Sunday, 19 May 2019

चुनाव ड्यूटी का मारा : इक टीचर दुखियारा

दिमाग में बहुत दिनों से एक अजीब सी उलझन चल रही थी | यही सोच रहा था कि अपनी बात आप से साझा करूं या चुप रहना बेहतर रहेगा | दरअसल किसी भी भले इंसान या आसपास की दीनो-दुनिया की अच्छाई के बारे में बात करो तो खुद को भी खुशी होती है और सुनने वाले को भी सुकून मिलता है | पर दुनिया में सब कुछ तो भला-चंगा नहीं है और कहीं तो मजबूरन ऐसे हालात बन जाते हैं कि आपको लगता है कि अब तो हद हो चुकी है| ऐसे मौकों पर खामोशी कमजोरी की निशानी मान ली जाती है जिससे समाज में गलत लोगों और खराब व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है | एक जिम्मेदार नागरिक होने का फ़र्ज़ निभाते हुए आपको इन हालातों में अक्सर सामने वाले को आईना दिखाते हुए कहना ही पड़ता है कि हुजूर बस करिए , बहुत हुआ अब सुधर जाइए | मेरे घर के आस-पास कभी सड़क की लाईट हफ़्तों खराब पडी रहती है तो कभी सामने के पार्क में गंदगी बिखरी रहती है | जनता-जनार्दन ऐसी कि जान कर भी अनजान बने रहते हैं | मैं ऐसे मौकों पर संबंधित महकमों पर शिकायत दर्ज करवा ही देता हूँ जिस पर मेरी श्रीमती जी भी ताने मार देती हैं कि जब सब चुप बैठे हैं तो तुम्हें ही क्या पड़ी है | कभी मैं खामोश रह जाता हूँ तो कभी जवाब देता हूँ कि सभी अगर चुप रहें तो आखिर काम कैसे चलेगा | 

तो चलिए अब आते हैं सीधे मुद्दे की बात पर | पिछले काफी दिनों से देश में हर जगह चुनाव का माहौल अपनी पूरी सरगर्मी पर है | अखबार , टी.वी. , सोशल मीडिया , जहां देखिए सब चुनाव के रंग में रंगे पड़े हैं | जिसे देखो सब अपना राग अलाप रहे हैं | इस सारे शोर-शराबे में अगर कोई खामोश है , जिनकी आप आवाज नहीं सुन पा रहें हैं तो ये वे भुक्तभोगी कर्मयोगी हैं जिनके कन्धों पर सवार होकर चुनाव का महात्यौहार सफलता पूर्वक पूरा हुआ | अगर आप चुनाव आयोग के बारे में सोच रहें हैं तो लगे हाथों आपकी गलतफहमी भी दूर कर देता हूँ | इस मामले में चुनाव आयोग की भूमिका तो खच्चर पर बैठे मदमस्त, अड़ियल और हठीले हाथ में चाबुक लहराते सवार जैसी है | वजन से लदे-फदें उस मरियल खच्चर पर कोई रहम नहीं खाता जो कोड़ों की बेदर्द मार से पूरी तरह से पस्त होने के बावजूद उस मुटल्ले सवार को मुश्किल से मुश्किल रास्तों से गुजरते हुए मंजिल तक समय पर पहुँचाने में कामयाब ही रहता है | जी हाँ , चुनाव को संपन्न करवाने के लिए जिन सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं ली जाती हैं , उनमें सबसे अधिक पढ़े-लिखे पर मजबूर शोषित कर्मचारियों का समूह होता वे हैं अध्यापक का | कहने को दुनिया जितनी चाहे बातें बना ले , पर सच्चाई यही है कि इतना सम्माजनक प्रोफेशन होने के बावजूद भी इन्हें बदकिस्मती से समाज वह इज्ज़त नहीं देता जिसके ये असली हकदार हैं | अब यहाँ सवाल उस व्यवहार का नहीं है जो चुनाव आयोग के बददिमाग निरंकुश अधिकारी उन लोगों से करते हैं जिनकी सेवाएं वे उधार के सिंदूर की तरह प्राप्त करते हैं, यहाँ हम बात कर रहें हैं उस बद-इंतजामियत की जिसकी मार चुनाव ड्यूटी पर लगे कर्मचारियों पर पड़ती है | और यह मार भी ऐसी कि चोट खाया मुलाजिम डर के मारे उफ्फ तक नहीं कर सकता कि आवाज उठाई तो कहीं सस्पेंड ना कर दिया जाऊं | यह वह डर ही है जिसकी वजह से जिनकी चुनाव ड्यूटी की आपबीती राम कहानी का मैं ज़िक्र करने जा रहा हूँ उन्होंने गुमनाम रहने में ही अपनी भलाई समझी | अब आप ही सोचिए उन सबके बारे में जो अपने रिटायरमेंट की दहलीज़ पर हैं , जिनकी शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है पर मजबूर हैं फ़ौजी स्टाइल में चौबीस घंटे की लगातार ड्यूटी देने के लिए | खाना तो दूर पानी भी मिल जाए तो गनीमत है | यह बात मैं बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कह रहा | किसी की सच्ची आपबीती है | बीच में उठ कर बाथरूम तक जाने का समय नहीं | चुनाव के बाद ईवीएम मशीन को देर रात तक जमा करवाने के लिए भेड़-बकरियों की तरह सर-फोडू मेहनत-मशक्कत | 
सुखद व्यवस्था का मनमोहक नज़ारा 

ईवीएम मशीन जमा करने की धक्का-मुक्की  

अब चुनाव आयोग बेशक अपनी पीठ खुद कितनी ही थपथपा ले, पर असलीयत में ज़मीनी हालात का जाएजा आपको इस कविता के माध्यम से बखूबी मिल जाएगा | यह कविता मुझे व्हाट्सएप पर किसी ने भेजी, जिसे प्राप्त सन्देश के अनुसार सुश्री मीनाक्षी खंतवाल ‘मीना’ ने लिखी है | मुझे कोई शक नहीं यह किसी की आपबीती ही है जिसमें वह शायद स्वयं भी हो सकती हैं | कविता लम्बी अवश्य है पर जब कष्ट अपरम्पार हैं तो उन कष्टों का बखान करती कविता भी कुछ लम्बी ही होगी जिसे पढ़ने के लिए  आपमें धीरज तो होना ही चाहिए |

