चाहते हैं पर किसी के पास सिखाना तो दूर , उनके पास बैठने का समय भी नहीं । स्मार्टफोन और इंटरनेट की टेक्नोलोजी से जुड़ कर वह अकेलेपन की समस्या से काफी हद तक छुटकारा पा सकते हैं । अपने समय का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं । बिजली, गैस , फोन के बिलों को जमा करने की लाइनों में खड़े होने की दिक्कत से छुटकारा पा सकते हैं । सोशल मीडिया के माध्यम से अपने संगी-साथियों और दूर- दराज़ बसे बाल-बच्चों के निरंतर संपर्क में रह सकते हैं ।अपनी जानकारी में आए ऐसे किसी भी गुप्ता जी की तरह के बुजुर्ग के जीवन को आसान बनाने के लिए अगर हम अपना थोड़ा सा समय और धैर्य दे सकें तो इससे नेक काम और कुछ नहीं हो सकता । और हाँ - चलते-चलते एक सलाह अपने बुजुर्ग दोस्त बिरादरी से भी - इन्टरनेट और स्मार्टफोन की नई टेक्नोलोजी सीखें जरूर - पर अपने किसी भरोसे के संगी-साथी या व्यक्ति से ही । अनजान गुरु आपके लिए जी का जंजाल भी बन सकता है क्योंकि इस दुनिया में एक से ऊपर एक धोखेबाज भी बैठे हैं जो आपकी बैंक और निजी जानकारी का गलत इस्तेमाल भी कर सकते हैं 

मैं किसी को कुछ सीख देने की कोशिश कतई नहीं कर रहा हूँ – केवल अपने विचार रख रहा हूँ । हो सकता है शायद आप में कुछ को भी पसंद आ गए और उनके हाथों किसी एक ‘गुप्ता जी’ का भी भला हो गया तो मेरा लिखना सफल है ।

Sunday, 19 January 2020

हाथ की लकीरें : रमेश कुमार जोशी

🎧   सुनने के लिए नीचे के फ़ोटो पर  ➤ के निशान पर क्लिक करें 

सुनते आए हैं - मुंबई की बरसात, अफ़सर की बात और घोड़े की लात का कुछ भरोसा नहीं होता । अभी कुछ है और अगले ही पल क्या रंग दिखा दें , आपके फरिश्ते भी नहीं जान पाएंगे । मुंबई मैं कभी गया नहीं और घोड़े की पिछाड़ी से भी दूर ही रहा सो मुंबई की बरसात और घोड़े की लात से मेरा भी पाला नहीं पड़ा । हाँ अफसरों की बातों के लपेटे में कई बार बुरी तरह से चकर -घिन्नी बना । कुछ इसी तरह इंसान के भाग्य का भी कुछ भरोसा नहीं होता । हाथों की लकीर की कुछ तासीर ही ऐसी होती है, चाहे तो बना देती हैं तकदीर या फिर लंगोटधारी फकीर । यह बात मुझे तब याद आई जब कभी श्री रमेश कुमार जोशी का जिक्र चला । भाग्य-चक्र, ज्योतिष शास्त्र और जोशी जी में उतना ही गहरा संबंध है जितना केजरीवाल जी और उनके गले में पड़े मफ़लर में है । आप पूछंगे - कैसे . . . . ? वह भी बताऊंगा , बस ज़रा सब्र कीजिए ।


