Monday, 27 July 2020

संगीत - शौक - सेवा : दिलीप कुमार राव

मेरे दिवंगत पूज्य पिता श्री रमेश कौशिक बहुत ही विद्वान और प्रख्यात कवि थे । उनसे अक्सर बड़े ज्ञान की नसीहतें सुनने को मिला करती थीं । मैं भी उन्हें गांठ बांध लेता । आज भी उन्हें याद करता हूँ तो जीवन के किसी न किसी मोड़ पर सहारा मिल जाता है । वह कहा करते थे अगर तनाव मुक्त जिंदगी गुजारनी है तो इंसान कम से कम ऐसा एक अच्छा शौक जरूर पाले जिसका उसके काम-धंधे से दूर-दूर तक कोई संबंध ना हो । बागवानी, खेलकूद , सैर सपाटा , फोटोग्राफी , पढ़ना -लिखना , खाना पकाना , समाज सेवा जैसे अनगिनत शौक हैं जिनमें मैंने अपने बहुत से दोस्तों को व्यस्त और मस्त देखा है । जिनका कोई शौक नहीं है उसका नौकरी का समय तो जैसे-तैसे रो-धो कर कट जाता है पर रिटायरमेंट के बाद बुढ़ापे में उनकी हालत भूतपूर्व मंत्री जैसी हो जाती है जिसकी ना तो मूंछ बाकी है और ना ही पूंछ ।
दिलीप कुमार राव : किसी हीरो से कम नहीं 
मेरे एक करीबी दोस्त हैं – दिलीप कुमार राव । फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की तरह वह भी मुंबई में ही रहते हैं । बड़ा शानदार और प्रभावशाली व्यक्तित्व है उनका । हो सकता है उनके नामकरण के पीछे भी फिल्मी दिलीप साहब का ही प्रभाव रहा हो । उनके प्रशंसकों और दोस्तों की बहुत लंबी लिस्ट है जिनमें मैं भी शामिल हूँ । किसी जमाने में उसी कंपनी – सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया – में काम करते थे जिसमें मैं भी लंबे अरसे तक रहा । बहुत ही मिलनसार हैं – जिसे हम चलती भाषा में कहते हैं – यारों के यार । उन्हें कभी फोन कीजिए तो वर्ष 1956 के मशहूर फिल्मी गाने की मस्त कॉलर ट्यून सुनाई पड़ेगी – ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ , ज़रा हटके -ज़रा बचके – ये है बॉम्बे मेरे जाँ । सुनकर हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है कि आज से 64 साल पहले भी बॉम्बे के ये हालात थे और आज के दिन भी कोरोना के मारे मुंबई का वही रोना है । हाँ तो मैं बात कर रहा था अपने मित्र दिलीप की । वैसे वह बंदा है गुणा -भाग वाला यानी फाइनेंस डिपार्टमेंट में काम करने वाला । इस लाइन में काम करने वालों को दुनिया अक्सर एक अलग ही नजर से देखती है – बहुत ही रूखे -सूखे , तेज-तर्रार जिन्हे हर छोटी बड़ी चीज़ को नफ़े – नुकसान की तराजू में तोलने की आदत होती है । लेकिन यह दुनिया तो उस भगवान की बनायी हुई है जिसने पाँचों उंगलियों को भी एक समान नहीं बनाया । सबसे हट कर अनोखे लोग हर जगह होते हैं और दिलीप भी उन्हीं में से एक हैं । संगीत का शौक उन्हें जुनून की हद तक है । बहुत तरह के साज़ बड़ी ही निपुणता से बजा लेते हैं जैसे – ढोलक, कीबोर्ड, हारमोनियम , माउथ ऑर्गन । जितनी गंभीरता से नौकरी कर रहे हैं उतनी ही जिम्मेदारी से समय निकाल लेते हैं जगह -जगह होने वाले संगीत कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए।
संगीत -साथियों की टोली 
 हुनर तब और रंग लाता है अगर उसे दुनियादारी से दूर रखा जाए । असली कलाकार एक अलग ही दुनिया के वासी होते हैं और दिलीप भी उसी श्रेणी में हैं । फिल्मी दुनिया के बहुत से प्रसिद्ध कलाकारों में उठना -बैठना है पर खुद किसी भी तरह के दिखावे से बहुत दूर । 
परिचय की जरूरत नहीं : फ़ोटो खुद बोलता है 
दिलीप की मुझे जो सबसे अच्छी बात लगी – जिसने यह छोटी सी कहानी लिखने को मजबूर किया – वह है उनका संगीत के प्रति निस्वार्थ प्रेम । इतनी काबलियत होते हुए भी दिलीप ने संगीत को कमाई का जरिया नहीं बनाया । जगह -जगह जा कर अपने इस हुनर और शौक का इस्तेमाल करता है लोगों का मनोरंजन करने में । केवल जन-साधारण ही नहीं वह अस्पतालों में तकलीफें झेल रहे मरीजों का मन बहलाते हैं , उनके चेहरे पर मुस्कराहट लाते हैं । आप एक बारगी नीचे दी गई तीन मिनिट की वीडिओ क्लिप पूरी देख जाइए । मेरी तरह आपके चेहरे पर होगा एक सुकून, होंठों पर मुस्कराहट और दिल में एक प्यारे से गीत की याद : 
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार , जीना इसी का नाम है । 




इस दुनिया को तुम से बहुत कुछ सीखना बाकी है दिलीप ।


Monday, 20 July 2020

दास्ताने टिंकू

बड़ा प्यारा से नाम है टिंकू । सुनते ही दिलो दिमाग में किसी खूबसूरत से शरारती बच्चे की तस्वीर कौंध जाती है । मुझे तो इस नाम से खास ही लगाव है । बारह - तेरह वर्ष की उम्र रही होगी मेरी जब घर पर एक शाम पिता जी प्यारा सा भूरे रंग का पिल्ला ले कर आए । जहाँ तक मुझे याद पड़ता है उसका नामकरण – टिंकू हम तीन सदस्यीय भाई-बहन की टीम द्वारा सर्व सम्मति से ही हुआ होगा । मेरे ज़िंदगी का वह पहला जीता जागता खिलौना आज भी मुझे अक्सर याद आता है । इतिहास के मुगल वंश के शासकों के नाम बेशक मुझे कभी याद ना हो सके लेकिन अपने घर पर समय -समय पर पाले गए पिल्लों के नाम मैं एक ही सांस में उंगलियों पर गिना सकता हूँ – टिंकू – बंटी – शिमलू – टिंकू ( द्वितीय) – केरी – टैडी - चंपू । स्कूल के मास्टर जी अक्सर कहा करते थे कि याद वही चीज रहती है जिसे आप दिल से प्यार करते हैं – अब चाहे वह किताब का पाठ हो या कोई इंसान । ज़ाहिर सी बात है कि मुगलिया सल्तनत के इन बादशाहों में मेरी कोई रुचि नहीं रही , इसीलिए कितने ही रट्टे मारने के बाद आज भी दिमाग से सफाचट है कि कौन किसका बाप था और कौन बेटा । 
टिंकू का इकलौता फ़ोटो - माँ के साथ 

हाँ तो मैं बात कर रहा था टिंकू की – जिसका हमारे घर में पदार्पण इसलिए नहीं हुआ कि उस जमाने में उसे हम बच्चों की ख्वाहिश पूरी करने के लिए लाया गया हो – या हमारे माँ-बाप का शौक हो । हमारा मध्यम वर्ग का बहुत ही साधारण सा ऐसा परिवार था जहाँ कुत्ता -बिल्ली पालने की बच्चों की मनुहार को यह कह कर दरकिनार कर दिया जाता है कि पहले तुम तो पल जाओ । हम लोग उन दिनों दिल्ली शाहदरा – मानसरोवर पार्क में रहा करते थे । भीड़-भाड़ से दूर सुनसान इलाके में बस्ती थी । पिता दफ्तर और माँ स्कूल के लिए सुबह ही निकल जाते । पहली शिफ्ट के स्कूल में पढ़ा कर जब तक दोपहर को माँ वापिस घर आती उससे पहले ही हम अपने स्कूल के लिए रवाना हो जाते । कुल मिलाकर चोरी-चपाटी के डर से घर को सुरक्षा की जरूरत थी और उसके लिए हमारी हैसियत और बजट कुत्ते पर ही आकर रुक जाता था । टिंकू क्योंकि एक साधारण देसी पिल्ला था इसलिए मेरी समझ से वह चाहे जहाँ से भी आया हो , पर आया मुफ़्त में ही । इंसान की सोच यहीं आकर चक्कर खा जाती है जब कहा जाता है कि पैसा बोलता है । अरे भाई – जरूरी नहीं कि हर अच्छी चीज के लिए आपको अंटी ढीली करनी पड़े । कई बार आपको कचरे के ढ़ेर में भी खजाना मिल जाता है । हमारे टिंकू का मामला भी कुछ ऐसा ही था । 

