Sunday, 16 August 2020

जिन खोजा तीन पाइया

यह जो नीली छतरी वाला है – बहुत ही अव्वल दर्जे का कहानीकार है । दुनिया के हर बंदे के जीवन और भाग्य - कहानी का ताना-बाना इस चतुराई से बुनता है कि उस गोरखधंधे को अच्छे -अच्छे नहीं समझ पाते । इस सबका नतीजा कई बार वही होता है जैसा मेरी कहानी – “कौन है वह" के बाद पाठकों से मिली कुछ प्रतिक्रियाओं से पता लगा । ( अगर उस कहानी को अभी तक आपने नहीं पढ़ा तो उसे एक बार पढ़िएगा जरूर ) उस किस्से में एक ऐसे अनजान, अनदेखे शख्स का जिक्र था जो अंधेरी बियाबान रातों में, जब सारी दुनिया नींद के गहरे आगोश में सो रही होती है –अपनी बड़ी सी गाड़ी में सड़कों पर घूमता रहता । कड़कती सर्दी, घनघोर बरसात , भीषण गर्मी – कुछ भी हो उसकी राह और उद्देश्य में रुकावट नहीं बन पाती है । हर रात उसका एक खास मकसद होता है – सड़क किनारे बैठे बेसहारा कुत्तों ,  और पशु-पक्षियों के लिए खाना , दाना -पानी का शानदार इंतजाम करना । 
कुछ ऐसी ही प्रतीक्षा होती है रात के देवदूत की 
उसके इस नेक कार्यकलाप को मैं पिछले एक साल से महसूस कर रहा हूँ पर कभी उस बंदे को देखा नहीं क्योंकि वह तो ठहरा रातों का देवदूत । अब ज़िंदगी की असलियत को तो मैं बदल नहीं सकता । किस्सा पढ़ने के बाद मेरे दोस्त , मेरे सुधि पाठक सब मेरा कान पकड़ रहे हैं उस कहानी के लिए क्योंकि उस किस्से का नायक ही अदृश्य और गुमनाम है । सब का सिर्फ एक ही सवाल – वह कौन है , इसका जवाब भी चाहिए । झूठ मैं लिख नहीं सकता और उम्र के  इस दौर में जासूसी का काम मेरे बस का नहीं । पर जब आपने सवाल किया है तो खोजबीन और जवाब देने की जिम्मेदारी भी तो मेरी ही है । बस यह समझ लीजिए कि पता नहीं कितने पापड़ बेलने पड़े इस काम में । पूरी – पूरी रात जागा – कान सड़क पर हर आती -जाती गाड़ी की आवाज पर । एक रात साढ़े तीन बजे खटका होने पर तीर की तरह बाहर की ओर भागा । सामने वही काली गाड़ी और यह लीजिए वह शख्स भी जिसके बारे में जानने के लिए सभी उत्सुक । इसी को तो कहते हैं : जिन खोजा तिन पाइया । 

वह सज्जन- एक उम्रदराज सरदार जी , बड़ी तसल्ली से सड़क किनारे बेसब्री से इंतजार कर रहे कुत्तों की टोली को बिस्किट्स की दावत कराने में व्यस्त थे । सरसरी निगाह से उनकी बड़ी सी काले रंग की  एस.यू.वी गाड़ी की डिक्की में नजर दौड़ाई जो खाने पीने के सामान से ठसाठस भरी हुई थी । मैंने सरदार जी को अभिवादन कर अपना परिचय दिया । थोड़ी बहुत इधर -उधर की बातें हुईं । अपने मन में उमड़ रहे ढेर सारे सवालों के जवाब भी जानना चाह रहा था । दिक्कत यही थी कि उन्हें अभी और भी आगे जाना था, बातें करने का समय भी नहीं था और सही वक्त भी नहीं था । उन्होनें मेरा फोन नंबर लिया और चलते – चलते यह वायदा किया कि जल्द ही मेरे से मिलने आएंगे और तब जी भर कर बातें भी करेंगे । मेरे देखते -देखते उनकी गाड़ी रात के अंधेरे में गुम हो गई । 
देवदूत  की रसद गाड़ी 
इसी बीच दो दिन निकल गए । दोपहर का वक्त था – यही कोई तीन बज रहे होंगे - कॉल बेल बजी । झाँक कर देखा बाहर वही सरदार जी खड़े थे । गोरा -चिट्टा रंग, मजबूत कद – काठी, चलने – फिरने का अंदाज  देखकर यकीन नहीं हुआ कि यह इंसान 78 वर्ष की उम्र का है । चेहरे पर गोल्डन फ्रेम का चश्मा, हाथ में बेशकीमती घड़ी, ब्रांडेड - सलीकेदार कपड़े उनकी शख्सियत को और भी प्रभावशाली और गरिमामय बना रहे थे । नेक काम करने का प्रभाव ही कुछ ऐसा होता है कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व में एक अनोखा ही तेज आ जाता है । ऐसा ही कुछ उस रातों के देवदूत को देख कर भी लगा । कोरोना संक्रमण के समय में हर आदमी नए अनजान शख्स से मिलने से डरता है – पर वह तो ठहरा देवदूत, दिल ने कहा – उससे डर कैसा । उनसे घर पर बैठ कर तसल्ली और आत्मीयता से बातचीत हुई । 

सबसे पहले उन्होनें बहुत ही विनम्रता से अपनी पहचान उजागर नहीं करने का अनुरोध किया । इसीलिए उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए अब मैं उन्हें एक काल्पनिक नाम से ही संबोधित करूँगा – ‘सिंह साहब’ । उनका मानना है कि जिस दिन इंसान प्रसिद्धी के घोड़े पर सवार हो जाता है उसमें घमंड आने की पूरी संभावना होती है । उन्हें गुमनामी के अंधेरे में रह कर ही सेवा करने में आत्म संतोष मिलता है । लोग बेशक तरह-तरह की बातें बनाते रहें पर रात में जीव – जगत की सेवा पर निकलने के पीछे यही कारण है । इस प्रकार से कुत्ते -बिल्लियों से जन्मजात दुश्मनी रखने वाले कुछ लोगों की फ़िजूल टोका- टाकी से भी बच जाते हैं । यद्यपि मेरे घर के आस-पास उन्होंने विगत एक साल से ही आना शुरू किया है पर यह सेवा वह पिछले दस वर्षों से करते आ रहे हैं । अपने स्वभाव की विनम्रता के अनुसार के ही अनुकूल सिंह साहब कहते हैं वह जो भी कर रहे हैं उसमें उनका निजी स्वार्थ है । यह स्वार्थ है सेवा के बाद मिलने वाले संतोष का ।अपने जीवन में मिली सफलताओं और आज  ज़िंदगी के जिस मुकाम पर वह  खड़े हैं व वहाँ तक पहुँचने में शायद इन बेजुबान प्राणियों की दुआएं ही काम कर रही हैं । इस सेवा के कारण इंसान की मदद करने में वह कई बार धोखा खा चुके हैं क्योंकि मदद के हकदार सच्चे इंसान को पहचानने के मामले में कई बार भूल भी हो जाती है । नतीजा यही होता है कि कपटी और चालबाज लोग गलत फायदा उठाने में सफल हो जाते हैं और सिंह साहब के पास बाद में पछताने के सिवाय कोई चारा नहीं रहता । इसीलिए वह कहते हैं कि पशु -जगत की सेवा में कम से कम खुद के ठगे जाने का खतरा तो नहीं होता । जितनी भारी -भरकम खाने की रसद की खरीद सिंह साहब करते हैं उसे देख कर तो यही महसूस होता है कि उनका नाम दरियादिल सिंह होना चाहिए । 