शिक्षक बनाम चुनाव 

जो धीमे धीमे हाथ में सफ़ेद थैला लिए जा रहा है,
लोकतंत्र की रक्षा का भार कंधे पर धरे जा रहा है....
उसी पर तो इन दिनों सरकार का पूर्ण भरोसा है,
वो कभी कोई ग़लती नहीं करेगा,उसीसे ये आशा है...
सरकारी महकमों में यही कौम गाय सरीख़ी होती है,
किसी और महकमे की क़ौम मिर्च सी तीखी होती है,
उन पर तो सरकार मजबूरी में ही हाथ डालती है,
क्योंकि वो तो फ़ाइलों को भी कल पर टालती है,
शिक्षक की कॉपी डायरी सब अप टू डेट रहती है,
तब भी ये क़ौम अधिकारियों के ताने ही सहती है..
उसी सहनशक्ति की परीक्षा चुनावी ड्यूटी होती है,
शिक्षक के कंधे पर बोझ रख राजनीति चैन से सोती है..
चुनावी घोषणा होते ही हमारा दिल ज़ोर से धड़कने लगा,
बायीं या दायीं आँख का पता नहीं,अंग अंग फड़कने लगा,
सुबह और शाम की पूजा में ये प्रार्थना भी शामिल हो गयी,
स्कूल पहुँच के ड्यूटी पायी तो ये आस भी धूमिल हो गयी,
कोई हमारी नहीं सुनता ,ये तो जग ज़ाहिर है,
पर ये भगवान भी हमे धोखा देने में माहिर है!
ड्यूटी न आने की प्रार्थना पर कैसे मुस्काता था,
भगवान तब तेरा वो रूप हमें कितना भाता था,
जो प्रिंसिपल दारुण दुःख में भी छुट्टी नहीं देता है,
चुनाव आयोग के सामने कितना बेबस होता है,
अब तो शिक्षक सिर्फ़ फ़ोन पर सन्देश दिखाते हैं,
उसी प्रिंसिपल से 'अभी जाओ' का आदेश पाते हैं,
दुःख तो होता है ड्यूटी का , फिर भी धीरज धरते हैं,
' चलो सबकी ड्यूटी आई है' सोच गहरी साँस भरते हैं,
पहुँचे जब पंडाल में तो एक बिछड़ा साथी मिल गया,
चुनाव आयोग से मेरा बैर कुछ क्षण को टल गया,
एक दूसरे के सुख दुःख पूछते ट्रेनिंग भी हो गयी,
मित्र की छोटी बच्ची उसकी गोद में ही सो गयी,
'अक्कड़ बक्कड़'खेल कर पोलिंग पार्टी बनायीं गयी,
किसी तरह'भानुमति' के कुनबे की ईंटें जुटाई गयी,
यूँ हर कोई एक दूजे के लिए अजनबी था,अनजान था,
पर अब तो एक टीम थे ,और सामने बिखरा सामान था,
ज़मीन पर बैठ कर सामान की गिनती कर रहे थे,
कुछ रह ना जाये, प्रिसाइडिंग इसी फ़िक्र में मर रहे थे,
पोलिंग अफ़सर दो और तीन तो निरे बेफ़िक्रे थे,
ये सब तो पोलिंग एक और पीठासीन के ठीकरे थे,
सबसे ज़्यादा एक दूजे के लिए वही फिक्रमंद थे,
वे दोनों मानो एक ही गीत के तुकांत छंद थे,
दोनों मनाते थे कि सामने वाला समझदार हो,
चुनाव के दिन का उसी पर दारोमदार हो...
सुबह चार बजे जब घर से शिक्षक बाहर निकलता है,
उसकी बेबसी पर गली का कुत्ता भी नहीं भौंकता है,
अँधेरी सड़कों पर पोस्टमॉर्टम से सफ़ेद थैले चमक रहे हैं,
लोकतंत्र बचाने के स्तंभ, शिक्षकों के चेहरे दमक रहे हैं,
राह चलते वो गाड़ी रोक औरों को लिफ़्ट देता है,
इस तरह मानव दूजे को मानवीयता का गिफ़्ट देता है,
पोलिंग बूथ को बच्चे के घरौंदे-सा मनोयोग से सजाता है,
कर्तव्यनिष्ठा में वो गुरु,शिष्य को भी लजाता है...
चौदह घंटे एक सीट पर भूखा प्यासा बैठा रहता है,
तब भी मुस्कुराता है जब कोई मतदाता ऐंठा रहता है,
मशीन जमा करवाने के लिए,बसों में ठूंसा जाता है,
रहा सहा ख़ून भी जमा करवाते वक़्त चूसा जाता है,
इस तरह शिक्षकों का चुनावी मेला हो ख़त्म होता है,
उधर छह बजे के बाद नेताओं के घरों में जश्न होता है....
नेताओं के भक्त उनकी ज़ोरशोर से जयकार कर रहे हैं,
उन्हें कोई नहीं जानता,जो इनके लिए24 घंटे से मर रहे हैं,
अपना काम निकालने के बाद,सब वादे तोड़ देते हैं,
चुनाव करानेवालों को आधी रात सड़क पर छोड़ देते हैं,
इनके लिए रात्रि में कोई बस या मैट्रो सेवा नहीं चलती है,
इस क़ौम को सरकार काम निकालने हेतु यूँ ही छलती है,
रात के डेढ़ बजे हैं और मैं मदर्स डे के सन्देश पढ़ रही हूँ,
कई मदर्स अभी भी सड़कों पर हैं,ये सोच शर्म से गढ़ रही हूँ|
(मीनाक्षी खंतवाल'मीना')
13 मई 2019 

वैसे तो इस मामले से जुड़ी मन को झकझोर देने वाली घटनाओं का अंत नहीं है पर फिलहाल तो मैं केवल इतनी ही कामना कर सकता हूँ कि ईश्वर चुनाव आयोग और सरकार को इतनी सद्बुद्धि , क्षमता और संवेदना दे कि भविष्य में चुनाव कार्यों में लगे सभी छोटे-बड़े कर्मचारियों से इंसानों की तरह से सलूक हो | चुनाव में सभी को एक त्यौहार का एहसास हो, किसी के मरने पर ग़मगीन तेहरवीं का नहीं |

