Tuesday, 9 August 2022

शतक और दो वर्षों की दुविधा

एक लंबे अरसे की चुप्पी के बाद आपके सामने प्रस्तुत हूँ ।

हम  सब बचपन से सुनते आ रहे हैं , मेरे मन कछु और है, दाता के कछु और । इंसान सोचता रहता है, बड़े – बड़े मंसूबे पालता है – मैं यह करूँगा , वह करूँगा – पर अंत में जो नतीजा निकलता है वह वही होता जिस पर ऊपर वाले की मंजूरी की मोहर लगती है। बहुत पहले बचपन में फिल्म देखी थी ‘वक्त’ । उसमें बलराज साहनी एक ऐसे सेठ थे जिन्होनें अपने बच्चों के लिए बहुत ऊँचे -ऊँचे सपने पाले थे लेकिन वक्त की मार के आगे सब छिन्न-भिन्न हो गए । आपको यह बात इस लिए बता रहा हूँ कि जीवन से जुड़े छोटे-मोटे कहानी किस्से अपने ब्लाग के माध्यम से आप सबके पास पहुंचाता रहा हूँ । लगभग हर सप्ताह कोई नई कहानी, नया किस्सा आप सब तक पहुँच ही जाता था । यह सब सिलसिला निर्बाध रूप से चलता रहा और ब्लाग की पोटली में किस्सों की गिनती बढ़ती गई – दस .. बीस.. पचास .. अस्सी .. नब्बे और एक दिन जब उस आँकड़े ने 99 की गिनती छू ली तब दिमाग ने कुछ ऐसी खिचड़ी पकानी शुरू करदी कि बस कुछ मत पूछिए। बस हर दम एक ही विचार खोपड़ी में दौड़ लगाता रहता कि शतक बनाने वाले किस्से का नायक कौन होगा, विषय क्या होगा, वगैरा .. वगैरा ।

अब मज़े की बात यह कि जितनी सहजता से अब तक लेपटॉप के कीबोर्ड पर उँगलियाँ दौड़ती रही थी, अचानक उनमें जैसे ब्रेक लग गया । यह ब्रेक भी टेलीविजन पर चलाने वाले कार्यक्रम के बीच दिखाए जाने वाला कोई छोटा-मोटा कमर्शियल ब्रेक नहीं था । दिमाग में दही जमने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी । दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनों में और महीने साल का रूप लेने लगे और उस नायक का दूर-दूर तक नामों-निशान नहीं जिसे स्वर्णिम शतक के घोड़े पर सवार होकर आपके पास आना था ।

समय था कि गुजरता जा रहा था । उस ऊपर वाले की कुदरत ने भी अपना कहर बरपाना शुरू कर दिया । कोरोना की महामारी  दैत्याकारी प्रचंड रूप धारण कर चुकी थी । हर आदमी एक तरह से मौत के साये में जी रहा था । कितनों ने अपनी जान गवाईं , अपने प्रिय जन गँवाए, मौत से किसी प्रकार बच भी गए तो बीमारी ने अधमरी हालत में ला पटका ,अपना रोज़गार खोया । शायद ही कोई परिवार हो जो इस महामारी की मार से अछूता रहा हो । अब हालात कुछ ऐसे कि मैं स्वयं दुखी, मेरे निकट संबंधी कष्ट में, मेरे मित्रगण परेशानी में । ऐसी परिस्थितियों में कहानी-किस्सों के बारे में सोचना किसी भी संवेदनशील प्राणी के बस की बात नहीं । यही वजह रही मेरी खामोशी की ।

अब इस सारे घटनाक्रम ने पूरे दो साल निकाल दिए । बकौल मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब “मुश्किलें इतनीं पड़ी मुझ पर कि आसां हो गईं”। कुल मिलाकर हालात अब पहले जैसे बदतर नहीं हैं लेकिन फिर भी मंज़र कुछ-कुछ तो ऐसा ही है जिसके लिए कवि नीरज कह गए - – “कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे” ।

इस तूफान के बाद की खामोशी ने बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया । मानों अंदर से कोई आवाज कह रही हो –“ बेटा ! क्रिकेट में क्रीज़ पर बल्ला लिए अच्छे -अच्छे धुरंधर खिलाड़ी 99 रनों पर ही आउट हो जाते हैं। शतक खिलाड़ी नहीं बनाता, मैं बनवाता हूँ । इस दुनिया का सबसे बड़ा खिलाड़ी मैं हूँ । जिसने भी इस रहस्य को जान लिया, समझ लिया उसीका जीवन सफल है, सुखमय है।“

विगत दो वर्षों में जो कुछ अनुभव हुआ – कुछ आपबीती कुछ जगबीती, उसने इतना तो स्पष्ट इशारा कर दिया कि ‘शतक- कथा’ का नायक, जी नहीं – क्षमा कीजिए – महानायक उस आदि शक्ति, परमपिता परमेश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता जो इस संसार को चलाता है। जबतक यह विचार मेरे दिमाग में नहीं आया तब तक इस ब्लाग की रेलगाड़ी ने स्टेशन पर डेरा ही जमा लिया ।

इतने समय के बाद जबकि आपमें से बहुतों के स्मृतिपटल से शायद मैं गायब भी हो चुका होऊँगा, यह लेख महानायक परमेश्वर को समर्पित इस अर्चना के साथ :