स्वभाव से बड़ा ही सीधा -सरल प्राणी था टिंकू । सभी से मिलजुल कर प्यार से रहता । इस मामले में कुछ ज्यादा ही मस्त -मौला था । हालत यह कि कोई अजनबी भी घर आता तो बड़े प्यार से पूँछ हिलाते हुए गले मिलने वाला भव्य स्वागत करता । कभी सड़क पर भी जा रहा होता तो वही नजारा पेश हो जाता – जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए । गरीब घर के बच्चे ज्यादातर सभी प्रकार के उद्दंड व्यवहार से दूर बहुत ही अनुशासित और संकोचशील जीवन जीते हैं । टिंकू भी कुछ - कुछ ऐसा ही था । उसकी बस एक ही मनपसंद शरारत होती । गरमी के दिनों में हम सब खुले आँगन में कतार में खाट बिछा कर सोया करते । सुबह सूरज निकलने के बाद देर तक सोने वाले हम बच्चों की खटिया पर ही चढ़ कर वह मुँह के ऊपर से चादर खींच कर अपनी ही भाषा में जय राम जी की कर देता । इस हरकत में उसे परोक्ष रूप से हमारे माता -पिता का ऐसे ही समर्थन मिलता जैसा पाकिस्तान को चीन का – इसलिए उसमें हेकड़ी और हिम्मत दोनों ही आ जातीं । 

उसका एक शौक और भी था – घर में आने वाले मेहमानों की चप्पलों से उसे खास ही प्यार था । इधर मौका लगा और उधर चप्पल ऐसे गायब जैसे बैंक से कर्जा लेकर विजय माल्या । बहुत खोजबीन के बाद जूते -चप्पल मिल तो जाते पर इतनी क्षत -विक्षत और घायल अवस्था में कि पहचान करना ही मुश्किल हो जाता । उन दिनों टिंकू के दांत निकल रहे थे सो दांतों में हो रही खुजली और कसक मिटाने के लिए वह कभी कुर्सियों के पाए कुतर डालता तो कभी अच्छी-खासी ऊंची एड़ी की सैंडिल को नोच-नोच कर हवाई चप्पल में बदल देता । नतीजा यही होता कि इस तरह की करतूतों के लिए उसकी चपत-परेड और कान-खिचाई भी होती । पर उसे भी अपनी इज्जत बहुत प्यारी थी इसीलिए ऐसे मौके पर होने वाली ज़लालत से बचने के लिए वह अक्सर पहले ही बिन लादेन की तरह भाग कर हमारी पहुँच से दूर किसी दुर्गम जगह जैसे तख्त या सोफ़े के नीचे शरण ले लेता । कठिन परिस्थितियों में आत्म-रक्षा के लिए भूमिगत होने का पहला पाठ मुझे टिंकू से ही सीखने को मिला । 

हमारे मकान में काफी खाली जगह भी थी जिसमें पेड़ -पौधे और सब्जियां उगाते रहते थे । वह खाली जगह टिंकू का खेल का मैदान भी था । कई बार टिंकू को उस बगिया से हमने गाजर – मूली उखाड़ कर खाते हुए रंगे हाथों भी पकड़ा । वह उसके मस्ती के दिन थे । 

घर में खुले में रखे खाने -पीने के सामान पर वह कभी मुँह नहीं मारता था । समझदार इतना कि सारे घर में घूमता -फिरता बस रसोई घर को छोड़ कर । रसोई में केवल तभी अंदर घुसता जब गलती से दूध उबल कर नीचे फर्श पर बहने लगता । अपने अनुभव से वह इतना जानता था कि उस जमीन पर बहने वाले दूध पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार था जिसे लेने के लिए उसे किसी पासपोर्ट या अनुमति की आवश्यकता नहीं थी । 

घर में सभी की आँखों का तारा था । मेरी नानी खुर्जा में रहा करती थीं । जब भी हमारे पास मिलने आतीं तो टिंकू के हिस्से के लड्डू अलग से लातीं । उन लड्डुओं को बड़े प्यार से अपने हाथ से उसे सहलाते हुए खिलाती जाती और कहतीं – “खा टिंकू खा । तू मेरे बच्चों की रक्षा करता है ।“ उनकी बात सच भी थी क्योंकि रात के समय घर की चौकीदारी टिंकू पूरी मुस्तैदी से निभाता । 

टिंकू का पालन पोषण भी कुछ हद तक गोकुल की गैया की तरह ही होता था । समय -समय पर उसे घर से बाहर घूमने-फिरने के लिए छोड़ देते । वह आस-पास चहल कदमी कर कुछ देर बाद अपने आप ही घर वापिस लौट आता । एक दिन तो कमाल ही हो गया – वह गया तो ऐसा गया कि देर शाम तक वापिस नहीं आया । चिंता हुई – सारी कॉलोनी छान मारी पर टिंकू नहीं मिला । थक -हार कर घर पर सभी उदास होकर बैठ गए । उस रात परिवार में कोई ढंग से खाना भी नहीं खा पाया । गर्मियों के दिन थे – हमेशा की तरह सभी आँगन में खात बिछा कर सो रहे थे । देर रात अचानक दरवाजे पर आहट हुई । दरवाजा खोला तो सामने टिंकू बैठा था । देखते ही उसने सीधे घर के अंदर दौड़ लगा दी और कूँ -कूँ करते हुए सभी के पाँव से चिपट गया । वह बहुत घबराया हुआ था – उसके गले में एक टूटी हुई रस्सी बंधी हुई थी । उसे कोई अपने साथ जबरदस्ती ले गया था पर मौका देख कर वह उस रस्सी को तुड़ा कर भाग निकला । 

इस कहानी को ब्लॉग पर  पोस्ट करने के बाद एक टिंकू के बारे में एक ऐसा कमेन्ट आया जिसे मैं मूल रूप में उद्धृत  कर रहा हूँ ।  ब्लॉग लेखन के दौरान मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ है जब  प्रकाशन के बाद भी उसमें कहानी में ही  पाठक प्रतिक्रिया / संदेश को समाहित किया हो । यह संदेश था इस कहानी के ही एक पात्र - मेरी छोटी बहन पारुल  का जिसने लिखा :   
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"दास्ताने टिंकू पढ़ते हुए यादों के गलियारों में घूम रही थी ।बचपन की बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं ।जब हम तीनों भाई-बहन नींद से जूझते हुए परीक्षा की तैयारी कर रहे होते थे, टिंकू कमरे के बीचों बीच आराम से फैल कर सो रहा होता था । उस समय हमें उससे बहुत ईर्ष्या होती थी । कम से कम मैं तो उस समय यही सोचती थी --अगले जनम मोहे-------।"
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समय पर किसी का ज़ोर नहीं चलता । मैं बचपन से किशोरावस्था में जा रहा था और टिंकू अपने बुढ़ापे की ओर । बुजुर्ग ठीक ही कहते हैं – बुढ़ापा खुद अपने आप में एक लाइलाज बीमारी है । टिंकू को भी धीरे -धीरे बीमारियों ने जकड़ना शुरू कर दिया । वह आज से पचास बरस पहले सत्तर के दशक का वह ज़माना था जब पशु तो दूर , इंसानों के इलाज की व्यवस्था भी आज जितनी उन्नत और सुलभ नहीं थी । ले -देकर घर से चार किलोमीटर दूर एक सरकारी पशु डिस्पेंसरी थी । टिंकू को भी कभी पैदल तो कभी अपनी गोद में बिठा कर रिक्शे में लेजाता । वह बेचारा धीरे -धीरे कमजोर होता जा रहा था । चलने फिरने में उसे दिक्कत होती, खुराक कम हो गई। शरारत तो क्या कर पाता बस घर के एक कोने में पड़ा बस सोता रहता । अब उसे बेहोशी के दौरे भी पड़ने लगे थे । उसको ऐसी हालत में तड़पते हुए देखना भी मेरे लिए अपने आप में बहुत बड़ी सज़ा थी । उसे शायद दमा या ऐसी ही कोई फेफड़ों की बीमारी हो चुकी थी जिसके लिए डिस्पेंसरी का डाक्टर भी हाथ खड़े कर चुका था । 

उस दिन तब दोपहर के बारह बजे थे । दरवाजे की घंटी बजी – बाहर जो व्यक्ति खड़ा था उसके आने के बारे में पिता जी दफ्तर जाने से पहले मुझे पहले ही बता चुके थे । वह उनके दिल्ली परिवहन निगम के दफ्तर का मेडीकल ऑफीसर था । मुझसे उसने टिंकू के बारे में पूछा और देखने की इच्छा ज़ाहिर की । टिंकू हमेशा की तरह घर में अपने पसंदीदा जगह - तख्त के नीचे बेसुध होकर सो रहा था । मैंने उसे जगाया और घर के पीछे के बरामदे में ले गया जहाँ डॉक्टर उसका इंतजार कर रहा था । डॉक्टर ने अपने बैग से इंजेक्शन निकाला और टिंकू को लगा दिया । इंजेक्शन लगते ही टिंकू बहुत जोर से झटके से छटपटाया , तड़पा और धीरे -धीरे शांत हो गया । डॉक्टर ने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला – “बच्चे ! इसकी बीमारी का कोई इलाज नहीं था । समय के साथ इसकी तकलीफें बढ़नी ही थी । इसको आराम दिलाने का बस यही एक रास्ता था ।“ डॉक्टर की बातें मेरी बाल -बुद्धि की समझ से बाहर थीं । मैं तो सिर्फ अपनी डबडबाई आँखों में आँसू रोकने की कोशिश करते हुए चिरनिद्रा में सोए अपने उस खिलौने को देख रहा था जो कुछ समय पहले तक बूढ़ा, लाचार और बीमार ही सही पर था तो जीता जागता । 