अब अचंभे की बात सुनिए । ज़िंदगी में जितने उतार -चढ़ाव सिंह साहब ने देखे हैं वह भी किसी फिल्मी कहानी की तरह कुछ कम दिलचस्प नहीं है । पुरखों का किसी जमाने में धन- दौलत से भरपूर , सम्पन्न परिवार था। आजादी के बाद भारत – पाक विभाजन के कारण सब कुछ छोड़ कर शरणार्थी बन कर हिंदुस्तान में कदम रखना पड़ा । लेकिन उस समय के बालक सिंह साहब के पिता जी का इतना रुतबा तो था ही कि वहाँ से हवाई जहाज से आए थे और उनका पहला ठिकाना अंबाला रहा । गर्दिश के दिनों ने दस्तक देनी शुरू कर दी । जमा -पूंजी की नैया भी धीरे -धीरे डूबने लगी और जल्द ही ऐसे हालात बन गए कि 12 साल के उस बच्चे को पटियाला की सड़कों पर दही- भल्ले बेचने की भी नौबत आ गयी । लेकिन उस बच्चे में भी गजब की हिम्मत थी । हर छोटे-बड़े काम में हाथ आजमाता रहा । कभी स्कूल के बस्ते बेचे तो कभी बनाए, और तो और ऑटो रिक्शा तक चलाया । किसी भी काम को छोटा नहीं समझा – मेहनत करने में कोई कोताही नहीं की । उम्र के साथ -साथ तजुर्बा भी बढ़ता गया । छोटी – मोटी मशीनों से शुरुआत की, काम धीरे -धीरे बढ़ाना शुरू किया । अब उस नीली छतरी वाले भगवान की भी इस नेकदिल और मेहनती इंसान पर नजर पड़ी और उसके बाद तो सिंह साहब ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा । इनकी नोएडा-सूरजपुर में लंबी – चौड़ी फेक्टरी हैं जिसमें 450 लोगों को रोजगार मिलता है ।अपने भरे -पूरे परिवार के साथ सिंह साहब नोएडा के पॉश इलाके में वैभवशाली कोठी में सुख शांति का जीवन व्यतीत कर रहे हैं । जीवन के भौतिक सुख के साथ -साथ आत्मिक शांति से परिपूर्ण जीवन बिरलों को ही नसीब होता है – सिंह साहब भी उन्हीं में से एक हैं । अब तो आप भी मुझ से सहमत होंगे कि नेक नीयती से की गए निस्वार्थ सेवा कार्य कभी बेकार नहीं जाते । 

और हाँ चलते -चलते – जिस इंसान को हम संदेह और शक की निगाह से देख रहे थे उसकी असलियत जानकार क्या हमें आत्म- निरीक्षण की जरूरत नहीं है ?        

Tuesday, 11 August 2020

कौन है वह ????


मैं आपको कोई डरावनी कहानी नहीं सुना रहा । पर यह सच है कि रात के सन्नाटे में साढ़े तीन बजे अक्सर मेरी नींद उचट जाती है । बाहर सड़क पर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आती है । कुछ ही मिनिट रुकने के बाद उस गाड़ी के इंजिन की धीर-धीरे मंद होती आवाज बताती है कि वह गाड़ी फिर कहीं आगे की ओर चली गई है । उस खामोशी में कुत्तों के लगातार भौंकने की आवाज पूरे वातावरण को और अधिक रहस्यमयी , भूतहा और कुछ हद तक डरावना बना देती है । यह लगभग रोज का ही किस्सा है । उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ । समय वही था जाना – पहचाना रात के साढ़े तीन बजे का । वही बाहर गाड़ी रुकने की आवाज – कुत्तों के भौकने का शोरगुल और मैं अपनी उचटती नींद में दिमाग में उठ रहे कई सवालों की पहेली को सुलझाने की कोशिश में उलझा हुआ – आखिर यह सब माजरा है क्या ? सोचा आज तो हिम्मत जुटा कर इस रहस्य पर से परदा उठाने की कोशिश करनी ही चाहिए । कमरे की बत्ती जलाई ,मेन गेट की चाभी लेकर बाहर निकला । ताला खोला – सामने बड़ा अजीब नजारा था । मेरे घर के बाहर बने रेंप पर कुत्तों का भरा - पूरा जमावड़ा लगा हुआ था । जमावड़ा भी क्या – आप यह भी कह सकते हैं कि उनकी महासभा चल रही थी । इस कुत्ता-महासभा के आयोजन का कारण जल्द ही समझ भी आ गया । घर के बाहर सड़क किनारे कुत्तों के खाने के स्वादिष्ट बिस्किट्स बिखरे पड़े थे । उन्हीं बिस्किट्स की पार्टी का मज़ा लेने के लिए कुत्तों के झुंड में लूट-खसोट मची हुई थी । यहाँ तक तो सब ठीक था पर यह समझ नहीं आया कि आखिर इतने महंगे बिस्किट्स आखिर कहाँ से आ गए – कौन डाल गया ? बाहर सड़क पर ही दूर तक नजर दौड़ाई – अपने सवाल का कुछ हद तक जवाब मिल गया । कुछ ही दूरी पर अंधेरे में सड़क पर खड़ी एक बड़ी सी काले रंग की (एस यू वी ) कार की टेल -लाइट की लाल रोशनी चमक रही थी । उस गाड़ी का शीशा खुला और अंदर से ही ढेर सारे बिस्किट्स की बौछार पास के चबूतरे पर हुई । आसपास के कुत्ते दौड़ कर उस जगह पहुंचे और अपनी पार्टी शुरू कर दी । इतनी देर में वह गाड़ी आगे चल दी और उसकी टेल लाइट की लाल रोशनी को धीरे - धीरे मानों अंधेरे ने निगल लिया । उस गाड़ी में कौन बैठा है मैं नहीं देख पाया । 

अगले दिन इस बारे में मैंने आस-पड़ोस के कई लोगों से बात की – जानकारी चाही । सारी कहानी धीरे-धीरे साफ़ होने लगी । इस बारे में पक्के -तौर पर कोई भी सटीक और विश्वसनीय जानकारी नहीं दे पाया । सबने केवल सुनी-सुनाई बात का ही अलग-अलग तरीकों से बखान किया । उस गाड़ी में कौन होता है – यह किसी ने नहीं देखा । इतना सभी को पता था कि वह गाड़ी पिछले एक वर्ष से लगातार आ रही है । वह गाड़ी कहीं दूर से आती है । रास्ते में जिधर भी कुत्तों की पलटन नजर आती है – उसी जगह पर बिस्किट्स की भरपूर बौछार करती जाती है । सर्दी , गरमी, बरसात – किसी भी मौसम की कोई भी रुकावट उस रहस्यमयी गाड़ी को रोक नहीं सका । 

मैंने उस इंसान को कभी नहीं देखा । लोग उसके बारे में तरह-तरह के अनुमान लगाते हैं । रात के साढ़े तीन बजे के अजीबोगरीब समय में बिस्किट्स खिलाने के पीछे उसकी मंशा पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं । यह दुनिया और पुलिस का दस्तूर है – जब तक सबूत न मिले तब तक हर इंसान संदेह के घेरे में होता है । कुछ लोगों की नज़रों में वह शातिर चोर है तो कुछ उसे आतंकवादी समझ रहे हैं जो किसी बड़ी घटना को अंजाम देने से पहले इलाके के कुत्तों से दोस्ती गांठ रहा है । जहाँ तक मेरा सवाल है – तो मुझे भी लगता है सड़क पर घूमते आवारा, निरीह , भूखे-प्यासे कुत्तों की शानदार – जॉयकेदार पार्टी का रोज़ इंतजाम करने वाला शख्स निश्चित रूप से कोई असामाजिक तत्व ही हो सकता है । जब समाज के अधिकांश तथाकथित दयावान सदस्यों के सेवा-भाव पर निजी स्वार्थ का चश्मा चढ़ा हो तो इन बेसहारा, दर -दर भटकते और पानी की दो बूंदों के लिए भी तरसते मासूम कुत्तों का भला सोचने वाला इंसान उस कठोर समाज का हिस्सा नहीं हो सकता । नेक इंसान को सिरफिरा , पागल और असामाजिक समझने की भूल करना हमारी आदत में शुमार हो चुका है ।