जीवन-चक्र चमत्कार है
साँसें हैं उपहार,
परमपिता को याद रखो
मानो उसका उपकार ।

Tuesday, 17 November 2020

फकीर बादशाह

यूं तो सलमान और नेमत दो सीधे-सादे नाम लगते हैं पर मेरे लिए इनमें एक मजेदार किस्सा छुपा है । एक ऐसा किस्सा जिसे सुनकर आपके होंठों पर भी एक मीठी से मुस्कराहट आ जाएगी । इस कहानी के तीन पात्र हैं – मेरा शरारती कुत्ता चंपू और उसके दो दोस्त – सलमान और नेमत । 
नेमत - सलमान ( फकीर बादशाह )
नोएडा में मेरे घर के सामने से गुजरती कॉलोनी की सड़क अक्सर व्यस्त ही रहती है । छोटी – मोटी मोटर गाड़ियों के अलावा रेहड़ी पर सब्जी – भाजी बेचने वालों का भी ताँता लगा ही रहता है । घर के भीतर बैठा मेरा कुत्ता चंपू यूं तो देखने में लगेगा जैसे आंखे बंद किए ध्यान मुद्रा में बैठा है पर उसके कान हमेशा रहते हैं चौकस । हर आवाज़ के प्रति सजग – चाहे वह घर के अंदर की हो या बाहर से आने वाली । अपने मतलब की आवाज पर चंपू की प्रतिक्रिया मौके के अनुसार ही होती है । जैसे किसी अनजान आदमी या किसी भिखारी की भनक पाते ही उसकी दहाड़ किसी शेर से कम नहीं होती । इसके विपरीत किसी परिचित व्यक्ति की आहट पर चंपू की कूँ – कूँ की स्वर ध्वनि में से मानों संगीत की स्वर – लहरी फूटती प्रतीत होती हैं । ऐसा ही कुछ हाल होता है चंपू का जब वह एक खास रेहड़ी वाले की आवाज़ सुनता है । उस आवाज़ पर मानों वह पागल सा हो जाता है । वृंदावन में कान्हा की बंसरी सुनकर गैया जैसे भाव विभोर हो उठती थीं कुछ -कुछ ऐसा ही हाल चंपू का हो उठता है । वह दौड़ कर मेरे पास आता है और अपनी पूँछ हिलाते हुए तरह - तरह की मार्मिक आवाजें निकालते हुए मानो विनती करता है कि दरवाजा खोल दो , मुझे बाहर जाने दो।दरअसल इस सब्जी की रेहड़ी से आने वाली आवाज़ें होती हैं चंपू के दो नन्हे दोस्तों की – सलमान और नेमत । दोनों भाई हैं और सब्जी बेचने में अपने परिवार की हाथ बांटते हैं । बड़े भाई सलमान की उम्र है दस वर्ष और छोटे नेमत की सात वर्ष । चंपू जैसे ही घर के सात तालों की कैद तोड़ता हुआ सलमान – नेमत के सब्जी ठेले पर पहुँचता है वहाँ उसका इतना जबरदस्त स्वागत होता है जितना शायद डोनाल्ड ट्रम्प का भी भारत आने पर नहीं हुआ होगा ।
चंपू की पार्टी 
चंपू के लिए मनपसंद मटर , आलू , टमाटर और फलों की पार्टी मानों इंतजार ही कर रही होती है । सारी दुनिया से बेखबर ये तीनों दोस्त एक अद्भुत संसार में रम जाते हैं । एक ऐसा संसार जिसमें कोई हिन्दू – मुस्लिम का भेद नहीं , अमीरी – गरीबी की ऊँच – नीच नहीं । इनकी दुनिया में अगर है तो केवल प्रेम – निस्वार्थ , निष्कपट प्रेम और मानवता । सबसे मज़ेदार बात यह कि हमें सब्जी – भाजी बेचने के वक्त वे दोनों नन्हे सौदागर किसी भी किस्म की रियायत नहीं देते हैं पर चंपू को पार्टी देते समय उनके लिए चंपू की पसंद की महंगी से महंगी फल- सब्जी सौ रुपये किलो के टमाटर की भी कोई अहमियत नहीं होती । खुद गरीबी के हालात में गुजर – बसर करने वाले बच्चों के दिल में बसी दरियादिली को देख कर टाटा और अंबानी की अमीरी भी एक बारगी जैसे पानी भरती प्रतीत होती है । फकीर होते हुए भी ये बच्चे किसी भी वैभवशाली बादशाह से कम नहीं । कहने को यह किस्सा छोटा सा है पर समझने वाले के लिए चंपू – सलमान और नेमत की दुनिया बहुत कुछ सीख दे रही है ।

Saturday, 31 October 2020

थक गया ख़ुदा !



वह भी था समय ,

महामारी  का था ना नामो - निशान ,

चारों ओर बस भीड़ , शोरगुल,

धूल - धुएं से परेशान इंसान ।


फिर आया कोरॉना,

जैसे फटा कोई बम,

पूरी दुनिया गई जैसे थम,

आदमी घरों  में कैद

हवा - नदियां हुई साफ़    ,

आसमां ने ओढ़ा नीला लिहाफ़ ।

साथ ही . . .  

शुरू हुआ आदमी का  सफ़ाया,
  
और कुदरत की सफाई।

एक तरफ दर्द - एक तरफ दवाई ।




बदले फिर हालात,

दिख रहा अब चारो ओर दर्द ही दर्द ,

आसमां में छाई धूल की गर्त,

जीवन बन रहा फिर से नर्क।

नहीं कोई राहत,

सर पर सवार कोराना की शामत ।


देख कर यह सब,

बात इतनी समझ आयी

थक चुका  ख़ुदा भी

कर कुदरत की सफाई ,

करता है अब  इंसान का सफाया ।

Saturday, 17 October 2020

यादों का सफर : अनिल डी शर्मा

 अनिल डी  शर्मा 
यादों के समंदर में गोते लगाना भला किसे अच्छा नहीं लगता – मुझे भी लगता है । मैं भी उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जब सीनियर सिटीजन की उम्र की दहलीज को छू ही लिया है । यद्यपि अभी भी अपने आपको हर तरह से सक्रिय रखा हुआ है फिर भी जब कभी फुरसत के क्षणों में बैठ कर सोचता हूँ कि इस भाग-दौड़ की ज़िंदगी में अब तक क्या खोया और क्या पाया तब बीती हुई ज़िंदगी की कहानी किसी सिनेमा के परदे पर चल रही तस्वीरों की तरह बंद आँखों में सपने की तरह दौड़ने लगती है । यह आज की बात नहीं है – मेरे साथ पिछले दस सालों से यादों की आंधी कुछ ज्यादा ही झकझोर रही है । इन पुरानी यादों में सबसे करीब हैं वह मीठी यादें जो बचपन से जुड़ी हुई हैं । उन यादों ने दिल में कुछ ऐसी अमिट छाप और कसक छोड़ी हुई है कि आज भी मैं उन लम्हों को फिर से जीना चाहता हूँ । 