मुझे पता नहीं उसके बाद कब वह डॉक्टर वापिस गया – कब माँ स्कूल से आयीं । माँ को उस बारे में शायद पहले से ही पता था । वह कमरे में उस तख्त पर बैठीं हुई थी जिसके नीचे सुबह टिंकू आराम कर रहा था । उन्होनें अपनी धीमी आवाज में सिर्फ इतना ही पूछा – वह कहाँ है ? मैं माँ को उस जगह ले गया – माँ ने निश्चल पड़े टिंकू को एक नजर देखा । जब सहन नहीं हुआ तो उस को एक बड़ी सी चादर से ढक कर वापिस कमरे में उसी तख्त पर आकर धम से बैठ गयीं और दोनों हाथों से अपना चेहरा ढाँप लिया । मेरी माँ यूं तो मजबूत दिल वाली है पर उसे सुबकते हुए मैंने तभी देखा था । घर के पास की ही एक खाली जगह पर टिंकू को प्यार और सम्मान के साथ गहरा गड्ढा खोद कर अंतिम संस्कार कर दिया । बूढ़े टिंकू की दर्द और रोग से सदा के लिए मुक्ति का तरीका और औचित्य आज पचास साल बाद भी मुझे परेशान कर देता है – आँखों में आँसू ला देता है । 

टिंकू ने अपनी शरारतों और प्यार से जो हम सबके दिलों में जगह बनायी वह कभी खाली नहीं हो सकती । यद्यपि इतने प्यारे दोस्त की हमेशा के लिए विदाई दिल को चीर कर रख देती है पर उससे मिलने वाला निश्चल स्नेह  उसके  जाने के बाद भी आपको उनकी दुनिया से जोड़े रखता है । यही कारण है टिंकू ही समय समय पर अलग – अलग नाम से मेरे पास आता रहा –शिमलू , टिंकू ( द्वितीय) , केरी , टैडी  , चंपू सब में उसी का ही तो रूप है । उनके साथ खेलते समय मैं फिर से वही छोटा बच्चा बनता रहा हूँ  – टिंकू का नन्हा दोस्त । इस सब के बावज़ूद दिल के किसी अंजान कोने में आज भी एक दबी हुई ख्वाहिश है - काश फिर कभी देर रात दरवाजे पर आहट हो और सामने टूटी रस्सी गले में बांधे टिंकू बैठा मिले ।

Monday, 13 July 2020

मासूम पुकार

आज की आपको जो किस्सा सुनाने जा रहा हूँ वह उसी कहानी का एक तरह से हिस्सा है जो आज से तकरीबन दो साल पहले सुनाई थी ; मैं जिंदा हूँ । इसमें एक जीप दुर्घटना का वर्णन था । अगर आपकी याद के पिटारे से वह कहानी गायब हो चुकी है तो फिर से याद ताज़ा कर सकते हैं दिए गए कहानी के लिंक पर क्लिक करके :  मैं जिंदा हूँ अभी । 

19 अगस्त - वर्ष 1996 – दिन सोमवार – समय लगभग सुबह सवा नौ बजे का – स्थान हिमाचल प्रदेश में सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की राजबन फैक्ट्री । ड्राइवर कर्म चंद मेरे आफिस में बैठ कर विभाग के कर्मचारियों के साथ बतिया रहा था । कुछ ही देर बाद उसे अपनी जीप में लेडी डॉक्टर – शैल सहगल को 15 किलोमीटर दूर बसे खदान के इलाके में ले जाना था । वहाँ पर भी भरी -पूरी कॉलोनी है जिसमें रहने वाले कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों को डिस्पेंसरी में इलाज की सुविधा दी जाती है । कर्म चंद की खिलखिलाती आवाज मेरे कमरे तक आ रही थी । वह अपने कुछ ही महीने बाद होने वाले अपने रिटायरमेंट की योजना बना रहा था । बता रहा था कि इस खटारा जीप को भी कंपनी से खरीद कर अपने साथ ही ले जाएगा । मैं उसकी इन भोली बातों को सुन कर मंद – मंद मुस्करा रहा था । चलते -चलते बोला अभी तो जा रहा हूँ – वापिस लौट कर दोपहर को घर पर लंच में बैंगन की सब्जी बनाई हुई है वही खाऊँगा । अपने आफिस की खिड़की से मैं उसकी बूढ़ी- जर्जर जीप को शोर-मचाते - धुआँ उड़ाते आँखों से ओझल होते देखा । 
अब आगे की आपबीती डॉक्टर शैल सहगल के मुंह से : 
 लाड़ली वसुधा और  माँ  डॉ ० शैल (9  जनवरी 1997)

"मैं कॉलोनी के अपने क्वाटर में बैठी इंतजार कर रहीं थी जीप का जिसे आज की ड्यूटी के लिए माइंस कॉलोनी लेकर जाना था । जीप का हॉर्न सुन कर घर से बाहर निकलने लगीं । जाने से पहले एक बारगी अपनी छ: माह की छोटी से बच्ची -वसुधा को प्यार से पुचकारा और जीप की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिए । मेरे पति - डाक्टर संजीव सहगल भी राजबन में ही कार्यरत थे । हम लोगों का मिलनसार व्यवहार की वजह से सभी स्नेह और सम्मान करते थे । ऊबड़ -खाबड़ धूल भरे पहाड़ी रास्तों पर हिचकोले खाती जीप मानल खदान की डिस्पेंसरी की ओर ले चली । वहाँ पहुँच कर लगभग एक घंटे तक मरीजों को देखने का काम चला । काम निपटा कर वापिस राजबन की ओर चल पड़े । 