Saturday, 1 August 2020

फटफटिया झूला

सिनेमा के शौकीन पुरानी पीढ़ी के लोगों को शायद याद हो - एक जमाने में राज कपूर साहब की फिल्म आई थी – मेरा नाम जोकर । फिल्म तो खास चली नहीं पर प्रख्यात कवि और गीतकार नीरज जी का एक गाना जरूर चला – 
ऐ भाई ज़रा देखा कर चलो , आगे ही नहीं पीछे भी ,
दाएं ही नहीं बाएं भी , ऊपर ही नहीं नीचे भी ।
नीरज जी तो आज इस दुनिया में नहीं हैं पर उनका यह यादगार गीत अभी भी रेडियो पर कभी - कभार सुनने को मिल जाता है । मैं जब भी इस गीत को सुनता हूँ तो इस गीत के साथ जुड़ी यादें भी ताज़ा हो जाती हैं । यादें उस दौरान की जब मैं अपनी बुलेट फटफटिया को फर्राटे से सड़कों पर दौड़ाते हुए इस गीत को गुनगुनाया करता था । आज का किस्सा उसी बुलेट फटफटिया और इस गीत से जुड़ा है । 

ज़माना वर्ष 1994 के आस-पास का था ।  उन दिनों मेरी पोस्टिंग हिमाचल प्रदेश के पाँवटा साहिब के निकट स्थित राजबन नाम की जगह में सीमेंट फैक्ट्री में थी । मार्केटिंग विभाग में होने के कारण समय -समय पर आस-पास की जगहों पर सरकारी दौरे पर भी जाता रहता था । उम्र का तकाजा और कुछ जवानी का जोश - ऐसे अवसरों पर सार्वजनिक यातायात के साधनों के बजाय अधिकतर अपनी भारी -भरकम बुलेट मोटर साइकिल का ही प्रयोग करता था । दफ्तर का काम भी हो जाता था और फटफटिया पर मस्ती -भरा सैर -सपाटा भी – और वह भी सरकारी खर्चे पर । ऐसे ही किसी मौके पर पास की एक जगह विकास नगर जाने का कार्यक्रम बना जो कि लगभग 20 किलोमीटर दूर थी । हिमाचल प्रदेश का मौसम तो हमेशा ही सुहावना रहता है – उस दिन भी कुछ ऐसा ही था । सुबह का वक्त था ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी और ऐसे ही सुहावने मौसम में फटफटिया धकधक की आवाज करती सरपट दौड़ती चली जा रही थी । अब उसे मेरे अकल का फेर कहिए या कुछ और , मुझे उस आवाज़ में भी मानो : माधुरी दीक्षित की फिल्म का गाना सुनाई देरहा था – “धक-धक करने लगा , ओ मेरा जियरा डरने लगा ।“ पर मुझे डर काहे का जब - सड़क बिल्कुल साफ थी और भीड़-भाड़ का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था । मेरी मंजिल अब नजदीक ही थी । सड़क के दोनों और हरे-भरे खेत और आम के पेड़ों की भरमार थी । आम के पकने का मौसम आ चुका था और पेड़ों पर लगे पके आमों की महक उस दौड़ती मोटर साइकिल पर भी एक अलग ही किस्म का मदहोश करने वाला अनुभव करा रही थी । अचानक एक झटका सा लगा और महसूस हुआ कि सड़क से ऊपर उठ कर मोटर साइकिल ने रनवे पर दौड़ते हुए हवाई जहाज की तरह उड़ान लेनी शुरू कर दी । मेरी मोटर साइकिल सड़क से पंद्रह फीट की ऊंचाई तक पहुँच गई और उसके बाद वापिस उलटी दिशा में आकर सड़क पर ही बहुत धीमे से झटके से उतर भी गई । मेरा संतुलन बिगड़ चुका था और मैं भी मोटर साइकिल के साथ सड़क पर लमलेट हो चुका था । अब तक आसपास के खेतों में काम कर रहे लोग तुरंत मेरी सहायता के लिए आ गए । सहारा देकर मुझे खड़ा किया – भाग्यवश कोई गंभीर चोट मुझे नहीं आई थी । दायें हाथ की कलाई में मामूली सी खरोंच भर लगी जो बाद में पता चला छोटा सा फ्रेकचर था । यह सब इतना पलक झपकते हुआ कि इस कांड को मैं तुरंत समझ नहीं पाया । बाद में जब इधर-उधर नजर दौड़ाई तो सारा मामला साफ़ हुआ । 

दरसल जैसा मैंने पहले बताया जिस सड़क से मैं गुजर रहा था वह यातायात के हिसाब से बिल्कुल साफ थी – मेरे आगे -पीछे आधा किलोमीटर तक तक कोई नहीं था । पर उस सड़क के किनारे लगे पेड़ों पर कुछ लोग चढ़ कर आम तोड़ रहे थे । उन्होंने रस्सी का फंदा बनाया हुआ था जिससे ऊपर की टहनियों पर लगे आम झटका देकर नीचे गिरा रहे थे । वह रस्से का फंदा उनके हाथों से फिसल कर नीचे सड़क तक झूले की तरह लटक आया । अचानक नीचे से गुजर रही मेरी मोटर साइकिल उस झूले की चपेट में आकर बुरी तरह से उलझ गई । झूले के आकार का वह रस्सी का फंदा सीधे मेरी गरदन पर उलझने वाला ही था पर उससे पहले ही मोटर साइकिल के हेंडल पर दोनों ओर लगे मजबूत रियर व्यू मिरर में अटक गया । दौड़ती मोटर साइकिल की रफ्तार ने अचानक पेड़ से लटकते रस्सी के झूले में उलझ कर वहाँ सर्कस का खतरनाक करतब दिखा दिया । बिना सावन के ही मेरी फटफटिया अपने सवार समेत पेंडुलम की तरह हवाई झूले का भरपूर मज़ा ले गई । एक और अचंभे की बात यह कि रस्सी का एक अन्य सिरा मोटर साइकिल के तेजी से घूमते हुए पहिए में उलझ कर उसे हवा में ही पूरी तरह से जाम कर चुका था । इस कारण जब मेरा हवाई घोड़ा वापिस जमीन पर अवतरित हुआ तो बहुत ही शांत भाव से – बिना इसी प्रकार की खतरनाक उछल-कूद मचाए । 
बाद में जब ठंडे दिमाग से सोचा तो महसूस हुआ कि बहुत बड़ी विपत्ति थी जो बगल से निकल गई । शायद कुछ अच्छे कर्मों का और कुछ दोस्तों की शुभकामनाओं और बड़े -बूढ़ों के आशीर्वाद का प्रताप रहा होगा । रस्सी का फंदा उस वक्त मेरी गरदन तोड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार था - पर मेरी किस्मत में आपको यह किस्सा सुनाना बाकी जो था । इस किस्से का सार यही है कि कई बार मुसीबत आपको ऐसे कोने में आकर घेर लेती है जहाँ बिल्कुल उम्मीद नहीं होती । सड़क पर आप जा रहे हैं – मौसम साफ है - आगे कोई नहीं – पीछे कोई नहीं – अब आप सपने में भी नहीं सोच सकते कि आपकी ऐसी-तेसी करने के लिए मुसीबत आसमान के रास्ते उतर आएगी । नीरज जी ने तभी ठीक ही लिखा – ऐ भाई ज़रा देख के चलो – नीचे ही नहीं – ऊपर भी । 
इस किस्से का सबसे दुखद पहलू मेरे लिए यही रहा कि पूज्य पिताश्री का आदेश हुआ – “ तुम्हारी बुलेट फटफटिया मनहूस है । तुम्हारी जान जाते-जाते बची है । इसे घर में मत रखो – तुरंत बेच डालो । दुपहिए से नाता तोड़ो , कार से रिश्ता जोड़ों ।” मैं उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता हूँ जिनके लिए बुजुर्गों की इच्छा और आदेश सर्वोपरि होता है अतः आज्ञा का पूरा पालन हुआ । जान से प्यारी बुलेट फटफटिया को भारी मन से अपने घर ही नहीं अपनी ज़िंदगी से भी निकाल दिया । अब तो बस कभी -कभार अपने बेटे की बुलेट पर दिखावटी सवार होकर शौकिया फ़ोटो खिंचवा लेता हूँ । इस तरह पिताश्री की इच्छा का सम्मान भी हो जाता है और मेरे दिल के अधूरे अरमान भी कुछ हद तक पूरे हो जाते हैं।