Thursday, 9 May 2019

दुआएं बेजुबान की

जीव- जंतुओं की दुनिया भी एक अलग ही मनोहारी दुनिया है | पर इसका आनंद भी हर किसी के भाग्य में नहीं होता | इसका मज़ा भी वही ले सकता है जिसके दिल में भावनाएं हैं , संवेदनशीलता है और जो इस बात को समझता है कि इन बेजुबान जानवरों में भी वही जीव बसता है जो खुद उनके अंदर भी है | बस एक बार अपने अंदर यह एहसास जगा कर देखिए और फिर आपको लगेगा जैसे आपने अपने लिए एक नयी दुनिया के कपाट खोल लिए जिसमें इंसान तो हैं ही , इसके अलावा आपके दोस्तों की लिस्ट में नए जीव-जंतु भी जुड़ गए | इन नए दोस्तों में आपके घर के आँगन में बैठने वाले परिंदे भी हो सकते हैं , कमरे में बोतल में लगा मनी-प्लांट का पौधा भी हो सकता है और सामने की गली में आपको अक्सर देखकर दुम हिलाने वाला कुत्ता भी हो सकता है | बस सवाल है मन के तार का जो जब भी झंकृत हो उठे और आप उस अजनबी जीव से एक दिल का रिश्ता कायम कर बैठें | आपमें से कुछ को मेरी बातें शायद ऊलजलूल और बेसिरपैर की लगें पर भाई मेरे मैं तो जो भी कह रहा हूँ अपने अनुभव की ही कह रहा हूँ | सारी ज़िंदगी भाग-दौड़ में कटी, उस हिमालयन कार रैली में भाग लेने वाले ड्राइवर की तरह जिसकी नज़र रही सिर्फ और सिर्फ सड़क पर और मंजिल पर पहुँचने की जल्दी में जो आस-पास के खूबसूरत कुदरत के नजारों से बिलकुल अनजान रहा | रिटायमेंट के बाद अब समय की कोई कमीं नहीं, भाग-दौड़ की दुनिया से छुट्टी मिली और आराम-चैन के वतन में प्रवेश हुआ | अब वह दुनिया है जिसमें मेरे इर्द-गिर्द हैं कुछ चुनिन्दा दोस्त, सीमित परिवार , गिने-चुने बंधु-बांधव और भगवान की दुनिया का जीव-जंतु जगत | इसे कुछ यूँ भी समझ सकते हैं कि हर फालतू सामान से निजात क्योंकि अगर सफ़र का असली मज़ा लेना है तो अपने साथ सामान कम रखिए | तो ज़िंदगी के इस नए सफ़र में कई ऐसे लोगों से मुलाक़ात हुई जो लगता है इस दुनिया के हो कर भी मानों यहाँ के नहीं हैं | उनकी सोच सबसे हट कर है, उनके विचार अनोखे और दुनियादारी से बिलकुल अलग | इन लोगों से थोड़ी सी बातचीत भी रेगिस्तान में ठंडी और ताजी हवा के झोके का एहसास दे जाता है | अभी पिछले दिनों हालात कुछ ऐसे बने कि दीनो-दुनिया से अलग एक निहायत भले मानस से मुलाक़ात हो गयी |

दरअसल मेरे घर के मेनगेट पर गली के छोटे-बड़े कुत्तों का एक तरह से सदाबहार जमावड़ा लगा रहता है | शायद उन्हें भी इस बात का एहसास है कि इस घर में रहने वाला एक शख्स उन्हीं की तरह से ठलुआ है – मतलब बिना पोर्टफोलियो का मिनिस्टर |

सुबह-सवेरे की गेट मीटिंग  😂
कुछ अड़ोसी-पड़ोसियों के लिए ये शैतान आतंकवादी परेशानियों का कारण भी बनते रहते हैं | कभी किसी सड़क चलते राहगीर को दौड़ा दिया तो कभी किसी को काट खाया | रात को भौंक-भौंक कर इतना शोर मचा देते हैं मानो हवाई हमले का साइरन बज रहा हो | समय-समय पर इनकी शिकायतें भी मिलती रहती हैं पर मैं भी ठहरा अव्वल नंबर का ढीठ , उस अमरीका की तरह जो इजराइल की सब शरारते जान कर भी अनजान बना रहता है | सच कहूँ तो ये सारे मेरे मुंह –लगे बदमाश दोस्त हैं | सुबह शाम जब घर के सामने के पार्क में घूमने निकलता हूँ तो ये सारे कमबख्त भी जाने कहाँ से ऐन उसी वक्त टपक पड़ते हैं और मुझे घेर लेते हैं | 
पार्क में मस्ती 
पहले से ही कुछ की आँखों की किरकिरी बना मैं, अब और अटपटे हालात में आ जाता हूँ | इनके खाने-पीने का थोडा बहुत इंतजाम नियमित रूप से होता रहता है | कभी कोई शरारती इधर-उधर से पिट-पिटा कर या चोट खा कर आ जाता है तो उनकी दवा-पट्टी भी हो ही जाती है| पहले उन्हें आस-पास के डाक्टर के पास ले जाने में मेरी जेब का खासा दिवाला निकल जाता था | उन डाक्टरों को भी तो आखिर अपना परिवार पालना था | पर आखिर नोएडा की ही एक समाज सेवी संस्था का पता चला | नाम है सोसाइटी फॉर प्रीवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनीमल्स (SPCA )| मुझे सबसे अचम्भे की बात यह लगी कि इसमें काम करने वाला एक शख्स इतनी मेहनत, समर्पण और निष्ठा से अपना काम करता है जो कि आज के समय में कम ही देखने में नज़र आता है | इस प्यारे से इंसान का नाम है जितेन्द्र कुमार उर्फ़ जीतू | जीतू, एस.पी. सी. ए की एम्बुलेंस में ड्यूटी पर तैनात रहते हैं | 
जितेन्द्र कुमार : मैं और मेरी दुनिया  
जानवरों से इन्हें दिल से हद दर्जे का प्यार है | यही वजह है कि सुबह सवेरे से लेकर देर रात तक अपने काम में जुटे रहते हैं | इतने व्यस्त रहते हैं कि इनके बारे में , जितनी जानकारी में जुटाना चाहता था वह भी इन्हें बताने का वक्त नहीं | अभी कुछ दिनों पहले एक और छोटे से पिल्ले- कालू की टांग बुरी तरह से उसी प्रकार घायल हो गयी जैसे भोलू की हुई थी | ऐसे वक्त में इन्ही जीतू ने बिना कोई प्लास्टर बांधे, केवल कुछ इंजेक्शन और पट्टियों के सहारे कालू को भला चंगा कर दिया |
कालू की टूटी टांग का इलाज 
आज की दुनिया का दस्तूर देखते हुए जीतू अगर चाहता तो इस काम के मेरे से पैसे भी मांग सकता था , पर उसने यह सब निस्वार्थ सेवा भाव से खुशी-खुशी किया | जीतू ने बताया कि इलाज करने के दौरान कई बार घायल जानवर उन्हें चोट भी पहुंचा चुके हैं पर उनकी हिम्मत और प्यार में कोई कमीं नहीं आयी | सबसे खतरनाक काम तो तब हो जाता है जब जीतू को पागल कुत्ते को पकड़ना पड़ता है |इस काम के लिए भी उनमें हिम्मत और बहादुरी की कोई कमीं नहीं है | मैं अक्सर सोचता हूँ कि जीतू भाई के पास तो दुआओं का खजाना होगा - उन दुआओं का जो उन्हें उन सब जरूरतमंद, बेसहारा घायल और बीमार जानवरों ने इलाज़ के बाद चंगे हो कर दी होंगीं | मानवता  की तराजू में यह खज़ाना जीतू को दुनिया का सबसे अमीर इंसान बनाता है |   मेरे और मेरे नटखट बदमाश दोस्तों की टीम के लिए जितेन्द्र भाई एक मसीहा की तरह हैं जो हर जरूरत के वक्त अपनी एम्ब्युलेंस और दवाइयों के साथ हाज़िर हो जाते हैं – बिना किसी लोभ के , बिना किसी लालच के | जीव-जंतुओं से उनका भी दिल से रिश्ता है – और रिश्ते का यही तार उन्हें मुझसे भी जोड़ता है | उन्हें मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं |

Tuesday, 30 April 2019

शिंकजी वाले सरदार जी

मैं भी कई बार सोचता हूँ कि आप तक पहुंचाने के लिए नए –नए किस्से कहाँ से लाऊं | इसीलिए अक्सर अपने सभी परिचितों को कहता रहता हूँ कि आप लोग भी कुछ आगे बढिए , कुछ अपनी भी कहिये, कुछ अपनी भी सुनाइये | अपने किस्सों को भी इस ब्लॉग की दुनिया का हिस्सा बनाइये | इस बार का किस्सा आप सब के लिए खोज कर लायें हैं तीन दोस्तों की तिगडी – प्रियंक , अतुल और अभिषेक जिन्होंने अपनी हाल में ही अपनी हिमाचल प्रदेश की सैर सपाटे के दौरान एक बड़ी मनोरंजक हस्ती के बारे में मुझे बताया | आपकी याददास्त के लिए बता दूँ कि यह वही तिकड़ी उसी घुमक्कड़ मस्त्त टीम का हिस्सा है जो कभी हिमाचल प्रदेश के सत्तरह हज्जार फीट के ऊँचें बियाबान बर्फीले इलाके में बुरी तरह से फंस गए थे और आर्मी के सहायता दल ने इनकी जान बचाई थी | इनका मजेदार किस्सा ब्लॉग के "सफ़रनामा:  बुरे फँसे" लिंक पर मौजूद है | 
प्रियंक
अतुल


अभिषेक

इस बार ये दोस्त गए थे तीर्थन( यह जगह का नाम है, इसे आप तीर्थ यात्रा मत समझ लेना ) जो कि हिमाचल प्रदेश के मशहूर हिल स्टेशन कुल्लू के पास है | बहुत ही सुन्दर जगह है और यहाँ के मौसम का तो कहना ही क्या | बस यह समझ लीजिए कि धरती पर मानो स्वर्ग है | पर इस बार बात उस हिल स्टेशन और हिमाचल के स्वर्ग की नहीं हो रही है | इस बार का किस्सा है एक सरदार जी का , जो बताने का कम और देखने की चीज़ ज्यादा है | 

तो हुआ कुछ यूँ कि जब कुछ दिनों की छुट्टियां पहाड़ पर बिताने के बाद घर की ओर वापसी की यात्रा पर थे | कार पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर सरपट दौड़ रही थी | आखिरकार ऊँचा-नीचा पहाड़ी रास्ता पूरा हुआ और तलहटी का समतल सफ़र शुरू हुआ | अब हम कीरतपुर साहिब के पास से गुज़र रहे थे | अचानक देखा सड़क के किनारे कुछ भीड़ सी लगी हुई थी | बड़े-बूढ़े कह गए थे कि पैसा पैसे को खींचता है, पर हमारा मानना है कि इस देश में भीड़ भी भीड़ को खींचती है | यकीन न हो तो सड़क के किनारे डुगडुगी बजा कर बन्दर नचाना शुरू कर दीजिए | फिर देखिए कैसे थोड़ी सी ही देर में पूरा मज़मा लग जाएगा | वजह साफ़ है, हमारे यहाँ कहने को तो हर चीज़ की कमीं है , अगर कोई चीज़ बहुतायत में है तो वह है समय | सो हम भी गाड़ी सड़क किनारे खडी कर शामिल हो गए उसी भीड़ का हिस्सा बन कर | दरअसल वहां एक छोटा सा रेहड़ी नुमा खोखा लगा था जिस में एक सरदार जी बड़ी ही मस्ती से शिंकजी बना कर लोगों को पिला रहे थे | सरदार जी की शिकंजी बनाने की अदा ही इतनी जबरदस्त थी कि जिसे देखकर रजनीकांत और सलमान खान का स्टाइल भी फीका पड़ जाए | किसी ने सच ही कहा है , दुनिया में कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता | आपके उस काम करने की महारत ही आपको सब लोगों की भीड़ से अलग करती है और पहुंचा देती है कामयाबी के ऊँचें मुकाम पर जहां यह शिंकजी वाले सरदार जी भी बहुत जल्द पहुँचने वाले हैं | 