सरकारी जीप अपनी मंद गति से चली जा रही थी । टूटी-फूटी सड़क के गड्ढे उस जीप को बुरी तरह से झकझोर रहे थे । खड़खड़ाहट की आवाज इतनी तेज हो रही थी कि उसके आगे हॉर्न की आवाज भी बेमानी लग रही थी । ड्राइवर कर्म चंद इस सबका अभ्यस्त था । उस खटारा गाड़ी में रोज-रोज आने वाली दिक्कतों और खराबियों की आला अफसरों से शिकायत करने के अलावा वह कर भी क्या सकता था । वो शिकायतें जो हमेशा अनसुनी रह जातीं । मन मसोस कर वह खुद को दिलासा देता – एनी हाऊ . . . . काम चलाओ । लेकिन आज मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था । गाड़ी की चाल कुछ ज्यादा ही अजीब तरीके से हो रही थी । ड्राइवर की ओर देखा – वह अपने आप में ही मगन , दीनो-दुनिया से बेखबर । उसकी तरफ का दरवाजा लॉक खराब होने के कारण बार -बार खुल जाया करता था इसलिए तार से ही बांध कर जुगाड़ बना हुआ था । उस खतरनाक जुगाड़ को देख कर मेरे मन में आश्चर्य , खीझ और अनजाने डर की मिश्रित भावनाएं उठ रहीं थी । कई बार हालात इस तरह के बन जाते हैं कि मजबूरी में इंसान को अन्याय भी सहना पड़ जाता है । नौकरी और जिम्मेदारी से बड़ी लाचारी और मजबूरी शायद दूसरी कोई नहीं । जीप जिस रास्ते पर वापिस राजबन की ओर जा रही थी उस मोड़दार सड़क के एक तरफ़ पहाड़ थे और दूसरी ओर गहरी खाई , घाटी और बहती हुई गिरी नाम की नदी । अचानक पता नहीं क्या हुआ मैंने नोट किया– जीप अनियंत्रित होकर सड़क से उतर कर खाई की ओर के कच्चे कटाव पर दौड़ रही हैं । तुरंत ड्राइवर को सचेत भी किया पर कर्म चंद खामोश रहा । शायद वह उस खतरनाक हालात पर काबू करने में व्यस्त था । होनी को कुछ और ही मंजूर था - भरसक कोशिशों के बावजूद जीप पागल हाथी बन चुकी थी जिस पर महावत का कोई भी जोर नहीं चल पा रहा था । उन खतरनाक लम्हों में भी मेरे दिमाग में तब भी अडिग विश्वास था कि कुछ भी अनहोनी नहीं होगी – जो भी होगा सब ठीक ही होगा । इसके बाद कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिला – जीप पूरी तरह से बेकाबू होकर सड़क किनारे की कच्ची मिट्टी को काटते हुए गहरी खाई की ओर बढ़ चली थी । जीप अपना संतुलन खो चुकी थी और लगातार पलटियाँ खाते हुए गहरी खाई में नीचे – और नीचे लुढ़कती जा रही थी । हर पलटी के साथ मैं और ड्राइवर भी अंदर ही चक्कर खा रहे थे । गिरती हुई जीप की छत से सिर टकराया और मैं बेहोश । उसके बाद मुझे कुछ पता नहीं । मौके पर मौजूद चश्मदीदों के अनुसार खाई में गिरने तक जीप ने चार पलटियाँ मारी ।इस दौरान नीचे गिरते हुए जगह -जगह पेड़ों से भी टकराती रही और हर टक्कर पर जीप के परखचे हवा में उड़ते रहे । ऐसी ही किसी पेड़ की टक्कर के जबरदस्त धक्के ने मुझे बेहोशी की हालत में ही जीप के पिछले टूटे दरवाजे के रास्ते हवा में उड़ाते हुए पास की जमीन पर ला पटका । कितनी देर तक उस हालत में रही आज भी पता नहीं । भाग्य साथ दे रहा था – जहाँ मैं खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी वहाँ पर पास में ही पहाड़ी झरना बह रहा था । उससे छिटक कर आती पानी की बौछार ने मानों अमृत का काम किया । कुछ ही देर बाद मुझे होश या चुका था । शरीर असहनीय पीड़ा से छटपटा रहा था । शरीर कीचड़ और खून से लथपथ था । कर्म चंद को आवाज दी – पर जीप और उसका कुछ पता नहीं था । शायद वह नीचे खंदक की और गहराइयों में समा चुकी थी । सिर में लगी गहरी चोट की वजह से सोचने – समझने की शक्ति एक तरह से गायब हो चुकी थी । मेरे सिर में गहरे घाव की वजह से लगातार खून रिस-रिस कर चेहरे पर आ रहा था । पाँच जगह से हड्डियाँ टूट चुकी थी ।लेकिन मेरा अवचेतन मन ( subconscious mind) पूरी शक्ति से काम कर रहा था । वह अवचेतन मन जो बार बार मेरे कान में कह रहा था कि तुम्हें अभी और जीना है – तुम्हें किसी भी कीमत पर अपनी जान बचानी है । तुम्हारी मौत किसी भी हालत में इस जगह और इस वक्त नहीं लिखी है । गहरी खाई से ही ऊपर की ओर नजर दौड़ाई - देखा जहाँ से होकर सड़क गुजर रही थी । पता नहीं किस अदृश्य शक्ति ने शरीर में इतनी ताकत भर दी मैंने धीरे -धीरे डगमगाते कदमों से आगे ऊपर चढ़ना शुरू किया । सहारे के लिए पहाड़ पर उगी लंबी घास और पेड़-पौधों की टहनियों पर अपने घायल हाथों की पकड़ बनाते हुए ऊपर चढ़ती जा रही थी । जीवन की उत्कंठा ने शरीर के असहनीय दर्द को मानों गायब ही कर दिया था । जैसे -तैसे करके सड़क तक पहुंची । आती -जाती गाड़ियों को हाथ देकर रोकना चाहा पर मेरे खून और कीचड़ से सने घायल शरीर को देखकर कोई भी गाड़ी रुकने को तैयार नहीं थी । इसी बीच में वहाँ से गुजरते हुए एक ट्रक – ड्राइवर ने मुझे पहचान लिया । वह राजबन के पास के ही किसी इलाके का रहने वाला था । उसने तुरंत ट्रक रोका - उसी ट्रक से मैं राजबन के लिए चल पड़ी । ड्राइवर से पानी मांगा – अपने चेहरे को धोया जो शायद मुझे होश में रखने के लिए जरूरी भी था । राजबन की सीमा पर पहुंचते ही सबसे पहले ड्राइवर को फेक्टरी के मेन गेट पर ट्रक रोकने को कहा । वहीं पर सिक्योरिटी स्टाफ को मैंने उस दुर्घटना के बारे में सूचित किया और बताया कि कर्म चंद के बारे में तुरत पता किया जाए । ट्रक मुझे आगे कॉलोनी में घर पर छोड़ने ले चला । मुझे सहारा देकर नीचे उतार गया और घर पहुंची । वहाँ पहुंचते ही इस हादसे की खबर आग की तरह से फैल गई । दुर्घटना -स्थल पर आपातकालीन सहायता टीम दौड़ाई गई । पता चला कर्म चंद मेरे जितना भाग्यशाली नहीं रहा – उस दुर्घटना में उसके प्राण नहीं बच सके । ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे । 

 मेरा लंबा इलाज चला । मन की शक्ति ने तन की शक्ति वापिस लाने में पूरा साथ दिया । आज मैं उस ईश्वर पर पूरी आस्था रखते हुए उस हादसे की डरावनी यादों से पूरी तरह से मुक्त हूँ । डॉक्टर के रूप में जो भी सेवा इस समाज की कर सकती हूँ वह आज भी कर रही हूँ ।" 
आज : सुखी  सहगल परिवार 
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डॉक्टर शैल ने तो अपनी कहानी कह दी पर चलते -चलते उनकी इस आपबीती पर मैं अपना नज़रिया जरूर रखना चाहूँगा । जहाँ तक दिवंगत कर्म चंद ड्राइवर का प्रश्न है – वह भी बहुत ही भला और प्यारा इंसान था पर जीवन और मृत्यु उस विधाता के द्वारा ही निश्चित है । फिर भी आपके शुभ कर्म और लोगों से मिली शुभकामनाएं भी रक्षा कवच बन कर विपत्ति में साथ निभाती हैं । डॉक्टर शैल के साथ उनके मरीजों की दुआएं तो थी हीं , उसके अलावा उस 6 माह की छोटी बिटिया – वसुधा की मासूम पुकार भी थी जो उस संकट की घड़ी में सुरक्षा प्रदान कर रही थी । अब आप मानो या ना मानो – मैंने अपनी बात कह दी क्योंकि नजरिया अपना -अपना होता है । हैं ना ?
                                        🌺श्रद्धांजली 🌺


दिवंगत कर्म चंद 

Tuesday, 30 June 2020

गयी भैंस पानी में

बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है जब आपको एक किस्सा सुनाया था अपने एक मित्र – जगजीवन प्रसाद यादव उर्फ जे पी की गाँव से जुड़ी यादों का ।पुरानी यादें मीठी होती हैं , बचपन से जुड़ी हुई हों तब तो कहना ही क्या । बचपन, गाँव और गाँव की भैंसों से जुड़ा यह किस्सा भी बड़ा मजेदार है जिसे आज भी अपने जेपी जनाब बड़े चटखारे ले कर सुनाया करते हैं । गाँव की मिट्टी की सौंधी -सौंधी गंध से सराबोर उन यादों की खुशबू का आनंद शायद आज की नई पिज्जा – बर्गर की पीढ़ी के नसीब में नहीं । इसमें उनका भी दोष नहीं – बदलते वक्त के साथ इंसान तो क्या पूरी दुनिया ही बदलती चली जाती है । हाँ – तो मैं बात कर रहा था भैंस की ।अपने जेपी उर्फ बबुआ किसान परिवार से थे , बचपन पूरी तरह से गाँव में ही गुजरा जो कि उत्तर प्रदेश में फैजाबाद के निकट ही था । खेत, खलिहान और मवेशियों के बीच ही पले- बढ़े । बड़ा अचंभा होता है आज भी यह सोच कर कि एक नामी गिरामी पब्लिक सेक्टर की कॉर्पोरेट दुनिया का दिग्गज रह चुका यह शख्स गाँव की मिट्टी में पूरी तरह धूनी भी रमा चुका है ।