गुज़रा हुआ ज़माना 
आजकल जोशी जी हिमाचल प्रदेश में शिमला के पास पहाड़ों और जंगलों के बीच मशोबरा में एक सुंदर सा होटल चला रहे हैं । आप कहेंगे – इसमें क्या खास बात हो गई । अब मैं फिर से कहता हूँ – बहुत ही बेसब्र किस्म के इंसान हैं आप ।  मुझे अपनी बात पूरी तो करने दीजिए पहले । फिलहाल तो आपको टाइम मशीन में बैठा कर आज से 72 साल पहले की उस  दुनिया में पहुँचा देता हूँ हिमाचल प्रदेश के एक दूर-दराज़ के उस छोटे से गाँव में जहाँ बालक रमेश पैदा हुआ, बचपन बीता । आज़ादी से पहले  उनके पुरखे वहाँ की रियासत कियार कोटी के राजगुरु  थे । परिवार धन-वैभव से हर प्रकार से सम्पन्न था ।लेकिन  वक्त का घोड़ा किस समय दुलत्ती मार दे कुछ कहा नहीं जा सकता ।यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ ।  देश की आज़ादी के बाद राजे-रजवाड़े गए, उनका राज गया - ताज गया और साथ ही उन पर आश्रित राजघराने के दरबारी – कर्मचारी सभी एक तरह से आसमान से ज़मीन पर आ गए । कुछ समय बाद तो  बालक रमेश के घर में तो जैसे मनहूसियत ने और भी जबदस्त डेरा डाल दिया । अचानक एक के बाद एक कई मौते भी होने लगीं और घबरा कर परिवार हिमाचल प्रदेश छोड़ कर सहारनपुर मे आ कर बस गया । खुद जोशी जी के शब्दों में – कभी वह भी वक्त था जब हमारे घर में दो सौ गाय पलती थी, पर ऐसे दिन भी देखने पड़े जब  हमें दो -दो दिन तक खाना भी नसीब में नहीं था ।

युवावस्था में रमेश जोशी 
पढ़ाई – लिखाई में जोशी जी बचपन से ही तेज़ थे । इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया और नौकरी की तलाश में दिल्ली की ओर दौड़ लगाई ।बालीवुड तो क्या हालीवुड के भी अभिनेता शरमा जाएँ ऐसा अच्छा-खासा व्यक्तित्व था और तकनीकी योग्यता तो थी ही । दिल्ली के ही एक जाने-माने कालेज से शुरुआत की । काम था बतौर सुपरवाइजर रख-रखाव की सारी व्यवस्था देखना । बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ गए – मेहनती तो थे ही , प्रमोशन्स की सीढ़ियों पर भी ऊपर चढ़ते जा रहे थे - असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद तक की ज़िम्मेदारी संभाली ।

ज्योतिष गुरु  - जोशी जी 
अब आता है कहानी में पहला ट्विस्ट यानी झटकेदार मोड़ । पुरखों से विरासत में मिले ज्योतिष ज्ञान के गुण ने ज़ोर मारा । शुरुआत शौकिया तौर पर हुई पर साथ ही साथ ज्योतिष शास्त्र का धीर -गंभीर अध्ययन भी चलता रहा । जोशी जी की शिक्षा की इमारत,  विज्ञान और इंजीनियरिंग की नींव पर टिकी थी अत: हर चीज़ को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखने के बाद विश्वास करना  उनका स्वभाव बन चुका था । उनके लिए ज्योतिष महज़ एक तीर-तुक्के का अधकचरा तमाशा नहीं वरन गृह -दशाओं की जटिल गणनाओं पर आधारित भविष्यवाणियों  का समग्र विज्ञान है । सब कुछ निर्भर करता है आपकी इस विषय की विधिवत शिक्षा पर – ठीक वैसे ही जैसे डाक्टरी की पढ़ाई ही अंतर करती है एक झोला-छाप नकली डाक्टर और एम.बी.बी.एस प्रशिक्षित डाक्टर के बीच ।  जोशी जी ने भी ज्योतिष शास्त्र के प्रकांड पंडितों के शिष्य रहे और अपने ज्योतिष ज्ञान को आसमानी ऊंचाई तक पहुंचाया ।  उनकी बताई अनेक भविष्यवाणियाँ आश्चर्यजनक रूप से सटीक साबित हुईं ।  इस सब का नतीजा यह  रहा कि कई राष्ट्रीय स्तर के समाचारपत्रों के लिए लेख  और टी. वी. चैनल्स पर कार्यक्रम  देने के लिए नियमित रूप से बुलावे आने लगे ।  प्रसिद्धि बढ़ने लगी – देश के कई जाने -माने उद्योगपति और फिल्म अभिनेता उनसे सलाह लेते । इन सबके बीच वर्ष 2007 में जोशी जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति (V.R.S) ले ली और अपने आप को पूरी तरह से ज्योतिष विद्या के गहन  अध्ययन और इसके माध्यम से समाज की सेवा को समर्पित कर दिया । नाम – पैसा – शौहरत किसी चीज़ की कोई  कमी नहीं थी । सब कुछ जोशी जी के ज्ञान, भाग्य और ईश्वर की कृपा से  अच्छा चल रहा था – बल्कि दौड़ रहा था ।