गुलधर रेलवे स्टेशन 
थोड़े में कहूँ तो मेरा जन्म वाराणसी में हुआ जहाँ मेरी ननसाल हुआ करती थी । एक तरह से आप मुझे बनारसी बाबू भी कह सकते हैं । पिता रेलवे में थे – कुछ यादें छुटपन की गाजियाबाद – मेरठ लाइन पर स्थित छोटे से रेलवे स्टेशन गुलधर से भी जुड़ी हैं । बाद में राजस्थान के कोटा में बस गए । मैं भी नौकरी के सिलसिले में काफ़ी घूमा -फिरा । भारत सरकार के सीमेंट कार्पोरेशन के मार्केटिंग विभाग में काफी समय तक जगह -जगह काम किया । आजकल कोटा के एक जाने-माने कोचिंग इंस्टीट्यूट में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ । रोजमर्रा की काम – काज की व्यस्तता ही कुछ ऐसी रहती है कि दम मारने की फुरसत ही नहीं मिलती । लेकिन इतना जरूर है कि जब भी दो घड़ी सुकून के मिलते हैं तब भी यह कमबख्त दिमाग चैन से नहीं बैठ पाता । तब इस दिमाग पर दिल हावी हो जाता है जो ले जाता है मुझे पुरानी बचपन की प्यारी – प्यारी यादों में । 
मेरी नानी - प्यारी नानी 
इंसान को इस दुनिया में माँ से प्यारा कोई नहीं होता । ज़ाहिर सी बात है कि माँ की भी माँ यानि नानी तो दिल के सबसे प्यारे कोने में रहती है । मुझे भी अपनी ननसाल से इतना जबरदस्त लगाव और जुड़ाव रहा है जिसके आगे फेविकोल का जोड़ भी कुछ मायने नहीं रखता । मेरी उम्र तब रही होगी यही कोई आठ – नौ वर्ष की । अपने नाना को तो मैंने कभी नहीं देखा । उनका स्वर्गवास मेरी माँ की शादी से भी पहले ही हो चुका था । वह सही मायने में अंग्रेजों के जमाने के जेलर थे । माँ और नानी के मुंह से उनके राजसी ठाठ -बाट और रहन- सहन के किस्से सुनकर मैं अचंभित रह जाता । नानी के घर अक्सर छुट्टियों में जाया करता था ।