बचपन का रूप 

जे पी यादव ( साहबों की दुनिया में )
 मवेशियों को चरा कर लाने की भी इस छोटे से बबुआ की जिम्मेदारी होती थी जिसे यह बखूबी निभाते भी थे । उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ जब अपनी मवेशियों का रेवड़ लेकर अपने किशन -कन्हैया चल पड़े जंगल की ओर । गाँव की सरहद को छूती हुई सरयू नदी बहती थी । नदी के विशाल तटबंध के आसपास ही सब मवेशी चरते रहे थे । नदी में अक्सर पानी का बहाव और जल-स्तर कम ही रहता था तो उनकी टीम भी नदी के बीच में स्थित उथले टापुओं तक भी पहुँच जाया करती । बबुआ और उनकी मंडली पूरे टापू पर खूब धमा-चौकड़ी मचा रही थी और उधर मवेशी अपनी भोजन व्यवस्था और स्नान -ध्यान में व्यस्त थे ।
कुछ ऐसा ही नज़ारा  होता था 
अचानक बबुआ का ध्यान नदी की ओर गया तो देख कर होश उड़ गए । नदी में पानी का बहाव तेजी पकड़ रहा था । उस वक्त तक तैरना आता नहीं था और छोटे से बच्चे के लिए उस गहरे पानी को पार करना एक जबरदस्त जानलेवा चुनौती बन चुकी थी । करें तो करें क्या यही चिंता आफत बन कर दिमाग को खाए जा रही थी । मरता क्या ना करता – आखिर बबुआ के शैतानी दिमाग की बत्ती जल उठी । बड़े बूढ़ों से सुना करते थे कि मृत्यु के बाद इंसान को स्वर्ग जाने के लिए गाय की पूंछ पकड़ कर वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है। अब सामने गाय तो थी नहीं तो सोचा जब सवाल जीने -मरने का हो चुका है तो भैंस पर ही भरोसा किया जाए । फटाफट आव देखा ना ताव , सामने नदी पार कर रही भैंस की पूंछ ही पकड़ ली ओर चल निकले आगे । अब हाल यह कि आगे -आगे भैंस और पीछे -पीछे भैया । कुछ देर और दूर तक तो सब ठीक-ठाक रहा पर जब पानी की गहराई बढ़ चली तो भैंस रानी के नखरे भी बढ़ गए । शायद इंसानों की सोहबत में रहते हुए उसमे भी वक्त पर धोखा देने की कला कुछ हद तक आ गई थी । अब तक गुलबदन श्यामा सुंदरी पानी में जहाज़ की तरह तैरते हुए नदी पार कर रही थी और साथ ही उसकी पूंछ के सहारे लटके हुए छोटा भीम । उस भैंस ने बीच गहरी नदी में पानी के अंदर डुबकी लगा दी । अब वह जहाज़ रूपी भैंस पूरी तरह से पनडुब्बी बन चुकी थी और पूंछ- पकड़ छोटा भीम बन गया मुसीबत का मारा गोताखोर । अचानक आयी इस मुसीबत के लिए जेपी बबुआ कतई तैयार नहीं थे । गहरे पानी के अंदर सांस फूल रहा था, शरीर छटपटा रहा था लग रहा था शायद राम जी की तरह इसी सरयू में जल समाधि हो जाएगी । लग रहा था कि आज तो सही सलामत अपने घर पहुँचना भी नसीब में नहीं । ज़िंदगी और मौत के बीच सिर्फ भैंस , भैंस की पूंछ और भगवान का आसरा था । जब जान पर बन आती है तो इंसान ऐसे -ऐसे हैरतअंगेज़ कारनामे कर जाता है जिन्हें बाद में सोच कर उसे खुद अपने पर भी यकीन नहीं होता । यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ – बबुआ ने पानी के अंदर ही भैंस की पूँछ पर अपनी जोरदार पकड़ कायम रखते हुए मरोड़ना शुरू कर दिया। पनडुब्बी भैंस इस अचानक तारपीडो हमले के लिए तैयार नहीं थी । वह एक झटके के साथ पानी के ऊपर आ गई और उसके साथ ही अपना बबुआ । लेकिन इस बार यह बालक ज़रा ज्यादा ही फुर्तीला और चतुर निकला । अब वह दोबारा और जोखिम नहीं उठाना चाहता था । अपनी पूरी ताकत और ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर वह भैंस के सींग पकड़ कर पीठ पर मजबूती से सवार हो चुका था । जैसे -तैसे करके भैंस और उसका बहादुर सवार नदी पार कर किनारे आ लगे । उसके बाद दोनों ही खुश – बबुआ की जान बची और गुलबदन, श्यामा सुंदरी भैंस का पिंड छूटा पूँछ मरोड़ बबुआ से । अब आप ही बताइए - क्या इस खालिस देसी किस्से का  इससे अधिक सुखदायक अंत और भी हो सकता है ?

Tuesday, 9 June 2020

आम का बाग - गाँव की याद और जगजीवन प्रसाद यादव

अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है गर्मी अपने पूरे जोर पकड़ चुकी थी । ठंडे पानी के लिए फ्रिज का सहारा लेना शुरू किया । लेकिन बात कुछ बनी नहीं – गला पकड़ कर बैठ गया । एक दिन घर के बरामदे में बैठा हुआ था । सामने सड़क से एक कुम्हार अपने ठेले पर घड़े बेचता जा रहा था । खरीद लिया । अब जो उस घड़े का ठंडा-ठंडा , सोंधी सी महक लिए पानी पिया – लगा जैसे अपने बचपन के दिनों में वापिस चला गया । वे सब यादें जो बचपन और खास तौर पर मिट्टी की महक से जुड़ी होती हैं, उनकी बात ही कुछ और ही होती है । मेरे परिचित दोस्तों में भी उन मित्रों का अलग ही स्थान है जो दिखावट और आडंबर से कोसों दूर, सादगी की चादर लपेटे अपनी ही दुनिया में व्यस्त और मस्त हैं । अक्सर समय मिलता है तो ऐसे ही अपने पुराने साथियों और वरिष्ठ सहयोगियों से फोन पर बातचीत करता रहता हूँ । कुछ उनकी सुनता हूँ और कुछ अपने दिल का हाल सुनाता हूँ – बस इसी हाल और चाल के लेन -देन में दिन भी अच्छा-खासा गुजर जाता है, पुरानी खुशनुमा यादें ताज़ा हो जाती हैं और मैं भी तरोताजा हो जाता हूँ । मेरी नजर में दुनिया में खुशहाल और मस्त ज़िंदगी गुजारने का यह एक आजमाया हुआ नुस्खा है । कई बार बातचीत के दौरान ऐसे -ऐसे मनोरंजक किस्सों का आदान-प्रदान होता है जिनसे कभी आपको सीख मिलती है तो कभी आप अंदर तक हँसी  से सराबोर हो जाते हैं । आज एक ऐसे ही दिलचस्प व्यक्तित्व से आपको मिलवाता हूँ – नाम है श्री जगजीवन प्रसाद  यादव जिन्हे सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) में फाइनेंस डिपार्टमेंट के जाने -माने संकट -मोचक अधिकारी के रूप में आज भी याद किया जाता है । बड़ी से बड़ी कठिनाई के समय जब कंपनी के चेयरमेन भी परेशान हो जाते थे तब उन्हे भी बस एक ही दर्द निवारक दवा याद आती – जे. पी. यादव जिन्हें हम सब यादव जी के नाम से पुकारा करते हैं । सीसीआई में लंबी और शानदार नौकरी से रिटायरमेंट के बाद आजकल यादव जी नोएडा में परिवार के साथ स्वस्थ और मस्त जीवन बिता रहे हैं । 
श्री जगजीवन प्रसाद यादव 
आप मुझसे पूछ सकते हैं कि इन यादव साहब में ऐसी क्या खास बात है जिस वजह से उन्हें आज की कहानी का नायक चुना गया । दरअसल यादव जी की जड़े भी बहुत गहराइयों से गांवों से जुड़ी हैं जिसे वह पूरे गर्व से और बिना किसी झिझक के स्वीकार करते हैं । उत्तर प्रदेश में फैजाबाद के पास के ही एक गाँव के किसान परिवार से संबंध रखते हैं । बचपन का माहौल कुल मिलाकर ऐसा था कि बड़े-बूढ़े कहते कि अपना पूरा ध्यान शरीर को बलशाली बनाने में रखो । उसके बाद अगर हिम्मत और ताकत बचती है तो पढ़ाई के बारे में सोच सकते हो । नतीजा यही रहा कि हमारे बबुआ लग गए दंड पेलने , कुश्ती और अखाड़े के शौक में । इसके अलावा लट्ठ-बाजी का भी उन्होनें बाकायदा गाँव में ही गुरु – शिष्य परंपरा से प्रशिक्षण लिया । आज के दिन में भी अगर मैं गलत नहीं हूँ तो उनमें इतनी क्षमता है कि अकेले ही तीन-चार हमालवरों पर भारी पड़ सकते हैं । उनके सिवाय मुझे आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसकी दफ्तर में कलम पर जितनी महारत हो उतनी ही पकड़ लट्ठ पर भी हो । है ना मजेदार बात । इस सबके पीछे वजह केवल यही कि हमारे बबुआ पढ़ाई में भी बहुत ही तेज रहे लेकिन उसके लिए मेहनत भी बहुत की । गाँव से स्कूल आने - जाने के लिए रोज़ चौदह किलोमीटर का पैदल सफर करना पड़ता । 