( वीडिओ क्लिप श्री प्रियंक के सौजन्य से )
इन शिकंजी वाले सरदार जी ने कुछ साल पहले ही यह काम बड़े छोटे पैमाने पर एक रेहड़ी लगा कर शुरू किया था | काम के प्रति इनकी लगन और एक अनोखा स्टाइल इन्हें धीरे-धीरे  मशहूर करता चला गया | आज लोगों को हँसते -हँसाते लेमन- सोड़ा  पिला कर इज्ज़त से अपना छोटा सा परिवार जिसमें अपने बूढ़े  माँ -बाप, पत्नी और बच्चे  को पाल-पोस रहें हैं |
अंत में यही कहूँगा - जब भी कभी कुल्लू, मनाली की और जाते हुए कीरतपुर साहब की तरफ से गुजरें , उन सरदार जी का  लेमन सोड़ा जरूर पीयें और जब पी कर  डकार आये तब जोर से बोलिएगा ठण्ड पा

Tuesday, 23 April 2019

अजब तेरी दुनिया - अजब तेरे खेल

मनसा देवी मंदिर - हरिद्वार 
सच मानिए ,यह ज़िंदगी और यह दुनिया इतने चमत्कारों से भरी हुई है कि आप गिनते-गिनते थक जायेंगे पर उस ऊपर वाले की जादूगरी ख़त्म होने का नाम नहीं लेगी | कई ऐसी-ऐसी घटनाएं इस जीवन में हो जाती हैं जो समय के साथ भी कभी भी धुंधली नहीं पड़ती | आप उन चमत्कारी घटनाओं को सारी जिन्दगी बस सोचते ही रह जाते हैं कि ऐसा कैसे हो गया | आप हमेशा के लिए अपनी खोपड़ी खुजाते रह जाते हैं पर यह जटिल पहेली अनसुलझी ही रह जाती है| आज ऐसी ही एक अजीबोगरीब घटना से आपका परिचय कराने जा रहा हूँ जिसे सुनकर आप भी एक बार उस ईश्वरीय शक्ति के बारे में सोचने को मजबूर हो जायेंगे | 

तो यह बात है आज से लगभग बीस-बाईस साल पुरानी | उन दिनों मेरी तैनाती हिमाचल प्रदेश में थी | हरिद्वार वहां से लगभग 2 घंटे की दूरी पर था | अक्सर छुट्टी के दिनों में परिवार सहित गंगा स्नान का कार्यक्रम बन जाता | बच्चे तब छोटे ही थे | रविवार का दिन था, हरिद्वार में मनसा देवी के दर्शन करने पहुँच गए | मेरे परिवार के साथ , एक घनिष्ट मित्र का परिवार भी था | मनसा देवी के मंदिर में दर्शन किए | मंदिर के प्रांगण के बाहर एक लम्बी से ढलानदार संकरी गली थी जिसकी किनारे पर साथ-साथ खाने-पीने के सामान की छोटी-छोटी दुकानें थी | इन हलवाई की दुकानों पर मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की भरपूर भीड़ रहती जो मंदिर की पूजा के बाद सीधे पेट-पूजा के लिए इन दुकानों पर टिड्डी-दल की तरह से हमला बोल देते | हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ | मैं और श्रीमती जी तो मंदिर के गलियारे में ही रुक गए और मेरी बिटिया- साँची , जो उस समय यही कोई पांच वर्ष की होगी, मेरे मित्र परिवार के साथ ही गली पार हलवाई की दुकान पर चली गयी | वे कह कर गए थे कि आप कहाँ परेशान होंगें , यहीं रुकिए, हम खाने-पीने का सामान यहीं लेकर आते हैं , बाद में सब साथ बैठ कर खायेंगे | 

इस बीच में जब मित्र गली के दूसरी ओर हलवाई से सामान लेने में व्यस्त थे, मेरी बिटिया चुपचाप हमारे पास आने के लिए गली पार करने लगी | हम अभी तक बिलकुल अनजान थे कि अचानक बहुत जोरों से लोगों की चीख-पुकार और हल्ला-गुल्ला सुनकर उस गली की और झाँका | क्या देखते हैं कि उस संकरी से ढलवां गली में दस-पन्द्रह गायों का झुण्ड दौड़ लगाता आ रहा है | 

उस गायों के रेवड़ की चपेट में आने से बचने की कोशिश में लोग अपने आप को इधर –उधर कूद –फांद कर बचाने की कोशिश कर रहे थे | सब तरफ शोर-गुल और अफरा-तफरी का नज़ारा था | लोग गली के किनारे से ही घबरा कर कुछ इशारे भी कर रहे थे | अब हम भी अचानक एक अनजाने डर से अंदर तक काँप गए | गली में साँची का कहीं अता-पता नहीं था | बस नज़र आ रहा था तो वह भयानक गति से दौड़ता हुआ मवेशियों का झुण्ड | अब हम भी समझ चुके थे – साँची रेवड़ की चपेट में आकर नीचे गली में ही गिर चुकी थी जिसके ऊपर से वह रेवड़ उसके ऊपर से सरपट दौड़ता जा रहा था | साफ़ लगा कि बिटिया तो बस गयी राम जी के पास | घबराहट के मारे चक्कर सा आ गया, सारा खून  जैसे जम कर बर्फ हो चुका था | जितनी तेजी से वह रेवड़ दौड़ता हुआ आया , उतनी ही तेजी से वह रेवड़ दौड़ता हुआ निकल भी गया | देखा बीच गली में साँची ओंधे मुंह गिरी पड़ी थी | लोगों ने तुरंत दौड़ उसे कर गोद में उठाया |अब तक हम भी दौड़ कर वहां पहुँच चुके थे | साँची बुरी तरह से घबराई हुई और चीखें मार कर रोये जा रही थी | झपट कर तुरंत अपनी गोदी में लेते ही उसकी चोटों का मुआयना किया | पर यह क्या , शरीर पर तो एक भी खरोंच का निशान भी नहीं था | आँखों को मानो यकीन ही नहीं हो रहा था | फिर दोबारा से ध्यान से देखा कि कहीं अंदरूनी चोट तो नहीं , कोई हड्डी तो नहीं टूटी | सब कुछ सही सलामत पाकर जान में जान आयी | सब से बड़े अचम्भे की बात यही कि इतनी रफ़्तार में इतना बड़ा मवेशियों का झुण्ड ऊपर से गुजर जाने के बाद भी नन्हीं साँची को हल्की सी खरोंच भी नहीं आयी | कारण आज तक समझ नहीं आया | इतना अवश्य है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने गए भगवान के मंदिर में जो इतना घोर संकट टल गया, उससे उस परम पिता परमेश्वर के प्रति आस्था और मजबूत हुई | और हाँ , शायद उन भागते हुए मवेशियों में भी इतना ज्ञान और संवेदना मौजूद थी जिन्होनें अपने पांवों की एक भी टाप, उस अबोध छोटी सी बच्ची के शरीर पर नहीं पड़ने दी| गलत नहीं होगा अगर मैं कहूँ कि उस समय ईश्वर की सम्पूर्ण शक्ति उन मवेशियों में उतर आयी थी जिसके कारण साँची के प्राण बच सके |