मेरे नाना  : सचमुच अंग्रेजों के ज़माने  के जेलर 



नानी का घर : अहमद मंजिल 
मेरी ननसाल थी बनारस के अर्दली बाजार इलाके में । वहाँ एक अंग्रेजों के जमाने की पुरानी सी दुमंजिला हवेलीनुमा शानदार इमारत थी जिसका नाम था – अहमद मंजिल । उस जैसी शानो-शौकत वाली इमारतें आजकल तो सिर्फ पुरानी फिल्मों में ही देखने को मिलती हैं । जहाँ तक मुझे याद आता है उसमें लगभग अट्ठारह - बीस कमरे थे – ऊंची – ऊंची छत वाले । गुसलखाने से लेकर रसोईघर तक सभी विशालकाय जिनके सामने आजके हाउसिंग सोसायटी के फ्लेट - मकान कबूतरखाने का आभास देते हैं । वह ज़माना था 1960 के दशक का । मेरी ननसाल में भरा-पूरा परिवार था – नानी , मामा , मौसी – सब तरफ से चहल-पहल से भरपूर । अपने जमाने में तब के बनारस में इतनी भीड़-भाड़ नहीं होती थी । घर के पास ही हनुमान मंदिर था । एक दुकान थी बालमुकंद की जहाँ जाकर चटपटी लेमनचूस गोलियां खरीदकर चटखारे ले-ले कर खाते । उन गोलियों का स्वाद और याद आज भी बचपन के झूले पर बैठा देता है । घर के पास ही बरना नदी का पुल था जहाँ तक जाने के लिए रिक्शा या तांगा मिलता था । यह बरना नदी वही है जो मध्य प्रदेश से लंबी दूरी तय कर अंत में बनारस में गंगा में विलीन हो जाती है । 
बरना नदी का पुल 
वक्त के साथ – साथ हालात भी बदलते चले गए । अर्दली बाज़ार की अहमद मंजिल किराये की रिहाइश थी सो एक दिन तो उसे विदा कहना ही था । नानी ने भी इस दुनिया से रुखसत ले ली और नानी की सुनाई कहानियाँ वक्त की धूल के नीचे धीरे -धीरे धूमिल होने लगीं । लेकिन यादों में बसा रही तो वही अहमद मंजिल की ननसाल जो मेरे दिलों-दिमाग पर कुछ इस कदर हावी थी कि समय – समय पर दिल में हूक मारती – चल उसी आशियाने में जहाँ बचपन के पंछी ने अपने छोटे- छोटे पंखों से उड़ान भरना सीखा । नौकरी की व्यस्तता और तरह-तरह की मजबूरियों के जंजाल में यह सब संभव नहीं हो पाया । पर कहने वाले कह गए हैं लाख टके की बात – अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो नीली छतरी वाला भगवान भी खुद आपकी मदद को हाज़िर हो जाता है । मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । कोटा के जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट की प्रशासकीय जिम्मेदारी निभा रहा हूँ वहाँ के लिए अध्यापकों की नियुक्ति करने के सिलसिले में केम्पस सलेक्शन के लिए एक बारगी आई.आई.टी, वाराणसी ( इंजीनियरिंग कॉलेज – भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) जाने का कार्यक्रम बना । मुझे लगा भगवान ने मेरे अंतर्मन की पुकार आखिर सुन ही ली । शायद अर्दली बाजार और अहमद मंजिल भी उस मासूम बच्चे से मिलने को बेताब थी जिसके छोटे – छोटे कदमों की आहट और खिलखिलाहट से उसकी शान में भी चार चाँद लग जाते थे । मैंने मन में उसी क्षण ठान लिया कि इस सुनहरे मौके को मैं हाथ से व्यर्थ नहीं जाने दूंगा । अपनी पुरानी यादों के सपने को साकार करने का समय सचमुच आ चुका था । 
वाराणसी में आई. आई. टी के गेस्ट हाउस में ही ठहरा । सबसे पहले तो कॉलेज के जिस काम के लिए आया था उसे निपटाया । अब बारी थी अपने बचपन में लौटने की । वाराणसी में ही मेरा ममेरा भाई भी रहता है । स्थानीय व्यक्ति की मदद के बिना मेरे ननसाल खोजी अभियान की सफलता संभव नहीं थी इसलिए वाराणसी में ही रहने वाले अपने ममरे भाई से संपर्क साधा । आशा के मुताबिक वह भी तुरंत हाजिर हो गया और फिर निकाल पड़े हम दोनों भाई अपनी पुरानी यादों के सफर पर । 
पहले का शांत अर्दली बाजार अब भीड़भाड़ और शोरगुल का केंद्र बन चुका था । बालमुकुंद की टॉफी वाली दुकान अभी भी मौजूद थी पर नए रूप- रंग में जिसकी कमान अब नई पीढ़ी के हाथ में थी । मेरे बचपन की ननसाल रहे अहमद मंजिल के आसपास का इलाका भी काफी बदल चुका था । उस पुरानी इमारत का दरवाजा धड़कते दिल से खटखटाया । दरवाजा खोलने वाले एक मुस्लिम शख्स थे । हमने अपना परिचय दिया और अनुरोध किया कि हमें अपने बचपन की यादों से जुड़े इस घर को एक बारगी देखने का मौका दें । आज के इस हिन्दू- मुस्लिम के बीच अविस्वास के दौर में भी भले लोगों की कमी नहीं है । वह जनाब बड़ी इज्जत से हमें घर के अंदर ले गए । मैं अब एक नई ही दुनिया में आ चुका था – वह दुनिया जो आज भी मेरे सपनों में जिंदा थी । मैं एक के बाद एक उस इमारत के कमरों को देख रहा था – किसी कमरे में मुझे अपनी नानी बैठी नजर या रहीं थी तो किसी में अपने मामा – मौसी । उन अद्भुत क्षणों में मैं बिल्कुल बेबस था क्योंकि यादों पर किसी का वश नहीं चलता । शायद मुझे परखने के इरादे से ही मकान मालिक ने कहा कि आगे आप खुद जाएं क्योंकि आप जब यहाँ रह चुके हैं तब तो यहाँ के चप्पे – चप्पे से वाकिफ़ होंगे । उस दुमंजिला विशाल इमारत के अंदर और छत पर मैं मंत्रमुग्ध सा घूम रहा था और सही मायने में यादों के समंदर में गोते लगा रहा था । 

हर सुनहरे सपने का एक अंत होता है – मेरे सपने का भी हुआ । वापिस चलने का समय आ गया । यहाँ की यादों को हमेशा के लिए मैं अपने साथ समेट कर अपने साथ ले जाना चाहता था । मकान मालिक से वहाँ के फ़ोटो खींचने की अनुमति मांगी । अहमद मंजिल इमारत की विरासत मुकदमेबाज़ी में फंसी होने के कारण उन्होंने फोटोग्राफी के मामले में अपनी असमर्थता जताई । वैसे तो मैं निहायत ही शरीफ़ किस्म का इंसान हूँ पर कुछ मौकों पर थोड़ा-बहुत दाएं – बाएं भी हो जाता हूँ । यहाँ भी कुछ ऐसा ही मामला था सो इज्जत का फ़लूदा होने का खतरा उठाते हुए भी आँख बचा कर कुछ फ़ोटो खीच ही डाले । यह बात अलग है कि वे फ़ोटो आज मेरे पास से भी गुम हो चुके हैं क्योंकि पुरानी कहावत है ‘चोरी का माल मोरी में’। 

पत्नी के साथ 

मेरी माँ और बच्चे 


                      (फ़ोटो सौजन्य : श्रीमती संगीता और श्री  राजीव कुमार)

वापिस कोटा आकर यादों को अपने परिवार के साथ बाँटा । माँ की आँखों में जो खुशी की चमक आई थी उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है ।  आज जब भी फुरसत के लम्हों में उन पुरानी यादों की जुगाली करता हूँ वह गीत अक्सर होंठों पर आ ही जाता है : 

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन🎵🎵🎵🎵🎵

                                                                (प्रस्तुतकर्ता : मुकेश कौशिक) 