कभी मूड में होते हैं तो अपने बचपन के गाँव के किस्सों और शरारतों को बड़े ही मजेदार ढंग से चटखारे ले-ले कर सुनाते हैं । एक बार रात को अपने दोस्त के साथ गाँव में आम के बाग में चुपचाप पहुँच गए चोरी -चोरी आम तोड़ने । अब भला आम की चोरी भी कोई चोरी होती है – लेकिन उसके लिए भी हिम्मत और कलेजा चाहिए । वजह - अगर चोरी पकड़ी गई तो माली भी छिताई करता और घर पर होती डबल कुटाई । उस वक्त कोई उस दलील को सुनने के लिए तैयार नहीं होता कि एक ही अपराध के लिए दो बार सज़ा नहीं दी जा सकती । अब ज़रा कल्पना कीजिए – घनघोर अंधेरी रात, बाग में दो शरारती बच्चे , सूखे पत्तों पर नंगे पाँव चलने से होती सन्नाटे को चीरती खड़खड़ाहट और इन सबसे ऊपर डर के मारे धड़कते दिल की धुकधुकी । माना उन दिनों अपने जे पी बाबू बच्चे थे , शक्ल से भोले और अकल के कच्चे थे पर इतना तो तब भी जानते थे कि डर के आगे जीत है और जीत के आगे मीठे मीठे आम हैं । उन मीठे आमों के मीठे सपनों में डूबे हुए होशियारी से छोटे-छोटे कदमों से बाग की जमीन नाप रहे थे । पेड़ पर चढ़ने की बजाय जमीन पर टपक कर गिरे आमों को उठाना इनके लिए हर तरह से सुरक्षित सौदा था । अचानक पैर में बबुआ को तीखा दर्द महसूस हुआ । लगा किसी ने काट खाया है । थोड़ा ध्यान से देखा तो होश उड़ गए - पता लगा कि खून निकल रहा है और पास से ही सरसराता हुआ सांप निकल कर जा रहा है । बस अब तो ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे – डर के आगे ना तो उन्हें जीत नजर आ रही थी और ना ही मीठे -मीठे आम । उस वक्त सिर्फ एक ही चीज़ नजर आ रही थी – जीती-जागती मौत । अपने दोस्त को बताया और दोनों ने ही घर की तरफ दौड़ लगा दी । अभी कुछ दूर ही पहुंचे होंगे कि चक्कर खा कर गिर पड़े । पैर धीरे-धीरे सुन्न होने लगा था । बालक बुद्धि थी पर फिर भी दूसरों के मुकाबले तेज़ थी । तुरंत ही अपनी कमीज उतार कर फाड़ कर पट्टियाँ बना डालीं और पाँव पर जगह जगह कस कर बांध लिया । चलना तो बस की बात नहीं थी सो दोस्त ने दोस्ती के फर्ज को निभाया और कंधे पर विक्रम-बेताल की तरह लाद कर गाँव के घर तक पहुँचा दिया । इस हालत में देख कर घर के सभी बुजुर्गों के होश उड़ गए । सारी हालत जानकर – पिटाई का कार्यक्रम तो हो गया स्थगित और इलाज के इंतजाम में सभी व्यस्त हो गए । झाड़ -फूक करने वाले ओझा को भी बुलाया गया । ओझा अपने ढंग से इलाज करना चाहता था – और जे पी बबुआ था कि अपने पाँव पर बंधी पट्टियों को खोलने को तैयार नहीं । बच्चे की जिद के आगे ओझा भी हार मान कर कान दबा कर चुपचाप निकल लिया । पूरी रात अंगीठी पर पाँव रख कर सिकाई करी गई और तब कहीं जा कर आराम मिला और जान बची । 
आम को सभी फलों का राजा कहते हैं । अगर मैं गलत नहीं हूँ तो आज भी यादव जी कभी रसीले आम खाने बैठते होंगें तब उन्हें यह खालिस गाँव का किस्सा जरूर याद आ जाता होगा ।

Tuesday, 19 May 2020

आफ़त का बंदर

कॉलेज के दिनों  की याद 
दुनिया में आफ़त तीन तरह की होती हैं – पहली वह जिसे आप खुद बाकायदा न्योता देकर बुलाते हैं कि आ बैल मुझे मार । ऐसी आफत का नमूना आपको अभी कुछ दिनों पहले आपको सुनाया था अपनी कहानी “खुराफ़ाती सफ़र” में । याद आया कुछ – अरे वही किस्सा जिसमें रेल के इंजिन के आगे बैठ कर खतरनाक जानलेवा सफ़र किया था । चलिए वह किस्सा तो हो गया रांत गई – बात गई । अब बात करते हैँ दूसरी तरह की आफ़त की जो कोरोना की तरह बिन बुलाए मेहमान की तरह आपके दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती है । बल्कि एक तरह से कहा जाए तो सिर्फ दरवाजे पर खड़ी ही नहीं होती वह आपके सर पर ऐसे सवार हो जाती है कि जान छुड़ाना मुश्किल हो जाता है । लेकिन जो तीसरी तरह की आफत होती है उस कमबख्त का आपको पता ही नहीं चलता कि यह बिन बुलाए आई या इसके आगमन में आपकी भी कोई कारगुज़ारी या करतूत छिपी है ।आज एक ऐसी ही आफ़त का मजेदार किस्सा आपको सुनाता हूँ । 
कॉलेज का मेन गेट 
बात बहुत पुरानी है – आज से लगभग अड़तालीस साल पुरानी – फिर भी इस शैतानी खोपड़ी के यादों के पिटारे में बिल्कुल तरोताज़ा । उन दिनों में इन्टर जिसे आप बारहवी (12) भी कह सकते हैं , का छात्र था । कॉलेज था – सेठ मुकुंद लाल इंटर कॉलेज , गाजियाबाद जो कि उन दिनों अच्छे कॉलेजों में माना जाता था । अच्छे से मेरा मतलब है वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थी पढ़ाकू किस्म के होते थे जिनका पंगेबाजी, ऊधम और बदमाशी से दूर-दूर तक का कोई नाता नहीं होता था । इसके ठीक विपरीत – कुछ ही दूरी पर एक दूसरा कॉलेज भी था – (महानंद मिशन हरिजन कॉलेज) जिसे आम भाषा में एम. एम. एच. कॉलेज के नाम से जाना जाता था । आप दुनिया भर की सारी खुराफ़तें जोड़ लीजिए – उन्हे किसी सन्दूक में बंद कर किसी कॉलेज में छोड़ दीजिए – उसके बाद उस कॉलेज का जो स्वरूप होगा – वह उन दिनों का एम. एम. एच. कॉलेज ही होगा । वहाँ के छात्र बड़े गर्व से बाकायदा कमीज के कॉलर खड़े करके अपने कॉलेज के नाम का रूपांतरण महा मक्कार हरामी कॉलेज बताते । साल में ज्यादातर समय छात्रों की हड़ताल के कारण उनका कॉलेज बंद रहता था और इधर हमारे कॉलेज में गधों की तरह पिदाई होती रहती । कई बार हमें उस ऊधमी कॉलेज के मस्त-मलंग छात्रों के भाग्य से बड़ी ईर्षा भी होती । घर क्योंकि शाहदरा में था इसलिए गाजियाबाद आना-जाना दैनिक यात्री के रूप में ट्रेन से ही होता था । दूसरे ऊधमी कॉलेज के छात्र भी उस सफर के साथी होते और उनसे भी अच्छी -खासी दोस्ती हो गई थी । एक बार ऐसे ही किसी मौके पर मैंने उस कॉलेज के रेल-मित्र के सामने अपने दिल का गुबार निकाल दिया । ऊधमी दोस्त सुनकर बोला कुछ नहीं बस मुस्करा दिया और बात आयी -गयी हो गई । 