Monday, 27 July 2020

संगीत - शौक - सेवा : दिलीप कुमार राव

मेरे दिवंगत पूज्य पिता श्री रमेश कौशिक बहुत ही विद्वान और प्रख्यात कवि थे । उनसे अक्सर बड़े ज्ञान की नसीहतें सुनने को मिला करती थीं । मैं भी उन्हें गांठ बांध लेता । आज भी उन्हें याद करता हूँ तो जीवन के किसी न किसी मोड़ पर सहारा मिल जाता है । वह कहा करते थे अगर तनाव मुक्त जिंदगी गुजारनी है तो इंसान कम से कम ऐसा एक अच्छा शौक जरूर पाले जिसका उसके काम-धंधे से दूर-दूर तक कोई संबंध ना हो । बागवानी, खेलकूद , सैर सपाटा , फोटोग्राफी , पढ़ना -लिखना , खाना पकाना , समाज सेवा जैसे अनगिनत शौक हैं जिनमें मैंने अपने बहुत से दोस्तों को व्यस्त और मस्त देखा है । जिनका कोई शौक नहीं है उसका नौकरी का समय तो जैसे-तैसे रो-धो कर कट जाता है पर रिटायरमेंट के बाद बुढ़ापे में उनकी हालत भूतपूर्व मंत्री जैसी हो जाती है जिसकी ना तो मूंछ बाकी है और ना ही पूंछ ।
दिलीप कुमार राव : किसी हीरो से कम नहीं 
मेरे एक करीबी दोस्त हैं – दिलीप कुमार राव । फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार की तरह वह भी मुंबई में ही रहते हैं । बड़ा शानदार और प्रभावशाली व्यक्तित्व है उनका । हो सकता है उनके नामकरण के पीछे भी फिल्मी दिलीप साहब का ही प्रभाव रहा हो । उनके प्रशंसकों और दोस्तों की बहुत लंबी लिस्ट है जिनमें मैं भी शामिल हूँ । किसी जमाने में उसी कंपनी – सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया – में काम करते थे जिसमें मैं भी लंबे अरसे तक रहा । बहुत ही मिलनसार हैं – जिसे हम चलती भाषा में कहते हैं – यारों के यार । उन्हें कभी फोन कीजिए तो वर्ष 1956 के मशहूर फिल्मी गाने की मस्त कॉलर ट्यून सुनाई पड़ेगी – ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ , ज़रा हटके -ज़रा बचके – ये है बॉम्बे मेरे जाँ । सुनकर हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है कि आज से 64 साल पहले भी बॉम्बे के ये हालात थे और आज के दिन भी कोरोना के मारे मुंबई का वही रोना है । हाँ तो मैं बात कर रहा था अपने मित्र दिलीप की । वैसे वह बंदा है गुणा -भाग वाला यानी फाइनेंस डिपार्टमेंट में काम करने वाला । इस लाइन में काम करने वालों को दुनिया अक्सर एक अलग ही नजर से देखती है – बहुत ही रूखे -सूखे , तेज-तर्रार जिन्हे हर छोटी बड़ी चीज़ को नफ़े – नुकसान की तराजू में तोलने की आदत होती है । लेकिन यह दुनिया तो उस भगवान की बनायी हुई है जिसने पाँचों उंगलियों को भी एक समान नहीं बनाया । सबसे हट कर अनोखे लोग हर जगह होते हैं और दिलीप भी उन्हीं में से एक हैं । संगीत का शौक उन्हें जुनून की हद तक है । बहुत तरह के साज़ बड़ी ही निपुणता से बजा लेते हैं जैसे – ढोलक, कीबोर्ड, हारमोनियम , माउथ ऑर्गन । जितनी गंभीरता से नौकरी कर रहे हैं उतनी ही जिम्मेदारी से समय निकाल लेते हैं जगह -जगह होने वाले संगीत कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए।
संगीत -साथियों की टोली 
 हुनर तब और रंग लाता है अगर उसे दुनियादारी से दूर रखा जाए । असली कलाकार एक अलग ही दुनिया के वासी होते हैं और दिलीप भी उसी श्रेणी में हैं । फिल्मी दुनिया के बहुत से प्रसिद्ध कलाकारों में उठना -बैठना है पर खुद किसी भी तरह के दिखावे से बहुत दूर । 
परिचय की जरूरत नहीं : फ़ोटो खुद बोलता है 
दिलीप की मुझे जो सबसे अच्छी बात लगी – जिसने यह छोटी सी कहानी लिखने को मजबूर किया – वह है उनका संगीत के प्रति निस्वार्थ प्रेम । इतनी काबलियत होते हुए भी दिलीप ने संगीत को कमाई का जरिया नहीं बनाया । जगह -जगह जा कर अपने इस हुनर और शौक का इस्तेमाल करता है लोगों का मनोरंजन करने में । केवल जन-साधारण ही नहीं वह अस्पतालों में तकलीफें झेल रहे मरीजों का मन बहलाते हैं , उनके चेहरे पर मुस्कराहट लाते हैं । आप एक बारगी नीचे दी गई तीन मिनिट की वीडिओ क्लिप पूरी देख जाइए । मेरी तरह आपके चेहरे पर होगा एक सुकून, होंठों पर मुस्कराहट और दिल में एक प्यारे से गीत की याद : 
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार , किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार , जीना इसी का नाम है । 




इस दुनिया को तुम से बहुत कुछ सीखना बाकी है दिलीप ।


Monday, 20 July 2020

दास्ताने टिंकू

बड़ा प्यारा से नाम है टिंकू । सुनते ही दिलो दिमाग में किसी खूबसूरत से शरारती बच्चे की तस्वीर कौंध जाती है । मुझे तो इस नाम से खास ही लगाव है । बारह - तेरह वर्ष की उम्र रही होगी मेरी जब घर पर एक शाम पिता जी प्यारा सा भूरे रंग का पिल्ला ले कर आए । जहाँ तक मुझे याद पड़ता है उसका नामकरण – टिंकू हम तीन सदस्यीय भाई-बहन की टीम द्वारा सर्व सम्मति से ही हुआ होगा । मेरे ज़िंदगी का वह पहला जीता जागता खिलौना आज भी मुझे अक्सर याद आता है । इतिहास के मुगल वंश के शासकों के नाम बेशक मुझे कभी याद ना हो सके लेकिन अपने घर पर समय -समय पर पाले गए पिल्लों के नाम मैं एक ही सांस में उंगलियों पर गिना सकता हूँ – टिंकू – बंटी – शिमलू – टिंकू ( द्वितीय) – केरी – टैडी - चंपू । स्कूल के मास्टर जी अक्सर कहा करते थे कि याद वही चीज रहती है जिसे आप दिल से प्यार करते हैं – अब चाहे वह किताब का पाठ हो या कोई इंसान । ज़ाहिर सी बात है कि मुगलिया सल्तनत के इन बादशाहों में मेरी कोई रुचि नहीं रही , इसीलिए कितने ही रट्टे मारने के बाद आज भी दिमाग से सफाचट है कि कौन किसका बाप था और कौन बेटा । 
टिंकू का इकलौता फ़ोटो - माँ के साथ 