Thursday, 4 April 2019

भोलू : दर्द से दिल्लगी और दिलेरी तक का सफ़र

आज आप के लिए कोई कहानी- किस्सा नहीं | बस एक छोटी सी खबर | कुछ दिनों पहले आपको सड़क के एक छोटे से पिल्ले भोलू के उस दर्दनाक वाकये के बारे में बताया था जिसमें कार की टक्कर से उसकी टांग की हड्डी टूट गयी थी (अगर नहीं पढ़ा है तो अब पढ़ लीजिए - लिंक : भोलू का दर्द) | कई दिनों तक वह बेचारा जबरदस्त दर्द से गुजरा | बाद में उसकी टांग की महरम पट्टी और प्लास्टर चढ़वाया गया | उस टांग पर चढ़े प्लास्टर से भी लगभग एक महीने तक भोलू का चलना फिरना काफी कठिनाई भरा रहा | मैंने आप सब से अनुरोध किया था कि भोलू के पाँव के ठीक होने के लिए भगवान से दुआ करें क्योंकि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है | बस एक छोटी सी खुशखबरी | मैंने आप से वादा किया था कि जिस दिन भोलू अपने पैरों पर दौड़ेगा मैं आपको वह खुशखबरी भी जरूर दूंगा | आप सब की शुभकामनाओं से नन्हे से भोलू का दर्द अब हो चुका है एकदम गायब, उतर चुका है उसका प्लास्टर और दर्द में कराहता परेशान भोलू अब बन चुका है उछलता- कूदता मस्त- मलंग भोलू | विश्वास नहीं होता तो खुद देख लीजिए नज़ारा|


शुक्रिया आप सब का 




मुझे पूरा विश्वास है आज की इस खबर ने ही आपका दिल खुश कर दिया होगा |

Thursday, 21 March 2019

हैदर का हौसला

ज्यादा पुरानी बात नहीं है | बहुत दिनों से घर पर बैठा बोर हो रहा था | घर से बाहर निकलना ही था सो घूमते- फिरते जा पहुंचा हुमांयू के मकबरे पर जो कि मेरे घर से कोई ख़ास दूर भी नहीं है | यह मकबरा दिल्ली के ख़ास दर्शनीय स्थानों में से एक है जिसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जा चुका है इस जगह पर मुग़ल सल्तनत के बादशाह हुमांयू और उसके वशंजों और ख़ास दरबारियों को यहीं दफनाया गया था | हरे-भरे बाग़ में बसी यह यह सुन्दर सी इमारत मुग़ल वास्तु-कला का जीता-जागता नायाब नमूना है | | ऐतिहासिक महत्त्व का होने के कारण इस जगह पर देशी –विदेशी सैलानियों की भरमार लगी रहती है | किसी समय हरी-भरी दिल्ली आज इस मुकाम पर पहुँच चुकी है कि ताज़ी हवा में सांस लेने के लिए भी मकबरे और कब्रिस्तानों का आसरा लेने की नौबत आ चुकी है | 

हरियाली में घिरा हुमांयू का मकबरा 
तो उस दिन हुआ कुछ ऐसा कि मकबरे में घूमते-घामते, वहां के बाग़ तक भी टहलते हुए पहुँच गया | भीड़-भाड़ से दूर उस हरे-भरे पार्क में एक अनोखी शान्ति विराजमान थी | ताज़ी आबो-हवा और हरियाली उस पूरे माहौल को एक अलग ही ऐसी रंगत दे रही थी जिसे शब्दों में बताना भी मुश्किल है | एक पेड़ की छाँव में बैठा हुआ इस पूरे आलौकिक वातावरण के आनंद में पूरी तरह से खोया हुआ था कि अचानक एक बहुत ही सुरीली आवाज में आलाप लेता हुआ एक बीस-बाईस साल का लड़का नज़र आया | वह उस पार्क के चक्कर काट रहा था पर लगता था जैसे किसी और ही दुनिया में खोया हुआ है | पहली नज़र से देखने में ही वह एक अलग ही दुनिया का बाशिंदा महसूस हो रहा था क्योंकि उसके गले से संगीत की मीठी स्वर-लहरियां किसी पहाड़ी झरने की तरह से फूट रहीं थी | मेरे पास से जैसे ही वह गुज़रा, मैं स्वयं को उससे बात करने से रोक नहीं पाया | उसने अपने बारे में जो भी बताया वह मेरे दिमाग़ को झकझोरने के लिए काफी था | आइये आज आपसे भी उस बातचीत को साझा करता हूँ -
हैदर का बचपन  

उस लड़के का नाम है - हैदर अंसारी | बचपन से निहायत ही गरीबी के माहौल से टक्कर लेते हुए किसी तरह से गुज़र-बसर हो रही है | पिता की मौत तभी हो गयी जब हैदर महज सात साल का था | 
दिवंगत अब्बू के साथ हैदर 
हालात इतने खराब हो चले कि जिस माँ ने कभी घर से बाहर कदम नहीं रखा, परिवार पालने के लिए बेचारी को पान के खोखे पर बैठना पड़ा | बचपन से ही हैदर और उसके भाइयों को भी इस काम में हाथ बटाने के लिए दुकान पर भी बैठते |
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं
इस तंगहाल ज़िंदगी से परेशान हूँ मैं 