Monday, 5 October 2020

मॉनीटर मित्र : श्याम लाल

मॉनीटर मित्र : श्याम लाल 
पुरानी कहावत है – सैयाँ भए कोतवाल अब डर काहे का । मतलब यही कि जब कोई दोस्त या रिश्तेदार किसी ऊंचे पद पर बैठा हो तो फायदा मिलने की पूरी संभावना होती है । स्कूल के दिनों में मुझे भी कुछ ऐसा ही महसूस होता था – क्योंकि श्याम लाल मेरा दोस्त था और दोस्त होने के साथ वह क्लास का मॉनीटर भी था । स्कूल खालिस सरकारी था । जब भी कभी क्लास में मास्टर जी नहीं होते या खाली पीरियड होता तब हमारी मस्ती की बात ही कुछ अलग होती । जबान पर लगा ताला मानो टूट जाता और संगी – साथियों के साथ हल्ला – गुल्ला उस स्तर पर पहुँच जाता कि पार्लियामेंट भी एक बारगी शर्म से पानी – पानी हो जाए । बातों का सिलसिला भी ऐसा जो रुकने का नाम ना ले । अब ऐसे समय में जब हम सब बातों के रस में पूरी तरह से सराबोर हो रहे होते थे तब अचानक ब्लेकबोर्ड पर लिखने वाले चॉक के टुकड़े बंदूक से निकली गोलियों की तरह शरीर से टकराती । नजर उठा कर देखता – ब्लेकबोर्ड के ठीक सामने मास्टर जी की जगह क्लास के मॉनीटर – यानी श्याम लाल को पाता । ब्लेकबोर्ड साफ़ करने का लकड़ी का डस्टर मेज पर ठकठका कर मॉनीटर की चेतावनी का नगाड़ा पूरी क्लास में गूंज उठता । पलक झपकते ही क्लास रूम मानों कोर्ट रूम में बदल जाता जहाँ के जज साहब अपना श्याम लाल होता । उसकी पैनी निगाह क्लास के बच्चों पर रडार की तरह नज़र रखती । इतने पर ही बात निबट जाए तब भी गनीमत समझो , वह तो शरारत करने वाले बच्चों के रोल नंबर एक -एक करके सामने ब्लेकबोर्ड पर लिखना शुरू कर देता । दिमाग का वह तेज था इसीलिए केवल नाम ही नहीं क्लास के सभी बच्चों के रोल नंबर तक उसे रटे पड़े थे । उसके द्वारा ब्लेकबोर्ड पर नाम लिखा जाना ठीक वही डर पैदा कर देता जैसा अमरीका द्वारा किसी देश को आतंकवादी घोषित करने पर होता है । मास्टर जी का जब क्लास में अवतरण होता तब उनके लिए ब्लेकबोर्ड ही गीता – बाइबिल – कुरान होता । उस पर आतंकवादियों के रोल नंबर वेद वाक्य की तरह अटल , शाश्वत सत्य माने जाते । उन आतंकवादी – शरारती – बातूनी बच्चों की किसी भी फ़रियाद पर कोई सुनवाई नहीं होती । हाँ- बतौर सज़ा, कुटाई होगी, मुर्गा बनना है या छड़ी से पिछाड़ी की सिकाई होनी है , यह मास्टर जी के मूड पर निर्भर होता । यह थी ताकत मेरे मॉनीटर मित्र श्याम लाल की जिससे क्लास के सारे बच्चे हद दर्जे की खौफ खाते थे । जहाँ तक मेरा सवाल है – पूरी क्लास का गब्बर मेरा तो दोस्त था , बल्कि एक तरह से कहूँ तो सही मायने में लँगोटिया यार था । यारी का फर्ज निभाने में कभी भी कतई पीछे नहीं रहा । जब शोर मचाती क्लास में आतंकवादियों के रोल नंबर ब्लेकबोर्ड पर लिखे जा रहे होते थे , तब मुझे वह केवल आँखे तरेर, अपने मुँह पर उंगली रख चुप होने का इशारा करता हुआ चाक का टुकड़ा मिसाइल की तरह खींच कर दे मारता । मास्टर जी की कुटाई – पिटाई के मुकाबले मैं भी उस चॉक के टुकड़े की गोली खाकर अपने को धन्य समझता कि चलो सस्ते में छूट गए । उसकी इस रहमदिली का कारण बहुत बाद में पता चला । दरअसल मेरी माँ भी उसी स्कूल में अध्यापिका रहीं थी और श्याम लाल किसी जमाने में उनका छात्र रह चुका था । 

स्कूल था मेरा दिल्ली – यमुना पार इलाके के झिलमिल कॉलोनी में । श्याम लाल भी नजदीक की ही कच्चे – पक्के मकानों की बस्ती विस्वास नगर में रहता था । जब भी मौका मिलता मैं अपने एक और दोस्त चंद्रभान- जो श्याम का पड़ोसी भी था , के साथ उसके घर चला जाता । यद्यपि वह समाज के उस वर्ग से था जिसे आर्थिक और सामाजिक नजरिए से अविकसित माना जा सकता है लेकिन उस बंदे में गजब का आत्मविश्वास भरा हुआ था । दिमाग का तेज था, क्लास का मॉनीटर था, एन.सी.सी का अच्छे केडेट्स में से एक था । खेल-कूद में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेता । लिखाई इतनी सुंदर जैसे मोती जड़ दिए हों । उस कच्ची उम्र में भी जिम्मेदारी का इतना एहसास था कि अपने पिता का हाथ बटाने के लिए उनकी किरियाने दुकान की जिम्मेदारी संभालनी शुरू कर दी थी । 

स्कूल के बाद रास्ते अलग -अलग हो गए । लंबे समय तक एक दूसरे की कोई खोज -खबर नहीं रही लेकिन मॉनीटर मित्र दिलों-दिमाग की तिजोरी में महफ़ूज रहा । पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के कोल्हू में जुत गए और रिटायर होते -होते कब जवानी ने विदा ली और बुढ़ापे ने दस्तक दी समय का पता ही नहीं चला । बचपन से बुढ़ापे तक के सफ़र में दुनिया ने भी बहुत तरक्की कर ली थी । सोशल मीडिया और मोबाइल का ज़माना आ चुका था । उसी के जरिए श्याम लाल की खोज खबर ली गई । असली दोस्ती वही होती है जिसका रंग समय के साथ फीका नहीं पड़ता वरन और भी पक्का होता जाता है । श्याम के साथ भी ऐसा ही था । वह भी नौकरी के बाद रिटायर हो चुका था । उसे भी मेरे तरह दोस्ती के उसी कीड़े ने काटा हुआ था जो हालचाल पता करने के लिए समय-समय पर फोन करता रहता । 