कुछ दिनों के बाद की ही बात है – कॉलेज की क्लास में पूरे जोर-शोर से पढ़ाई चल रही थी । हम सबका ध्यान सामने ब्लेकबोर्ड और मास्टर जी पर था । अचानक बाहर से हल्ला-गुल्ल और शोर-शराबे की आवाजें आने लगीं । यह शोर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था – अब इस शोर में नारे-बाजी की आवाजें भी साफ़ तौर पर सुनाई देने लगी थीं । जब तक हम कुछ ठीक से समझ पाते तब तक हमारी क्लास के आगे एक भारी -भरकम भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी । यह भीड़ उसी ऊधमी कॉलेज के हड़ताली छात्रों की थी जो गला फाड़ आवाज में छात्र एकता के नारे लगा रहे थे । उस भीड़ के नेता ने मास्टर जी और सारे पढ़ाकू बच्चों को क्लास में ही आकर धमका दिया “ निकलो बाहर फिर देखते हैं तुम्हें । हम हड़ताल पर हैं और तुम सब यहाँ किताबी कीड़े बन रहे हो । ” इसके बाद तो पूछो मत क्लास में क्या गदर मचा – जिसके जिधर सींग समाए उधर ही पूँछ दबा कर भागता नजर आया । मैं भी सरपट भागा पर गलत दिशा में । कहते हैं ना जब गीदड़ की मौत आती है तो शहर की तरफ भागता है – लेकिन मैं भागा कॉलेज की छत की ओर जहाँ हमारी बायोलॉजी की प्रयोगशाला थी । सीढ़ियों पर रॉकेट की गति से दौड़ता जा रहा था । छत पर बनी उस प्रयोगशाला भवन की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि मुख्यद्वार में घुसने से पहले एक पिंजड़ें जैसा कमरा था । ठीक वैसा ही जैसा आप चिड़ियाघर में देखते हैं जिसमें बंदर उछल-कूद मचाते हैं । उस विशाल पिंजड़े-नुमा कमरे की तीन तरफ की दीवारें लंबी-लंबी सलाखों से बनी हुईं थी । वहीं पर दो-तीन मेज भी रखी हुई थीं । दरअसल उस कॉलेज की स्थापना वर्ष 1955 में ,सेठ मुकुंद लाल द्वारा दान की गई जमीन और हवेली पर हुई थी । इसीलिए उस कॉलेज बिल्डिंग का कुछ हिस्सा पुरानी हवेलीनुमा डिज़ाइन का एहसास कराता था । अब मेरी हालत उस बंदर जैसी हुई पड़ी थी जिसकी दुम में किसी ने आग लगादी हो । नीचे खड़ी ऊधमी कॉलेज की रावण सेना से जान कैसे बचे यही सोच -सोच कर कलेजा मुँह को आ रहा था । ज्यादा सोचने का व्यक्त था नहीं – सीधे उस पिंजड़े की ओर दौड़ा – अंदर जा कर देखा तो प्रयोगशाला भवन का दरवाजे पर ताला लटका हुआ था । अंदर जा नहीं सकता था और नीचे ग्यारह मुल्कों की पुलिस डॉन को गिरफतार करने के इंतजार में खड़ी थीं । अभी सोच ही रहा था कि इतने में खाली बोतल पास ही छत पर आकर फूटी । नीचे खड़ी भीड़ में से किसी ने फैंक के मारी थी पर निशाना चूक गया था । मैं घबरा कर तुरंत पास की बड़ी सी मेज के नीचे दुबक कर छिप गया । पर यह क्या – वहाँ तो पहले से ही एक ओर शरणार्थी दुबका माथे से पसीना पूछ रहा था । ध्यान से देखा तो पहचाना – यह तो मेरे बायलॉजी के ही मास्टर जी थे जो मेरी तरह ही अपनी जान बचाने के लिए भाग कर ऊपर आए तो थे पर चाभी लेब असिस्टेंट के पास होने की वजह से बीच में ही फँस गए । अब मैं और मेरे श्रद्धेय गुरु जी – दोनों ही उस मुसीबत के क्षण में एक ही नाव में सवार थे । अब नीचे से कोल्ड ड्रिंक और सोडा वाटर की बोतलों की जैसे मिसाइल – बरसात शुरू हो चुकी थी । हमारे कॉलेज के सामने हापुड़ रोड़ से गुजरने वाले एक कोल्ड ड्रिंक ले जा रहे ट्रक को उपद्रवी छात्रों ने लूट लिया था । उन बोतलों को ही अब वे दुष्ट हथगोलों की तरह से कॉलेज में यहाँ -वहाँ फेंक रहे थे । उन्हीं में से कुछ बोतलें हमारे हिस्से में आ रहीं थी । उड़ती हुई बोतलें आकर सीधे उस लोहे के पिंजड़े से टकरातीं – विस्फोट की आवाज होती – कोकाकोला की बरसात होती और साथ ही साथ टूटी बोतल के काँच के टुकड़े हवा में उड़ते यहाँ वहाँ बिखरते नजर आते । एक बार तो लगा कि वे सब मैंढ़क जिन पर मैंने इसी प्रयोगशाला में चीर-फाड़ की , शायद उन्हीं की आत्मा के श्राप का यह सब नतीजा है । कुछ देर तक बोतलों के हथगोले बरसते रहे – और इस भीषण युद्ध में घिरा हुआ मैं खुद को किसी खंदक में छुपे फौजी की तरह महसूस कर रहा था । उन फूटती हुई बोतलों से हवा में उड़ती काँच की किरचियाँ बंदूक की गोलियों की तरह दनदना कर बरस रही थी । वो तो भगवान भले करे उन मेजों का, जिनके नीचे हमने आसरा लिया हुआ था , वह हमारे लिए किसी फौजी बंकर से कम नहीं थी । क्या खतरनाक नजारा था – आज भी याद करता हूँ तो शरीर में सिहरन दौड़ जाती है । कुछ देर बाद बोतल वर्षा बंद हुई । गुरु जी को प्रणाम कर दबे पाँव वापिस सीढ़ियों से नीचे उतर कर आया । आस-पास देखा , ऊधमी वानर सेना अभी भी मौजूद थी । नजर बचा कर मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा बन गया । यहाँ तक तो गनीमत थी पर सभी मेरे कॉलेज और उसके प्रिंसिपल के खिलाफ़ हाय -हाय और मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे । मुझे कोई पहचान ना ले , इस डर से मैं भी उस नारेबाजी में जोर-शोर से शामिल हो गया । अब दूसरी तरफ दिल में धुकधुकी भी थी कि मेरे किसी मास्टर जी ने मुझे जिन्दाबाद – मुर्दाबाद करते देखा तो अगले ही दिन और कुछ हो या ना हो – पर जिंदा मुर्गा जरूर बना दिया जाऊंगा । बस यह समझ लीजिए – इधर कुआं और उधर खाई – जैसी हालत थी । अपने ही कॉलेज की हाय-हाय करता हुआ मैं उस भीड़ में पीछे खिसकता जा रहा था और जैसे ही किनारे पर पहुँचा सर पर पाँव रख कर बाहर भाग खड़ा हुआ । सीधे स्टेशन पहुँचा – गाड़ी पकड़ी और घर पहुँच कर ही दम लिया । 
नज़ारा  कुछ -कुछ ऐसा ही था 
असली पिक्चर तो अभी बाकी है दोस्त । उस दिन के बाद से कॉलेज में बायलॉजी के मास्टर जी मुझ पर खास मेहरबान रहने लगे । अरे वही गुरुजी जो मेरे साथ उस दिन मेज के नीचे छिपे बैठे थे । मुझे प्रेक्टिकल परीक्षा में दिल खोल कर नंबर देने में उनका विशेष योगदान था । उनकी वीरता के किस्से को खामोशी से अपने तक ही सीमित रखने का शायद यह ईनाम / रिश्वत थी । 

एक दिन उस उत्पाती कॉलेज का वही रेल-मित्र भी मिल गया जिसके आगे कभी मैंने अपने कॉलेज की कमरतोड़ पढ़ाई का जिक्र किया था । उसने मुस्करा कर आँख मारते हुए कहा – “अब तो तुम्हें कोई शिकायत नहीं । हड़ताल का बंदर आखिर तुम्हारे पढ़ाकू कॉलेज में हमने एक बारगी तो पहुंचा ही दिया । अब आगे तुम्हारी मर्जी –चाहे तो पालो या उसे भगा दो ।” 

आज तक अक्सर अपनी खोपड़ी खुजा – खुजा कर सोचता रहता हूँ – उस बोतल फोड़ आफ़त को क्या मैंने खुद न्योता दे कर बुलाया था ?

Saturday, 9 May 2020

खुराफ़ाती सफ़र

आम इंसान की फितरत में ही कुछ ऐसी बात है कि अपने को किसी भी तुर्रमखां से कम नहीं समझता । कुछ तो ऐसे होते हैं कि अपनी शेखी बघारने के चक्कर में इतनी लंबी -लंबी छोड़ेंगे कि आप चक्कर खाकर धाराशाही हो जाएंगे । हमारी देसी भाषा में इस तरह के सत्पुरुषों को शेखचिल्ली कहा जाता है । कभी आप इनकी संगत में थोड़े समय के लिए भी बैठ जाइए – यह खुद अपनी झूठी प्रशंसा इस सीमा तक करेंगे कि आपको अपने आप से शर्म आने लगेगी कि काश हम भी इतने काबिल हो पाते । अपनी नौकरी के दौरान मैंने पाया कि जितना बड़ा अफसर – उतना ही बड़ा गपोड़िया । अब अफसर के नीचे काम करने वाला वह बेचारा अदना सा मातहत – बेचारे की क्या औकात कि साहब को उनके गप्प-पुराण के बीच में टोक दे । भैया अगर साहब से दस तरह के फ़ायदे लेने हैं तो उनकी जी-हुजूरी तो करनी ही पड़ेगी । चलिए छोड़िए इन सब शेखचिल्लियों की गाथा को , मेरा तो मानना है कि इंसान को अपनी उपलब्धियों से ज्यादा अपनी गलतियों पर ध्यान देना चाहिए । अपनी किसी भी ऊटपटाँग कारगुजारी को केवल याद ही नहीं रखना चाहिए वरन दूसरों को जब भी मौका मिले बताना भी चाहिए कि हमने तो ऐसी नालायकी करदी पर तुम मत करना । बरसों पुराना एक ऐसे किस्से को आज आपको सुना रहा हूँ जिसे आज तक मैंने सबसे छुपा कर रखा । वजह – जबरदस्त कान-खिचाई और डाट-डपट के डर से माँ -बाप तक को बताने की हिम्मत ही नहीं पड़ी । पिता जी आज इस दुनिया में हैं नहीं और माँ खुद इतनी बुजुर्ग हैं कि आज मेरी उस कारगुजारी को सुन कर गुस्सा तो जरूर होगी पर अपने इस सफेद बालों वाले रिटायर्ड बालक की पिटाई तो हरगिज नहीं करेगी । 