(फोटो सौजन्य : मौहम्मद समीर)
हुमांयू के मकबरे के इलाके में ही बसी हुई झौंपड-पट्टी में रहा | कुछ साल पहले मकबरे की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का काम जब आगा खां ट्रस्ट और भारत सरकार द्वारा हाथ में लिया गया तब उस बस्ती को ही गिरा दिया गया | सर पर जो आसरा था वह भी छिन गया | वह तो गनीमत थी कि सरकार ने इस बात का ख्याल रखा कि बस्ती से उजड़ कर जाने वालों को तीस किलोमीटर दूर रहने की जगह दिलवा दी | पर हालत तो अब इस मायने में और बुरी हो गयी कि रिहाइश दिल्ली के एक कोने में और काम-धंधा वहां से इतनी दूर | हैदर को इस बात का बहुत मलाल है कि माँ को रोज काम के सिलसिले में ३० किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है | पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर हैदर ने बताया कि वह बारहवीं कक्षा तक दिल्ली पब्लिक स्कूल , मथुरा रोड से पढ़ा है | यह दिल्ली का नामी-गिरामी स्कूल है जहां पर अच्छे-अच्छे अमीर और खासे रसूख वाले लोग भी अपने बच्चों का दाखिला करवाने के लिए तरसते हैं | हैदर वहां कैसे पहुँच गया ? खुद हैदर ने यह राज़ खोला कि इस इतने नामचीन स्कूल में दाखिला मिलने में भी आखिर उसकी गरीबी ही काम आयी | सरकारी दिशानिर्देशों के कारण उन पब्लिक स्कूलों के लिए आस-पास के इलाकों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए भी दाखिला देने की बाध्यता होती है | सुनकर एक बारगी तो मैं भी सोच में पड़ गया- पैसा जहां काम न आया, ग़ुरबत ने अपना काम कर दिया | हाँ इतना जरूर था कि सुबह के समय साहबी बच्चों के बाद ही उन गरीब बच्चों के लिए स्कूल में शाम के समय अलग शिफ्ट में पढ़ाई करवाई जाती जिससे राजा और रंक में हमेशा से चला आ रहा फर्क आगे आने वाली नस्लों में भी बाकायदा बरकरार रहे |
अब बात आयी संगीत के शौक की तो हैदर ने बताया कि यह जुनून तो उसमें बचपन से ही है | हाँ इतना जरूर है कि पैसे की किल्लत के कारण इसकी विधिवत शिक्षा उस प्रकार से नहीं ले पाया जैसी होनी चाहिए थी | इस बात का मलाल आज भी उसे है कि संगीत के गुरू का हाथ अगर सर पर होता तो शायद आज वह भी उस मुकाम से बहुत बेहतर होता जहां आज है | वह महसूस करता है कि उसकी हालत बहुत कुछ उस नौसीखिए तैराक की तरह है जिसे समुद्र में सीधे धकेल दिया गया हो| अपने हाथ-पाँव मार कर , संगीत के प्रति जन्मजात रुझान और शौक की वजह से और दूसरे अच्छे गायकों को सुन-सुन कर ही खुद रियाज़ कर लेता है | जहां कहीं भी कोई संगीत का कार्यक्रम होता है कोशिश होती है अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिल जाए , चाहे पैसा न भी मिले | 
गाने का दीवाना : हैदर अंसारी 
हैदर बताते हैं कि इनके कई गाने यू ट्यूब पर भी हैं | पैसे की तंगी के बावजूद , इन गानों की वीडिओ रिकार्डिंग भी किसी न किसी तरह से करवा ही लेते हैं| कभी दोस्तों से उधार ले कर तो कभी मदद लेकर | यही कारण है कि ज्यादातर म्यूजिक वीडिओ में हैदर किसी और के साथ नज़र आते हैं | ये दूसरे कलाकार अक्सर वही होते हैं जो उस वीडिओ के लिए आर्थिक योगदान देने में सक्षम होते हैं | यह बात नहीं है कि इन साथी कलाकारों के हुनर में किसी प्रकार की कमीं है , उनकी गायकी अपनी जगह और आर्थिक सहायता अपनी जगह | स्वभाव से ही संवेदनशील हैदर बहुत कम बोलने वाला और अपनी ही दुनिया में खोया रहता है | दिमाग में उधेड़-बुन चलती रहती है जब कोई नया गीत जन्म ले रहा होता है | अपनी माँ के प्रति आदर और सम्मान देने के लिए अन्य साथी कलाकार- अल्ताफ शाह  के साथ एक म्यूजिक वीडिओ बनाया है जिसे आप भी पसंद करेंगे | हैदर की यही दिली इच्छा है कि संगीत की दुनिया में इतना नाम कमाए कि माँ को मेहनतकश ज़िंदगी से निजात मिल सके | नीचे के लिंक पर आपके लिए उसी गीत को दे रहा हूँ , जरूर सुनिएगा :

और हाँ , चलते-चलते मेरे दिमाग में एक फितूरी ख्याल भी मंडरा रहा है | पुराने ज़माने में बादशाहों के दरबारियों में संगीतज्ञों और गायकों की ख़ास इज्ज़त होती थी जैसे तानसेन, बैजूबावरा | मुझे लगता है उन जैसे ही किसी की आत्मा हैदर के रूप में आज भी उस मकबरे में सोये पड़े शाही खानदान का सुरीला मनोरंजन कर रही है |