अब सिर्फ फोन पर बात करने से मन तो भरता नहीं । सो एक दिन प्रोग्राम बना कि अपने उसी झिलमिल कॉलोनी के स्कूल में श्याम लाल और चंद्रभान के साथ जाकर पुराने दिनों की यादें ताज़ा की जाएं । समय का फेर कुछ ऐसा रहा कि किसी न किसी कारणवश यह स्कूल दर्शन और मित्र मिलन का कार्यक्रम टलता ही रहा – कभी हारी- बीमारी, कभी व्यस्तता तो कभी दिल्ली का प्रदूषण । आखिर में रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी जब दिल्ली तो क्या सारी दुनिया ही ठहर गई । 

श्याम लाल के फोन हमेशा की तरह आते रहते – गपशप होती ।स्कूल के दिनों से आज तक उसमें कोई अंतर नहीं आया था सिवाय एक बात के – अब वह मुझे नाम के साथ जी भी लगा कर संबोधित किया करता । अभी कुछ दिन पहले की बात है – मोबाइल पर दोस्त चंद्रभान का संदेश था जिसमें श्याम लाल के आकस्मिक दु:खद निधन की सूचना थी । दिल को गहरा धक्का लगा । श्याम के घर फोन लगाया – बच्चों से बात की – जो पता लगा वह और भी कष्टकारी था । अचानक तबीयत खराब होने पर गंभीर हालत में श्याम को एम्बुलेंस में कई अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े पर किसी ने भी उसे भर्ती तक नहीं किया । सब एक दूसरे पर टरकाते रहे और अंत में इलाज के अभाव में श्याम लाल के प्राण पखेरू एम्बुलेंस में ही उड़ गए । वह श्याम लाल जो बचपन में ही मॉनीटर बन कर पूरी क्लास की अनुशासन व्यवस्था संभाला करता था , अस्पतालों की अनुशासनहीनता से उसके प्राणों की रक्षा इस दुनिया का मॉनीटर नहीं कर पाया । ऊपर वाले से यह शिकायत मुझे ताउम्र रहेगी और साथ ही खुद अपने से भी – मिलने का वादा नहीं निभा पाया । 

अलविदा मॉनीटर मित्र 🙏

Thursday, 24 September 2020

भक्ति की राह - नहीं आसान : चरन जी


भजन की राह पर चरन  जी 

इंसान चाहता कुछ है लेकिन तकदीर किसी ऐसे रास्ते पर धकेल देती है जिसे उसने खुद चुना है । अपना ही उदाहरण देता हूँ – मेरा बचपन से ही रेडियो एनाउंसर बनने का सपना था । पिताश्री स्वयं साहित्यकार होने के कारण कलाकारों की कमजोर आर्थिक मजबूरियों से भली-भांति परिचित थे । उन्होंने मुझे डाक्टर बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी पर जब किस्मत में सीमेंट बेचना लिखा था तो रेडियो जॉकी और डाक्टरी के पटाखे हो गए फुस्स । हम में से बहुत कम ऐसे खुशनसीब होते हैं जिन्हें नौकरी , काम-धंधा , व्यवसाय भी अपनी पसंद और रुचि के अनुसार मिलता है । पिछले दिनों मुझे एक ऐसे ही अत्यंत दिलचस्प व्यक्तित्व से संपर्क हुआ । आमने – सामने मुलाकात तो नहीं हुई पर फोन पर ही लंबी बातचीत हुई । इस शख्स की ज़िंदगी बहुत ही उतार – चढ़ाव वाली रही पर मजे की बात यही कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी । इन सबके बावजूद उसे आखिर में हासिल क्या हुआ – वह भी बताऊँगा । 

चलिए बात बचपन से ही शुरू करते हैं – उस बच्चे का नाम था गुरप्रीत सिंह । इस नाम का अर्थ है गुरु से प्रेम करने वाला । पता नहीं इस नाम में ही ऐसा क्या जादू डाला उस बच्चे पर कि कम उम्र से ही आध्यात्म और भक्ति की ओर झुकाव शुरू हो गया । जिस उम्र में बच्चे कंचे खेलते, पतंग उड़ाते, वह किसी और ही दुनिया में लीन रहता । गुरु नानक जी महाराज की जीवनी कई बार पढ़ी । माँ को बड़ी शांति मिलती । गुरुद्वारे की संगत में शबद – कीर्तन सुनने में उसे अद्भुत आनंद मिलता । अगर यह कहें कि पढ़ाई से ज्यादा उसे आनंद भक्ति की दुनिया में मिलता तो कुछ गलत नहीं । गुरुद्वारे में जाकर खुद भी शबद गाने लगा । उसके पिता एक ठेठ व्यवसायी थे । हर पिता की तरह उनकी भी चाहत थी कि अपने दूसरे भाई की तरह गुरप्रीत भी फेक्टरी के काम में हाथ बटाए । यहीं से शुरू होता है दोनों के बीच विचारधारा का टकराव । पिता को हमेशा यही लगता कि ईश्वर भक्ति के द्वारा रोज़ी -रोटी का इंतजाम करना कठिन ही नहीं – नामुमकिन है । दूसरे शब्दों में कहें तो – काम-धंधा अपनी जगह और भक्ति – भावना अपनी जगह । 