पर कहने वाले ठीक ही कहते हैं – रमता जोगी, बहता पानी, इनकी माया किसने जानी । अपनी मर्जी के मालिक होते हैं ये । ठीक ऐसा ही कुछ हुआ जोशी जी के जीवन में – और अब आता है इस कहानी में दूसरा झटकेदार मोड़ । जोशी जी अब रुख करते हैं उन्हीं पहाड़ों और उस गाँव की ओर जिसे किसी ज़माने  में मजबूरीवश छोड़ कर आना पड़ा था । पर इस बार मन में एक विचार था, संकल्प था , उद्देश्य था – अपने पुरखों के गाँव के लिए ऐसा कुछ करने का जो उस क्षेत्र के विकास और स्थानीय निवासियों को रोजगार उपलब्द्ध कराने में मददगार  साबित हो । अपनी अब तक की जमा-पूंजी से उन्होने सुंदर सा होटल बनाया और उसी की देखरेख में व्यस्त हैं । जय जवान -जय किसान की तर्ज़ पर वह महसूस करते हैं कि आज के नए ज़माने की माँग है – जय करदाता – जय रोजगार दाता ।
खुशहाल जोशी परिवार 
श्री रमेश कुमार जोशी का हँसता-खेलता परिवार है- पत्नी और दो बेटियाँ- प्राची और मनु ।  सभी गुणवान, शिक्षित और आत्मनिर्भर । जोशी जी विशेष रूप से ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि उनकी अब तक की उपलबद्धियों में पत्नी श्रीमती वीणा जोशी का बहुत बड़ा योगदान है । श्रीमती जोशी एक मल्टी-नेशनल कंपनी में प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत हैं ।              

जोशी जी से संबन्धित अनेक रोचक किस्से  उनकी बिटिया प्राची से सुनने को मिले ।उनके ज्योतिष ज्ञान की परीक्षा लेने के लिए किसी ने झूठ बोल कर  मृत व्यक्ति की जन्मकुंडली सामने रख दी जो पहले ही राम को प्यारा हो चुका था ।  फिर तो पूछिए मत, जोशी जी तो कुंडली सरसरी रूप से तुरंत देखते ही भाँप गए .... उसके बाद तो पूछिए मत क्रोध में जैसे उनमें साक्षात शिव का रूप आ गया और जो तांडव शुरू हुआ तो उस छलिया बाबू ने वहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी । एक और मज़ेदार बात – जोशी जी संगीत के बहुत शौकीन हैं । गाना बहुत अच्छा गाते हैं । एक बार किसी चौकस पड़ोसन ने श्रीमती जोशी से चुगली कर दी कि आपके आफिस जाने के बाद घर पर कोई महिला घर आकर  आपके पति के सुर में सुर मिला कर गाने गाती है । श्रीमती जी ने खबरी जासूस की विश्वसनीय चुगली के आधार पर एक दिन घर पर अचानक छापा मार दिया । जो देखा अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ – हाय दैया ! बड़े छुपे रुस्तम निकले हमारे सैया । इतना बड़ा राज़ पति ने अब तक छुपा कर रखा था । दरअसल जोशी जी अपने गले से पुरुष और महिला दोनों की ही आवाज़ खुद ही बखूबी निकाल कर आँखें बंद कर तल्लीनता से गा रहे थे ।यह तो वही बात हुई – खोदा पहाड़ निकला, निकला चूहा और वह भी मारा हुआ । इधर घर के अंदर श्रीमती जोशी की हँसी नहीं रुक पा रही थी और बाहर उनकी चुगलखोर जासूस सहेली कान लगा कर, दम साधे इंतज़ार में खड़ी थी कि जोशी जी के घर से अभी तक किसी बम धमाके की आवाज़ क्यों नहीं आई । 
यह कहानी थी उस इंसान की और उसकी घुमावदार झटके लेती तकदीर की जो एक इंजीनियर को कभी विश्वविद्यालय का  व्यस्थापक बना देती है, तो कभी ज्योतिष शास्त्र के समुद्र में गहरे गोते लगवाती है और अंत में पहुँचा देती है हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में बसी पुरखों की ज़मीन पर  – जहाँ उन के मन में संतोष है- अपने होटल के माध्यम से प्रदेश के पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने का, स्थानीय निवासियों को रोजगार देने का और खुद भी प्रक़ृति की सुंदरता को निहारने का।    