हाँ तो मैं बात कर रहा था टिंकू की – जिसका हमारे घर में पदार्पण इसलिए नहीं हुआ कि उस जमाने में उसे हम बच्चों की ख्वाहिश पूरी करने के लिए लाया गया हो – या हमारे माँ-बाप का शौक हो । हमारा मध्यम वर्ग का बहुत ही साधारण सा ऐसा परिवार था जहाँ कुत्ता -बिल्ली पालने की बच्चों की मनुहार को यह कह कर दरकिनार कर दिया जाता है कि पहले तुम तो पल जाओ । हम लोग उन दिनों दिल्ली शाहदरा – मानसरोवर पार्क में रहा करते थे । भीड़-भाड़ से दूर सुनसान इलाके में बस्ती थी । पिता दफ्तर और माँ स्कूल के लिए सुबह ही निकल जाते । पहली शिफ्ट के स्कूल में पढ़ा कर जब तक दोपहर को माँ वापिस घर आती उससे पहले ही हम अपने स्कूल के लिए रवाना हो जाते । कुल मिलाकर चोरी-चपाटी के डर से घर को सुरक्षा की जरूरत थी और उसके लिए हमारी हैसियत और बजट कुत्ते पर ही आकर रुक जाता था । टिंकू क्योंकि एक साधारण देसी पिल्ला था इसलिए मेरी समझ से वह चाहे जहाँ से भी आया हो , पर आया मुफ़्त में ही । इंसान की सोच यहीं आकर चक्कर खा जाती है जब कहा जाता है कि पैसा बोलता है । अरे भाई – जरूरी नहीं कि हर अच्छी चीज के लिए आपको अंटी ढीली करनी पड़े । कई बार आपको कचरे के ढ़ेर में भी खजाना मिल जाता है । हमारे टिंकू का मामला भी कुछ ऐसा ही था । 

स्वभाव से बड़ा ही सीधा -सरल प्राणी था टिंकू । सभी से मिलजुल कर प्यार से रहता । इस मामले में कुछ ज्यादा ही मस्त -मौला था । हालत यह कि कोई अजनबी भी घर आता तो बड़े प्यार से पूँछ हिलाते हुए गले मिलने वाला भव्य स्वागत करता । कभी सड़क पर भी जा रहा होता तो वही नजारा पेश हो जाता – जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए । गरीब घर के बच्चे ज्यादातर सभी प्रकार के उद्दंड व्यवहार से दूर बहुत ही अनुशासित और संकोचशील जीवन जीते हैं । टिंकू भी कुछ - कुछ ऐसा ही था । उसकी बस एक ही मनपसंद शरारत होती । गरमी के दिनों में हम सब खुले आँगन में कतार में खाट बिछा कर सोया करते । सुबह सूरज निकलने के बाद देर तक सोने वाले हम बच्चों की खटिया पर ही चढ़ कर वह मुँह के ऊपर से चादर खींच कर अपनी ही भाषा में जय राम जी की कर देता । इस हरकत में उसे परोक्ष रूप से हमारे माता -पिता का ऐसे ही समर्थन मिलता जैसा पाकिस्तान को चीन का – इसलिए उसमें हेकड़ी और हिम्मत दोनों ही आ जातीं । 

उसका एक शौक और भी था – घर में आने वाले मेहमानों की चप्पलों से उसे खास ही प्यार था । इधर मौका लगा और उधर चप्पल ऐसे गायब जैसे बैंक से कर्जा लेकर विजय माल्या । बहुत खोजबीन के बाद जूते -चप्पल मिल तो जाते पर इतनी क्षत -विक्षत और घायल अवस्था में कि पहचान करना ही मुश्किल हो जाता । उन दिनों टिंकू के दांत निकल रहे थे सो दांतों में हो रही खुजली और कसक मिटाने के लिए वह कभी कुर्सियों के पाए कुतर डालता तो कभी अच्छी-खासी ऊंची एड़ी की सैंडिल को नोच-नोच कर हवाई चप्पल में बदल देता । नतीजा यही होता कि इस तरह की करतूतों के लिए उसकी चपत-परेड और कान-खिचाई भी होती । पर उसे भी अपनी इज्जत बहुत प्यारी थी इसीलिए ऐसे मौके पर होने वाली ज़लालत से बचने के लिए वह अक्सर पहले ही बिन लादेन की तरह भाग कर हमारी पहुँच से दूर किसी दुर्गम जगह जैसे तख्त या सोफ़े के नीचे शरण ले लेता । कठिन परिस्थितियों में आत्म-रक्षा के लिए भूमिगत होने का पहला पाठ मुझे टिंकू से ही सीखने को मिला । 

हमारे मकान में काफी खाली जगह भी थी जिसमें पेड़ -पौधे और सब्जियां उगाते रहते थे । वह खाली जगह टिंकू का खेल का मैदान भी था । कई बार टिंकू को उस बगिया से हमने गाजर – मूली उखाड़ कर खाते हुए रंगे हाथों भी पकड़ा । वह उसके मस्ती के दिन थे । 

घर में खुले में रखे खाने -पीने के सामान पर वह कभी मुँह नहीं मारता था । समझदार इतना कि सारे घर में घूमता -फिरता बस रसोई घर को छोड़ कर । रसोई में केवल तभी अंदर घुसता जब गलती से दूध उबल कर नीचे फर्श पर बहने लगता । अपने अनुभव से वह इतना जानता था कि उस जमीन पर बहने वाले दूध पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार था जिसे लेने के लिए उसे किसी पासपोर्ट या अनुमति की आवश्यकता नहीं थी । 

घर में सभी की आँखों का तारा था । मेरी नानी खुर्जा में रहा करती थीं । जब भी हमारे पास मिलने आतीं तो टिंकू के हिस्से के लड्डू अलग से लातीं । उन लड्डुओं को बड़े प्यार से अपने हाथ से उसे सहलाते हुए खिलाती जाती और कहतीं – “खा टिंकू खा । तू मेरे बच्चों की रक्षा करता है ।“ उनकी बात सच भी थी क्योंकि रात के समय घर की चौकीदारी टिंकू पूरी मुस्तैदी से निभाता । 

टिंकू का पालन पोषण भी कुछ हद तक गोकुल की गैया की तरह ही होता था । समय -समय पर उसे घर से बाहर घूमने-फिरने के लिए छोड़ देते । वह आस-पास चहल कदमी कर कुछ देर बाद अपने आप ही घर वापिस लौट आता । एक दिन तो कमाल ही हो गया – वह गया तो ऐसा गया कि देर शाम तक वापिस नहीं आया । चिंता हुई – सारी कॉलोनी छान मारी पर टिंकू नहीं मिला । थक -हार कर घर पर सभी उदास होकर बैठ गए । उस रात परिवार में कोई ढंग से खाना भी नहीं खा पाया । गर्मियों के दिन थे – हमेशा की तरह सभी आँगन में खात बिछा कर सो रहे थे । देर रात अचानक दरवाजे पर आहट हुई । दरवाजा खोला तो सामने टिंकू बैठा था । देखते ही उसने सीधे घर के अंदर दौड़ लगा दी और कूँ -कूँ करते हुए सभी के पाँव से चिपट गया । वह बहुत घबराया हुआ था – उसके गले में एक टूटी हुई रस्सी बंधी हुई थी । उसे कोई अपने साथ जबरदस्ती ले गया था पर मौका देख कर वह उस रस्सी को तुड़ा कर भाग निकला । 