बात यह तब की है जब मैं बारहवीं कक्षा का छात्र था – वर्ष 1972 । घर दिल्ली-शाहदरा में था और कॉलेज – सेठ मुकुंद लाल इंटर कॉलेज, गाजियाबाद में । रोज़ का आना-जाना ट्रेन से ही हुआ करता था ।




 समय पर कॉलेज जाना और समय पर वापिस घर लौटना यही दिनचर्या थी । मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह से उन दिनों भी भीड़-भड़क्का काफ़ी होता था पर मजबूरीवश उस धक्का-मुक्की का आदी हो चुका था । उस दिन जब घर वापिस जाने के लिए कॉलेज से स्टेशन पहुँचा तो भीड़ पूरे उफ़ान पर थी । दरअसल अगले दिन ही होली का त्योहार था इसलिए भी स्टेशन पर कुंभ के मेले का नज़ारा दिख रहा था । प्लेटफ़ार्म पर पैर रखने की भी जगह नहीं थी । दम साध कर ट्रेन के आने का इंतजार कर रहा था । साथ में एक अन्य दोस्त भी था जो मेरी ही क्लास में पढ़ता था और साथ में शाहदरा से ही आता था । थोड़ी देर बाद ही ट्रेन भी आ गई – लेकिन उस ट्रेन की भीड़ को देखकर मेरे छक्के छूट गए । 1947 में भारत -पाकिस्तान के विभाजन के समय पाकिस्तान से आने वाली रेलगाड़ियों में भेड़ -बकरियों की तरह शरणार्थी लोगों का हुजूम खचाखच ठुसा रहता था । ऐसा ही मुझे इस शाहदरा जाने वाली ट्रेन को देख कर लग रहा था । जितने यात्री डिब्बे के अंदर थे उससे कहीं अधिक छत पर सवार थे ।


समस्या गहन थी कि घर वापिस कैसे पहुंचेंगे । घर वाले क्योंकि ट्रेन का मासिक पास बनवा कर दे देते थे इसलिए जेब में अलग से कोई खर्चा -पानी भी नहीं होता था । अब सवाल करो या मरो का आ पड़ा था । । प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ी के एक छोर से दूसरे छोर तक चक्कर लगा डाला पर अंदर घुसने का कहीं कोई जुगाड़ नहीं लग पाया । अब ट्रेन के छूटने का टाइम हो चुका था, सिग्नल डाउन था – लाइन क्लियर थी और गार्ड साहब ने सीटी बजा कर हरी झंडी दिखानी शुरू करदी थी । अचानक पता नहीं दिमाग में क्या आया – अपने दोस्त का हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए इंजिन की अगाडी बने चबूतरे पर चुपके से सवार हो गया । ड्राइवर का ध्यान उस समय पीछे गार्ड की हरी झंडी देखने में केंद्रित था इस लिए वह हमारी हरकत को नहीं देख पाया । इंजिन ने जबरदस्त कानफोडू अंदाज में सीटी मारी और जबरदस्त हिचकोले खाता चल पड़ा । यह उन दिनों की बात है जब अधिकतर गाड़ियां काले -कलूटे भाप के इंजिन से चला करती थीं । उन कोयले पानी से चलाने वाली रेल गाड़ियों को आज तक छुक -छुक गाड़ी के नाम से भी याद किया जाता है । 


जब उस इंजिन पर चुपके से सवार हुए थे तब दिल मे एक तरह की खुशी थी जैसे किला फतह कर लिया हो । पर यह खुशी ज्यादा देर तक बरकरार नहीं रह पायी । धीरे-धीरे इंजिन रफ्तार पकड़ता जा रहा था । गाड़ी की रफ्तार के हिसाब से ही दिल की धड़कनें और साँसे बढ़ती जा रहीं थी । रही सही कसर कमबख्त इंजिन की सीटी पूरी कर देती थी । रह - रह कर जब भी ठीक सिर के ऊपर बजती, लगता कान के परदे फट जाएंगे , कलेजा मुंह को आ रहा था । हम दोनों ही दोस्त पालथी मार कर कस कर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बैठे हुए थे । इंजिन पूरी तूफ़ानी रफ्तार पर आ चुका था । कमर तोड़ भयानक हिचकोले खतरनाक ढंग से शरीर को हिला रहे थे । कभी लगता था जैसे शरीर में मिर्गी का दौरा पड़ रहा हो – और कभी लगता रेगिस्तान में किसी दौड़ते हुए ऊंट की सवारी कर रहे हैं । सामने से आती आती तेज हवा में आँखे खोल कर रखना मुश्किल हो रहा था । कमर के पीछे इंजिन की धधकती कोयला भट्टी की गर्मी से इतनी तेज हवा के झोंकों के बीच भी शरीर पसीने से नहा रहा था । सामने से आती धूल भरी गरम आंधी नुमा तेज हवा, इंजिन का काला धुआँ , यहाँ -वहाँ बिखरी कोयले और राख की कालिख ने हमारा ऊपर से लेकर नीचे तक ऐसा काला -कलूटा मेकअप कर दिया था कि कोई भी ब्लेक केट कमांडो समझने की भूल कर सकता था । डर के मारे एक तरह से घिग्गी बंध गई थी । किताब – कापियाँ तेज हवा और झटकों की वजह से हाथ से छूट – छूट कर इधर उधर फिल्मी गाना गाते हुए भाग रहीं थी – मुझे रोको ना कोई मैं चली , मैं चली । उन किताब कापियों को संभालता था तो उस तेज रफ्तार में खुद का संतुलन बिगड़ने लगता था । लगता जैसे साक्षात ईश्वर प्रश्न कर रहे हों – “ वत्स तुझे ज्ञान प्यारा है या प्राण”? बार -बार अपने सभी देवी – देवताओं से मनौती मना रहा था – बस इस बार सही सलामत घर के दर्शन करवा दो प्रभु – इसके बाद कभी ऐसा पंगा हरगिज नहीं लूँगा । शाहदरा स्टेशन – जहाँ मुझे उतरना था , वह भी अब पास ही आ रहा था । हम दोनों दोस्त ही अब थोड़े निश्चिंत हो चले थे और सोच रहे थे कि ईश्वर ने हमारी प्रार्थना सुन ली है । पर नहीं रे नहीं – अभी तो उस ऊपर वाले ने अभी इस किस्से का क्लाइमेक्स भी दिखाना था । तो हुआ कुछ यूँ , कि रेल की पटरी के साथ -साथ कुछ शरारती स्कूल के बच्चों का झुंड गुजर रहा था । उन्होंने जब इस तेज रफ्तार इंजिन के आगे बैठे हम अजूबों को दूर से ही देखा तो उन्होंने आव देखा न ताव – हो – हो की आवाजें कर मचाने लगे शोर । इतने पर भी गनीमत थी – उन दुष्टों ने पास पड़े पत्थर उठा लिए और हो गए शुरू – दे दनादन । अब आप खुद सोचिए – तेज रफ्तार दौड़ते इंजिन पर बैठे किसी इंसान को अगर एक छोटा सा भी पत्थर लग जाए तो कपाल क्रिया की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी । कुछ हमारे पुण्य कर्म रहे होंगे और कुछ उस ऊपर वाले की मेहरबानी , उस पत्थर -वर्षा से हम सकुशल बच गए । हाँ , हमारी मौजूदगी से अनजान, उस इंजिन के ड्राइवर उन पत्थर बरसाते शरारती बच्चों के बर्ताव पर जरूर अचंभा कर रहे होंगे। 

खैर , जैसे -तैसे कर अपनी मंजिल के स्टेशन पर पहुँचे । जितनी चालाकी और चोरी से सबकी आँख बचा कर उस इंजिन रूपी शेर पर सवार हुए थे उतनी ही चतुराई से चुपचाप उतर गए । सिर्फ उतरे ही नहीं – कान दबा कर सिर पर पाँव रख कर भाग खड़े हुए । सीधे घर पहुँच कर ही दम लिया । माँ ने देखते ही आश्चर्य से सवाल किया- “यह क्या हुलिया बनाया हुआ है ? क्या हुआ ? ज़रा शीशे में अपनी शक्ल देखो । ” जब सचमुच शीशे में अपनी शक्ल देखी तो सामने शोले फिल्म का काला -भुजंग साक्षात कालिया नजर रहा था । उलझे हुए चीकट बाल, चेहरे पर कोयले की कालिख, कपड़ों पर धूल, ग्रीस और कालिख से बने दुनिया के सभी देशों के नक्शे । माँ के सवाल का लड़खड़ाती जुबान से यही जवाब निकला : “कोयले के ढेर पर फिसल कर गिर गया था । ” भगवान का शुक्र है उसके बाद आगे सवाल -जवाब नहीं हुए । 

चलते -चलते सबको एक सलाह – जो बेवकूफी मैंने की , आप मत करिएगा । भगवान हर इंसान पर हर वक्त मेहरबान नहीं होता ।

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...