पिता-पुत्र की इस विचारधारा में टकराव ही कई बार घर में कटुता का वातावरण ला देता । पिता भी अपनी जगह ठीक थे – इस दुनिया में माँ – बाप से बढ़कर अपनी औलाद का भला सोचने वाला और कौन हो सकता है । समझदारी गुरप्रीत में भी कुछ कम नहीं थी - 16 - 17 वर्ष की आयु में भी अपने हमउम्र साथियों से ज्यादा परिपक्वता थी । उसकी सोच थी कि जिंदा रहने के लिए जितनी जरूरी रोज़ी -रोटी है उससे भी कहीं ज्यादा आवश्यक है कि पैसा कमाने का तरीका भी सात्विक होना चाहे । अब आप खुद ही सोचिए – कितना कठिन रास्ता चुना गुरप्रीत ने । घर के अच्छे -खासे पारिवारिक फेक्टरी -व्यवसाय को छोड़ कर निकल पड़े मन की शांति की खोज में गौतम बुद्ध की तरह । गुरुद्वारे में भक्ति की – वहाँ भी चैन नहीं मिला । एक तरह से कहा जाए तो जगह – जगह धक्के खाए । एक से एक बुरे दिन भी देखने पड़े । उधर पिता नाराज और इधर रोटियों के भी लाले पड़ रहे थे । कभी – कभी मन में निराशा का भाव भी आता – कहीं ऐसा ना हो कि ना खुदा ही मिला , ना विसाले सनम , ना इधर के रहे ना उधर के रहे । पर दिल के किसी कोने में विश्वास भी था – ऊपर वाला सब भला ही करेगा । हुआ भी कुछ ऐसा ही । खुद उनके ही शब्दों में “ सारा जीवन शांति की तलाश में अलग-अलग रास्ते खोजता रहा । रास्ता सादगी और सहज ध्यान में था जिस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया ।“ खोजते -खोजते आध्यात्मिक पंथ सहज मार्ग के संपर्क में आए । पुराना सब कुछ भुला – नाम ही नया अपना लिया – “चरन जी” । तब से संगीत और भजन – यही दुनिया है चरण जी की । अब उन्हें अपना संगीत का शौक, ईश्वर के प्रति भक्ति और आजीविका सब एक ही माध्यम से अपनाने का भगवान ने सुनहरा मौका दिया । अपनी मेहनत ,लगन , सुरीली आवाज और ईश्वर के आशीर्वाद की बदौलत आज चरन जी भजन गायकी के क्षेत्र में चमकता हुआ सितारा हैं ।

बाएं  से अभिनेता  विवेक वासवानी, संगीतज्ञ  विश्व मोहन भट्ट,  चरन जी 
देश विदेशों में ढेरों कार्यक्रम कर चुके हैं । आज भगवान का दिया सब कुछ वह पा चुके हैं । अपनी सोच को वह हकीकत में बदल चुके हैं – आप समाज सेवा करिए पर उसमें दिया जाने वाला धन भी वही हो जो सात्विक तरीके से कमाया गया हो । यह असल ज़िंदगी का जीता -जागता किस्सा हमें यही बताता है कि अगर भावनाएं पवित्र हैं तो भगवान स्वयं हमें मंजिल तक पहुंचाता है ।


आपका क्या ख्याल है ?

Tuesday, 8 September 2020

मर जावां गुड़ खा के

पंजाबी में एक कहावत है – मर जावां  गुड़ खा के । सही मायने में इसका अर्थ आज तक नहीं समझ पाया । भला गुड़ खा कर कोई शख्स कैसे मर सकता है । गुड़ तो बहुत ही स्वादिष्ट और स्वास्थ के लिए लाभकारी पदार्थ है । मैं तो जब भी गुड़ खा कर मरने वाली बात सुनता हूँ तो एक मजेदार किस्सा याद या जाता है जब इस गुड़ ने सही मायने में जान आफत में डाल दी थी । तो चलिए शुरू करता हूँ इस गुड़ की गाथा को । 


इस कहानी की भी शरुआत होती है हिमाचल प्रदेश में स्थित राजबन सीमेंट फेक्टरी में जहाँ मैं उन दिनों काम कर रहा था । जैसा कि मैंने शुरू में ही बताया गुड़ खाने के बहुत ही फायदे होते हैं । जो मजदूर सीमेंट उद्योग, स्टोन क्रशिंग आदि धूल भरे वातावरण में कार्य करते हैं, उनके गले, फेफड़े व सांस के सारे रोगों से गुड़ बचाव करता है। सीमेंट फेक्टरी के कुछ हिस्सों में सीमेंट का धूल भरा वातावरण कुछ ज्यादा ही होता है इसलिए वहाँ काम करने वाले मजदूरों को गुड़ नियमित रूप से बांटा जाता है । गुड़ खरीदने की प्रक्रिया में सही मायने में मेरा खुद का तेल निकल जाता था । गुड़ का कोई कंपनी - ब्रांड तो होता नहीं जो आर्डर दिया और मँगवा लिया । ऊपर से तुर्रा यह कि हमारी कंपनी भी सरकारी थी जहाँ गर्मियों के लिए घड़े और मटके की खरीद - फरोक्त ठीक उन्हीं सरकारी नियमों के तहत होती थी जिन के अंतर्गत भारत सरकार अरबों रुपयों की राफेल विमानों को खरीदती है । सो जनाब इस गुड़- खरीद के काम के लिए भी बाकायदा कमेटी बनती , उस कमेटी को सरकारी वाहन उपलबद्ध कराया जाता । कमेटी के माननीय सदस्य आस-पास के गावों में जाकर कोल्हू – कोल्हू भटकते , निरीक्षण करते , बनने वाले गुड़ का परीक्षण करते और खरीद के लिए कोटेशन लेते । उसके बाद इधर कमेटी की मीटिंग पर मीटिंग , मीटिंग पर मीटिंग और गुड़ वितरण में हुई देरी की वजह से उधर यूनियन और मजदूरों का हल्लागुल्ला । जैसे तैसे करके जब गुड़ ट्रेक्टरों में भर कर फेक्टरी में आता तो ऐसा लगता जैसे मंगल यान अपना मिशन सफलता पूर्वक पूरा कर मंगल ग्रह पर उतर लिया ।