इस कहानी को ब्लॉग पर  पोस्ट करने के बाद एक टिंकू के बारे में एक ऐसा कमेन्ट आया जिसे मैं मूल रूप में उद्धृत  कर रहा हूँ ।  ब्लॉग लेखन के दौरान मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ है जब  प्रकाशन के बाद भी उसमें कहानी में ही  पाठक प्रतिक्रिया / संदेश को समाहित किया हो । यह संदेश था इस कहानी के ही एक पात्र - मेरी छोटी बहन पारुल  का जिसने लिखा :   
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"दास्ताने टिंकू पढ़ते हुए यादों के गलियारों में घूम रही थी ।बचपन की बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं ।जब हम तीनों भाई-बहन नींद से जूझते हुए परीक्षा की तैयारी कर रहे होते थे, टिंकू कमरे के बीचों बीच आराम से फैल कर सो रहा होता था । उस समय हमें उससे बहुत ईर्ष्या होती थी । कम से कम मैं तो उस समय यही सोचती थी --अगले जनम मोहे-------।"
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समय पर किसी का ज़ोर नहीं चलता । मैं बचपन से किशोरावस्था में जा रहा था और टिंकू अपने बुढ़ापे की ओर । बुजुर्ग ठीक ही कहते हैं – बुढ़ापा खुद अपने आप में एक लाइलाज बीमारी है । टिंकू को भी धीरे -धीरे बीमारियों ने जकड़ना शुरू कर दिया । वह आज से पचास बरस पहले सत्तर के दशक का वह ज़माना था जब पशु तो दूर , इंसानों के इलाज की व्यवस्था भी आज जितनी उन्नत और सुलभ नहीं थी । ले -देकर घर से चार किलोमीटर दूर एक सरकारी पशु डिस्पेंसरी थी । टिंकू को भी कभी पैदल तो कभी अपनी गोद में बिठा कर रिक्शे में लेजाता । वह बेचारा धीरे -धीरे कमजोर होता जा रहा था । चलने फिरने में उसे दिक्कत होती, खुराक कम हो गई। शरारत तो क्या कर पाता बस घर के एक कोने में पड़ा बस सोता रहता । अब उसे बेहोशी के दौरे भी पड़ने लगे थे । उसको ऐसी हालत में तड़पते हुए देखना भी मेरे लिए अपने आप में बहुत बड़ी सज़ा थी । उसे शायद दमा या ऐसी ही कोई फेफड़ों की बीमारी हो चुकी थी जिसके लिए डिस्पेंसरी का डाक्टर भी हाथ खड़े कर चुका था । 

उस दिन तब दोपहर के बारह बजे थे । दरवाजे की घंटी बजी – बाहर जो व्यक्ति खड़ा था उसके आने के बारे में पिता जी दफ्तर जाने से पहले मुझे पहले ही बता चुके थे । वह उनके दिल्ली परिवहन निगम के दफ्तर का मेडीकल ऑफीसर था । मुझसे उसने टिंकू के बारे में पूछा और देखने की इच्छा ज़ाहिर की । टिंकू हमेशा की तरह घर में अपने पसंदीदा जगह - तख्त के नीचे बेसुध होकर सो रहा था । मैंने उसे जगाया और घर के पीछे के बरामदे में ले गया जहाँ डॉक्टर उसका इंतजार कर रहा था । डॉक्टर ने अपने बैग से इंजेक्शन निकाला और टिंकू को लगा दिया । इंजेक्शन लगते ही टिंकू बहुत जोर से झटके से छटपटाया , तड़पा और धीरे -धीरे शांत हो गया । डॉक्टर ने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला – “बच्चे ! इसकी बीमारी का कोई इलाज नहीं था । समय के साथ इसकी तकलीफें बढ़नी ही थी । इसको आराम दिलाने का बस यही एक रास्ता था ।“ डॉक्टर की बातें मेरी बाल -बुद्धि की समझ से बाहर थीं । मैं तो सिर्फ अपनी डबडबाई आँखों में आँसू रोकने की कोशिश करते हुए चिरनिद्रा में सोए अपने उस खिलौने को देख रहा था जो कुछ समय पहले तक बूढ़ा, लाचार और बीमार ही सही पर था तो जीता जागता । 

मुझे पता नहीं उसके बाद कब वह डॉक्टर वापिस गया – कब माँ स्कूल से आयीं । माँ को उस बारे में शायद पहले से ही पता था । वह कमरे में उस तख्त पर बैठीं हुई थी जिसके नीचे सुबह टिंकू आराम कर रहा था । उन्होनें अपनी धीमी आवाज में सिर्फ इतना ही पूछा – वह कहाँ है ? मैं माँ को उस जगह ले गया – माँ ने निश्चल पड़े टिंकू को एक नजर देखा । जब सहन नहीं हुआ तो उस को एक बड़ी सी चादर से ढक कर वापिस कमरे में उसी तख्त पर आकर धम से बैठ गयीं और दोनों हाथों से अपना चेहरा ढाँप लिया । मेरी माँ यूं तो मजबूत दिल वाली है पर उसे सुबकते हुए मैंने तभी देखा था । घर के पास की ही एक खाली जगह पर टिंकू को प्यार और सम्मान के साथ गहरा गड्ढा खोद कर अंतिम संस्कार कर दिया । बूढ़े टिंकू की दर्द और रोग से सदा के लिए मुक्ति का तरीका और औचित्य आज पचास साल बाद भी मुझे परेशान कर देता है – आँखों में आँसू ला देता है । 

टिंकू ने अपनी शरारतों और प्यार से जो हम सबके दिलों में जगह बनायी वह कभी खाली नहीं हो सकती । यद्यपि इतने प्यारे दोस्त की हमेशा के लिए विदाई दिल को चीर कर रख देती है पर उससे मिलने वाला निश्चल स्नेह  उसके  जाने के बाद भी आपको उनकी दुनिया से जोड़े रखता है । यही कारण है टिंकू ही समय समय पर अलग – अलग नाम से मेरे पास आता रहा –शिमलू , टिंकू ( द्वितीय) , केरी , टैडी  , चंपू सब में उसी का ही तो रूप है । उनके साथ खेलते समय मैं फिर से वही छोटा बच्चा बनता रहा हूँ  – टिंकू का नन्हा दोस्त । इस सब के बावज़ूद दिल के किसी अंजान कोने में आज भी एक दबी हुई ख्वाहिश है - काश फिर कभी देर रात दरवाजे पर आहट हो और सामने टूटी रस्सी गले में बांधे टिंकू बैठा मिले ।

Monday, 13 July 2020

मासूम पुकार

आज की आपको जो किस्सा सुनाने जा रहा हूँ वह उसी कहानी का एक तरह से हिस्सा है जो आज से तकरीबन दो साल पहले सुनाई थी ; मैं जिंदा हूँ । इसमें एक जीप दुर्घटना का वर्णन था । अगर आपकी याद के पिटारे से वह कहानी गायब हो चुकी है तो फिर से याद ताज़ा कर सकते हैं दिए गए कहानी के लिंक पर क्लिक करके :  मैं जिंदा हूँ अभी । 

19 अगस्त - वर्ष 1996 – दिन सोमवार – समय लगभग सुबह सवा नौ बजे का – स्थान हिमाचल प्रदेश में सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की राजबन फैक्ट्री । ड्राइवर कर्म चंद मेरे आफिस में बैठ कर विभाग के कर्मचारियों के साथ बतिया रहा था । कुछ ही देर बाद उसे अपनी जीप में लेडी डॉक्टर – शैल सहगल को 15 किलोमीटर दूर बसे खदान के इलाके में ले जाना था । वहाँ पर भी भरी -पूरी कॉलोनी है जिसमें रहने वाले कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों को डिस्पेंसरी में इलाज की सुविधा दी जाती है । कर्म चंद की खिलखिलाती आवाज मेरे कमरे तक आ रही थी । वह अपने कुछ ही महीने बाद होने वाले अपने रिटायरमेंट की योजना बना रहा था । बता रहा था कि इस खटारा जीप को भी कंपनी से खरीद कर अपने साथ ही ले जाएगा । मैं उसकी इन भोली बातों को सुन कर मंद – मंद मुस्करा रहा था । चलते -चलते बोला अभी तो जा रहा हूँ – वापिस लौट कर दोपहर को घर पर लंच में बैंगन की सब्जी बनाई हुई है वही खाऊँगा । अपने आफिस की खिड़की से मैं उसकी बूढ़ी- जर्जर जीप को शोर-मचाते - धुआँ उड़ाते आँखों से ओझल होते देखा । 
अब आगे की आपबीती डॉक्टर शैल सहगल के मुंह से : 
 लाड़ली वसुधा और  माँ  डॉ ० शैल (9  जनवरी 1997)