विंडसर पेलेस : मशोबरा -शिमला 

Tuesday, 14 January 2020

अंतिम नसीहत : भोली की


मैं हूँ भोलू बचपन में 


कार वाले अंकल ने मुझे चोट लगाई 



मैं ठीक भी हो गया 
इस बार मुझे पत्थर से मारा - अंतिम बार 
अपने पिछले लेख भोली की भोली सीख में एक प्यारी सी भोली के ज़िंदगी की दुख:भरी दास्तान की हल्की सी झलकी दिखाई थी । संक्षेप में बस यह समझ लीजिए कि उस प्यारी सी डॉगी को तीस दिसंबर को किसी ने इतनी बुरी तरह से पाँव को चोटिल कर दिया उसका चलना फिरना मुश्किल हो गया और उसके पेट में पल रहे बच्चे भी मर गए । उसके जल्दी ठीक होने की आप सबने भी अपनी तरफ से दुआ की । इस दौरान जब भी उसके इलाज़ के लिए एंबुलेंस गाड़ी में डाक्टर आता , भोली अगर कहीं बाहर सड़क पर भी होती तो अपने -आप मेरे घर में आकर अपनी पट्टियाँ बँधवा लेती , इंजेक्शन भी बिना किसी शोर-शराबे के, आराम से लगवा लेती । उसके इस व्यवहार से सीख मिली थी : भले-बुरे के बीच फर्क करना सीखो । जो आपका शुभचिंतक है हमेशा उसके साथ खड़े रहो – बेशक दुनिया उसके खिलाफ़ हो ।

आज 14 जनवरी 2020 को तमाम कोशिशों के बावजूद भोली के प्राण बचाए नहीं जा सके । आज उस एंबुलेंस वाले डाक्टर भैया के पहुँचने से पहले ही भोली दुनिया छोड़ चुकी थी । 

बीमारी के दिनों में भोली के लिए घर के बरामदे में ही एक सुरक्षित स्थान पर बिस्तर लगवा दिया था जहां वह आराम करती थी । सुबह से ही भोली काफी कष्ट में थी । कुछ भी खा-पी भी नहीं रही थी । दोपहर तक अपने नियत स्थान पर बिस्तर पर ही थी । मैं डाक्टर के आने की प्रतीक्षा कर रहा था । बाहर निकल कर देखा तो भोली अपने बिस्तर पर नहीं थी । गेट के बाहर एक और टाट बिस्तर भी रखवाया हुआ था । इस पर रात के समय इस कड़क सर्दी के मौसम में दूसरे कुत्ते अपना आसरा कर लेते हैं । देख कर मैं हक्का-बक्का रह गया – उसी बाहर के बिस्तर पर भोली सो रही थी – हमेशा की गहरी नींद में । उसकी अधखुली आँखें इस बार फिर मुझे कह रहीं थी – देखा दोस्त – चलते -चलते भी मैंने तुम्हें कोई तकलीफ नहीं दी । मैंने तुम्हारे घर में अपने प्राण नहीं त्यागे । अपने अंतिम समय में, उखड़ती हुई साँसों के बावजूद खुद अपने पाँवों से चलकर घर से बाहर आई थी । अब आगे का सफर तो मुझे खुद ही तय करना है । 

यह वही भोली थी जिसके पाँव को बचपन में भी कोई कार वाला बुरी तरह से कुचल कर चला गया था । तब भी अपने इन्ही हाथो से प्लास्टर चढ़वा कर लाया था । जब वह ठीक हो गई तो उसे उछलते -कूदते देखकर खुशी से मैं फूला नहीं समाता था । पर लगता है तकलीफ़ों और भोली का चोली-दामन का साथ रहा । खैर अब भोली इन सब से मुक्त हो चुकी है । बहुत दूर चली गई है ...... शायद नए जन्म में किसी और रूप में उसे खुशहाल ज़िंदगी मिले – यही मेरी प्रार्थना है । 

रही बात भोली की अंतिम नसीहत की जो भोली जाते -जाते भी दे गई : अपने शुभचिंतकों को कभी तकलीफ मत दो – अंतिम समय में भी नहीं ।

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...