उस बार भी सब कुछ उसी प्रकार से हुआ । ट्रेक्टर भर गुड़ की रसद आई – मजदूरों में बटवाने के लिए उसे टाइम ऑफिस के एक खाली कमरे में भरवा दिया । नोटिस निकलवा दिया गया कि गुड़ का स्टॉक आ चुका है , सभी मजदूर अपने – अपने हिस्से का गुड़ ले जाएँ । असली खेल अब शुरू हुआ । कुछ मजदूर नेता पहले से ही गुड़ की एवज़ में पैसे लेने की समय - समय पर मांग उठाते रहते थे । उधर कंपनी का कहना था कि जरूरी नहीं कि पैसे लेकर अगर मजदूर ने गुड़ खरीद कर नहीं खाया तो सेहत के लिए गंभीर खतरा हो सकता है । इसलिए यह मांग नामंजूर कर दी जाती थी । इस बार उन्ही नेताओं की शह पर मजदूरों ने गुड़ की क्वालिटी पर सवाल उठाते हुए लेने से मना कर दिया । नेताओं को लाख समझाया , उन्हें समझाने के चक्कर में पता नहीं किलो के हिसाब से कितना गुड़ खुद खा कर दिखाया । वह तो भला हो भगवान ने पहले ही मुझे मीठे का शौकीन पंडत बनाया था सो खाया -पिया सब हजम कर गया वरना आज की बिरादरी का छुई मुई होता तो डायबिटीज का मरीज पक्का बन चुका होता । नेता, महबूबा और घोड़ा इनकी यही खासियत है – अगर अड़ गए तो बस अड़ गए , इन्हे समझाना और ऊंट को हेलीकॉप्टर में चढ़ाना एक बराबर मुश्किल । नेताओं ने नहीं मानना था तो नहीं माने और इस चक्कर में गुड़ भी नहीं बाँटा जा सका । ऑफिस के कमरे में पड़ी उस गुड़ की हालत उस घर जमाई से भी बदतर हो चली थी जिससे पिंड छुड़ाने के सभी तरीके फेल हो चुके हों । 

गुड़ की खासियत ही कुछ ऐसी होती है कि उसे लंबे समय तक भंडार करके नहीं रखा जा सकता । मेरे उस बदनसीब गुड़ की दुर्दशा भी घर जमाई की तरह शुरू हो चुकी थी । गरमी का मौसम आया तो उस गुड़ के पहाड़ के ग्लेशियर ने पिघलना शुरू कर दिया । उस कमरे के सीमेंट के फर्श पर सुनहरी गुड़ की महकती परत एक अद्भुत नज़ारा प्रस्तुत कर रही थी । कमरे के रोशनदान से ततैये और मधुमक्खियों ने अपनी खुराक का नया खजाना ढूंढ लिया था । यहाँ तक भी गनीमत थी पर वो कमबख्त आते -जाते टाइम ऑफिस के कर्मचारियों के हाथ -गाल पर डंक मारकर अपनी हाजरी भी दर्ज कराने लगे । हर दूसरे दिन मेरे पास रोते-पीटते कर्मचारियों की शिकायतें आतीं और मैं परेशान । सरकारी महकमों में यही खासियत होती है – यहाँ घुसना जितना कठिन होता है और यहाँ से छुटकारा पाना उससे भी मुश्किल । गुड़ का हाल भी कुछ – कुछ ऐसा ही था । 

बदलते मौसम की तरह गुड़ भी अपनी रंगत बदल रहा था । मौसम करवट ले चुका था और बरसात भी आ गई । मौसम की सीलन ने उस गुड़ के ग्लेशियर को कुछ ज्यादा ही पिलपिला बना डाला । किसी जमाने में अच्छे – खासे रहे उस गुड़ में सड़ने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई । रही सही कसर बरसात से टपकती उस छत ने पूरी कर दी जो गुड़ के कैलाश पर्वत पर शिवलिंग पर टपकते पानी की धारा का रूप ले चुकी थी । नतीजा वही हुआ जो सपने में भी नहीं सोचा था । लगा जैसे कैलाश – मानसरोवर झील में अचानक बाढ़ या गई और उस गुड़ रस की लहरें उस कमरे की सीमा तोड़ कर बाहर टाइम ऑफिस के कॉरीडोर तक दर्शन दे रही थीं । हालत यह कि मैं देखूँ जिस ओर सखी री – सामने मेरे साँवरिया ( गुड़ की चाशनी )। टाइम ऑफिस तक पहुँचने के लिए उस चाशनी के समंदर को पार कर के जाना पड़ता । शायद अपनी ज़िंदगी में इतना मिठास भरा वातावरण मैंने कभी नहीं देखा । कुछ ही दिनों में उस चिपकती चाशनी से सराबोर कमरे और कॉरीडोर से बदबू के झोंके इस कदर उठने लगे कि ऑपरेशन टेबिल पर लेटा बेहोश मरीज भी घबरा कर होश में आ जाए । मैं रात दिन ऊपर वाले से यही दुआ करता कि या तो इस मुसीबत से मुझे छुटकारा दिलवा वरना मैं मर जाऊँ इसी गुड़ को खाकर । 

सब तरफ से हिम्मत हार कर आखिर एक दिन फेक्टरी के महाप्रबंधक के आगे यह सारा दुखड़ा सुनाया । काबिल थे , समझदार थे – उन्होंने समस्या का हल भी सुझा दिया । उस गुड़ के कैलाश पर्वत के निपटारे के लिए फिर से एक कमेटी का गठन हुआ । कमेटी ने पूरे गुड़-कांड का गहराई से विश्लेषण करते हुए सर्वसम्मति से उस दुर्गंध युक्त पदार्थ के – जिसे किसी जमाने में गुड़ के नाम से जाना जाता था – सफ़ाई का सुझाव दिया जिसे महाप्रबंधक ने तुरंत स्वीकार भी कर लिया । पास के ही गाँव से कोई किसान अपना ट्रेक्टर लेकर आया – उस कीचड़ बन चुके गुड़ को भर कर ले गया – अपने खेत में खाद बना कर डालने के लिए या मवेशियों को खिलाने के लिए । ट्रेक्टर जैसे ही फेक्टरी गेट से बाहर निकला मेरी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था । लग रहा था आज तो पप्पू सच में पास हो गया ।

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...