"मैं कॉलोनी के अपने क्वाटर में बैठी इंतजार कर रहीं थी जीप का जिसे आज की ड्यूटी के लिए माइंस कॉलोनी लेकर जाना था । जीप का हॉर्न सुन कर घर से बाहर निकलने लगीं । जाने से पहले एक बारगी अपनी छ: माह की छोटी से बच्ची -वसुधा को प्यार से पुचकारा और जीप की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिए । मेरे पति - डाक्टर संजीव सहगल भी राजबन में ही कार्यरत थे । हम लोगों का मिलनसार व्यवहार की वजह से सभी स्नेह और सम्मान करते थे । ऊबड़ -खाबड़ धूल भरे पहाड़ी रास्तों पर हिचकोले खाती जीप मानल खदान की डिस्पेंसरी की ओर ले चली । वहाँ पहुँच कर लगभग एक घंटे तक मरीजों को देखने का काम चला । काम निपटा कर वापिस राजबन की ओर चल पड़े । 

सरकारी जीप अपनी मंद गति से चली जा रही थी । टूटी-फूटी सड़क के गड्ढे उस जीप को बुरी तरह से झकझोर रहे थे । खड़खड़ाहट की आवाज इतनी तेज हो रही थी कि उसके आगे हॉर्न की आवाज भी बेमानी लग रही थी । ड्राइवर कर्म चंद इस सबका अभ्यस्त था । उस खटारा गाड़ी में रोज-रोज आने वाली दिक्कतों और खराबियों की आला अफसरों से शिकायत करने के अलावा वह कर भी क्या सकता था । वो शिकायतें जो हमेशा अनसुनी रह जातीं । मन मसोस कर वह खुद को दिलासा देता – एनी हाऊ . . . . काम चलाओ । लेकिन आज मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था । गाड़ी की चाल कुछ ज्यादा ही अजीब तरीके से हो रही थी । ड्राइवर की ओर देखा – वह अपने आप में ही मगन , दीनो-दुनिया से बेखबर । उसकी तरफ का दरवाजा लॉक खराब होने के कारण बार -बार खुल जाया करता था इसलिए तार से ही बांध कर जुगाड़ बना हुआ था । उस खतरनाक जुगाड़ को देख कर मेरे मन में आश्चर्य , खीझ और अनजाने डर की मिश्रित भावनाएं उठ रहीं थी । कई बार हालात इस तरह के बन जाते हैं कि मजबूरी में इंसान को अन्याय भी सहना पड़ जाता है । नौकरी और जिम्मेदारी से बड़ी लाचारी और मजबूरी शायद दूसरी कोई नहीं । जीप जिस रास्ते पर वापिस राजबन की ओर जा रही थी उस मोड़दार सड़क के एक तरफ़ पहाड़ थे और दूसरी ओर गहरी खाई , घाटी और बहती हुई गिरी नाम की नदी । अचानक पता नहीं क्या हुआ मैंने नोट किया– जीप अनियंत्रित होकर सड़क से उतर कर खाई की ओर के कच्चे कटाव पर दौड़ रही हैं । तुरंत ड्राइवर को सचेत भी किया पर कर्म चंद खामोश रहा । शायद वह उस खतरनाक हालात पर काबू करने में व्यस्त था । होनी को कुछ और ही मंजूर था - भरसक कोशिशों के बावजूद जीप पागल हाथी बन चुकी थी जिस पर महावत का कोई भी जोर नहीं चल पा रहा था । उन खतरनाक लम्हों में भी मेरे दिमाग में तब भी अडिग विश्वास था कि कुछ भी अनहोनी नहीं होगी – जो भी होगा सब ठीक ही होगा । इसके बाद कुछ और सोचने का मौका ही नहीं मिला – जीप पूरी तरह से बेकाबू होकर सड़क किनारे की कच्ची मिट्टी को काटते हुए गहरी खाई की ओर बढ़ चली थी । जीप अपना संतुलन खो चुकी थी और लगातार पलटियाँ खाते हुए गहरी खाई में नीचे – और नीचे लुढ़कती जा रही थी । हर पलटी के साथ मैं और ड्राइवर भी अंदर ही चक्कर खा रहे थे । गिरती हुई जीप की छत से सिर टकराया और मैं बेहोश । उसके बाद मुझे कुछ पता नहीं । मौके पर मौजूद चश्मदीदों के अनुसार खाई में गिरने तक जीप ने चार पलटियाँ मारी ।इस दौरान नीचे गिरते हुए जगह -जगह पेड़ों से भी टकराती रही और हर टक्कर पर जीप के परखचे हवा में उड़ते रहे । ऐसी ही किसी पेड़ की टक्कर के जबरदस्त धक्के ने मुझे बेहोशी की हालत में ही जीप के पिछले टूटे दरवाजे के रास्ते हवा में उड़ाते हुए पास की जमीन पर ला पटका । कितनी देर तक उस हालत में रही आज भी पता नहीं । भाग्य साथ दे रहा था – जहाँ मैं खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी वहाँ पर पास में ही पहाड़ी झरना बह रहा था । उससे छिटक कर आती पानी की बौछार ने मानों अमृत का काम किया । कुछ ही देर बाद मुझे होश या चुका था । शरीर असहनीय पीड़ा से छटपटा रहा था । शरीर कीचड़ और खून से लथपथ था । कर्म चंद को आवाज दी – पर जीप और उसका कुछ पता नहीं था । शायद वह नीचे खंदक की और गहराइयों में समा चुकी थी । सिर में लगी गहरी चोट की वजह से सोचने – समझने की शक्ति एक तरह से गायब हो चुकी थी । मेरे सिर में गहरे घाव की वजह से लगातार खून रिस-रिस कर चेहरे पर आ रहा था । पाँच जगह से हड्डियाँ टूट चुकी थी ।लेकिन मेरा अवचेतन मन ( subconscious mind) पूरी शक्ति से काम कर रहा था । वह अवचेतन मन जो बार बार मेरे कान में कह रहा था कि तुम्हें अभी और जीना है – तुम्हें किसी भी कीमत पर अपनी जान बचानी है । तुम्हारी मौत किसी भी हालत में इस जगह और इस वक्त नहीं लिखी है । गहरी खाई से ही ऊपर की ओर नजर दौड़ाई - देखा जहाँ से होकर सड़क गुजर रही थी । पता नहीं किस अदृश्य शक्ति ने शरीर में इतनी ताकत भर दी मैंने धीरे -धीरे डगमगाते कदमों से आगे ऊपर चढ़ना शुरू किया । सहारे के लिए पहाड़ पर उगी लंबी घास और पेड़-पौधों की टहनियों पर अपने घायल हाथों की पकड़ बनाते हुए ऊपर चढ़ती जा रही थी । जीवन की उत्कंठा ने शरीर के असहनीय दर्द को मानों गायब ही कर दिया था । जैसे -तैसे करके सड़क तक पहुंची । आती -जाती गाड़ियों को हाथ देकर रोकना चाहा पर मेरे खून और कीचड़ से सने घायल शरीर को देखकर कोई भी गाड़ी रुकने को तैयार नहीं थी । इसी बीच में वहाँ से गुजरते हुए एक ट्रक – ड्राइवर ने मुझे पहचान लिया । वह राजबन के पास के ही किसी इलाके का रहने वाला था । उसने तुरंत ट्रक रोका - उसी ट्रक से मैं राजबन के लिए चल पड़ी । ड्राइवर से पानी मांगा – अपने चेहरे को धोया जो शायद मुझे होश में रखने के लिए जरूरी भी था । राजबन की सीमा पर पहुंचते ही सबसे पहले ड्राइवर को फेक्टरी के मेन गेट पर ट्रक रोकने को कहा । वहीं पर सिक्योरिटी स्टाफ को मैंने उस दुर्घटना के बारे में सूचित किया और बताया कि कर्म चंद के बारे में तुरत पता किया जाए । ट्रक मुझे आगे कॉलोनी में घर पर छोड़ने ले चला । मुझे सहारा देकर नीचे उतार गया और घर पहुंची । वहाँ पहुंचते ही इस हादसे की खबर आग की तरह से फैल गई । दुर्घटना -स्थल पर आपातकालीन सहायता टीम दौड़ाई गई । पता चला कर्म चंद मेरे जितना भाग्यशाली नहीं रहा – उस दुर्घटना में उसके प्राण नहीं बच सके । ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे । 