Friday, 15 March 2019

भोलू का दर्द

उस दिन सुबह-सुबह एक पिल्ले की दर्दनाक चीखों की आवाज सुनकर बिस्तर छोड़ कर घर के बाहर निकला | मैं मोहल्ले की उस पूरी कुत्ते और पिल्ले बिरादरी से पहले से ही भली तरह से परिचित था | आप यह भी समझ सकते हैं कि एक तरह से वो सब मेरे दोस्त रहें हैं – और मेरे घर के रेम्प पर ही उनका रात भर जमावड़ा रहता है | हर सुबह घर से बाहर निकलने पर सबसे पहले उनकी टीम ही मेरा उछल-कूद कर हार्दिक अभिनन्दन करती है | महानगरों की आज की संस्कृति में, जब पड़ोसी भी पड़ोसी को नहीं पहचानता है, ऐसे में ये बेजुबान दोस्त ही रह जाते हैं इंसानों को यह याद दिलाने के लिए कि इस दुनिया में अगर आप भूल चुके हैं अपनेपन की भावना को तो हम से सीखो | क्या देखता हूँ सड़क के किनारे एक पिल्ला भयंकर पीड़ा में पड़ा रो रहा है | उसकी इन चीखों को सुनकर उसकी माँ भी तुरंत दौड़ती हुई आ गयी | उसी पिल्ले के , जिसे हम आगे भोलू के नाम से पुकारेंगे, छोटे-छोटे अन्य साथी भी आनन-फ़ानान में आ पहुँचे | उन साथियों में से एक ने तो महीन सी आवाज में रोना भी शुरू कर दिया | एक दूसरे साथी ने शायद भोलू का ध्यान बटा कर दर्द कम करने की कोशिश में, उसके साथ हल्का सा खिलवाड़ करने की तरकीब आजमानी चाही | पर हुआ इसका ठीक उल्टा असर – भोलू की माँ को यह कोशिश नागवार गुज़री और उस शरारती दोस्त को बुरी तरह से झिंझोड़ कर ऐसा करने से रोक दिया | भोलू की माँ का गुस्सा पूरे सातवें आसमान पर था | गुस्से में उसने सड़क के पास से निकलने वाले एक राहगीर को काटने की भी कोशिश की | अब तक मैं वहां खड़ा सारी स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहा था | क्या देखता हूँ कि थोड़ी ही दूर सड़क पर एक कार खडी हुई है | अब मैं समझ चुका था , यह वही तेज रफ़्तार कार थी जो कुछ ही देर पहले भोलू की टांग को बुरी तरह से कुचलती हुई आगे निकल गयी थी | गाड़ी में बैठा नवयुवक, अन्दर से ही रियर- व्यू मिरर से अपनी करनी का नतीजा देख रहा था | पता नहीं कैसा इंसान था, इतनी मानवता भी नहीं थी कि कम से कम गाडी से नीचे उतर कर उस रोते हुए बेजुबान निरीह प्राणी को एक नज़र देख तो लेता | कुछ ही देर में उसने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और चलता बना | 

भोलू का अब भी रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था | कुछ देर बाद बेचारे ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपने तीन टांगों के सहारे से ही सड़क के किनारे एक पेड़ की छाँह तक पहुंचा और निढाल हो कर एक तरह से बेहोश हो कर पड़ गया | अभी तक मैं भी उसे उठाने की कोशिश नहीं कर रहा था और उससे पहले लगी चोट का जायजा लेना चाह रहा था | भाग्यवश भोलू को बाहर से खून नहीं निकला था पर पैर में शायद अंदरूनी चोट थी| दोपहर तक भी उस गरीब का वही खराब हाल था | अब सोचा इसे किसी डाक्टर को दिखा देता हूँ , पर मेरे घर के पास का डाक्टर तो साहबों के कीमती कुत्तों का डाक्टर था और उसकी मोटी ताज़ी फीस भी मुझ रिटायर्ड आदमी की पहुँच से बाहर | एक और एन.जी.ओ. डिस्पेंसरी का पता चला जो काफी हद तक ठीक –ठाक थी| दोपहर को उस अस्पताल में भोलू को लेकर पहुंचा | डाक्टर ने मुआयना करके दो इंजेक्शन लगा दिए और कहा इससे ही आराम आ जाना चाहिए | अब भोलू को वापिस ले आया | बेचारे का दर्द दो दिन के बाद भी वैसा ही | फिर से उसी अस्पताल में भोलू को ले कर गया | इस बार डाक्टर ने भी मेरे आग्रह करने पर और ज्यादा ध्यान से मुआयना किया क्योंकि मैं उसे इस बार भी भुगतान करने का आश्वासन भी दे चुका था | पता चला भोलू के पाँव में फ्रेक्चर था | अब उस फ्रेक्चर पर बाकायदा प्लास्टर चढ़ाया गया | उस पूरे समय भोलू बेचारा दर्द से चीखें मारता रहा | खैर .... जैसे- तैसे प्लास्टर करवा कर वापिस घर आया | तौलिये में लिपटे भोलू को देखते ही उसकी सारी दोस्तों की मंडली ने खुश होकर घेर लिया और उसकी माँ की खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही नहीं था | मेरे घर में भोलू ज्यादा देर नहीं रुका | उसके दोस्त गेट के बाहर से ही शोर मचा-मचा कर मानों पूछ रहे हों – हाल कैसा है जनाब का |आखिर घर के बाहर पार्क में बने उसके पुराने अड्डे पर उसे छोड़ दिया | प्लास्टर बंधी टांग से पहले दिन तो भोलू परेशान रहा पर अगले दिन से उसे काफी हद तक आराम मिला | उसके दोस्त अब आस-पास ही घूमते रहते हैं जिससे भोलू का मन भी लगा रहता है | आइये आप को भोलू के दर्शन भी करवा देता हूँ :
भोलू का बेड रेस्ट 


दोस्त मेरे साथ है - अब पहले से कुछ आराम है 

अब अगर आराम है तो थोडा घूमने में क्या बुराई है 
मेरी आप सभी से केवल एक गुजारिश है : जब कभी भी अपनी गाड़ी में बैठें, उससे पहले एक बारगी नीचे झाँक कर अवश्य देख लें कहीं कोई बेसहारा कुत्ता, गर्मी से बचने के लिए , छांह की आस में , उसके नीचे तो नहीं बैठा | हम सब इंसान हैं इसलिए सड़क पर गाड़ी भी इंसानों की तरह से ही चलायें जिससे किसी को भी चोट न लगे – चाहे वह इंसान हो या जानवर | अगर आप को ध्यान हो , केरी की दर्दनाक मौत भी स्कूल बस की लापरवाही से ही हुई थी | (एक थी केरी -  भाग 2 )
अब तो मुझे बस इंतज़ार है जब चालीस दिनों के बाद भोलू के पाँव का प्लास्टर कटेगा | मैं उसके पाँव के ठीक होने की ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ और आप भी करिए क्योंकि प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है | जिस दिन भोलू अपने पैरों पर दौड़ेगा मैं आपको वह खुशखबरी भी जरूर दूंगा | आप भी इंतज़ार कीजिए |

भूला -भटका राही

मोहित तिवारी अपने आप में एक जीते जागते दिलचस्प व्यक्तित्व हैं । देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं । उनके शौक हैं – ...