 मेरा लंबा इलाज चला । मन की शक्ति ने तन की शक्ति वापिस लाने में पूरा साथ दिया । आज मैं उस ईश्वर पर पूरी आस्था रखते हुए उस हादसे की डरावनी यादों से पूरी तरह से मुक्त हूँ । डॉक्टर के रूप में जो भी सेवा इस समाज की कर सकती हूँ वह आज भी कर रही हूँ ।" 
आज : सुखी  सहगल परिवार 
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डॉक्टर शैल ने तो अपनी कहानी कह दी पर चलते -चलते उनकी इस आपबीती पर मैं अपना नज़रिया जरूर रखना चाहूँगा । जहाँ तक दिवंगत कर्म चंद ड्राइवर का प्रश्न है – वह भी बहुत ही भला और प्यारा इंसान था पर जीवन और मृत्यु उस विधाता के द्वारा ही निश्चित है । फिर भी आपके शुभ कर्म और लोगों से मिली शुभकामनाएं भी रक्षा कवच बन कर विपत्ति में साथ निभाती हैं । डॉक्टर शैल के साथ उनके मरीजों की दुआएं तो थी हीं , उसके अलावा उस 6 माह की छोटी बिटिया – वसुधा की मासूम पुकार भी थी जो उस संकट की घड़ी में सुरक्षा प्रदान कर रही थी । अब आप मानो या ना मानो – मैंने अपनी बात कह दी क्योंकि नजरिया अपना -अपना होता है । हैं ना ?
                                        🌺श्रद्धांजली 🌺


दिवंगत कर्म चंद 

Tuesday, 30 June 2020

गयी भैंस पानी में

बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है जब आपको एक किस्सा सुनाया था अपने एक मित्र – जगजीवन प्रसाद यादव उर्फ जे पी की गाँव से जुड़ी यादों का ।पुरानी यादें मीठी होती हैं , बचपन से जुड़ी हुई हों तब तो कहना ही क्या । बचपन, गाँव और गाँव की भैंसों से जुड़ा यह किस्सा भी बड़ा मजेदार है जिसे आज भी अपने जेपी जनाब बड़े चटखारे ले कर सुनाया करते हैं । गाँव की मिट्टी की सौंधी -सौंधी गंध से सराबोर उन यादों की खुशबू का आनंद शायद आज की नई पिज्जा – बर्गर की पीढ़ी के नसीब में नहीं । इसमें उनका भी दोष नहीं – बदलते वक्त के साथ इंसान तो क्या पूरी दुनिया ही बदलती चली जाती है । हाँ – तो मैं बात कर रहा था भैंस की ।अपने जेपी उर्फ बबुआ किसान परिवार से थे , बचपन पूरी तरह से गाँव में ही गुजरा जो कि उत्तर प्रदेश में फैजाबाद के निकट ही था । खेत, खलिहान और मवेशियों के बीच ही पले- बढ़े । बड़ा अचंभा होता है आज भी यह सोच कर कि एक नामी गिरामी पब्लिक सेक्टर की कॉर्पोरेट दुनिया का दिग्गज रह चुका यह शख्स गाँव की मिट्टी में पूरी तरह धूनी भी रमा चुका है ।


बचपन का रूप 

जे पी यादव ( साहबों की दुनिया में )
 मवेशियों को चरा कर लाने की भी इस छोटे से बबुआ की जिम्मेदारी होती थी जिसे यह बखूबी निभाते भी थे । उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ जब अपनी मवेशियों का रेवड़ लेकर अपने किशन -कन्हैया चल पड़े जंगल की ओर । गाँव की सरहद को छूती हुई सरयू नदी बहती थी । नदी के विशाल तटबंध के आसपास ही सब मवेशी चरते रहे थे । नदी में अक्सर पानी का बहाव और जल-स्तर कम ही रहता था तो उनकी टीम भी नदी के बीच में स्थित उथले टापुओं तक भी पहुँच जाया करती । बबुआ और उनकी मंडली पूरे टापू पर खूब धमा-चौकड़ी मचा रही थी और उधर मवेशी अपनी भोजन व्यवस्था और स्नान -ध्यान में व्यस्त थे ।
कुछ ऐसा ही नज़ारा  होता था 
अचानक बबुआ का ध्यान नदी की ओर गया तो देख कर होश उड़ गए । नदी में पानी का बहाव तेजी पकड़ रहा था । उस वक्त तक तैरना आता नहीं था और छोटे से बच्चे के लिए उस गहरे पानी को पार करना एक जबरदस्त जानलेवा चुनौती बन चुकी थी । करें तो करें क्या यही चिंता आफत बन कर दिमाग को खाए जा रही थी । मरता क्या ना करता – आखिर बबुआ के शैतानी दिमाग की बत्ती जल उठी । बड़े बूढ़ों से सुना करते थे कि मृत्यु के बाद इंसान को स्वर्ग जाने के लिए गाय की पूंछ पकड़ कर वैतरणी नदी पार करनी पड़ती है। अब सामने गाय तो थी नहीं तो सोचा जब सवाल जीने -मरने का हो चुका है तो भैंस पर ही भरोसा किया जाए । फटाफट आव देखा ना ताव , सामने नदी पार कर रही भैंस की पूंछ ही पकड़ ली ओर चल निकले आगे । अब हाल यह कि आगे -आगे भैंस और पीछे -पीछे भैया । कुछ देर और दूर तक तो सब ठीक-ठाक रहा पर जब पानी की गहराई बढ़ चली तो भैंस रानी के नखरे भी बढ़ गए । शायद इंसानों की सोहबत में रहते हुए उसमे भी वक्त पर धोखा देने की कला कुछ हद तक आ गई थी । अब तक गुलबदन श्यामा सुंदरी पानी में जहाज़ की तरह तैरते हुए नदी पार कर रही थी और साथ ही उसकी पूंछ के सहारे लटके हुए छोटा भीम । उस भैंस ने बीच गहरी नदी में पानी के अंदर डुबकी लगा दी । अब वह जहाज़ रूपी भैंस पूरी तरह से पनडुब्बी बन चुकी थी और पूंछ- पकड़ छोटा भीम बन गया मुसीबत का मारा गोताखोर । अचानक आयी इस मुसीबत के लिए जेपी बबुआ कतई तैयार नहीं थे । गहरे पानी के अंदर सांस फूल रहा था, शरीर छटपटा रहा था लग रहा था शायद राम जी की तरह इसी सरयू में जल समाधि हो जाएगी । लग रहा था कि आज तो सही सलामत अपने घर पहुँचना भी नसीब में नहीं । ज़िंदगी और मौत के बीच सिर्फ भैंस , भैंस की पूंछ और भगवान का आसरा था । जब जान पर बन आती है तो इंसान ऐसे -ऐसे हैरतअंगेज़ कारनामे कर जाता है जिन्हें बाद में सोच कर उसे खुद अपने पर भी यकीन नहीं होता । यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ – बबुआ ने पानी के अंदर ही भैंस की पूँछ पर अपनी जोरदार पकड़ कायम रखते हुए मरोड़ना शुरू कर दिया। पनडुब्बी भैंस इस अचानक तारपीडो हमले के लिए तैयार नहीं थी । वह एक झटके के साथ पानी के ऊपर आ गई और उसके साथ ही अपना बबुआ । लेकिन इस बार यह बालक ज़रा ज्यादा ही फुर्तीला और चतुर निकला । अब वह दोबारा और जोखिम नहीं उठाना चाहता था । अपनी पूरी ताकत और ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर वह भैंस के सींग पकड़ कर पीठ पर मजबूती से सवार हो चुका था । जैसे -तैसे करके भैंस और उसका बहादुर सवार नदी पार कर किनारे आ लगे । उसके बाद दोनों ही खुश – बबुआ की जान बची और गुलबदन, श्यामा सुंदरी भैंस का पिंड छूटा पूँछ मरोड़ बबुआ से । अब आप ही बताइए - क्या इस खालिस देसी किस्से का  इससे अधिक सुखदायक अंत और भी हो सकता है ?

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...